Devrukhchya Savitribai
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Author:
Abhijit HegshetyePublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction₹
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इंदिराबाई हळबें यांच्या आयुष्यात बरेच योगायोग आले. त्यातून त्यांच्या जीवनाला एक अनोखे वळण लागत गेले. गांधीविचाराच्या, सेवादलाच्या, सोशालिस्ट विचाराच्या हळुवार लाटा त्यांच्या जीवनाला स्पर्श करत गेल्या; पण त्यांचे वेगवेगळ्या वेळचे निर्णय त्यांचे स्वत:चे होते. 1940 आणि 1950 ही दोन दशके त्यांच्या जीवनात अनेक उलथापालथी होत राहिल्या. त्यात यत्किंचितही खचून न जाता स्वत:ला सावरण्याचे साहस हे त्यांचे होते. ते उद्भवले त्यांच्या आत्मबळातून आणि सद्सदविवेकातून, त्यांच्या मानव- वात्सल्यातून आणि कार्यश्रद्धेतून. म्हणून त्यांचा स्वत:च्या आयुष्याला नवे वळण देणारा प्रत्येक निर्णय अगदी सहजासहजी, ऑरगॅनिकली, जितक्या सहजतेने झाडांना पालवी फुटते, तितक्या खळखळाटाशिवायच्या नि:शब्दतेत घेतला गेला. ही त्यांची किमया, इंदिराबाईंना त्यांच्या काळातील स्त्रीवादी चळवळीसाठी एक अत्यंत महत्त्वाचा आदर्श बनवते, जणू त्या देवरुखच्या सावित्रीबाईच! एका कर्तृत्ववान स्त्रीची ही प्रेरक गाथा अभिजित हेगशेट्ये यांनी तितक्याच ताकदीने आपल्यासमोर ठेवली आहे. ती प्रत्येकाने एकदा तरी वाचायलाच हवी. पद्मश्री डॉ. गणेश देवी भाषाशास्त्रज्ञ आणि साहित्य समीक्षक Devrukhchya Savitribai | Abhijeet Hegshetye देवरुखच्या सावित्रीबाई | अभिजित हेगशेट्ये संपादन : विलास पाटील
Read moreAbout the Book
इंदिराबाई हळबें यांच्या आयुष्यात बरेच योगायोग आले. त्यातून त्यांच्या जीवनाला एक अनोखे वळण लागत गेले. गांधीविचाराच्या, सेवादलाच्या, सोशालिस्ट विचाराच्या हळुवार लाटा त्यांच्या जीवनाला स्पर्श करत गेल्या; पण त्यांचे वेगवेगळ्या वेळचे निर्णय त्यांचे स्वत:चे होते. 1940 आणि 1950 ही दोन दशके त्यांच्या जीवनात अनेक उलथापालथी होत राहिल्या. त्यात यत्किंचितही खचून न जाता स्वत:ला सावरण्याचे साहस हे त्यांचे होते. ते उद्भवले त्यांच्या आत्मबळातून आणि सद्सदविवेकातून, त्यांच्या मानव- वात्सल्यातून आणि कार्यश्रद्धेतून. म्हणून त्यांचा स्वत:च्या आयुष्याला नवे वळण देणारा प्रत्येक निर्णय अगदी सहजासहजी, ऑरगॅनिकली, जितक्या सहजतेने झाडांना पालवी फुटते, तितक्या खळखळाटाशिवायच्या नि:शब्दतेत घेतला गेला. ही त्यांची किमया, इंदिराबाईंना त्यांच्या काळातील स्त्रीवादी चळवळीसाठी एक अत्यंत महत्त्वाचा आदर्श बनवते, जणू त्या देवरुखच्या सावित्रीबाईच!
एका कर्तृत्ववान स्त्रीची ही प्रेरक गाथा अभिजित हेगशेट्ये यांनी तितक्याच ताकदीने आपल्यासमोर ठेवली आहे. ती प्रत्येकाने एकदा तरी वाचायलाच हवी.
पद्मश्री डॉ. गणेश देवी
भाषाशास्त्रज्ञ आणि साहित्य समीक्षक
Devrukhchya Savitribai | Abhijeet Hegshetye
देवरुखच्या सावित्रीबाई | अभिजित हेगशेट्ये
संपादन : विलास पाटील
Book Details
-
ISBN9788196493752
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: लेखक, राजनेता और अर्थशास्त्राी वीरप्पा मोइली की प्रसिद्ध पुस्तक-श्ाृंखला ‘अनलेशिंग इंडिया’ का यह दूसरा खंड भारत के जल-संसाधनों और सिंचाई-व्यवस्था पर केन्द्रित है। देश में उपलब्ध जल-संसाधनों के प्रबन्धन, नियोजन और विकास पर मौलिक समझ के साथ चर्चा करते हुए इस पुस्तक में लेखक ने पानी के सम्यक् उपयोग और उसकी सम्भावनाओं को नई दृष्टि से देखने का आह्वान किया है। पुस्तक का फोकस मुख्यतः सिंचाई है, और अपने गहन विश्लेषण में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि देश की प्रगति के लिए जल-संसाधनों का मितव्ययी और समान उपभोग बेहद जरूरी है। पुस्तक में जल-संसाधनों के सम्मुख उपस्थित वर्तमान और भावी चुनौतियों को रेखांकित किया गया है और उनसे निबटने की व्यावहारिक विधियों पर भी विचार किया गया है। विषय के लिहाज से अत्यन्त समीचीन और प्रासंगिक यह पुस्तक छात्राों, शोधकर्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए समान रूप से उपयोगी है।
Natkhat Bandar
- Author Name:
Ramesh Bedi
- Book Type:

