Dastan Mughal Mahilaon Ki
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
195
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मध्यकालीन इतिहास के अध्ययन, अध्यापन, शोध से 33 वर्षों के अधिक के जुड़ाव के कारण, इस काल के इतिहास से भली-भाँति वाक़िफ़ हैं अतः, ऐतिहासिक शोध के साथ लिखी गई कुछ कहानियों के माध्यम से चयनित महिला पात्रों की भूमिका के साथ उन्होंने न्याय करने के प्रयास में, इस संकलन की आवश्यकता महसूस की। इसमें प्रसिद्ध मंगोल शासक चंगेज़ ख़ाँ की पुत्र-वधू से प्रारम्भ करके, बाबर की नानी से होते हुए, हमीदा बानो बेगम की दास्ताँ बयाँ करते हुए, हर्रम बेगम की भूमिका को रेखांकित किया गया है जिसके फलस्वरूप हुमायूँ अन्ततोगत्वा भारत में प्रवेश कर पाता है। अन्त में अनारकली की गुत्थी को भी सुलझाने का प्रयास किया गया है।
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मध्यकालीन इतिहास के अध्ययन, अध्यापन, शोध से 33 वर्षों के अधिक के जुड़ाव के कारण, इस काल के इतिहास से भली-भाँति वाक़िफ़ हैं अतः, ऐतिहासिक शोध के साथ लिखी गई कुछ कहानियों के माध्यम से चयनित महिला पात्रों की भूमिका के साथ उन्होंने न्याय करने के प्रयास में, इस संकलन की आवश्यकता महसूस की। इसमें प्रसिद्ध मंगोल शासक चंगेज़ ख़ाँ की पुत्र-वधू से प्रारम्भ करके, बाबर की नानी से होते हुए, हमीदा बानो बेगम की दास्ताँ बयाँ करते हुए, हर्रम बेगम की भूमिका को रेखांकित किया गया है जिसके फलस्वरूप हुमायूँ अन्ततोगत्वा भारत में प्रवेश कर पाता है। अन्त में अनारकली की गुत्थी को भी सुलझाने का प्रयास किया गया है।
Book Details
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ISBN9788180317439
-
Pages148
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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भारत में जहाँ दोनों समुदायों का समान इतिहास और एक समान संस्कृति की साझेदारी है, उनकी राष्ट्रीयता एक है। कुछ मुसलमान हैं और कुछ हिन्दू हैं किन्तु दोनों भारतीय हैं। न्यस्त स्वार्थों या धार्मिक नेताओं द्वारा इनके बीच जानबूझकर अलगाव पैदा किया जाता है और फिर उसे बढ़ावा दिया जाता है जिससे कि चुनावी तथा अन्य कारणों के लिए दोनों समुदायों को एक-दूसरे से दूर रखा जाए। यह अलगाव पूर्वग्रह और धर्मान्धता का पोषण करता है।
एक विख्यात प्रशासनिक शासकीय अधिकारी पी.के. लाहिरी ने जो महत्त्वपूर्ण कार्य किया है, उसके समक्ष मेरी अच्छी-से-अच्छी कोशिश भी तुच्छ लगेगी। उन्होंने अनेक हिन्दू-मुसलमान दंगों को क़रीब से देखा है और उनके कारणों और प्रभावों का विश्लेषण करने का उत्कृष्ट कार्य किया है। उन्होंने दंगों का जो विवरण दिया है, उसमें छोटी-से-छोटी बात भी शामिल है, उससे मैं मंत्रमुग्ध हो गया हूँ।
मैं श्री लाहिरी से सहमत हूँ कि हिन्दू-मुसलमान दंगों की तुलना सभ्यताओं के संघर्ष से नहीं की जा सकती है और न ही उनका सम्बन्ध नस्लवाद के प्रश्न से है। इसका ज़्यादा सम्बन्ध पहचान को लेकर है, उस भय से कि बहुसंख्यक लोग कम संख्या वाले लोगों का नाश कर देंगे। शेष बात पूर्वग्रह या पक्षपात की है। धर्मान्ध और धार्मिकता के प्रति रूझान वाले राजनीतिक दल इसके लिए ज़िम्मेवार हैं। लाहिरी की पुस्तक ने मेरे ज्ञान को बढ़ाया है। पाठको, आपके साथ भी यही होगा। आपको भी यही अनुभव होगा। इस विद्वत्तापूर्ण कार्य को करने के लिए लाहिरी डॉक्टरेट के हक़दार हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि कोई विश्वविद्यालय उन्हें यह सम्मान देगा।
—कुलदीप नैयर
British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857
- Author Name:
Vandita Verma
- Book Type:

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1857 के डेढ़ सौ से ज़्यादा वर्ष बीत जाने के बाद आज इतिहास के इस पड़ाव को सही सन्दर्भों में स्थापित किया जाना नितान्त आवश्यक है।
गम्भीरता से जाँचा-परखा जाए तो यह पड़ाव मात्र एक रोमांचकारी अनुभूति देनेवाला न होकर हिन्दुस्तान के इतिहास की तमाम ऐसी प्रवृत्तियों का संवर्द्धन करनेवाला और उनका उद्गम स्रोत भी दिखाई देता है जिनका नाता उस उत्तर-औपनिवेशिकता से भी बनता दिखता है जिसकी कल्पना बीसवीं शताब्दी के मध्य में आकर ही विश्व के विचारकों द्वारा की जा सकी।
