Bharat Ke Prasiddha Kile
(0)
Author:
Shanti Gunakar Muley, Gunakar MuleyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
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भारत के प्रत्येक किले में हमारे देश के अतीत का एक विशेष क्षण छिपा हुआ है। इन किलों ने न जाने कितने आक्रमण सहे, जाने कितने युद्धों को प्रत्यक्ष देखा, और जाने कितने रक्तपात और वैभव को अपनी मजबूत दीवारों में सहेजा-समेटा है।<br />प्राचीन भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में आज जो जानकारी किलों से मिलती है उसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रत्येक किला हमारे लोमहर्षक इतिहास का एक जीवन्त अध्याय है। लेकिन भारतीय राजवंशों के उतार-चढ़ावों की दिलचस्प कथाएँ बताने वाले और इतिहास के स्वर्णिम युगों के गवाह इन किलों में से अनेक अब खँडहर बन गए हैं, भूत-बँगले हो गए हैं। कुछ किले पुरातत्व विभाग के अधीन होकर भी अपनी किस्मत को रो रहे हैं।<br />यह भी एक तथ्य है कि कुछ प्रमुख किलों को छोड़ दें तो ज्यादातर किलों के बारे में साधारणजन पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। गुणाकर जी की यह पुस्तक भारत के किलों के बारे में एक विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। 300 से ज्यादा चित्रों और नक्शों से सुसज्जित इस पुस्तक में प्रत्येक प्रदेश के किलों का सिलसिलेवार विवरण दिया गया है और उनके स्थापत्य तथा उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है।
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About the Book
भारत के प्रत्येक किले में हमारे देश के अतीत का एक विशेष क्षण छिपा हुआ है। इन किलों ने न जाने कितने आक्रमण सहे, जाने कितने युद्धों को प्रत्यक्ष देखा, और जाने कितने रक्तपात और वैभव को अपनी मजबूत दीवारों में सहेजा-समेटा है।<br />प्राचीन भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में आज जो जानकारी किलों से मिलती है उसे नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। प्रत्येक किला हमारे लोमहर्षक इतिहास का एक जीवन्त अध्याय है। लेकिन भारतीय राजवंशों के उतार-चढ़ावों की दिलचस्प कथाएँ बताने वाले और इतिहास के स्वर्णिम युगों के गवाह इन किलों में से अनेक अब खँडहर बन गए हैं, भूत-बँगले हो गए हैं। कुछ किले पुरातत्व विभाग के अधीन होकर भी अपनी किस्मत को रो रहे हैं।<br />यह भी एक तथ्य है कि कुछ प्रमुख किलों को छोड़ दें तो ज्यादातर किलों के बारे में साधारणजन पूरी तरह अनभिज्ञ हैं। गुणाकर जी की यह पुस्तक भारत के किलों के बारे में एक विस्तृत और प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। 300 से ज्यादा चित्रों और नक्शों से सुसज्जित इस पुस्तक में प्रत्येक प्रदेश के किलों का सिलसिलेवार विवरण दिया गया है और उनके स्थापत्य तथा उनसे जुड़ी ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रकाश डाला गया है।
Book Details
-
ISBN9788126722648
-
Pages458
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हम इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि किसी दिन इस धरती पर केवल मानव जाति का अस्तित्व होगा। पशु–पक्षियों व अन्य जीवधारियों की असंख्य प्रजातियों और वनस्पतियों की अगणित क़िस्मों के अभाव में क्या इस सृष्टि में जीवन को बचाए रखना सम्भव होगा। सच्चाई तो यह है कि सृष्टि एक अखंड इकाई है। चराचर की पारस्परिक निर्भरता ही जीवन का मूल मंत्र है। यदि किसी कारण से जीवन–चक्र खंडित होता है तो इसके भीषण परिणाम हो सकते हैं। ‘भारत के संकटग्रस्त वन्य प्राणी’ में प्रसिद्ध लेखक गुणाकर मुळे ने ऐसे प्राणियों की चर्चा की है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। उन्होंने अनेक