Pracheen Vishwa Ka Uday Evam Vikas
Author:
Om Prakash PrasadPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 716
₹
895
Available
विश्व-इतिहास का निर्माण जिन लोगों ने किया, उन्हें निम्न पशुमानव, निर्धन, अनपढ़, अर्धनग्न, जंगली और आदिवासी के नाम से पहचाना गया। इतिहासकार उन्हें विश्व का आविष्कर्ता और प्रारम्भिक वैज्ञानिक मानते हैं। भारत, मिस्र, मेसापोटामिया, चीन, यूनान, और रोम की सभ्यताओं का उदय और विकास उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है।</p>
<p>जिस सूत्र से ये सभी सभ्यताएँ परस्पर सम्बद्ध रहीं, वह सूत्र है—इस पुस्तक में मानव-विकास के विभिन्न चरणों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए जिन पहलुओं पर विशेष दृष्टिपात किया गया है, उनमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रमुख हैं। इस क्रम में पुस्तक यह भी स्पष्ट करती है कि अखिल विश्व में एकता और परस्पर-निर्भरता का आधार सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक उपकरणों ने तैयार किया। विज्ञान के साथ-साथ विद्वान इतिहासकार ने इस कृति में समय-समय पर अस्तित्व में आए धर्मों की भी जानकारी दी है।</p>
<p>पुस्तक के अन्त में दी गई शब्दावली विशेष रूप से उपयोगी है।
ISBN: 9788126719938
Pages: 568
Avg Reading Time: 19 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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प्राचीन भारतीय इतिहास के अन्यतम विद्वान प्रो. रामशरण शर्मा ने अपनी प्रस्तुत पुस्तक में वैदिक और वैदिकोत्तर काल के भौतिक जीवन के विविध रूपों और समाज की विभिन्न अवस्थाओं के आपसी सम्बन्धों के स्वरूप का अध्ययन किया है। उनका मानना है कि वैदिक युग के मध्यभाग में जिस समाज का स्थान-स्थान पर उल्लेख मिलता है, वह मूलतः पशुपालक समाज है। उत्तर वैदिक काल तक आते-आते कृषिकर्म तथा लोहे के सीमित प्रयोग के दर्शन होने लगते हैं। इस काल का कृषक अपने राजा या मुखिया को कर देने की स्थिति में नहीं पहुँच पाया था, लेकिन इसी काल में जनजातीय समाज का वर्गों एवं व्यावसायिक समूहों में परिवर्तन आरम्भ हो गया था। इसमें पुरोहित वर्ग के क्रमिक वर्चस्व के लक्षण दिखने लगते हैं।
बुद्ध के समय तक आते-आते यह प्रक्रिया अधिक जटिल रूप धारण कर लेती है, उत्पादन के साधनों और सम्बन्धों में अप्रत्याशित बदलाव आ जाता है। समाज में वर्ण-व्यवस्था का आरम्भिक रूप इस काल तक आते-आते स्पष्ट आकार ग्रहण करने लगता है। असमानता का विकास, सिक्कों का प्रचलन इस युग की बदली भौतिक स्थिति की सूचना देते हैं।
इसी प्रकार की कुछ और बातें हैं जो सामाजिक स्तरीकरण और भौतिक प्रगति के युगपत सम्बन्धों को दर्शाती हैं। प्रो. शर्मा ने प्रारम्भ से अन्त तक इस विकास को द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दृष्टि से देखा-परखा है। वैज्ञानिक दृष्टि से इतिहास-लेखन का यह ग्रन्थ सर्वोत्तम उदाहरण है और भारतीय इतिहास में दिलचस्पी रखनेवाले हर व्यक्ति के लिए अपरिहार्य भी।
Katha Satisar
- Author Name:
Chandrakanta
- Book Type:

- Description: शैव, बौद्ध और इस्लाम की साँझी विरासतों से रची कश्मीर वादी में पहले भी कई कठिन दौर आ चुके हैं। कभी औरंगजेब के समय, तो कभी अफ़ग़ान-काल में। लेकिन वे दौर आकर गुज़र गए। कभी धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर मसीहा बनकर आए, कभी कोई और। तभी ललद्यद और नुन्दऋषि की धरती पर लोग भिन्न धर्मों के बावजूद, आपसी सौहार्द और समन्वय की लोक-संस्कृति में रचे-बसे जीते रहे। आज वही आतंक, हत्या और निष्कासन का कठिन सिकन्दरी दौर फिर आ गया है, तब सिकन्दर के आतंक से वादी में पंडितों के कुल ग्यारह घर बचे रह गए थे। गो कि नई शक्ल में नए कारणों के साथ, पर व्यथा-कथा वही है—मानवीय यंत्रणा और त्रास की चिरन्तन दु:ख-गाथा। लोकतंत्र के इस गरिमामय समय में, स्वर्ग को नरक बनाने के लिए कौन ज़िम्मेदार हैं? छोटे-बड़े नेताओं, शासकों, बिचौलियों की कौन-सी महत्त्वाकांक्षाओं, कैसी भूलों, असावधानियों और ढुलमुल नीतियों का परिणाम है—आज का रक्त-रँगा कश्मीर? पाकिस्तान तो आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार है ही, पर हमारे नेतागण समय रहते चेत क्यों न गए? ऐसा क्यों हुआ कि जो औसत कश्मीरी, ग़ुस्से में, ज़्यादा-से-ज़्यादा, एक-दूसरे पर काँगड़ी उछाल देता था, वही कलिशनिकोव और एके सैंतालीसों से अपने ही हमवतनों के ख़ून से हाथ रँगने लगा? ‘ऐलान गली ज़िन्दा है’ तथा ‘यहाँ वितस्ता बहती है’ के बाद कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया चर्चित लेखिका चन्द्रकान्ता का बृहद् उपन्यास है—‘कथा सतीसर’। लेखिका ने अपने इस उपन्यास में पात्रों के माध्यम से मानवीय अधिकार और अस्मिता से जुड़े प्रश्नों को उठाया है। इस पुस्तक में सन् 1931 से लेकर 2000 के शुरुआती समय के बीच बनते-बिगड़ते कश्मीर की कथा को संवेदना का ऐसा पुट दिया गया है कि सारे पात्र सजीव हो उठते हैं । सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में घटे हादसों से जन-जीवन के आपसी रिश्तों पर पड़े प्रभावों का संवेदनात्मक परीक्षण ही नहीं है यह पुस्तक, वर्तमान के जवाबदेह तथ्यों को साहित्य में दर्ज करने से एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी बन गई है।
Vikas Ka Garh Chhattisgarh
- Author Name:
Dr. Raman Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
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