The Indians
Author:
Ganesh Devy, Tony Joseph, Ravi KorisettarPublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 719.2
₹
899
Available
मनुष्यप्राण्याच्या एकूण इतिहासामध्ये होमो सेपियनची जडणघडण, भटका- अन्नसंकलन व पशुपालन करणारा समुदाय ते सार्वभौम राष्ट्रीयत्वाची मांडणी करणारा समाज असा एक विशाल आणि विस्मयकारक घटनाक्रम दडलेला आहे. या दूरस्थ गतकाळाच्या आरंभबिंदूपासूनच भारतीय उपखंड हा मानवी स्थलांतरासाठी एक महत्त्वपूर्ण हमरस्ता ठरलेला आहे. काळाच्या निरनिराळ्या टप्प्यावर विविध समुदायांनी भारताच्या सुजलाम सुफलाम भूमीला आपले घर बनवण्यास प्राधान्य दिलेले आहे. परिणामी युगानुयुगे 'बहुसांस्कृतिकता' हा इथला स्थायीभाव बनून राहिलेला आहे. तथापि, अलीकडील काही वर्षांत दक्षिण आशिया खंडाचा इतिहास मोडून-तोडून टाकण्याची वृत्ती बळावत चालल्याचे दिसून येत आहे आणि या वृत्तीतूनच मग वांशिक शुद्धतेचा मागोवा घेणाऱ्या विवेकशून्य, धोकादायक योजना मूळ धरत असल्याचेही चित्र दिसून येते आहे. 'फेक नरेटीव्हज' रचण्याच्या आजच्या कालखंडात इतिहास जाणून घेण्याचे प्रस्थापित वैज्ञानिक मापदंड आहेत, हेच आपण विसरत चाललो आहोत. त्यामुळे काळाच्या या अशा टप्प्यावर जनुकशास्त्र, पुरातत्त्वशास्त्र, हवामानशास्त्र, भाषाशास्त्र अशा विज्ञानाच्या कसोटीवर खऱ्या उतरणाऱ्या साधनांच्या सहाय्याने भारताच्या तब्बल बारा हजार वर्षांच्या गतकाळाचे अतिशय चिकित्सकपणे अवलोकन करणारा 'द इंडियन्स' हा ग्रंथ अतिशय प्रस्तुत ठरणारा आहे. 'द इंडियन्स' हा एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी प्रकल्प असून यामध्ये जगभरातील सुमारे शंभर एक अभ्यासकांनी आपले योगदान दिलेले आहे. इतिहास, तत्त्वज्ञान, भाषा, संस्कृती या ज्ञानशाखा आणि समाजकारण व राजकारण याप्रति सजग असणाऱ्या सर्वांना आवाहन करणारा अलीकडच्या काळातील हा एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दस्तऐवज आहे.
ISBN: 9789363471973
Pages: 776
Avg Reading Time: 26 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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हिन्दी भारत की एक राष्ट्रीय भाषा है, संघ की राजभाषा है और एक विश्वभाषा भी है। समस्त संसार में वह आज करोड़ों लोगों द्वारा समझी जाती है। उसकी व्याप्ति लगभग डेढ़ सौ देशों में है। वह लगभग एक दर्जन देशों में जनभाषा के रूप में प्रचलित है। इन देशों को तीन कोटियों में विभाजित करना तर्कसंगत होगा—(1) भारत के पड़ोसी राष्ट्र, (2) भारतवंशी राष्ट्र, (3) आप्रवासी-बहुल राष्ट्र।
‘विश्व पटल पर हिन्दी’ का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है, विश्वबोध। हिन्दी का सम्बन्ध संस्कृत, पालि और भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अरबी, फ़ारसी, पस्तो, तुर्की, अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, स्पेनिश, डच, पुर्तगाली, इटैलिक आदि कई भाषाओं से है। इस भाषा ने हज़ारों शब्दों का आदान-प्रदान किया है। हिन्दी-सेवियों ने सैकड़ों विश्वविख्यात ग्रन्थों के अनुवाद किए हैं। दर्जनों विश्व विभूतियों पर ग्रन्थ लिखे हैं। कई यात्रा-संस्मरण लिखे हैं तथा विश्व की घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। हिन्दी ने अनेक विश्वस्तरीय विचारधाराओं को आत्मसात् किया है तथा देश-देशान्तर तक अपनी ‘भारत विद्या’ का निर्यात भी किया है। हिन्दी की रूप-रचना अर्थात् व्याकरण, शब्दकोश, पाठ्यक्रम, शोध, समीक्षा एवं सर्जनात्मक लेखन में सैकड़ों विदेशी विद्वानों की सहभागिता रही है।
