Sabhi Ke Liye Kanoon
(0)
Author:
Deepak Kumar MaharshiPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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"सभी के लिए कानून आज हमारे पारिवारिक, सामाजिक एवं दिन-प्रतिदिन के जीवन में कानून की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है। कानून एक ऐसा विषय है, जिसके संबंध में प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य जानकारियाँ होनी ही चाहिए। कानून के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ सभी नागरिकों की आवश्यकता बन गई है। यह पुस्तक अपने पाठकों को सामान्य कानूनों की भरपूर जानकारी प्रदान करेगी। इसमें सरल व सुगम भाषा में तथ्यों को वर्णित किया गया है। इस पुस्तक को पढ़कर पाठकगण—अदालतों के प्रकार, एफ.आई.आर. दर्ज कराने के तरीके, जमानतों के तरीके, अपील के तरीके, सड़क दुर्घटना का मुआवजा, विवाह एवं तलाक, उपभोक्ता कानून, प्रोपर्टी ट्रांसफर, बीमा, टैक्स, चेक के अनादरण, श्रमिक कानून, दहेज, अपराधों के प्रकार और हमारे कानून का संक्षेप में इतिहास—आदि के संबंध में जानकारियाँ प्राप्त करेंगे। इसके माध्यम से पाठक भारतीय दंड संहिता की प्रमुख धाराओं के अंतर्गत शामिल अपराधों और उनकी सजाओं के बारे में भी जान सकेंगे। हमें विश्वास है, प्रस्तुत पुस्तक पाठकों को कानून संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी जानकारियों से समृद्ध करेगी।
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"सभी के लिए कानून
आज हमारे पारिवारिक, सामाजिक एवं दिन-प्रतिदिन के जीवन में कानून की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई है। कानून एक ऐसा विषय है, जिसके संबंध में प्रत्येक नागरिक को अनिवार्य जानकारियाँ होनी ही चाहिए। कानून के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ सभी नागरिकों की आवश्यकता बन गई है।
यह पुस्तक अपने पाठकों को सामान्य कानूनों की भरपूर जानकारी प्रदान करेगी। इसमें सरल व सुगम भाषा में तथ्यों को वर्णित किया गया है। इस पुस्तक को पढ़कर पाठकगण—अदालतों के प्रकार, एफ.आई.आर. दर्ज कराने के तरीके, जमानतों के तरीके, अपील के तरीके, सड़क दुर्घटना का मुआवजा, विवाह एवं तलाक, उपभोक्ता कानून, प्रोपर्टी ट्रांसफर, बीमा, टैक्स, चेक के अनादरण, श्रमिक कानून, दहेज, अपराधों के प्रकार और हमारे कानून का संक्षेप में इतिहास—आदि के संबंध में जानकारियाँ प्राप्त करेंगे। इसके माध्यम से पाठक भारतीय दंड संहिता की प्रमुख धाराओं के अंतर्गत शामिल अपराधों और उनकी सजाओं के बारे में भी जान सकेंगे। हमें विश्वास है, प्रस्तुत पुस्तक पाठकों को कानून संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण व उपयोगी जानकारियों से समृद्ध करेगी।
Book Details
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ISBN9789383111718
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Pages212
