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Itihas, Sanskriti Aur Sampradayikta

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गुणाकर मुळे को हम विज्ञान विषयों के लेखक के रूप में जानते हैं। उन्होंने हिन्‍दी पाठकों को सरलतम शब्दावली में विज्ञान की कठिन अवधारणाओं, आविष्कारों और खोजों से परिचित कराया। लेकिन उनके लेखन का उद्‌देश्य वैज्ञानिक दृष्टि को आमजन की जीवन-शैली और विचार का हिस्सा बनाना था। इसीलिए उन्होंने शुद्ध सूचनात्मक वैज्ञानिक लेखक के साथ संस्कृति, समाज, धर्म, अंधविश्वास आदि पर भी हमेशा लिखा। मार्क्सवाद उनकी वैचारिक भूमि रहा और आधुनिक जीवन-मूल्य उनके अभीष्ट। यह किताब उनके ऐसे ही लेखन का संकलन है जिसमें संस्कृति, धर्म, हिन्‍दुत्व की राजनीति, आर्यों का मूल आदि विभिन्न विषयों पर उनका लेखन शामिल है। पाठक इन लेखों में काफ़ी कुछ नया पाएँगे। रामकथा को लीजिए। आज राम को लेकर देश में साम्‍प्रदायिक तनाव पैदा करने के प्रयास जारी हैं। मगर राम काफ़ी हद तक एक मिथकीय चरित्र है, इस बात के पर्याप्त सबूत वाल्मीकि-रामायण में ही मौजूद हैं। शिवाजी जैसे कई ऐतिहासिक चरित्रों को विकृत रूप में पेश करके मुस्लिम-द्वेष को उभारने के प्रयास हो रहे हैं। मगर प्रामाणिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि शिवाजी रत्ती-भर भी मुस्लिम-द्वेषी नहीं थे। इस बात को 'ऐसा था शिवाजी का राजधर्म' लेख में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इधर के वर्षों में देश में धार्मिक असहिष्णुता और साम्‍प्रदायिकता में तेज़ी से वृद्धि हुई है। इस पर रोक लगाने के लिए आम जनता को शिक्षित करना अत्यावश्यक है—उनकी अपनी भाषा में। साम्‍प्रदायिकता अपने प्रचार-प्रसार के लिए आम जनता की भाषा का भरपूर उपयोग कर रही है। साम्‍प्रदायिकता के प्रतिकार के लिए भी जनता की भाषा का ही उपयोग होना चाहिए। इस तरह गुणाकर मुळे की यह पुस्तक तमाम मुद्‌दों से टकराते हुए ऐसे कैनवस की रचना करती है, जहाँ विचार-विमर्श अपने सृजनात्मक रूप में सम्‍भव हो सके।

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गुणाकर मुळे को हम विज्ञान विषयों के लेखक के रूप में जानते हैं। उन्होंने हिन्‍दी पाठकों को सरलतम शब्दावली में विज्ञान की कठिन अवधारणाओं, आविष्कारों और खोजों से परिचित कराया। लेकिन उनके लेखन का उद्‌देश्य वैज्ञानिक दृष्टि को आमजन की जीवन-शैली और विचार का हिस्सा बनाना था।
इसीलिए उन्होंने शुद्ध सूचनात्मक वैज्ञानिक लेखक के साथ संस्कृति, समाज, धर्म, अंधविश्वास आदि पर भी हमेशा लिखा। मार्क्सवाद उनकी वैचारिक भूमि रहा और आधुनिक जीवन-मूल्य उनके अभीष्ट।
यह किताब उनके ऐसे ही लेखन का संकलन है जिसमें संस्कृति, धर्म, हिन्‍दुत्व की राजनीति, आर्यों का मूल आदि विभिन्न विषयों पर उनका लेखन शामिल है।
पाठक इन लेखों में काफ़ी कुछ नया पाएँगे। रामकथा को लीजिए। आज राम को लेकर देश में साम्‍प्रदायिक तनाव पैदा करने के प्रयास जारी हैं। मगर राम काफ़ी हद तक एक मिथकीय चरित्र है, इस बात के पर्याप्त सबूत वाल्मीकि-रामायण में ही मौजूद हैं।

शिवाजी जैसे कई ऐतिहासिक चरित्रों को विकृत रूप में पेश करके मुस्लिम-द्वेष को उभारने के प्रयास हो रहे हैं। मगर प्रामाणिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि शिवाजी रत्ती-भर भी मुस्लिम-द्वेषी नहीं थे। इस बात को 'ऐसा था शिवाजी का राजधर्म' लेख में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

इधर के वर्षों में देश में धार्मिक असहिष्णुता और साम्‍प्रदायिकता में तेज़ी से वृद्धि हुई है। इस पर रोक लगाने के लिए आम जनता को शिक्षित करना अत्यावश्यक है—उनकी अपनी भाषा में। साम्‍प्रदायिकता अपने प्रचार-प्रसार के लिए आम जनता की भाषा का भरपूर उपयोग कर रही है। साम्‍प्रदायिकता के प्रतिकार के लिए भी जनता की भाषा का ही उपयोग होना चाहिए।
इस तरह गुणाकर मुळे की यह पुस्तक तमाम मुद्‌दों से टकराते हुए ऐसे कैनवस की रचना करती है, जहाँ विचार-विमर्श अपने सृजनात्मक रूप में सम्‍भव हो सके।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Hardbound
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2019
Weight
360 grams
ISBN-13
9789388753692
Pages
224
Reading time
~7 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22.5 cm
Language
Hindi

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