Karyakartaon Se…
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कार्यकर्ताओं से...' हमारी विचारधारा के कार्यकर्ताओं और आनेवाली पीढिय़ों के लिए एक पथ-प्रदर्शक साबित होगी। साथ ही, राजनीतिक क्षेत्र में जनसंघ से लेकर भाजपा की आज भारतीय समाज में महती आवश्यकता क्यों है—जैसे विषयों को भी समझने में सहायता मिलेगी। यह संयोग ही है कि सन् 1996 में भोपाल में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के एक प्रशिक्षण वर्ग में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के साथ रहे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सह-सरकार्यवाह माननीय सुदर्शनजी, जनसंघ के ही दिनों से कार्य कर रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी एवं तत्कालीन संगठन महामंत्री माननीय कुशाभाऊ ठाकरे एक साथ इस प्रशिक्षण वर्ग में रहे और अपने प्रेरक उद्बोधनों से कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। पठनीय व संग्रहणीय यह पुस्तक अपनी विचारधारा के संवर्धन और व्यावहारिक निरूपण की दृष्टि से हम सबके लिए एक प्रकाशपुंज का कार्य करेगी।
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कार्यकर्ताओं से...' हमारी विचारधारा के कार्यकर्ताओं और आनेवाली पीढिय़ों के लिए एक पथ-प्रदर्शक साबित होगी। साथ ही, राजनीतिक क्षेत्र में जनसंघ से लेकर भाजपा की आज भारतीय समाज में महती आवश्यकता क्यों है—जैसे विषयों को भी समझने में सहायता मिलेगी। यह संयोग ही है कि सन् 1996 में भोपाल में आयोजित भारतीय जनता पार्टी के एक प्रशिक्षण वर्ग में भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी के साथ रहे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सह-सरकार्यवाह माननीय सुदर्शनजी, जनसंघ के ही दिनों से कार्य कर रहे पूर्व उप-प्रधानमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी एवं तत्कालीन संगठन महामंत्री माननीय कुशाभाऊ ठाकरे एक साथ इस प्रशिक्षण वर्ग में रहे और अपने प्रेरक उद्बोधनों से कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया। पठनीय व संग्रहणीय यह पुस्तक अपनी विचारधारा के संवर्धन और व्यावहारिक निरूपण की दृष्टि से हम सबके लिए एक प्रकाशपुंज का कार्य करेगी।
Book Details
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ISBN9789390372294
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Pages96
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: " त्रिशूल ' के लिए मैं ऐसे व्यक्ति की सुलाश में था जिसे न सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स एवं मिसाइल युद्ध की ठोस जानकारी हो बल्कि जो टीम के सदस्यों में आपसी समझ बढ़ाने के लिए पेचीदगियों को भी समझा सके और टीम का समर्थन प्राप्त कर सके । इसके लिए मुझे कमांडर एस.आर. मोहन उपयुक्त लगे, जिनमें काम को लगन के साथ करने की जादुई शक्ति थी । कमांडर मोहन नौसेना से रक्षा शोध एवं विकास में आए थे । ' अग्नि ', जो मेरा सपना थी, के लिए किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो इस परियोजना में कभी-कभी मेरे दखल को बरदाश्त कर सके । यह बात मुझे आर.एन. अग्रवाल में नजर आई । वह मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेकोलॉजी के विलक्षण छात्रों में से थे । वह डी.आर.डी.एल. में वैमानिकी परीक्षण सुविधाओं का प्रबंधन सँभाल रहे थे । तकनीकी जटिलताओं के कारण ' आकाश ' एवं ' नाग ' को तब भविष्य की मिसाइलों के रूप में तैयार करने पर विचार किया गया । इनकी गतिविधियाँ करीब आधे दशक बाद तेजी पर होने की उम्मीद थी । इसलिए मैंने ' आकाश ' के लिए प्रह्लाद और ' नाग ' के लिए एन. आर. अय्यर को चुना । दो और नौजवानो-वी.के. सारस्वत एवं ए.के. कपूर को क्रमश: सुंदरम तथा मोहन का सहायक नियुक्त किया गया । -इसी पुस्तक से प्रस्तुत पुस्तक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के जीवन की ही कहानी नहीं है बल्कि यह डॉ. कलाम के स्वयं की ऊपर उठने और उनके व्यक्तिगत एवं पेशेवर संघर्षों की कहानी के साथ ' अग्नि ', ' पृथ्वी ', ' आकाश ', ' त्रिशूल ' और ' नाग ' मिसाइलों के विकास की भी कहानी है; जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को मिसाइल-संपन्न देश के रूप में जगह दिलाई । यह टेकोलॉजी एवं रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की आजाद भारत की भी कहानी है । "
Aadhar Se Kiska Uddhar
- Author Name:
Reetika Khera
- Book Type:

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Description:
‘‘रीतिका खेड़ा की किताब भारी सरकारी प्रचार के साथ सारे देश में लागू की गई विवादित आधार योजना के बारे में एक सामयिक और सटीक दस्तावेज़ है। यह बताती है कि कैसे सर्वोच्च न्यायालय और जानकारों की सलाह की अनदेखी करते हुए सरकार ने आधार कार्ड को फटाफट तमाम सरकारी कल्याण योजनाओं के लाभार्थियों के लिए अनिवार्य बना दिया। इससे उपजी विसंगतियों और जनता के संवैधानिक अधिकारों को पहुँचे गम्भीर नुकसान पर लेखिका ने बड़ी ईमानदारी से रोशनी डाली है। किताब हमको आधार से जमा किए गए भारतीय उपभोक्ता की बाबत अनमोल डाटा का, आगे मुनाफ़ाख़ोर बाज़ार द्वारा सम्भावित दुरुपयोग के ख़िलाफ़ चेतावनी देती है। एक जटिल विषय के सहज हिन्दी अनुवाद ने इस किताब को सरल और आमफ़हम बनाया है।’’
—मृणाल पाण्डे
Mahashakti Bharat
- Author Name:
Vedpratap Vaidik
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Description:
इस ग्रन्थ के निबन्धों और हमारी वर्तमान विदेश नीति में एक तरह से आँख–मिचौनी चलती रहती है। कभी विदेश नीति आगे होती है और निबन्ध पीछे और कभी निबन्ध आगे होते हैं और विदेश नीति पीछे। जब निबन्ध पीछे–पीछे चलता है तो वह हर विदेश नीति से सम्बन्धित पहल की चीर–फाड़ करता है, कार्य–कारण में उतरता है, जड़ों तक पहुँचता है और दूध को दूध और पानी को पानी कहता है। ताँगे में जुते घोड़े को वह अगर पुचकारता है तो कभी–कभी उस पर चाबुक भी बरसाता है। इसके अलावा यह भी बताता है कि सरकार ने किसी ख़ास मुद्दे पर जो पहल की है, उसे वह बेतहर ढंग से कैसे उठा सकती थी। जब निबन्ध आगे–आगे चलता है तो उसकी कोशिश होती है कि विदेश नीति को वह अपने पीछे खींचता चले।
भारत सरकार की पाकिस्तान–नीति की विचित्रताएँ और वक्रताएँ इन निबन्धों में जमकर अनावृत हुई हैं। लाहौर का आकाश और आगरा की खाई इस लेखक को जैसे पहले से दिखाई पड़ रही थी, अगर भारत सरकार को भी दिखाई पड़ जाती तो जिस निराशा के दौर में वह बाद में फँसी, वह नहीं फँसती। अन्य पड़ोसी देशों और महाशक्तियों के साथ भारत के सम्बन्धों के अन्त:सूत्रों को खोजने और उन्हें नए आयाम देने का प्रयत्न भी इन निबन्धों में हुआ है।
इस ग्रन्थ के अधिकतर निबन्ध तात्कालिक प्रतिक्रिया के रूप में हैं लेकिन हर तत्काल की जड़ें कई कालों तक फैली हुई होती हैं। व्यक्ति के अपने, अन्य व्यक्तियों के, राष्ट्रों के, संस्कृतियों के कालों तक। कालों के विशेष अनुभवों तक। प्रत्येक विश्लेषण में, वह कितना ही तात्कालिक हो, इन सब अनुभवों का निकष होता है। और सबसे बड़ी बात यह कि अपने मस्तिष्क में अगर कोई चिन्तन का ढाँचा हो, चिन्तन–प्रणाली हो तो अलग–अलग समय पर पिरोए गए अलग–अलग आकार–प्रकार के मोती भी अपने–आप सुघड़ माला का रूप धारण करते चले जाते हैं। वाद्य–यंत्रों की विभिन्नता के बावजूद जैसे आर्केस्ट्रा का संगीत समवेत और समरस होता है, वैसे ही विभिन्न विषयों और विभिन्न तिथियों पर लिखे गए ये निबन्ध पाठकों को विदेश नीति चिन्तन की एक प्रणाली के अनुशासन में बँधे हुए लगेंगे।
Madhyakalin Bharat Ka Arthik Itihas
- Author Name:
Sunil Kumar Singh
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Description:
यह पुस्तक नवीनतम स्रोत सामग्री को सन्दर्भित करते हुए लिखी गई है। लेखक ने बड़ी कुशलता के साथ सन्दर्भ ग्रन्थों को समन्वयित किया है कि विशेषज्ञों के अलावा साधारण पाठकों को भी आख्यान बोधगम्य हो सके।
इस पुस्तक में मुगलों की नई काराधान व्यवस्था के आने से कृषि के क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली संकटपूर्ण परिस्थितियों को उजागर किया है। लेखक का मानना है कि इस संकट के बावजूद ग्रामीण घरों में सूत कातने और कपड़ा बुनने की परम्पराएँ कायम रहीं। किन्तु मुग़ल नीतियों का दूरगामी परिणाम यह हुआ कि कृषि और शिल्प दो अलग-अलग व्यवसायों के रूप में नज़र आने लगे। अध्याय के अन्त में लेखक ने परम्परागत शिल्पों को स्वतन्त्र व्यवसाय के रूप में प्रस्तुत कर लम्बे अरसे से चली आ रही भ्रान्तियों को दूर किया है। शिल्प उत्पादन के सम्बन्ध में विस्तृत वृत्तान्त मिलता है।
दक्षिण भारत के राजस्व इतिहास को समाहित कर इस पुस्तक को पूर्णतः समावेशी बना दिया गया है। पाँचवें अध्याय में मध्यकालीन कराधान की व्यवस्था, शहरी उत्पादन, सिक्कों के प्रकार और प्रसार का उल्लेख है। मध्यकालीन भारत में नाप-तौल की प्रणालियों, मजदूरी और उत्पादकों पर विदेशी पूँजी के बढ़ते दबाव से सम्बन्धित है। लेखक ने तालिकाओं और आँकड़ों की सहायता से व्यापार और व्यवसायों के समक्ष बढ़ती चुनौतियों को स्पष्ट किया है।
विश्वास है कि सुधी पाठकों तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे पाठकों को यह रचना समान रूप से पसन्द आएगी।
ललित जोशी
प्रोफेसर, इतिहास विभाग
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