Hindu Muslim Rishte
(0)
Author:
Aashutosh VarshneyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
499
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समाज-विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी किताबें कम ही हैं जो अपने भारी-भरकम विषय में प्रमुख स्थान बनाने के साथ ही अपने लेखक को स्थापित कर दें। यह एक ऐसी ही किताब है। पर इसके लिए तर्कों और विचारों की नवीनता और विलक्षणता के साथ लेखक का श्रम भी श्रेय का हक़दार है। हिन्दू-मुस्लिम दंगों सम्बन्धी काफ़ी विवरणों को छान डालने के बाद लेखक ने छह शहरों का सघन अध्ययन भी किया है—इसमें वर्षों का श्रम लगा है, अनेक सहयोगियों की मदद लेनी पड़ी है और सम्भवतः लाखों डॉलर ख़र्च हुए हैं।</p> <p>लेकिन दंगों और नागरिक समाज की मुस्तैदी या ढील में एकदम स्पष्ट रिश्ता देखने-दिखाने वाली इस किताब ने इस सब श्रम-ख़र्च और बौद्धिक ऊर्जा के ख़र्च की सार्थकता साबित की है, लेखक ने ठोस प्रमाणों के आधार पर अभी तक प्रचलित जातीय दंगों सम्बन्धी उन सब सिद्धान्तों को ख़ारिज किया है जो अनेक प्रश्न अनुत्तरित ही छोड़ देते थे। यही कारण है कि भारतीय शहरों के अध्ययन पर आधारित इस पुस्तक की चर्चा दुनिया-भर में हुई है।</p> <p>पर यह किताब सिर्फ़ अकादमिक जगत् की चर्चा-भर की चीज़ नहीं है। यह हर पाठक, इस विषय में दिलचस्पी रखनेवाले हर व्यक्ति के मन में कुछ सवाल उठाती है, विभिन्न क़िस्म के संगठनों से जुड़कर अपना कुछ वक़्त समाज को देने की प्रेरणा देती है, पार्टियों-मजदूर संघों, व्यापार संगठनों, पेशागत संगठनों वग़ैरह से सामाजिक चौकसी की माँग करती है। यह स्थापित करती है कि बड़े शहरों के उदय के साथ इस चौकसी के बिना दंगे होंगे ही और सामाजिक चौकसी ही दंगे रोकने का अचूक मंत्र है।
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समाज-विज्ञान के क्षेत्र में ऐसी किताबें कम ही हैं जो अपने भारी-भरकम विषय में प्रमुख स्थान बनाने के साथ ही अपने लेखक को स्थापित कर दें। यह एक ऐसी ही किताब है। पर इसके लिए तर्कों और विचारों की नवीनता और विलक्षणता के साथ लेखक का श्रम भी श्रेय का हक़दार है। हिन्दू-मुस्लिम दंगों सम्बन्धी काफ़ी विवरणों को छान डालने के बाद लेखक ने छह शहरों का सघन अध्ययन भी किया है—इसमें वर्षों का श्रम लगा है, अनेक सहयोगियों की मदद लेनी पड़ी है और सम्भवतः लाखों डॉलर ख़र्च हुए हैं।</p>
<p>लेकिन दंगों और नागरिक समाज की मुस्तैदी या ढील में एकदम स्पष्ट रिश्ता देखने-दिखाने वाली इस किताब ने इस सब श्रम-ख़र्च और बौद्धिक ऊर्जा के ख़र्च की सार्थकता साबित की है, लेखक ने ठोस प्रमाणों के आधार पर अभी तक प्रचलित जातीय दंगों सम्बन्धी उन सब सिद्धान्तों को ख़ारिज किया है जो अनेक प्रश्न अनुत्तरित ही छोड़ देते थे। यही कारण है कि भारतीय शहरों के अध्ययन पर आधारित इस पुस्तक की चर्चा दुनिया-भर में हुई है।</p>
<p>पर यह किताब सिर्फ़ अकादमिक जगत् की चर्चा-भर की चीज़ नहीं है। यह हर पाठक, इस विषय में दिलचस्पी रखनेवाले हर व्यक्ति के मन में कुछ सवाल उठाती है, विभिन्न क़िस्म के संगठनों से जुड़कर अपना कुछ वक़्त समाज को देने की प्रेरणा देती है, पार्टियों-मजदूर संघों, व्यापार संगठनों, पेशागत संगठनों वग़ैरह से सामाजिक चौकसी की माँग करती है। यह स्थापित करती है कि बड़े शहरों के उदय के साथ इस चौकसी के बिना दंगे होंगे ही और सामाजिक चौकसी ही दंगे रोकने का अचूक मंत्र है।
Book Details
-
ISBN9789360867553
-
Pages379