इधर हिन्दी फ़िल्मों, धारावाहिकों, पत्र-पत्रिकाओं और मीडिया कार्यक्रमों ने उसे विश्व के कोने-कोने में पहुँचाया है। कम्प्यूटर, इंटरनेट से उसका काफ़ी परिविस्तार हुआ है। लेखक ने दो दशक पूर्व इस ‘विश्व पटल पर हिन्दी’ की दिशा में पहल की थी। इसे अभी और व्यवस्थित करने की आवश्यकता है। इस प्रयोजन पूर्ति में इस पुस्तक की अपनी एक विशिष्ट उपयोगिता है।
Lachhami Jaggar
- Author Name:
Harihar Vaishnav
- Book Type:

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Description:
‘लछमी जगार’ की कथा की भाव-भूमि का सम्बन्ध धान उत्पादन-प्रक्रिया के विस्तारित प्रसंग से है, अत: इसका गठन उसी के अनुरूप है। पाठक इस तथ्य की स्वत: पड़ताल के लिए आमंत्रित हैं। निम्न प्रतीकों की जानकारी जो हल्बी भाषी समुदाय के लिए तो स्पष्ट है, किन्तु उनसे इतर पाठकों के लिए इस कथा के सामान्य परिदृश्य को समझने हेतु आवश्यक जान पड़ती है : मेंग का अर्थ वर्षा है तो माहालखी हैं धान और इक्कीस रानियाँ हैं विभिन्न दलहनी-तिलहनी और अन्य मोटे अनाज। इसी तरह गोपपुर है खेत। इस कथा के नायक नरायन राजा की तुलना सूर्य से की जा सकती है जबकि माहादेव (शिव) को बीज-पुरुष के रूप में देखना चाहिए।
यहाँ यह जानना भी आवश्यक होगा कि दण्डकारण्य का पठार धान उत्पादक पूर्व एवं गौण अन्न उत्पादक पश्चिम की सीमा पर स्थित है। गौण अन्न का उत्पादन पहाड़ी भूमि पर तो किया जा सकता है, किन्तु धान के उत्पादन के लिए सम एवं सिंचित भू-भाग का होना आवश्यक है। इसलिए धान उत्पादन ने अपने-आपको मुख्य भूमि में स्थापित किया, जबकि गौण अन्न गाँव की सीमा पर चले गए। नरायन राजा का विवाह पहले गौण खाद्यान्नों (इक्कीस रानियों) के साथ हुआ और उसके बाद धान (माहालखी) के साथ। मिथकीय दृष्टि से यह कथा इस क्षेत्र का जनपदीय इतिहास सिद्ध होती है। और जैसे ही हम कथा के इस बिन्दु को आत्मसात् कर लेते हैं, वैसे ही इस कथा में आए पत्नी-पीड़क प्रसंगों और धान की मिंजाई के प्रसंग के बीच के अन्तर्सम्बन्धों को भी पकड़ने में सफल हो सकते हैं।
इस महाकाव्य का आयोजन बस्तर की महिलाओं के लिए एक पवित्र अनुष्ठान है। वस्तुत: ‘लछमी जगार’ चर्चा की नहीं अपितु महसूस करने की चीज़ है। यह महसूसना इसके भीतर के विभिन्न संस्कारों और उनसे जुड़े विश्वास, जो विभिन्न संस्कारों में सन्निहित भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में देखे जा सकते हैं, के साथ एकात्म होकर सहभागी होने में है। कथा में वर्णित कुछ एक घटनाओं का सजीव चित्रण उनकी अभिनय प्रस्तुति के साथ किया जाता है, जिनकी मुख्य भूमिकाओं में स्वयं आयोजक ही होते हैं। इन अनुष्ठानों/संस्कारों को मुख्य एवं गौण, दो श्रेणियों में बाँटकर देखा जा सकता है। भिमा-विवाह (अध्याय 16), आम-विवाह (अध्याय 21) एवं माहालखी का विवाह। (अध्याय 32) इस महाकाव्य की प्रमुख घटनाएँ हैं जो विपुल जन-समुदाय को आकर्षित करती हैं।
Marm Mudra
- Author Name:
Mahavir Jondhale
- Book Type:

- Description: ज्येष्ठ पत्रकार महावीर जोंधळे यांनी ‘मर्म मुद्रा' या सार्थ शीर्षकाच्या नव्या ग्रंथाची भेट वाचकांपुढे ठेवली आहे. स्वातंत्र्योत्तर काळात राजकीय चळवळच नव्हे; तर वंचित, दलित, अल्पसंख्य, शेतमजूर, धरणग्रस्त, पीडित वर्गाच्या मागण्या आणि त्यासाठी त्यांनी उभारलेल्या लढ्यात प्रत्यक्ष स्वत: आणि लेखणीद्वारेही जोंधळे यांनी स्वत:चा सहभाग नोंदवला आहे. अंधश्रद्धा, जातिभेद आदी समस्यांनी अद्यापही पुरोगामी समजल्या जाणाऱ्या महाराष्ट्रात ठाण मांडले