Hum, Bharat Ke Rajyon Ke Log
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भारत के नौ प्रान्त तथा वे 562 रियासतें जो अगस्त, 1947 में मौजूद थीं, आज आज़ादी के 75वें साल में देश के नक़्शे पर कहीं दिखाई नहीं देतीं, यह तथ्य अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक सीमाओं को लेकर अपने नागरिकों को विश्वास में लेने की राष्ट्र की क्षमता को दर्शाता है। राज्यों के मद्देनज़र भारत की पुनर्कल्पना की प्रक्रिया एक तरफ़ जहाँ प्रशासनिक ज़रूरतों से प्रभावित हुई, वहीं आन्तरिक सीमाओं का पुनर्गठन विभिन्न भाषायी और जातीय समूहों की आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए भी हुआ, वे समूह जो राज्य और संघीय राजनीति में अपना स्थान चाहते थे। प्रस्तुत अध्ययन डॉ. संजीव चोपड़ा ने राज्य अभिलेखों और भूमि बन्दोबस्त के लिए भूमि मापन उपकरणों पर शोध के रूप में शुरू किया था, जो होते-होते राज्य सीमाओं के मानचित्रण तथा भारत के भूगोल के माध्यम से इसके समकालीन राजनीतिक इतिहास के आख्यान के रूप में बदल गया। इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग, भाषायी पुनर्गठन आयोग, राजकीय दस्तावेजों और विदेश तथा राष्ट्रमंडल कार्यालय के दस्तावेजों से ली गई मूल्यवान सामग्री के साथ इस आख्यान को रचा गया है। राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के 1947 से अब तक हुए एकाधिक सीमा-निर्धारणों के बारे में यह पुस्तक प्रामाणिक तथ्यों के साथ प्रकाश डालती है। यह बताती है कि भारत ने कैसे अपने आपको लगातार पुनर्परिभाषित किया है और कर रहा है।
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About the Book
भारत के नौ प्रान्त तथा वे 562 रियासतें जो अगस्त, 1947 में मौजूद थीं, आज आज़ादी के 75वें साल में देश के नक़्शे पर कहीं दिखाई नहीं देतीं, यह तथ्य अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक सीमाओं को लेकर अपने नागरिकों को विश्वास में लेने की राष्ट्र की क्षमता को दर्शाता है। राज्यों के मद्देनज़र भारत की पुनर्कल्पना की प्रक्रिया एक तरफ़ जहाँ प्रशासनिक ज़रूरतों से प्रभावित हुई, वहीं आन्तरिक सीमाओं का पुनर्गठन विभिन्न भाषायी और जातीय समूहों की आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए भी हुआ, वे समूह जो राज्य और संघीय राजनीति में अपना स्थान चाहते थे।
प्रस्तुत अध्ययन डॉ. संजीव चोपड़ा ने राज्य अभिलेखों और भूमि बन्दोबस्त के लिए भूमि मापन उपकरणों पर शोध के रूप में शुरू किया था, जो होते-होते राज्य सीमाओं के मानचित्रण तथा भारत के भूगोल के माध्यम से इसके समकालीन राजनीतिक इतिहास के आख्यान के रूप में बदल गया। इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग, भाषायी पुनर्गठन आयोग, राजकीय दस्तावेजों और विदेश तथा राष्ट्रमंडल कार्यालय के दस्तावेजों से ली गई मूल्यवान सामग्री के साथ इस आख्यान को रचा गया है।
राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के 1947 से अब तक हुए एकाधिक सीमा-निर्धारणों के बारे में यह पुस्तक प्रामाणिक तथ्यों के साथ प्रकाश डालती है। यह बताती है कि भारत ने कैसे अपने आपको लगातार पुनर्परिभाषित किया है और कर रहा है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 1st
- Publication year
- 2024
- Weight
- 1000 grams
- ISBN-13
- 9789360861117
- Pages
- 364
- Reading time
