Putin And The Russian Renaissance
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The book invites you to uncover the remarkable journey of Vladimir Putin, one of the most intriguing and controversial leaders of our time. From the gritty streets of post-war Leningrad to the heights of global power, this is the story of a man who reshaped Russia and left the world divided. Explore Putin's transformation from a quiet KGB officer to a political force who rose unexpectedly to lead a nation. Witness his efforts to revive a faltering Russia, his bold and often polarizing decisions, and his relentless pursuit of restoring Russia's place on the global stage. But who is Vladimir Putin beyond the politics? This book peels back the layers to reveal the person behind the power-his early life, personal values and the driving force behind his vision. Told with clarity and depth, The Putin Story blends gripping storytelling with insightful analysis to offer a fresh perspective on a leader who has shaped history
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The book invites you to uncover the remarkable journey of Vladimir Putin, one of the most intriguing and controversial leaders of our time. From the gritty streets of post-war Leningrad to the heights of global power, this is the story of a man who reshaped Russia and left the world divided.
Explore Putin's transformation from a quiet KGB officer to a political force who rose unexpectedly to lead a nation. Witness his efforts to revive a faltering Russia, his bold and often polarizing decisions, and his relentless pursuit of restoring Russia's place on the global stage.
But who is Vladimir Putin beyond the politics? This book peels back the layers to reveal the person behind the power-his early life, personal values and the driving force behind his vision. Told with clarity and depth, The Putin Story blends gripping storytelling with insightful analysis to offer a fresh perspective on a leader who has shaped history
Book Details
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ISBN9789355627049
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Pages184
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘भाजपा, हिन्दुत्व और मुसलमान’ अपने ढंग की अनूठी कृति है। इस विषय का यह पहला मौलिक और विचारोत्तेजक ग्रन्थ है। उक्त तीनों मुद्दों और उनके आपसी सम्बन्धों पर जितनी गहराई और जितने कोणों से विद्वान लेखक ने विचार किया है, अब तक किसी भी ग्रन्थ में नहीं किया गया है। भाजपा का असली संकट क्या है, उसका समाधान क्या है, उसका भविष्य कैसा है, वह कहीं कांग्रेस की कार्बन-कॉपी तो नहीं बन गई है, संघ और भाजपा के बीच अन्तर्द्वन्द्व के मुद्दे कौन-कौन से हैं, आदि अनेक प्रश्नों पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
सावरकर का हिन्दुत्व अब कितना प्रासंगिक रह गया है? उसमें से क्या घटाया और क्या जोड़ा जाए, इस जटिल और विवादास्पद विषय पर डॉ. वैदिक ने जो मौलिक विचार प्रस्तुत किए हैं, वे भाजपा ही नहीं, 21वीं सदी के भारत के लिए भी ध्यातव्य हैं। हिन्दुत्व और इस्लाम के नाम पर चले अभियानों पर लेखक के जिन बेबाक निबन्धों ने देश की तत्कालीन राजनीति पर सीधा असर डाला था, वे भी इस ग्रन्थ में संकलित किए गए हैं। इस ग्रन्थ में कुछ निबन्ध ऐसे भी हैं, जिनके बारे में आपको लगेगा कि वे अपने आप में एक-एक ग्रन्थ के बराबर हैं। मुस्लिम राजनीति और मुसलमानों के प्रति भाजपा के रवैए पर भी लेखक ने अपनी दो-टूक राय ज़ाहिर की है। मुसलमान भारतीय इतिहास को कैसे देखें और शेष भारत मुसलमानों को कैसे देखे, आदि अत्यन्त पेचीदा और नाजुक मुद्दों पर भी लेखक ने अपने निर्भीक विचार प्रस्तुत किए हैं। डॉ. वैदिक के ये निबन्ध राजनेताओं, विद्वानों, पत्रकारों और प्रबुद्ध पाठकों के लिए दिशा-बोधक और उपयोगी हैं।