आहे. पत्रकारितेच्या क्षेत्रात लेखणीचा पराक्रम करणारे बहुसंख्य भाष्यकार निवृत्तीनंतर नि:संकोच मौनीबाबांचे धोरण अवलंबतात. म्हणूनच अपवादात्मक पत्रकार वगळता बहुसंख्य पत्रकारांनी सावधपणे पत्रकारितेच्या आद्य कर्तव्यपूर्तीच्या भूमिकेकडे पाठ फिरवली आहे. विचारवंतांना आणि साक्षेपी वाचकांना सभोवतालचे सार्वजनिक वास्तवाचे दर्शन खरेतर संवेदनशील आणि पत्रकारितेच्या नैतिक मूल्यांची जाण ठेवून घडवणे अपेक्षित असते. महावीर जोंधळे यांनी आदर्श पत्रकारितेचा धर्म सांभाळूनच स्वत:ची लेखणी आजवर झिजवली आहे. बॅ. नाथ पै, बाबा आढाव, कवयित्री शांता शेळके, प्रा. एम. एच. देसर्डा, नामदेव ढसाळ, शिल्पकार भाऊ साठे आदींची उद्बोधक शब्दचित्रे या पुस्तकात महावीर जोंधळे यांनी वाचकांपुढे ठेवली आहेत. ती निश्चितच सर्वांसाठी प्रेरणादायक ठरणारी आहेत, म्हणूनच ती वाचायला हवीत. एकनाथ बागूल Marm Mudra | Mahavir Jondhale मर्म मुद्रा । महावीर जोंधळे
Gopan Aur Ayan : Khand -1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description: गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Jharkhand GK: General Knowledge Book - 2025 For JPSC, JSSC, JTET, JSERC
- Author Name:
Dr. Manish Rannjan
- Book Type:

- Description: Jharkhand emerges as a vibrant canvas, portraying a mesmerizing blend of diverse natural, cultural, social, political, and geographical aspects. Across its enchanting terrain, a symphony of vibrant music and captivating dances fills the air, echoing the collective heartbeat of its inhabitants. The rhythmic beats of dhol, mandar, and flute reverberate, underscoring the region’s rich cultural tapestry. Festivals and rituals such as Karma Puja, Sarhul, Tusu, and Sohrai are intricately interwoven into the fabric of daily life, serving as a poignant expressions of reverence towards nature’s profound essence. In this harmonious celebration, the pure simplicity, charm, and equilibrium of Jharkhand's landscape find eloquent expression. In this comprehensive volume, we embark on a meticulous journey through the diverse dimensions of Jharkhand, spanning across 20 insightful chapters. From delving into its historical and geographical roots to dissecting its political, social, cultural, and economic landscapes, every facet is meticulously examined. The narrative doesn’t just stop at the past; it extends to elucidate contemporary developments, programmes, and policies, complemented by enlightening statistical diagrams that provides a clear understanding of the present scenario. Designed as a companion for both aspirants of competitive examinations and avid learners, this book is a treasure trove of knowledge. With 893 objective questions, their detailed answers, and 100 practice question sets, it serves as an indispensable tool for those striving to carve out successful careers. Anticipated to be a prized possession not only for students but also for researchers, educators, and enthusiasts keen on unraveling the enigmatic allure of this state, this volume promises an enriching exploration into the captivating essence of Jharkhand.
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