सांस्कृतिक साम्राज्यवाद यदि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही पश्चिमी विश्व की एक सुविचारित विचारधारा का स्वरूप ग्रहण कर चुका था तो उपनिवेशवाद के प्रारम्भिक स्वरूप का गवाह रहा हिन्दुस्तान, और वहाँ सांस्कृतिक दिशा में प्रवृत्त साम्राज्यवादी नीतियों की प्रतिक्रियाएँ भी उसी स्तर के प्रतिरोध पैदा करने में पूर्ण सक्षम थीं।
भारत में आनेवाले आधुनिक प्रभाव यहाँ की ज़मीन के लिए सहज तो थे ही नहीं, बल्कि कई अर्थों में बिलकुल भिन्न भी थे। फिर ये विचार पश्चिमी आधुनिकता का डंका पीटनेवालों और हर अन्य सभ्यता व संस्कृति को हेय दृष्टि से देखनेवाले पश्चिम के ईसाई विश्व द्वारा लाए जा रहे थे। किन्तु इन सबके साथ सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि ये उन औपनिवेशिक हुक्मरानों द्वारा लाए जा रहे थे जो इसे ज़बर्दस्ती लागू करने की मंशा और क्षमता दोनों ही रखते थे। यह परिदृश्य भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को एक तरफ़ अन्तर्द्वन्द्वों में जकड़ता गया, साथ-साथ उसके इन दंभी हुक्मरानों को अनायास एक अदृश्य, अप्रत्याशित संकट की ओर भी खींचता चला गया।
गहराइयों तक पहुँचकर ही हम वे सारी सम्भावनाएँ तलाश सकते हैं जिन्होंने 1857 के इस पड़ाव को निर्मित किया। एक ऐसा पड़ाव जो युद्ध के रूप में सामने आया, और जिसका नायक एक सिपाही बना। वह सिपाही जो हिन्दुस्तान के आम आदमी, किसान और उच्च जाति, सबका प्रतिनिधि था और अंग्रेज़ सरकार के कार्यकलापों का साक्षी भी। इस सिपाही के द्वारा किए गए विद्रोह के अर्थ निश्चित रूप से गम्भीर थे।
अपने तमाम ऐतिहासिक पड़ावों से गुज़रती एक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक है ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक पक्ष और 1857’।
Katha Satisar
- Author Name:
Chandrakanta
- Book Type:

- Description: शैव, बौद्ध और इस्लाम की साँझी विरासतों से रची कश्मीर वादी में पहले भी कई कठिन दौर आ चुके हैं। कभी औरंगजेब के समय, तो कभी अफ़ग़ान-काल में। लेकिन वे दौर आकर गुज़र गए। कभी धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर मसीहा बनकर आए, कभी कोई और। तभी ललद्यद और नुन्दऋषि की धरती पर लोग भिन्न धर्मों के बावजूद, आपसी सौहार्द और समन्वय की लोक-संस्कृति में रचे-बसे जीते रहे। आज वही आतंक, हत्या और निष्कासन का कठिन सिकन्दरी दौर फिर आ गया है, तब सिकन्दर के आतंक से वादी में पंडितों के कुल ग्यारह घर बचे रह गए थे। गो कि नई शक्ल में नए कारणों के साथ, पर व्यथा-कथा वही है—मानवीय यंत्रणा और त्रास की चिरन्तन दु:ख-गाथा। लोकतंत्र के इस गरिमामय समय में, स्वर्ग को नरक बनाने के लिए कौन ज़िम्मेदार हैं? छोटे-बड़े नेताओं, शासकों, बिचौलियों की कौन-सी महत्त्वाकांक्षाओं, कैसी भूलों, असावधानियों और ढुलमुल नीतियों का परिणाम है—आज का रक्त-रँगा कश्मीर? पाकिस्तान तो आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार है ही, पर हमारे नेतागण समय रहते चेत क्यों न गए? ऐसा क्यों हुआ कि जो औसत कश्मीरी, ग़ुस्से में, ज़्यादा-से-ज़्यादा, एक-दूसरे पर काँगड़ी उछाल देता था, वही कलिशनिकोव और एके सैंतालीसों से अपने ही हमवतनों के ख़ून से हाथ रँगने लगा? ‘ऐलान गली ज़िन्दा है’ तथा ‘यहाँ वितस्ता बहती है’ के बाद कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया चर्चित लेखिका चन्द्रकान्ता का बृहद् उपन्यास है—‘कथा सतीसर’। लेखिका ने अपने इस उपन्यास में पात्रों के माध्यम से मानवीय अधिकार और अस्मिता से जुड़े प्रश्नों को उठाया है। इस पुस्तक में सन् 1931 से लेकर 2000 के शुरुआती समय के बीच बनते-बिगड़ते कश्मीर की कथा को संवेदना का ऐसा पुट दिया गया है कि सारे पात्र सजीव हो उठते हैं । सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में घटे हादसों से जन-जीवन के आपसी रिश्तों पर पड़े प्रभावों का संवेदनात्मक परीक्षण ही नहीं है यह पुस्तक, वर्तमान के जवाबदेह तथ्यों को साहित्य में दर्ज करने से एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी बन गई है।
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