ऐसे प्राणियों का ज़िक्र किया है जिन्हें अब इस धरती पर कभी नहीं देखा जा सकता। विगत दशकों में 36 प्रजातियों के स्तनपायी प्राणी और 94 नस्लों के पक्षी प्रकृति के अंधाधुंध शोषण के कारण नष्ट हो चुके हैं। लेखक की चिन्ता यह है कि यदि इसी प्रकार हिंसा, लालच और अतिक्रमण का दौर चलता रहा तो इस ख़ूबसूरत दुनिया का क्या होगा! यह असन्तुलन विनाशकारी होगा। लेखक के अनुसार, ‘हमारे देश में प्राचीन काल से वन्य प्राणियों के संरक्षण की भावना रही है। हमारी सभ्यता और संस्कृति में वन्य प्राणियों के प्रति प्रेम-भाव रहा है। इसलिए हमारे समाज में वन्य जीवों को पूज्य माना जाता है। वन्य जीवों तथा पक्षियों को मुद्राओं और भवनों पर भी चित्रित किया जाता रहा है।’ हमें आज इस भाव को नए सन्दर्भों में विकसित करना होगा। वन्य प्राणी संरक्षण के लिए बनाए गए अधिनियमों से अधिक आवश्यकता व्यापक नागरिक चेतना की है। गुणाकर मुळे ने सहज, सरल भाषा में इस आवश्यकता को रेखांकित किया है। अनेक चित्रों से सुसज्जित यह पुस्तक पर्यावरण के प्रति जागरूकता निर्माण के लिए बहुत ही उपयोगी है। हर आयु के पाठकों के लिए एक पठनीय पुस्तक।
Bhartiya Sikkon Ka Itihas
- Author Name:
Gunakar Muley
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'विश्व संस्कृति को भारत की एक महानतम देन है–दस अंक-संकेतों पर आधारित स्थानमान अंक-पद्धति। आज सारे सभ्य संसार में इसी दशमिक स्थानमान अंक-पद्धति का इस्तेमाल होता है। न केवल यह अंक-पद्धति बल्कि इसके साथ संसार के अनेक देशों में प्रयुक्त होने वाले 1, 2, 3, 9...और शून्य संकेत भी, जिन्हें आज हम ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंक’ कहते हैं, भारतीय उत्पत्ति के हैं। देवनागरी अंकों की तरह इनकी व्युत्पत्ति भी पुराने ब्राह्मी अंकों से हुई है। भारतीय अंक-पद्धति की कहानी में भारतीय प्रतिभा की इस महान उपलब्धि के उद्गम और देश-विदेश में इसके प्रचार-प्रसार का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, अपने तथा दूसरे देशों में प्रचलित पुरानी अंक-पद्धतियों का भी संक्षिप्त परिचय दिया गया है। अन्त में, आजकल के इलेक्ट्रॉनिक गणक-यंत्रों में प्रयुक्त होनेवाली द्वि-आधारी अंक-पद्धति को भी समझाया गया है। इस प्रकार, इस पुस्तक में आदिम समाज से लेकर आधुनिक काल तक की सभी प्रमुख गणना-पद्धतियों की जानकारी मिल जाती है। विभिन्न अंक-पद्धतियों के स्वरूप को भली-भाँति समझने के लिए पुस्तक में लगभग चालीस चित्र हैं। न केवल विज्ञान के, विशेषतः गणित के विद्यार्थी, बल्कि भारतीय संस्कृति के अध्येता भी इस पुस्तक को उपयोगी पाएँगे। हमारे शासन ने ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ को ‘राष्ट्रीय अंकों’ के रूप में स्वीकार किया है। फिर भी, कइयों के दिमाग़ में इन ‘अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ के बारे में आज भी काफ़ी भ्रम है–विशेषतः हिन्दी-जगत में। इस भ्रम को सही ढंग से दूर करने के लिए हमारे शासन की ओर से अभी तक कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है। ‘भारतीय अन्तरराष्ट्रीय अंकों’ की उत्पत्ति एवं विकास को वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत करनेवाली यह हिन्दी में, सम्भवतः भारतीय भाषाओं में, पहली पुस्तक है। भारतीय अंक-पद्धति की कहानी एक प्रकार से लेखक की इस माला में प्रकाशित भारतीय लिपियों की कहानी की परिपूरक कृति है। अतः इसे भारतीय इतिहास और पुरालिपि-शास्त्र के पाठक भी उपयोगी पाएँगे।
Ganit Se Jhalakti Sanskriti
- Author Name:
Gunakar Muley +1
