Akhil Bharatiya Prashasnik Kosh
Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Language-linguistics0 Ratings
Price: ₹ 1200
₹
1500
Available
आज हिंदी की स्थिति लगभग वही है। स्वतंत्रता के बाद जो शब्दावली बनी है, बन रही है उससे हिंदी की सामर्थ्य स्वयंसिद्ध हो गई है। हिंदी का विस्तृत क्षेत्र जहाँ लोकभाषाओं से हिंदी को शब्दावली प्रदान कर रहा है वहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के लेखक तथा प्रशासक भी हिंदी को नई अर्थ-व्यंजनाएँ प्रदान कर रहे है। समय ही इस शब्दावली को मानक रूप प्रदान करेगा जिससे मानक शब्दावली में निश्चितार्थता एवं बोधागम्यता बढ़ती जाएगी। हिंदी भाषा-भाषी राज्यों की राजभाषा के रूप में हिंदी को मान्यता मिल चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश एवं केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली-चंडीगढ़ आदि ने अपना सभी सरकारी कामकाज हिंदी में करना प्रारंभ कर दिया है। इसके साथ ही पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात की सरकारों ने भी हिंदी को केंद्र के साथ पत्र-व्यवहार के लिए संपर्क भार्षा के रूप में स्वीकार कर लिया है। सभी हिंदी भाषी राज्यों की जनता द्वारा अपने प्रशासन संबंधी कार्य को हिंदी में ही करने से हिंदी का महत्त्व स्वयं बढ़ता जा रहा है।
ISBN: 9789352664122
Pages: 440
Avg Reading Time: 15 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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बीसवीं सदी के विश्व-कवियों में पाब्लो नेरुदा, नाज़िम हिकमत, ब्रेख़्त और महमूद दरवेश के साथ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और बांग्लादेश अर्थात् इस महाद्वीप के कवियों में रवीन्द्रनाथ टैगोर और इक़बाल के बाद फ़ैज़ को ही हम लोग याद करते हैं। फ़ैज़ आज़ादी, समाजवाद, सहज मानवीय ममता और गहरी प्रेमानुभूति के शायर के रूप में मशहूर रहे हैं। उनकी ग़ज़लें और नज़्में लोगों की स्मृतियों में बस गई हैं और उनकी ज़बान पर चढ़ी हुई हैं। फ़ैज़ की शायरी आम लोगों की मुसीबतों, संघर्षों और अटूट संकल्पों की ऐसी गाथा है जिसे उर्दू ही नहीं, हिन्दी के पाठक भी अपनी साहित्यिक विरासत का हिस्सा मानते हैं।
फ़ैज़ के क़लमकार और शायर के सम्पूर्ण रचनाकर्म पर हिन्दी में यह पहली आलोचनात्मक पुस्तक है। इस किताब में उनके समकालीन मुल्कराज आनन्द, सिब्ते हसन, सज्जाद ज़हीर, वज़ीर आगा के लेख तो हैं ही, उनके अलावा उर्दू के बड़े लेखकों में मुहम्मद हसन, शमीम हनफ़ी, अली मुहम्मद सिद्दीक़ी, जुबैर रिज़वी, शमीम फ़ैज़ी और अली अहमद फ़ातमी की आलोचनात्मक कृतियाँ इस पुस्तक में संकलित कर ली गई हैं। इस किताब की दूसरी बड़ी ख़ूबी यह है कि शमशेर बहादुर सिंह के बाद इसमें हिन्दी के अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाकारों ने जन्मशताब्दी वर्ष में फ़ैज़ पर पहली बार लिखा है। मसलन केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, असग़र वजाहत, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, मनमोहन, असद ज़ैदी, कृष्ण कल्पित, अरुण कमल, प्रणय कृष्ण, वैभव सिंह के लेखों के साथ तीनों सम्पादकों की अलग-अलग ढंग से लिखी आलोचनात्मक कृतियाँ इस किताब का विशेष आकर्षण हैं। दृश्य-श्रव्य कलाओं के मर्मज्ञ सुहैल हाशमी, इतिहासकार ज़हूर सिद्दीक़ी, युवा लेखिका अर्जुमंद आरा और पंजाबी के मशहूर लेखक सतिन्दर सिंह नूर के लेखों के कारण इस किताब में अनेक अनछुए प्रसंगों पर भी भरपूर चर्चा की गई है। इस पुस्तक को छह लेखकों-विद्धानों की टोली ने भरपूर मेहनत के साथ तैयार किया है। इनमें तीन सम्पादक हैं जिन्हें रेखा अवस्थी, जवरी मल्ल पारख और संजीव कुमार जैसे सहयोगी सम्पादकों के कठिन अध्यवसाय और परिश्रम की सहायता मिलती रही है। हिन्दी-उर्दू और पंजाबी भाषी लोग इस पुस्तक को अवश्य ही पसन्द करेंगे।
Ram Manohar Lohiya Aacharan Ki Bhasha
- Author Name:
Ram Kamal Rai
- Book Type:

- Description: डॉ. राममनोहर लोहिया जितने बड़े विचार- पुरुष थे, उतने ही बड़े आचारण-पुरुष; जितने बड़े संस्कृति-पुरुष थे, उतने ही बड़े विधि पुरुष थे; उतने ही बड़े सत्याग्रह-पुरुष। डा. लोहिया के लिए धर्म दीर्घकालिक राजनीति था, और राजनीति अल्पकालिक धर्म। लोहिया सिद्धान्त को साधारणीकृत कार्यक्रम मानते थे और कार्यक्रम को ठोस व्यवहार-गत सिद्धान्त। वे कथनी और करनी के बीच किसी भेद को स्वीकार नहीं करते थे। लोहिया विश्व बन्धुत्व में विश्वास करते थे और विश्वयारी को गर्हित समझते थे। आचरण उनके लिए विचार की कसौटी था । लोहिया वैचारिकता के धरातल पर बहुत परिपक्व और स्पष्ट दृष्टि वाले नेता थे। उन्होंने समाजवाद के अपने चिन्तन को भारतीय परिस्थितियों और भारतीय संस्कृति-चेतना से जोड़कर महात्मा गाँधी के विचारों और आचरण से सम्बद्ध करके विकसित किया था। आचरण और विचार की एकता की परम्परा भारतीय समाज में अधिक से अधिक जगह बना सके, यही इस पुस्तक का उद्देश्य है।
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