Khalji Kaleen Bharat
(0)
Author:
Saiyad Athar Abbas RizviPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
995
796 (20% off)
Available
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प्रस्तुत ग्रन्थ ख़लज़ी बादशाहों के, समय के लिहाज़ से अल्प किन्तु महत्त्व की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक शासनकाल (1290-1320 ई.) से सम्बन्धित है।</p> <p>डॉ. अतहर अब्बास रिज़वी ने इस पुस्तक में जिन तत्कालीन ग्रन्थों के परम आवश्यक उद्धरणों का समावेश किया है उनमें हैं—ज़ियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख़े फ़ीरोज़शाही’, ‘अमीर ख़ुसरो’ के पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ (‘मिफ़ताहुल फ़ुतूह’, ‘ख़ज़ाइनुल फ़ुतूह’, ‘दिवलरानी ख़िज्र ख़ानी’, ‘नुह सिपेहर’ और ‘तुग़लक़नामा’), साथ ही मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु से कुछ ही पहले लिखनेवाले एसामी की ‘फ़ुतूहुस्सलातीन’।</p> <p>इब्ने बतूता की यात्रा के उल्लेख से भी ख़लज़ी वंश से सम्बन्धित उद्धरण दिए गए हैं। कुछ काल पीछे के लिखे हुए तीन अन्य ग्रन्थों का भी समावेश इसलिए कर लिया गया है कि जिन मूल ग्रन्थों के आधार पर वे लिखे गए हैं, उनके अप्राप्य हो जाने के कारण उनकी अहमियत बढ़ गई है। ये ग्रन्थ हैं यहया बिन अहमद का ‘तारीख़े मुबारक शाही’, अबुल क़ासिम हिन्दू शाह फ़रिश्ता अस्तराबादी का ‘गुलशने इब्राहीमी’ जिसकी प्रसिद्धि ‘तीरीख़े फ़रिश्ता’ के नाम से है, और जफ़रुलवालेह के नाम से प्रचलित अरबी में लिखा हुआ गुजरात का इतिहास।</p> <p>विद्वान अनुवादक ने इन ग्रन्थों का आलोचनात्मक विवेचन किया है जिसके चलते यह पुस्तक इतिहासज्ञों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी सुग्राह्य हो गई है।
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प्रस्तुत ग्रन्थ ख़लज़ी बादशाहों के, समय के लिहाज़ से अल्प किन्तु महत्त्व की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक शासनकाल (1290-1320 ई.) से सम्बन्धित है।</p>
<p>डॉ. अतहर अब्बास रिज़वी ने इस पुस्तक में जिन तत्कालीन ग्रन्थों के परम आवश्यक उद्धरणों का समावेश किया है उनमें हैं—ज़ियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख़े फ़ीरोज़शाही’, ‘अमीर ख़ुसरो’ के पाँच ऐतिहासिक ग्रन्थ (‘मिफ़ताहुल फ़ुतूह’, ‘ख़ज़ाइनुल फ़ुतूह’, ‘दिवलरानी ख़िज्र ख़ानी’, ‘नुह सिपेहर’ और ‘तुग़लक़नामा’), साथ ही मुहम्मद बिन तुग़लक़ की मृत्यु से कुछ ही पहले लिखनेवाले एसामी की ‘फ़ुतूहुस्सलातीन’।</p>
<p>इब्ने बतूता की यात्रा के उल्लेख से भी ख़लज़ी वंश से सम्बन्धित उद्धरण दिए गए हैं। कुछ काल पीछे के लिखे हुए तीन अन्य ग्रन्थों का भी समावेश इसलिए कर लिया गया है कि जिन मूल ग्रन्थों के आधार पर वे लिखे गए हैं, उनके अप्राप्य हो जाने के कारण उनकी अहमियत बढ़ गई है। ये ग्रन्थ हैं यहया बिन अहमद का ‘तारीख़े मुबारक शाही’, अबुल क़ासिम हिन्दू शाह फ़रिश्ता अस्तराबादी का ‘गुलशने इब्राहीमी’ जिसकी प्रसिद्धि ‘तीरीख़े फ़रिश्ता’ के नाम से है, और जफ़रुलवालेह के नाम से प्रचलित अरबी में लिखा हुआ गुजरात का इतिहास।</p>
<p>विद्वान अनुवादक ने इन ग्रन्थों का आलोचनात्मक विवेचन किया है जिसके चलते यह पुस्तक इतिहासज्ञों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी सुग्राह्य हो गई है।
Book Details
-
ISBN9788126709519
-
Pages221