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गणित और संस्कृति का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध रहा है। अतीत की कौन सी संस्कृति कितनी उन्नत रही है, यह उसकी गणितीय उपलब्धियों से पहचाना जा सकता है। किसी आदिम जनजाति की भौतिक अवस्था इस बात से भी जानी जा सकती है कि वह कहाँ तक गिनती कर सकती है। यूनानियों ने मिस्र से ज्यामितीय जानकारी हासिल करके उसका आगे विकास किया और उसे निगमनात्मक तर्कशास्त्र का इतना सुदृढ़ जामा पहनाया कि यूक्लिड (300 ई.पू.) की ज्यामिति आज भी सारी दुनिया के स्कूलों में पढ़ाई जाती है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संसार को भारत की सबसे बड़ी देन है—शून्य सहित सिर्फ़ दस संकेतों से सारी संख्याएँ लिखने की अंक-पद्धति, जिसका आज सारी दुनिया में व्यवहार होता है। गणित अब एक व्यापक विषय बन गया है। आज गणित के बिना किसी भी विषय का गहन अध्ययन सम्भव नहीं है। भौतिकी, रसायन, आनुवंशिकी आदि अनेक वैज्ञानिक विषयों के लिए गणित का बुनियादी महत्त्व है। इस पुस्तक के लेखक गुणाकर मुळे आजीवन हिन्दी भाषा-भाषी समाज को वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न बनाने का सपना देखते रहे। इसी उद्देश्य को ध्यान में रख उन्होंने अनेकानेक ग्रन्थों की रचना की। गणित और संस्कृति के अन्तर्सम्बन्धों को रेखांकित करनेवाली यह पुस्तक भी उनकी इसी साधना का फल है जिसे पाठक निश्चय ही अत्यन्त उपयोगी पाएँगे।
Urja Sankat Aur Hamara Bhavishya
- Author Name:
Gunakar Muley
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वर्तमान ऊर्जा-संकट का प्रभाव समाज के सभी वर्गों पर पड़ रहा है। कोयले और तेल की कमी से किसानों, कारख़ानों और घरेलू उपयोग के लिए बिजली का नियमित मिलना कठिन हो गया है। आज साधारण जन यह जानने के लिए उत्सुक है कि इस संकट का निवारण कब और कैसे होगा?
खनिज तेल की कमी और उसके मूल्यों में अत्यधिक वृद्धि के कारण हमें सौर-ऊर्जा, परमाणु-ऊर्जा, तप्तकुंड-ऊर्जा, ज्वार-भाटा तथा पवन-ऊर्जा की ओर ध्यान देना होगा, क्योंकि ऊर्जा के ये स्रोत सस्ते तथा न ख़त्म होनेवाली ऊर्जा हैं। बिजली हमारी मूलभूत आवश्यकता है, मगर जिस रफ़्तार से इसकी खपत हो रही है, उस हिसाब से भविष्य में हम इससे वंचित हो सकते हैं।
प्रसिद्ध विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक ऊर्जा के विभिन्न स्रोतों की आधारभूत जानकारी देती है, और बताती है कि इस समय ऊर्जा उत्पादन और संरक्षण को लेकर भारत की क्या स्थिति है? ऊर्जा के नए स्रोत क्या हो सकते हैं? सूर्य, जल, वायु और परमाणु आदि स्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने की दिशा में क्या कोशिशें की जा रही हैं, यह पुस्तक ऐसे तमाम प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करती है।
Aakash Darshan
- Author Name:
Gunakar Muley
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धरती का मानव हज़ारों सालों से आकाश के टिमटिमाते दीपों को निहारता आया है। सभी के मन में सवाल उठते हैं—आकाश में कितने तारे हैं? पृथ्वी से कितनी दूर हैं? कितने बड़े हैं? किन पदार्थों से बने हैं? ये सतत क्यों चमकते रहते हैं? तारों के बारे में इन सवालों के उत्तर आधुनिक काल में, प्रमुख रूप से 1920 ई. के बाद, खोजे गए हैं; इसलिए भारतीय भाषाओं में सहज उपलब्ध भी नहीं हैं। प्रख्यात विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे ने इस भारी अभाव की पूर्ति के लिए ही प्रस्तुत ग्रन्थ की रचना की है। आधुनिक खगोल-विज्ञान में आकाश के सभी तारों को 88 तारामंडलों में बाँटा गया है। गुणाकर मुले ने हर महीने आकाश में दिखाई देनेवाले दो-तीन प्रमुख तारामंडलों का परिचय दिया है। साथ में तारों की स्पष्ट रूप से पहचान के लिए भरपूर स्थितिचित्र भी दिए हैं। बीच-बीच में स्वतंत्र लेखों में आधुनिक खगोल-विज्ञान से सम्बन्धित विषयों की जानकारी