Cintan Prawah
- Author Name:
Hukumdev Narayan Yadav
- Book Type:

- Description: लोहिया का नाम लेने वाले, समाजवाद की रट लगाने वाले और समता समाज का नारा लगाने वाले, सभी भ्रमित होकर केवल विशेष अवसर को ही अंतिम लक्ष्य मान चुके हैं। द्वेष, जलन, हिंसा, व्यक्तियों की स्वार्थोन्नति और राजनीति पर कब्जा, यही उनके विशेषाधिकार का मूलमंत्र है। यदि इस सिद्धांत के द्वारा जाति विनाश, समान शिक्षा, आर्थिक बराबरी, सत्ता का विकेंद्रीकरण, स्वदेशी, स्वराज्य, ग्रामोन्नति, कृषि को प्राथमिकता, भ्रष्टाचार और भोग का अंत इत्यादि किए जाते तो समता समाज की स्थापना के दर्शन की ओर कदम बढ़ाया गया माना जाता। आर्थिक गैर बराबरी के कारण सवर्ण में अवर्ण और अवर्ण में सवर्ण बन गए हैं। पिछड़ों और दलितों में भी द्विज बन गए हैं। तथा द्विजों में भी पिछड़े और दलित बन गए हैं। आरक्षण की राजनीति करनेवालों का उस दिन अंत होगा, जिस दिन आरक्षण का अंध विरोध बंद हो जाएगा। केवल सरकारी नौकरी में आरक्षण से ही राष्ट्र का कायाकल्प नहीं हो सकता है। उन्हें तो केवल वोट चाहिए, चाहे उसके लिए जाति, भाषा और संप्रदाय के नाम पर भारत की धरती लाल क्यों न हो जाए। राष्ट्रीयता, समता, दृढता, उदारता, निष्पक्षता, समरसता, ममता और आध्यात्मिकता के दर्शन के आधार पर बनाया गया सिद्धांत ही मानव के लिए कल्याणकारी हो सकता है। आज उसी तरह के नेतृत्व की आवश्यकता है। क्या सभी इस पर सोचेंगे? —इसी पुस्तक से वरिष्ठ राजनेता श्री हुक्मदेव नारायण यादव के प्रखर राष्ट्रवादी चिंतन-प्रवाह के रूप में बाहर आए ये मोती-स्वरूप विचार एक सजग-जागरूक समाज बनाने के इच्छुक हर भारतीय के लिए पठनीय पुस्तक।
Bhartiya Swadhinta Sangram Ka Itihas
- Author Name:
Ashok Ganguli
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके विरुद्ध हुए भारतीयों के विभिन्न संग्रामों का विवरण है। आरम्भ में अंग्रेज़ों के भारत में सर्वोपरि ताक़त के रूप में उभरने का विवरण है, साथ ही अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध भारतीय प्रायद्वीप के विभिन्न अंचलों में हुए विद्रोहों का उल्लेख है। तत्पश्चात् 1857 में हुई महान क्रान्ति का व्यापक उल्लेख, भारतीय राष्ट्रवाद की भावना का उदय और उसके बाद हुए आन्दोलनों एवं क्रान्तिकारी गतिविधियों का विशद विवरण है। इस प्रकार पुस्तक से जहाँ एक ओर भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857) और आज़ादी की लड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अन्य क्रान्तिकारियों की भूमिका के बारे में पता चलता है, वहीं पाठकों को स्थानीय विद्रोहों एवं उनके नायकों जैसे मजनूशाह, वेलु थम्पी, चेनम्मा, तीतू मीर, सीधु व कानू, बिरसा मुंडा आदि के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। भारत के मध्ययुगीन परम्पराओं से बाहर निकलने एवं नई चेतना के विकास के लिए विभिन्न महापुरुषों के सत्प्रयासों का भी विवरण पुस्तक में है।
भारत की आज़ादी का अनिवार्य प्रसंग है देश का विभाजन। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में पनपे मुस्लिम पृथकतावाद को समझने की कोशिश करते हुए पाकिस्तान के निर्माण के कारणों पर चर्चा पुस्तक का प्रमुख आकर्षण है। साथ ही दोनों विश्वयुद्धों, जिनमें ब्रिटिश मुख्य खिलाड़ी था पर भारत को जबरन उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़े, के बारे में भी आवश्यक जानकारियाँ पाठकों तक पहुँचाई गई हैं।