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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आधुनिक काल के क़रीब सभी भारतीय वैज्ञानिक इंग्लैंड से विज्ञान पढ़-लिख-जान कर आए। भारत के निवासियों को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा छूत-अछूत अथवा हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव न कर सबको एक नाम भारतीय दिया। भारत का मानचित्र भी अंग्रेज़ों ने तैयार किया। अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, बैंक, प्रयोगशाला, रेलवे आदि सब अंग्रेज़ों की देन है। कलकत्ता में अंग्रेज़ों ने अपने कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए फ़ोर्ट विलियम कॉलेज नमक विशेष विद्यालय की स्थापना की थी, जहाँ भारतीय भाषाओं में अनेक पाठ्य-पुस्तकों की रचना भी की गई। अठारहवीं सदी में महलों, सड़कों, पुलों आदि से युक्त अनेक नए नगर पैदा हुए। अठारहवीं सदी में भारत में विशेष रूप से बंगाल में यूरोपीय शैली के भवन भी बनने लगे थे। 1882 में टेलीफ़ोन आया। 1914 में प्रथम ऑटोमेटिक टेलीफ़ोन एक्सचेंज लगाया गया। अगस्त 1945 से लम्ब्रेटा स्कूटर बनना शुरू हुआ।
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- Description: आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है। —इसी पुस्तक से
Maun Muskaan Ki Maar
- Author Name:
Ashutosh Rana
- Book Type:

- Description: "मैंने और अधिक उत्साह से बोलना शुरू किया, ‘‘भाईसाहब, मैं या मेरे जैसे इस क्षेत्र के पच्चीस-तीस हजार लोग लामचंद से प्रेम करते हैं, उनकी लालबत्ती से नहीं।’’ मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक विवशता भरी मुसकराहट आई, वे बहुत धीमे स्वर में बोले, ‘‘प्लेलना (प्रेरणा) की समाप्ति ही प्लतालना (प्रतारणा) है।’’ मैं आश्चर्यचकित था, लामचंद पुनः ‘र’ को ‘ल’ बोलने लगे थे। इस अप्रत्याशित परिवर्तन को देखकर मैं दंग रह गया। वे अब बूढ़े भी दिखने लगे थे। बोले, ‘‘इनसान की इच्छा पूलती (पूर्ति) होना ही स्वल्ग (स्वर्ग) है, औल उसकी इच्छा का पूला (पूरा) न होना नलक (नरक)। स्वल्ग-नल्क मलने (मरने) के बाद नहीं, जीते जी ही मिलता है।’’ मैंने पूछा, ‘‘फिर देशभक्ति क्या है?’’ अरे भैया! जरा सोशल मीडिया पर आएँ, लाइक-डिस्लाइक (like-dislike) ठोकें, समर्थन, विरोध करें, थोड़ा गालीगुप्तार करें, आंदोलन का हिस्सा बनें, अपने राष्ट्रप्रेम का सबूत दें। तब देशभक्त कहलाएँगे। बदलाव कोई ठेले पर बिकनेवाली मूँगफली नहीं है कि अठन्नी दी और उठा लिया; बदलाव के लिए ऐसी-तैसी करनी पड़ती है और करवानी पड़ती है। वरना कोई मतलब नहीं है आपके इस स्मार्ट फोन का। और भाईसाहब, हम आपको बाहर निकलकर मोरचा निकालने के लिए नहीं कह रहे हैं; वहाँ खतरा है, आप पिट भी सकते हैं। यह काम आप घर बैठे ही कर सकते हैं, अभी हम लोगों ने इतनी बड़ी रैली निकाली कि तंत्र की नींव हिल गई, लाखों-लाख लोग थे, हाईकमान को बयान देना पड़ा। मैंने कहा कि यह सब कहाँ हुआ, बोले कि सोशल मीडिया पर इतनी बड़ी ‘थू-थू रैली’ थी कि उनको बदलना पड़ा। प्रसिद्ध सिनेमा अभिनेता आशुतोष राणा के प्रथम व्यंग्य-संग्रह ‘मौन मुस्कान की मार’ के अंश। "
Swatantrata Sangram Mein Jharkhand Ke Acharchit Nayak
- Author Name:
Vivek aryan
- Book Type:

- Description: ‘स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड के अचर्चित नायक’ इतिहास के एक ओझल लेकिन अपरिहार्य पक्ष को सामने लाता है। आजादी की लड़ाई में झारखंड के आदिवासियों ने भी बढ़-चढ़कर शिरकत की थी। औपनिवेशिक पराधीनता के खिलाफ संघर्ष की शुरूआत और अगुआई करने से लेकर बलिदान देने तक, वे कभी पीछे नहीं रहे। लेकिन बिरसा मुंडा और सिदो-कानू जैसे कुछेक नायकों को छोड़ दें तो उनमें से ज्यादातर सेनानियों और शहीदों के बारे में लोग कुछ नहीं जानते। उन्हें इतिहास की मुख्यधारा में कभी जगह नहीं दी गई। बेशक जन-मन के किस्से-कहानियों-गीतों में उनकी स्मृतियाँ बची रहीं लेकिन वह जन-मन प्रायः उनके अपने वंशजों, समुदाय और क्षेत्र तक सीमित था। स्पष्टतः उन पुरखा नायकों को अपने पन्नों पर यथोचित जगह दिए बिना हमारा इतिहास मुकम्मल नहीं हो सकता था। इस सन्दर्भ में यह पुस्तक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें झारखंड के कुछेक आदिवासी शहीद स्वतंत्रता सेनानियों की जीवनगाथा किंचित पहली बार व्यवस्थित रूप से प्रकाशित हुई है। इन शहीदों-सेनानियों में शामिल हैं—हाथीराम मुंडा, हाड़ी मुंडा, होपन मांझी, बैरू मांझी, अर्जुन मांझी, रूपु मांझी, चम्पाइ मांझी, शाम परगना, भाको मुर्मू, भुगलू मुर्मू और जीतराम बेदिया। इनके साथ ही इस शोधपरक पुस्तक में अन्य कई अज्ञात-अल्पज्ञात शहीदों और स्वतन्त्रता सेनानियों का भी उल्लेख किया गया है। एक अध्याय बिरसा मुंडा के आन्दोलन में शामिल महिलाओं पर केन्द्रित है जिसमें इतिहास की एक दिलचस्प विडम्बना नजर आती है, जब कई महिला स्वतंत्रता सेनानियों का जिक्र हम उनके पतियों के हवाले से पाते हैं। दरअसल कालक्रम में उन महिला सेनानियों का नाम खो चुका है। संक्षेप में, यह पुस्तक इतिहास की कई बन्द खिड़कियों को खोलती है और स्वतंत्रता संघर्ष की उस महान परम्परा और विरासत से परिचित कराती है जो अब तक अँधेरे में पड़ी हुई थी।
Aur Kitna Waqt Chahiye Jharkhand Ko
- Author Name:
Kamlesh Raghuvanshi
- Book Type:

- Description: झारखंड अलग राज्य तो बन गया, लेकिन राज्य गठन का जो उद्देश्य था, क्या वह पूरा हुआ? 12 सालों में यहाँ आठ सरकारें बनीं, चार मुख्यमंत्री बदले। कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। आखिर इस राजनैतिक अस्थिरता की वजह क्या है? विकास की तमाम संभावनाओं के बावजूद विकास की गति ठहरी हुई है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? झारखंड की आकांक्षाओं-आशाओं की कसौटी पर कसे विचारों का ज्ञानकोश है यह ग्रंथ। झारखंड में विकास के सारे दावे जनता को कागजी और छलावा क्यों लगते हैं? झारखंडी जनता के सपनों को फिर से जीवित करने का रास्ता क्या हो सकता है? विसंगतियों के बावजूद झारखंड विकसित राज्यों की सूची में पहले पायदान पर हो, यह सभी चाहते हैं—पर कैसे? समग्र महाबहस में राजनीति से लेकर सामाजिक स्तर पर एक-दूसरे के धुर विरोधियों ने एक मंच पर विकास प्रक्रिया और अवरोधों का काफी सटीक विश्लेषण किया है। खामी कहाँ रह गई और इसका उपाय क्या है? नाकामी के कारणों का विश्लेषण इतना गहन है कि इसको आधार बनाकर नए झारखंड का नया डेवलपमेंट रोडमैप तैयार किया जा सकता है। झारखंड की विफलता के कारण और उसके इलाज के प्रभावी नुस्खे पर यह पुस्तक पूरी तरह प्रकाश डालती है।
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