है, जैसे—आकाशगंगा, रेडियो-खगोल-विज्ञान, सुपरनोवा, विश्व की उत्पत्ति, तारों की दूरियों का मापन आदि। तारामंडलों के परिचय के अन्तर्गत सर्वप्रथम इनसे सम्बन्धित यूनानी और भारतीय आख्यानों की जानकारी है। उसके बाद तारों की दूरियों और उनकी भौतिक स्थितियों के बारे में वैज्ञानिक सूचनाएँ हैं। ग्रन्थ में तारों से सम्बन्धित कुछ उपयोगी परिशिष्ट और तालिकाएँ भी हैं। अन्त में तारों की हिन्दी-अंग्रेज़ी नामावली और शब्दानुक्रमणिका है। संक्षेप में कहें तो ‘आकाश-दर्शन’ एक ओर हमें धरती और इस पर विद्यमान मानव-जीवन की परम लघुता का आभास कराता है, तो दूसरी ओर विश्व की अति-दूरस्थ सीमाओं का अन्वेषण करनेवाली मानव-बुद्धि की अपूर्व क्षमताओं का भी परिचय कराता है। ‘आकाश दर्शन’ वस्तुतः विश्व-दर्शन है।
Akshar Katha
- Author Name:
Gunakar Muley +1
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प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में जब नगरों की स्थापना होने लगती है, पहली बार लिपियाँ तभी जन्म लेती दिखाई देती हैं। यह कोई छह हजार साल पहले की बात है।
वर्णमालात्मक लिपियाँ ई.पू. दसवीं सदी के आस-पास पहली बार सामने आती हैं। तब से आज तक लिपियों का विशेष विकास नहीं हुआ। बहुत-सी पुरालिपियाँ मर गईं, उनका ज्ञान भी लुप्त हो गया। पिछले क़रीब दो सौ वर्षों में संसार के अनेक पुरालिपिविदों ने पुनः उन पुरालिपियों का उद्घाटन किया है।
इस ग्रन्थ में गुणाकर जी ने मुख्यतः संसार की प्रमुख पुरालिपियों की जानकारी दी है। पाठक इससे जान जाएँगे कि किस देश में कौन-सी लिपि का अस्तित्व था, उसका स्वरूप कैसा था, उसके संकेत या अक्षर कैसे थे और आधुनिक काल में उन पुरालिपियों का उद्घाटन कैसे हुआ। पुस्तक के दूसरे खंड में भारतीय लिपियों की जानकारी है। आरम्भ में सिन्धु लिपि (अज्ञात) तथा खरोष्ठी लिपि का विवरण है। फिर ब्राह्मी लिपि के उद्भव तथा विकास के बारे में यथासम्भव पूरी जानकारी दी गई है। पुस्तक का परिशिष्ट संसार के प्रमुख भाषा-परिवारों पर केन्द्रित है। भाषा सम्बन्धी जिज्ञासु पाठकों और छात्रों के लिए प्रामाणिक तथ्यों, चित्रों और तालिकाओं से समृद्ध यह पुस्तक निश्चित रूप से उपादेय होगी।
Pascal
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Gunakar Muley
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सामान्यत: हम मान लेते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। लेकिन पास्कल जीवन-भर अजीर्ण और अनिद्रा से पीड़ित रहे। फिर भी 39 वर्ष की अल्पायु में गणित के क्षेत्र में इतना मौलिक कार्य कर गए कि आज उन्हें न केवल फ़्रांस का, अपितु संसार का एक महान गणितज्ञ माना जाता है। बालक पास्कल की शिक्षा घर पर ही हुई, पिता की देखरेख में। वह इतने प्रतिभाशाली थे कि 12 वर्ष की आयु में, किसी की सहायता के बिना, स्वयं ही यूक्लिड की ज्यामिति के कई प्रमेयों को सिद्ध कर डाला। इसमें वह प्रमेय भी शामिल था, जिसके अनुसार त्रिभुज के तीन भीतरी कोणों का योग दो समकोणों के बराबर होता है। गणित को पास्कल की एक और महान देन है—सम्भाविता-सिद्धान्त। ताश के पत्तों के खेल से उपजे सवालों को हल करने के प्रयासों में इस सिद्धान्त का जन्म हुआ था। आज सम्भाविता-सिद्धान्त एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है; यह सिद्धान्त प्रकृति की लीलाओं के मूल में पैठा हुआ है। हिन्दी के विशिष्ट विज्ञान-लेखक गुणाकर मुळे ने गहन शोध के बाद ख़ास तौर पर किशोर पाठकों के लिए यह पुस्तक तैयार की थी जिसमें पास्कल के जीवन के साथ-साथ उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों की भी सरल भाषा में जानकारी दी गई है। यह पुस्तक किशोरों के मानस को एक वैज्ञानिक दिशा प्रदान करती है।
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