पुस्तक अत्यन्त ही सरल भाषा में लिखी गई है जिसमें अंग्रेज़ों की भारत में उपस्थिति का सारगर्भित वृत्तान्त है। पुस्तक छात्रों, शोधकर्ताओं, इतिहासकारों, लेखकों एवं उन सबके लिए उपयोगी सिद्ध होगी जो भारत की ब्रिटिश साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता के बारे में जानने के इच्छुक हैं। यह पुस्तक विशेष तौर पर आज की पीढ़ी के लिए लिखी गई है।
Bharat : Ek Vichar-Parampara
- Author Name:
Prem Kumar Mani
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- Description: भारत क्या है—आज इस सवाल को पूछना, इसके उत्तर तलाश करना और एक राष्ट्र के रूप में भारत की संरचना को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है। समय है कि अकादमिक बहसों-विमर्शों से आगे बढ़कर इस सवाल पर आम जन की आम भाषा में बात हो। ‘भारत : एक विचार-परम्परा’ इसी दिशा में एक बड़ा क़दम है। इसका उद्देश्य भारतखंड की हज़ारों वर्षों की सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा पर दृष्टिपात करते हुए यह जानना है कि वह क्या चीज़ है कि ‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’? वह क्या तत्व है जो आरम्भ से अब तक इस इतने लम्बे सफ़र की प्रेरणा-पूँजी रहा है। सिन्धु नदी के किनारे उगी-उभरी सभ्यता कैसे आगे बढ़ी; वेदों का, उपनिषदों का समय आया, हड़प्पा और मुअन-जो-दड़ो विकसित हुए, तक्षशिला जैसे ज्ञान के महान केन्द्र अस्तित्व में आए, मगध में विचारों और विचारकों का इतना जमावड़ा हुआ; बौद्ध दर्शन, जहाँ उद्भूत हुआ, मध्यकाल में जिसने विदेशी आक्रान्ताओं का सामना किया, ब्रिटिश शासन का लम्बा औपनिवेशिक दौर देखा, और लम्बे संघर्ष के उपरान्त विभाजन जैसी विभीषिका के साथ स्वतंत्रता प्राप्त की। लेकिन एक विचार के रूप में भारत भारत ही बना रहा; समय से सीखता ख़ुद को बदलता, आगे बढ़ता। यह पुस्तक इस पूरी यात्रा पर दृष्टिपात करती है और हमें अपनी सुदीर्घ वैचारिक परम्परा के मद्देनज़र एक मत स्थिर करने में मदद करती है।
Satta Ke Galiyaron Se
- Author Name:
Sanjaya Baru
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- Description: प्रत्येक युग में राष्ट्र का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कुलीन अपनी शक्ति एवं प्रतिष्ठा को संरक्षित करते हुए अपने इस महान् विचार के प्रतिपादन द्वारा कि वह उसका प्रभुत्व सुनिश्चित करने तथा उसे कार्यान्वित करने में सक्षम है, परिवर्तन को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। ब्रिटिश साम्राज्य का संचालन उसी सिद्धांत के आधार पर किया गया था। अपने विचारों को प्रधानता के बल पर अजनबियों की एक छोटी सी संख्या ने इतने बड़े साम्राज्य का संचालन किया, जिसे बहुसंख्यकों ने स्वीकार किया। स्वाधीनता- प्राप्ति के पश्चात् गणतंत्र के निर्माताओं ने एक संविधान लिखा, जिसने राष्ट्र को सत्ता के कुलीनों को आर्थिक विशेषाधिकार के पदों पर बने रहने हेतु समर्थ बनाया, जबकि संविधान में सभी को समान स्तर प्रदान किया गया था। लोकतंत्र, समानता, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के विचार नए थे और समय के साथ उनका तालमेल भी था; परंतु उनका कार्यान्वयन इस प्रकार से हुआ, मानो वह सत्ता एवं विशेषाधिकारों के मौजूदा संबंधों को संरक्षित करनेवाला हो। --इसी पुस्तक से भारतवर्ष में सत्ता, उसके प्रभाव, उसके सरोकार, उसके दुरुपयोग और समाज पर उसके प्रभावों का एक व्यावहारिक चिंतन प्रस्तुत करती है यह विचारप्रधान पुस्तक.
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