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पिछले दो दशकों के दौरान, मध्य भारत में व्यापक रूप से वनों से आच्छादित और खनिज के मामले में समृद्ध बस्तर का इलाका देश में सबसे अधिक सैन्यीकृत स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। सरकार माओवादी उग्रवाद को भारत की ‘सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताती है। वर्ष 2005 में राज्य-प्रायोजित एक हथियारबन्द आन्दोलन, सलवा जुडुम, ने सैकड़ों गाँवों को जला दिया और मलेशिया, वियतनाम एवं अन्य जगहों पर विकसित आतंकवाद-विरोधी रवैये का अनुसरण करते हुए उन गाँवों के निवासियों को राज्य-नियंत्रित शिविरों में हाँक दिया। बलात्कार और हत्याओं के अलावा, ‘आत्मसमर्पण’ कर चुके सैकड़ों माओवादी समर्थकों को जबरन सहायक के रूप में भरती किया गया। संघर्ष आज भी जारी है, जो आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और माओवादी कैडरों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। वर्ष 2007 में, नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य लोगों ने इस संघर्ष से उत्पन्न मानवाधिकार-हनन के मुद्दे पर भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा। वर्ष 2011 में दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, न्यायालय ने हथियारबन्द गिरोह के लिए राज्य के समर्थन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि, सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया है। ‘दावानल : माओवाद से जंग’ पुस्तक भारत के हृदयस्थल में चल रहे इस क्रूर युद्ध का वर्णन करती है और देश की अदालतों, मीडिया, राजनीति और अन्त में भारतीय लोकतंत्र की हकीकत बयान करती है। यह इलाके की व्यापक यात्राओं, अदालती साक्ष्यों, सरकारी दस्तावेजों और उन घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका पर आधारित है।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Varanasi
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
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वाराणसी जनपद शुरू से ही आंदोलनों की पहली पंक्ति में रहता आया है। विद्या और नवचेतना का केंद्र होने के कारण यह नगर शुरू से ही देश के बुद्धिजीवियों का नेतृत्व करता रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन में भी उसने यह चुनौती स्वीकार की और इस नगर ने कई महत्त्वपूर्ण नेता और कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन को दिए। गांधी जी का अहिंसक आंदोलन हो या क्रांतिकारियों का हिंसक आंदोलन सभी जगह काशी के कार्यकर्ताओं का वर्चस्व था।
ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला मोहभंग काशी में ही उजागर हुआ जब काशिराज महाराज चेतसिंह ने ब्रिटिश गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की जोर-जबरदस्ती के सामने नतमस्तक होने से इनकार कर दिया। इसी कड़ी में अठारह वर्ष बाद काशी राज के दीवान बाबू जगतसिंह ने अवध के निष्कासित नवाब वजीर अली का समर्थन किया और उन्हें कालापानी की सजा भोगनी पड़ी।
हिंदी आंदोलन, स्वदेशी की चेतना और देश का धन विदेश चले जाने की बेचैनी, भारतेंदु हरिश्चंद्र के चिंतन की मूल पीठिका है। इस लड़ाई में वे आधुनिक साधनों से लड़ने के लिए कटिबद्ध हुए। उनका मन और भाषाबोध मध्ययुगीन था, लेकिन चिंतन आधुनिक था। वे उस समय की भारतीय नवचेतना के प्रतीक थे जो एक नई शताब्दी में प्रवेश कर रही थी।
वर्तमान पुस्तक काशी और वाराणसी को एक नए दृष्टिबोध के साथ समझने का एक प्रयास है।
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