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: अफ़ग़ानिस्तान की भौगोलिक संरचना उसकी स्थिति को अनूठा बनाती है। सभ्यता की शुरुआत से ही ये विभिन्न क़ाफ़िलों के आने-जाने का मार्ग रहा है। जो भी सुदूर पूर्व या भारत के जंगलों तथा नदियों की तरफ़ जाना चाहता, उसे अफ़ग़ानिस्तान की घाटियों तथा पहाड़ियों को ज़रूर पार करना पड़ता। एशिया और यूरोप, अरब दुनिया और दक्षिण एशिया और मध्य एशिया एवं पश्चिम एशिया के बीच स्थित होने की वजह से ये हर किसी को लुभाता है। क्या तालिबान के हटने तथा नई सत्ता के आने से ये लोभ-लालच ख़त्म होगा? पाँच साल के तालिबान शासन ने अफ़ग़ानिस्तान को सदियों पीछे ढकेल दिया है। शासकों ने बामियान की बौद्ध मूर्तियों के रूप में अपनी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर खो दी। ये एक तरह से द्वेष में आकर अपनी ही नाक काट लेने जैसा था, क्योंकि दुनिया ने तालिबान के तौर-तरीक़ों तथा विश्व आतंकवाद के निर्माता के रूप में उसे नामंज़ूर कर दिया था। काबुल के संग्रहालय को प्रसिद्ध गांधार चित्रों तथा प्रतिमाओं से वंचित कर दिया गया। कम्युनिस्ट शासन के दौरान महिलाओं को काम करने की पूरी आज़ादी थी, मगर अफ़ग़ानिस्तान इस स्थिति से उस स्थिति में ले जाया गया जहाँ तालिबान का राज था और जिसमें महिलाएँ दरवाज़ों के पीछे क़ैद कर दी गईं। स्कूल-कॉलेज तथा कामकाज की जगहों से हटाकर उन्हें बलात्कार के लिए छोड़ दिया गया। अपने समूचे ख़ूनी इतिहास में सम्भवतः एक बरबाद समाज ने सबसे ज़्यादा विधवाएँ और अनाथ देखे। इससे भी बुरा ये हुआ कि जो भी पढ़ा-लिखा था और मुल्क से जा सकता था, वो अपनी ज़िन्दगी की हिफ़ाज़त के लिए चला गया। क्या उनमें से कुछ लोग वापस लौटेंगे? उम्मीद करनी चाहिए कि लौटेंगे, मगर कुछ समय के बाद ही क्योंकि आज की हालत डरावनी है। अब इतिहास ने अफ़ग़ानिस्तान को एक और मौक़ा प्रदान किया है। विश्व बिरादरी के लिए भी ये एक अवसर है जब वो अफ़ग़ानिस्तान में एक सामूहिक भूमिका अदा कर सकती है। अफ़ग़ानिस्तान के अतीत और वर्तमान पर एक अनिवार्यतः पठनीय पुस्तक।
Aadhunik Kaal : Paryavaran, Arthvyavstha, Sanskriti (Bharat 1880 to 1950)
- Author Name:
Sumit Sarkar
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- Description: Awating description for this book
Pracheen Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
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Description:
हमारे यहाँ विज्ञान की जो तरक़्क़ी बहुत ज़्यादा नहीं हो सकी, उसका प्रमुख कारण जातिभेद रहा। मेहनत-मशक्कत यानी शूद्र शिल्पकारों के योगदान को सुविधाभोगियों और धामक ग्रन्थों ने छोटा काम समझ लिया; वेदान्त ने संसार को मिथ्या माया बताया, ऐसे में पृथ्वी को जानने-समझने का उत्साह कहाँ से आएगा। ध्यान से बड़ा है विज्ञान; जानने को ही विज्ञान कहते हैं। वैज्ञानिक कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक दृष्टि, एक विचार होता है।
यूँ तो भारत में वैज्ञानिक प्रागैतिहासिक काल से पाए जाते हैं किन्तु उनका नाम-पता हमें ज्ञात नहीं है। विश्व-प्रसिद्ध सिन्धु-सभ्यता का निर्माण ऐसे ही अनजान वैज्ञानिकों ने किया था। भूख, रोग, सर्दी एवं गर्मी से हमारी सुरक्षा भी वैज्ञानिकों ने की। पशुपालन और खेती से नया युग आया। इससे आदिम समाज का ख़ात्मा और श्रेणी अर्थात् वर्गीय समाज का आरम्भ हुआ। व्यापार की तरक़्क़ी, रोज़मर्रा के कामों में रुपए-पैसे का चलन और शहरों का जन्म—इन ऐतिहासिक घटनाओं ने शिल्पकार-शूद्र-कृषक वर्ग के पैरों में पड़ी ज़ंजीरों को खोलने का उपाय किया। परम्परावादी बन्धन अपने आप ढीले हो गए। माना जाने लगा कि आज़ाद लोग अच्छी और सख़्त मेहनत करते हैं।
पुरानी सभ्यताओं की टूटी-फूटी निशानियाँ धरती की छाती पर आज भी शेष हैं। यह स्पष्ट करने के लिए कि विज्ञान ही इतिहास का वास्तविक निर्माता होता है, इस पुस्तक में कुछ नवीन शीर्षक वाले लेखों को रखा गया है। इनमें प्रमुख हैं—प्राचीन विज्ञान एवं वैज्ञानिक, महाभारत, रामायण, शूद्र, मन्दिर, सिक्के, कला में विज्ञान, दक्षिण भारतीय अभिलेख, ज्योतिष विद्या : मिथक या यथार्थ, शिल्पकार आदि।
अभी तक इतिहास की मुख्यधारा से जनसाधारण को अलग ही रखा गया है। उदाहरण के लिए किसान-मज़दूर, इमारत बनाने वाले, बढ़ई, मछुआरा, हज्जाम, दाई, चरवाहा, कल-कारख़ानों में काम करने वाले और शहरों की स़फाई करने वाले आदि। इस पुस्तक में इन सबके योगदान की यथासम्भव चर्चा की गई है ताकि उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और तकनीकी ज्ञान को समझा जा सके।
