Madhyakalin Bharat Me Rajniti
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
350
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इस पुस्तक को लिखने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि इतिहास और राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी मात्र इतिहासक्रम के अध्ययन से ही संतुष्ट नहीं होते अपितु वे ऐतिहासिक प्रक्रिया के विश्लेषण को भी महत्व प्रदान करते हैं और यही विषय को समझने की उनकी दृष्टि को भी विकसित करती है। इसी प्रकार के अध्ययन से समाज की शक्तियों और राज्य की शक्तियों की परस्परता और अंतरक्रियाएं समझ आती हैं।<br>इस कृति में इस्लाम के अंतर्गत राज्य की अवधारणा की पृष्ठभूमि में मध्यकालीन भारत में राज्य की प्रकृति का विश्लेषण; दोनों विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों, यथा उलेमा (धर्माधिकारियों) तथा उमरा (अमीरों) की संरचना, विशेषताओं और समकालीन राज्य में उनकी भूमिका की व्याख्या की गई है अर्थात ऐतिहासिक घटनाक्रम के कारणों की पड़ताल पर विशेष जोर दिया गया है।
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इस पुस्तक को लिखने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि इतिहास और राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी मात्र इतिहासक्रम के अध्ययन से ही संतुष्ट नहीं होते अपितु वे ऐतिहासिक प्रक्रिया के विश्लेषण को भी महत्व प्रदान करते हैं और यही विषय को समझने की उनकी दृष्टि को भी विकसित करती है। इसी प्रकार के अध्ययन से समाज की शक्तियों और राज्य की शक्तियों की परस्परता और अंतरक्रियाएं समझ आती हैं।<br>इस कृति में इस्लाम के अंतर्गत राज्य की अवधारणा की पृष्ठभूमि में मध्यकालीन भारत में राज्य की प्रकृति का विश्लेषण; दोनों विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों, यथा उलेमा (धर्माधिकारियों) तथा उमरा (अमीरों) की संरचना, विशेषताओं और समकालीन राज्य में उनकी भूमिका की व्याख्या की गई है अर्थात ऐतिहासिक घटनाक्रम के कारणों की पड़ताल पर विशेष जोर दिया गया है।
Book Details
-
ISBN9789393603692
-
Pages327
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक भगवान सिंह की यह पुस्तक इस अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण आरम्भ है। इसमें उन्होंने न सिर्फ़ कोसंबी की मौलिक उद्भावनाओं और स्थापनाओं पर विस्तार से विचार किया है, बल्कि उनकी प्रतिपादन-पद्धति का भी विश्लेषण किया है। साथ ही व्यक्ति कोसंबी और एक विलक्षण प्रतिभा के रूप में बनी उनकी 'मूरत' को भी समझने की कोशिश की है। कोसंबी के नाम-जाप से ही अपनी उपलब्धियों का आकाश छूनेवाले इतिहासकारों के विपरीत भगवान सिंह ने इस सुचिन्तित अध्ययन में उनके अन्तर्विरोधों को भी रेखांकित किया है। आमुख में वे लिखते हैं, ‘हमारा अपना प्रयत्न कोसंबी को समझने का रहा है, परन्तु जहाँ वे अपने ही सिद्धान्त के विपरीत आचरण करते दिखाई देते हैं या अपनी सैद्धान्तिकी के विपरीत दावे करते हैं...वहाँ उनकी निन्दा के लिए भी बाध्य हुए हैं।’
कहना न होगा कि यह पुस्तक इतिहासवेत्ता कोसंबी को समझने में इतिहास के विद्वानों और अध्येताओं के लिए बहस के नए बिन्दु प्रस्तावित करेगी।
Bharat Ke Prasiddha Kile
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

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भारत के प्रत्येक किले में हमारे देश के अतीत का एक विशेष क्षण छिपा हुआ है। इन किलों ने न जाने कितने आक्रमण सहे, जाने कितने युद्धों को प्रत्यक्ष देखा, और जाने कितने रक्तपात और वैभव को अपनी मजबूत दीवारों में सहेजा-समेटा है।
प्राचीन भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में आज जो जानकारी किलों से मिलती है उसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रत्येक किला हमारे लोमहर्षक इतिहास का एक जीवन्त अध्याय है। लेकिन भारतीय राजवंशों के उतार-चढ़ावों की दिलचस्प कथाएँ बताने वाले और इतिहास के स्वर्णिम युगों के गवाह इन किलों में से अनेक अब खँडहर बन गए हैं, भूत-बँगले हो गए हैं। कुछ किले पुरातत्व विभाग के अधीन होकर भी अपनी किस्मत को रो रहे हैं।
यह भी एक तथ्य है कि कुछ प्रमुख किलों को छोड़ दें तो ज्यादातर किलों के बारे में साधारणजन पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। गुणाकर जी की यह पुस्तक भारत के किलों के बारे में एक विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। 300 से ज्यादा चित्रों और नक्शों से सुसज्जित इस पुस्तक में प्रत्येक प्रदेश के किलों का सिलसिलेवार विवरण दिया गया है और उनके स्थापत्य तथा उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है।
Itihas Chakkra
- Author Name:
Rammanohar Lohia
- Book Type:

- Description: वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे नेताओं की कमी बहुत खलती है जो सत्ता की तिकड़मों के बजाय समाज और देश की वास्तविक चिन्ताओं को लेकर न सिर्फ़ सोचने की प्रवृत्ति रखते हों, बल्कि उनमें तमाम परिस्थितियों को एक व्यापक नज़रिए के साथ देखने की क्षमता भी हो। भारतीय राजनीति में एकाधिक व्यक्तित्व ऐसे रहे हैं जो अपनी वैचारिक उद्यमिता में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखते थे। राममनोहर लोहिया ऐसे ही नेता थे। अपने तकरीबन चार दशकों के राजनीतिक जीवन में वे ज़मीनी हक़ीक़तों के अध्ययन और चिन्तन-मनन में इस तरह व्यस्त रहे कि सत्ता-केन्द्रित राजनीति ने उन्हें बहुत अहमियत नहीं दी। न ही उन्होंने इसके लिए कोई हड़बड़ी दिखाई। और जब देश की निगाह उनकी सामर्थ्य की ओर गई, वे चले गए। लेकिन उनकी वैचारिक थाती उनके लेखन के रूप में आज भी हमारे पास है, और हम चाहें तो एक सम्पूर्ण तथा न्यायसंगत समाज का विज़न उनके आधार पर गढ़ सकते हैं। इस पुस्तक में हम इतिहास को लेकर उनकी दृष्टि तथा विचारों से अवगत होते हैं। देखने लायक है कि उनकी इतिहास-दृष्टि जन-गण के जीवन को कभी अपने सामने से ओझल नहीं होने देती। उनके शब्द हैं : “इतिहास को बनाने व समझने में एक हानिकारक भूल यह होती है कि आंशिक कौशल को पूर्ण कौशल समझ लिया जाए और संसार के एक भाग की स्थिति को समस्त संसार पर लागू मान लिया जाए। हम इतिहास के अब तक सूखे रेगिस्तान को ऐसी मृग मरीचिकाएँ और सपनों के ऐसे बाग़ न पैदा करने दें कि दिमाग़ को ऐसे बीजों को अंकुरित होते देखने का भ्रम हो जाए जो अभी बोए भी नहीं गए हैं।” यह पुस्तक लोहिया के इतिहास बोध और दृष्टि की परिचायक है।
Kaliyug Mein Itihas Ki Talash
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

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वैदिककालीन धर्म-निर्माताओं का मानना था कि धर्म नहीं तो विश्व नहीं; विश्व का अस्तित्व धर्म पर आधारित था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करना ही धर्म था; यही कृत था; यही सत था। धर्म विश्वास पर आधारित था और विश्वास में तर्क की कोई गुंजाइश नहीं होती। वैदिक समाज चार वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित था। धर्म के भी चार पैर—सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग बताए गए। कई कारणोंवश ब्राह्मण और वैदिककालीन वर्णव्यवस्था के अस्तित्व पर ख़तरा उत्पन्न हुआ तो चार पैरोंवाले धर्म का एक पैर नष्ट हो गया अर्थात् सतयुग का अन्त हो गया। ब्राह्मणों के साथ क्षत्रियों के परम्परावादी अस्तित्व पर ख़तरा मँडराने लगा तो धर्म के दूसरे पैर (त्रेतायुग) का अन्त हो गया। धर्म के तीसरे पैर (द्वापर) का नाश उस समय हो गया जब वैश्यों ने वैदिक धर्म का पालन करना छोड़ शूद्र-म्लेच्छ का पेशा अपना लिया। अब धर्म मात्र एक पैर पर खड़ा हुआ। इसे कलियुग कहा गया।
कल्पना की गई कि देवतागण जब म्लेच्छों का पूर्ण नाश कर देंगे तो कलियुग का अन्त और सतयुग का सुआगमन होगा। इतिहास चूँकि तर्क, विज्ञान एवं प्रमाण पर आधारित है, इसलिए ऐसे धार्मिक युग-विभाजन को वह नहीं मानता। इस विभाजन के ऐतिहासिक कारणों की खोज करने पर जो तथ्य उभरकर सामने आते हैं, उनका गहरा लगाव किस प्रकार तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक दशाओं से रहा—इसी की तलाश कर प्रस्तुत करने का प्रयास इस पुस्तक में किया गया है।
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
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- Book Type:

- Description: जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
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