- ~12 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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पिछले दो दशकों के दौरान, मध्य भारत में व्यापक रूप से वनों से आच्छादित और खनिज के मामले में समृद्ध बस्तर का इलाका देश में सबसे अधिक सैन्यीकृत स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। सरकार माओवादी उग्रवाद को भारत की ‘सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताती है। वर्ष 2005 में राज्य-प्रायोजित एक हथियारबन्द आन्दोलन, सलवा जुडुम, ने सैकड़ों गाँवों को जला दिया और मलेशिया, वियतनाम एवं अन्य जगहों पर विकसित आतंकवाद-विरोधी रवैये का अनुसरण करते हुए उन गाँवों के निवासियों को राज्य-नियंत्रित शिविरों में हाँक दिया। बलात्कार और हत्याओं के अलावा, ‘आत्मसमर्पण’ कर चुके सैकड़ों माओवादी समर्थकों को जबरन सहायक के रूप में भरती किया गया। संघर्ष आज भी जारी है, जो आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और माओवादी कैडरों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। वर्ष 2007 में, नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य लोगों ने इस संघर्ष से उत्पन्न मानवाधिकार-हनन के मुद्दे पर भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा। वर्ष 2011 में दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, न्यायालय ने हथियारबन्द गिरोह के लिए राज्य के समर्थन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि, सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया है। ‘दावानल : माओवाद से जंग’ पुस्तक भारत के हृदयस्थल में चल रहे इस क्रूर युद्ध का वर्णन करती है और देश की अदालतों, मीडिया, राजनीति और अन्त में भारतीय लोकतंत्र की हकीकत बयान करती है। यह इलाके की व्यापक यात्राओं, अदालती साक्ष्यों, सरकारी दस्तावेजों और उन घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका पर आधारित है।
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि वह किस प्रकार शासित हो रहा है। संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में जानकारी के प्रचार-प्रसार के लिए जो भी किया जा सके देश हित में होगा। इसी भावना के साथ सरल और सुगम शब्दों में लिखी गई यह संक्षिप्त पुस्तिका हमारे संविधान का संक्षिप्त परिचय देती है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
Bisaveen Sadi Ke Tanashah
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
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तानाशाही एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा का नतीजा होती है या कुछ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं जो किसी एक व्यक्ति के रूप में खुद को प्रकट करती हैं? क्या समाजों और राष्ट्रों के जीवन में कोई ऐसा क्षण आता है जब जन-गण स्वयं आत्मघाती हो उठता है और आँख मूँदकर किसी अधिनायक के पीछे चल पड़ता है? आज इक्कीसवीं सदी के इतने पारदर्शी समय में तानाशाही क्या किसी नए रूप की तलाश करेगी; और इन सवालों की रोशनी में हम, जो दुनिया के लोकतान्त्रिक देशों में अग्रणी रहे हैं, खुद को कहाँ देखते हैं! ‘बीसवीं सदी के तानाशाह’ मोटे तौर पर इन्हीं सवालों के जवाब तलाश करती है; कहने की जरूरत नहीं कि आज हमारे सामने मौजूद सबसे अहम सवाल भी यही है। हिटलर, स्तालिन, मुसोलिनी, उत्तरी कोरिया के किम इल-सुंग, चिली के ऑगस्तो पिनोशे और युगांडा के ईदी अमीन पर केन्द्रित इस पुस्तक का हर अध्याय इन नेताओं के समय की आन्तरिक और विश्व-राजनीति के निर्णायक आयामों पर रोशनी डालते हुए बताता है कि ये लोग कैसे उठे, कैसे गिरे और दुनिया ने, दुनिया के विचारकों ने उन्हें कैसे देखा-समझा। इतिहास अध्येता के रूप में अशोक कुमार पाडेय इतिहास के उन अध्यायों को हिन्दी पाठक के समक्ष लाते रहे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध हमारी मौजूदा और आवश्यक प्रश्नाकुलताओं से है। इस प्रक्रिया में विचार उनका सहगामी रहा है। यह किताब इस यात्रा का एक और पड़ाव है और पाठकों को निश्चय ही अपने समय को लेकर सोचने और अपना पक्ष चुनने में मदद करेगी।
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