Manjhinama | The True Story Of A Bonded Labourer Becoming A Union Minister | Minister Enterprises of India Jitan Ram Manjhi Book In Hindi
- Author Name:
Amreen Khan
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- Description: जीतन राम मांझी एक राजनीतिज्ञ हैं, जो केंद्र सरकार में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्री हैं। वर्तमान में वे गया निर्वाचन क्षेत्र से संसद् सदस्य हैं। 20 मई, 2014 से 20 फरवरी, 2015 तक वे बिहार के 23वें मुख्यमंत्री भी रहे। इससे पहले उन्होंने नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति कल्याण मंत्री के रूप में कार्य किया। मांझी 1980 से बिहार विधानसभा के सदस्य हैं। मांझी का जन्म 6 अक्तूबर, 1944 को बिहार के गया जिले के खिजरसराय क्षेत्र के महकार गाँव में हुआ था। मगध विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 13 साल तक गया टेलीफोन एक्सचेंज में काम किया। जीतन राम मांझी ने 1980 में राजनीति में प्रवेश किया। कांग्रेस पार्टी के टिकट पर फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1990 का चुनाव हारने के तुरंत बाद मांझी जनता दल में चले गए। 1996 से 2005 तक मांझी बिहार में आरजेडी राज्य सरकार में मंत्री थे। 2010 के बिहार चुनावों में वे जहानाबाद जिले के मखदुमपुर से राज्य विधानसभा के लिए चुने गए। 2015 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद मांझी ने पार्टी से अलग होकर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा सेक्युलर नाम से अपनी पार्टी बनाई और भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. में शामिल हो गए।
Bharat Mein Angrezi Raj Aur Marxvaad : Vol. 2
- Author Name:
Ramvilas Sharma
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Description:
सुविख्यात समालोचक, भाषाविद् और इतिहासवेत्ता डॉ. रामविलास शर्मा प्रणीत अप्रतिम इतिहासग्रन्थ ‘भारत में अंग्रेज़ी राज और मार्क्सवाद’ का यह दूसरा खंड है। अपनी महत्ता में यह ग्रन्थ लेखक की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कृतियों—‘निराला की साहित्य साधना’ तथा ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’—के समकक्ष ऐतिहासिकता लिए हुए है।
पुस्तक के पहले खंड की तरह रामविलास जी ने इस खंड को भी छह अध्यायों में नियोजित किया है। इसके पहले दोनों अध्याय क्रान्ति और सामाजिक विकास के सन्दर्भ में मार्क्स की स्थापनाओं का विवेचन करते हैं और तीसरे अध्याय में मार्क्स की उन धारणाओं का विश्लेषण है, जो भारत में अंग्रेज़ी राज से सम्बद्ध हैं। चौथा अध्याय फ़्रांसीसी यात्री बर्नियर से लेकर रजनी पाम दत्त तक कई भारतीय चिन्तकों के उन विचारों को रेखांकित करता है; जो भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास पर प्रामाणिक प्रकाश डालते हैं। पाँचवाँ अध्याय भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के विभिन्न उतार-चढ़ावों का बेबाक विश्लेषण करता है, जिससे वर्तमान स्थितियों पर भी सार्थक सोच की शुरुआत की जा सकती है। छठे अध्याय में सत्ता-हस्तान्तरण तथा भारत-कॉमनवेल्थ-सम्बन्धों का गम्भीर विवेचन हुआ है।
संक्षेप में, यह ग्रन्थ भारतीय इतिहास के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विवादास्पद कालखंड का सर्वथा नया मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। भारत के वर्तमान और भावी स्वरूप के सन्दर्भ में इससे हमें जो दृष्टि प्राप्त होती है, उससे आज तक का जाना हुआ इतिहास अपने मिथ्या की अनेकानेक केंचुलियाँ उतारकर पूरी तरह निरावरण हो उठता है। यह प्रक्रिया पाठक को न सिर्फ़ लेखक के विराट वैज्ञानिक इतिहासबोध के मूल तक ले जाती है, बल्कि अर्थतंत्र से लेकर भाषा, संस्कृति और स्वदेशी को धुरी बनाकर एक नए भारत के निर्माण की आकांक्षा को भी अनुभूत कराती है।
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