- Description: रामेश बेदी के अनुसार इनसान के सम्पर्क में सबसे अधिक मदारी बन्दर आता है। मदारी की डुगडुगी पर नटखट बन्दर को तमाशबीनों का मनोरंजन करते देखा जाता है। उधर आज़ाद विचरने वाले बन्दर घरों, स्कूलों, दफ़्तरों में ऊधम मचाने के लिए मशहूर हैं। बन्दर की विभिन्न प्रजातियों को दिलचस्प और गहन जानकारी देनेवाली इस पुस्तक में श्री बेदी ने प्रतिपादित किया है कि लंगूर का मुँह काला होता है और इसके गाल में ताज़ा आहार जमा करने की थैली नहीं होती जैसा कि बन्दर के गाल में होती है। श्रीराम का अनन्य भक्त होने से हनुमान के प्रति लोकमानस में अगाध श्रद्धा है। छोटे गाँव से लेकर महानगर तक सभी जगह स्थापित इसकी लाखों प्रतिमाओं को करोड़ों श्रद्धालु पूजते हैं। हनुमान चालीसा के पाठ से स्तवन करते हैं। यह भी कहा जाता है कि प्राणिमात्र के दु:ख-दर्दों को दूर कर उन्हें सुख की राह बताने के लिए भगवान बुद्ध अपने तीस पूर्वजन्मों में बन्दर के रूप में पैदा हुए थे। पूँछ वाले और बिना पूँछ वाले बन्दरों की जातियों का इस पुस्तक में सचित्र परिचय दिया है। 130 सादे चित्रों के अलावा और 15 रंगीन फ़ोटो भी इसमें शामिल किए गए हैं। बिना पूँछ वाले बन्दर—हुल्लक, ओरङ्—उतान, चिम्पांजी, गोरिल्ला—का दिलचस्प जीवन परिचय पुस्तक में दिया गया है।
DADA-DADI KI KAHANIYON KA PITARA
- Author Name:
Smt. Sudha Murty
- Book Type:

- Description: हर दिन एक कहानी मुश्किलों के बिन जिंदगानी! यह वर्ष 2020 की बात है, जब बच्चे घरों में कैद होकर रह गए; क्योंकि नोवेल कोरोना वायरस भारत में आ धमका है। पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो चुका है, और इस बढ़ते संकट के बीच अज्जा और अज्जी अपने पोते-पोतियों और कमलु अज्जी का शिग्गाँव स्थित अपने घर में स्वागत करते हैं। मास्क सिलने से लेकर, घर के काम में हाथ बँटाने और श्रमिकों के लिए खाना तैयार करने से लेकर कालातीत कहानियों में खो जाने तक बच्चों के लिए लॉकडाउन का समय यादगार बन जाता है, जब वे देवी-देवताओं, राजाओं, राजकुमारों, साँपों, जादुई फलियों, चोरों, साम्राज्यों और महलों की दिलचस्प दुनिया में कदम रखते हैं। दादा-दादी की सुनाई अनगिनत कहानियाँ उनके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं, जिनसे बच्चे दुनियादारी को लेकर पहले से कहीं अधिक दयालु और समझदार हो जाते हैं। भारत की लोकप्रिय लेखिका सुधा मूर्ति आपके लिए नैतिक गुणों से भरी ‘दादा-दादी की कहानियों का पिटारा’ का ऐसा संग्रह लेकर आई हैं, जिसे उन्होंने लॉकडाउन के दौरान बड़े प्यार से सँजोया है, ताकि नन्हे-मुन्ने पाठकों को सुकून मिले और वे दूसरों की देखरेख तथा उनके साथ चीजों को साझा करने के चमत्कार का अनुभव प्राप्त कर सकें। उनकी चिर-परिचित शैली में बेहतरीन ढंग से बुनी गई पुस्तक को आप पढ़ने लगें तो उसे छोड़ने का मन नहीं करेगा और यह हर बच्चे के बुकशेल्फ के लिए एक आवश्यकता तो है ही!
Janjatiya Navjagran
- Author Name:
Rahul Singh
- Book Type:

- Description: ‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है।औपनिवेशिक दबावों के विरुद्ध जनजातीय समूह कैसे संगठित होकर प्रतिरोध और परिवर्तन की इबारत लिखते हैं? कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है। वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी है।
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