Hum, Bharat Ke Rajyon Ke Log
(0)
Author:
Sachin Chauhan, Sanjeev ChopraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
995
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भारत के नौ प्रान्त तथा वे 562 रियासतें जो अगस्त, 1947 में मौजूद थीं, आज आज़ादी के 75वें साल में देश के नक़्शे पर कहीं दिखाई नहीं देतीं, यह तथ्य अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक सीमाओं को लेकर अपने नागरिकों को विश्वास में लेने की राष्ट्र की क्षमता को दर्शाता है। राज्यों के मद्देनज़र भारत की पुनर्कल्पना की प्रक्रिया एक तरफ़ जहाँ प्रशासनिक ज़रूरतों से प्रभावित हुई, वहीं आन्तरिक सीमाओं का पुनर्गठन विभिन्न भाषायी और जातीय समूहों की आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए भी हुआ, वे समूह जो राज्य और संघीय राजनीति में अपना स्थान चाहते थे। प्रस्तुत अध्ययन डॉ. संजीव चोपड़ा ने राज्य अभिलेखों और भूमि बन्दोबस्त के लिए भूमि मापन उपकरणों पर शोध के रूप में शुरू किया था, जो होते-होते राज्य सीमाओं के मानचित्रण तथा भारत के भूगोल के माध्यम से इसके समकालीन राजनीतिक इतिहास के आख्यान के रूप में बदल गया। इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग, भाषायी पुनर्गठन आयोग, राजकीय दस्तावेजों और विदेश तथा राष्ट्रमंडल कार्यालय के दस्तावेजों से ली गई मूल्यवान सामग्री के साथ इस आख्यान को रचा गया है। राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के 1947 से अब तक हुए एकाधिक सीमा-निर्धारणों के बारे में यह पुस्तक प्रामाणिक तथ्यों के साथ प्रकाश डालती है। यह बताती है कि भारत ने कैसे अपने आपको लगातार पुनर्परिभाषित किया है और कर रहा है।
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भारत के नौ प्रान्त तथा वे 562 रियासतें जो अगस्त, 1947 में मौजूद थीं, आज आज़ादी के 75वें साल में देश के नक़्शे पर कहीं दिखाई नहीं देतीं, यह तथ्य अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक सीमाओं को लेकर अपने नागरिकों को विश्वास में लेने की राष्ट्र की क्षमता को दर्शाता है। राज्यों के मद्देनज़र भारत की पुनर्कल्पना की प्रक्रिया एक तरफ़ जहाँ प्रशासनिक ज़रूरतों से प्रभावित हुई, वहीं आन्तरिक सीमाओं का पुनर्गठन विभिन्न भाषायी और जातीय समूहों की आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए भी हुआ, वे समूह जो राज्य और संघीय राजनीति में अपना स्थान चाहते थे।
प्रस्तुत अध्ययन डॉ. संजीव चोपड़ा ने राज्य अभिलेखों और भूमि बन्दोबस्त के लिए भूमि मापन उपकरणों पर शोध के रूप में शुरू किया था, जो होते-होते राज्य सीमाओं के मानचित्रण तथा भारत के भूगोल के माध्यम से इसके समकालीन राजनीतिक इतिहास के आख्यान के रूप में बदल गया। इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग, भाषायी पुनर्गठन आयोग, राजकीय दस्तावेजों और विदेश तथा राष्ट्रमंडल कार्यालय के दस्तावेजों से ली गई मूल्यवान सामग्री के साथ इस आख्यान को रचा गया है।
राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के 1947 से अब तक हुए एकाधिक सीमा-निर्धारणों के बारे में यह पुस्तक प्रामाणिक तथ्यों के साथ प्रकाश डालती है। यह बताती है कि भारत ने कैसे अपने आपको लगातार पुनर्परिभाषित किया है और कर रहा है।
Book Details
-
ISBN9789360861117
-
Pages364
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
Loktantra Ki Chaukidari
- Author Name:
Steven Levitsky and Daniel Ziblatt +1
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लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। — दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। — डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि वह किस प्रकार शासित हो रहा है। संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में जानकारी के प्रचार-प्रसार के लिए जो भी किया जा सके देश हित में होगा। इसी भावना के साथ सरल और सुगम शब्दों में लिखी गई यह संक्षिप्त पुस्तिका हमारे संविधान का संक्षिप्त परिचय देती है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
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