Parkeey Haat
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Author:
Ravi AmlePublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction₹
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परकीय हात. फॉरिन हँड.विदेशी शक्तींचा, त्यांच्या हेरसंस्थांचा...तो भारतात सतत फिरत होता. फिरत आहे.तो अमेरिका, ब्रिटन, रशिया यांसारख्या मित्रराष्ट्रांचा आहे, तसाच पाकिस्तान, चीनसारख्या शत्रूंचाही.तो भारतात हेरगिरी करत आहे. येथील माणसे फोडत आहे. पण ते एवढ्यापुरतेच मर्यादित नाही.येथील राजकारण, अर्थकारण, समाजकारण यांत तो हस्तक्षेप करत आहे. सरकारी धोरणे आणि निर्णयांवर प्रभाव टाकत आहे. येथील लोकमानसास हवे ते वळण लावण्याचा प्रयत्न करत आहे. यातून तो आपल्या मन-मेंदूपर्यंत पोचू पाहत आहे. हेच ते सायवॉर!आज त्याला जोड लाभली आहे सायबरयुद्धाची. हे युद्धही केवळ येथील गोपनीय माहिती पळवणे एवढ्यापुरते मर्यादित नाही. भारतात घातपात घडवण्यासाठीही सायबरशस्त्रे वापरली जात आहेत. ही बखर आहे त्या थरारक कारवाया आणि कुटील कारस्थानांची.त्या विदेशी शक्तींच्या, सीआयए, केजीबी, एमआय-सिक्स, आयएसआय, चीनची क्वोचानछांपू अशा हेरसंस्थांच्या उद्योग आणि उपद्व्यापांची... स्वातंत्र्यपूर्वकाळापासून आजपर्यंतची... Parkeey Haat | Ravi Amale परकीय हात | रवि आमले
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परकीय हात. फॉरिन हँड.विदेशी शक्तींचा, त्यांच्या हेरसंस्थांचा...तो भारतात सतत फिरत होता. फिरत आहे.तो अमेरिका, ब्रिटन, रशिया यांसारख्या मित्रराष्ट्रांचा आहे, तसाच पाकिस्तान, चीनसारख्या शत्रूंचाही.तो भारतात हेरगिरी करत आहे. येथील माणसे फोडत आहे. पण ते एवढ्यापुरतेच मर्यादित नाही.येथील राजकारण, अर्थकारण, समाजकारण यांत तो हस्तक्षेप करत आहे. सरकारी धोरणे आणि निर्णयांवर प्रभाव टाकत आहे. येथील लोकमानसास हवे ते वळण लावण्याचा प्रयत्न करत आहे. यातून तो आपल्या मन-मेंदूपर्यंत पोचू पाहत आहे. हेच ते सायवॉर!आज त्याला जोड लाभली आहे सायबरयुद्धाची. हे युद्धही केवळ येथील गोपनीय माहिती पळवणे एवढ्यापुरते मर्यादित नाही. भारतात घातपात घडवण्यासाठीही सायबरशस्त्रे वापरली जात आहेत. ही बखर आहे त्या थरारक कारवाया आणि कुटील कारस्थानांची.त्या विदेशी शक्तींच्या, सीआयए, केजीबी, एमआय-सिक्स, आयएसआय, चीनची क्वोचानछांपू अशा हेरसंस्थांच्या उद्योग आणि उपद्व्यापांची... स्वातंत्र्यपूर्वकाळापासून आजपर्यंतची...
Parkeey Haat | Ravi Amale
परकीय हात | रवि आमले
Book Details
-
ISBN9788196774820
-
Pages472
-
Avg Reading Time16 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: We live in a visual age. I Gaze, Therefore I Am is a book on medical gaze first described by Michel Foucault, French philosopher and historian of ideas. The journey the medical gaze has taken from its archaic beginnings to our era of digital culture has been noteworthy. In this book, Rangaswami takes us through this historic journey, blending stories from the history of science and medicine with a rich collection of tales from scriptures and legends as well as iconic episodes from his personal experience, stirring them in his unique style with a wide range of topics for academic discussions. This book is a compelling narrative of the shifting optics of gaze, especially medical gaze, poised in our age of human transition from Homo visualis to Homo virtualis.
Arthat Rashtravaad
- Author Name:
Neerja Madhav
- Book Type:

- Description: भारत की आजादी के बाद से ही कुछ मुट्ठी भर राष्ट्रविरोधी छद्म विचारकों द्वारा राष्ट्रवाद का प्रयोग संकुचित और सीमित अर्थों में किया जाने लगा, जबकि राष्ट्रवाद किसी भी देश के नागरिकों की अपने देश के प्रति वह रागात्मक भावना है, जिसके कारण वह बिना किसी निजी स्वार्थ के राष्ट्र की प्राकृतिक, भौतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक अस्मिता से एक स्वाभाविक प्रेम रखता है। यही वह भावना है जो एक ही राष्ट्र में विविध भाषाओं, वर्गों और संस्कृतियों को एक सूत्र में जोड़ते हुए उसे राष्ट्रप्रेम की ओर उन्मुख करती है। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि तथाकथित बड़े-बड़े लेखकों और चिंतकों ने भी भारतीय राष्ट्रवाद की नकारात्मक व्याख्या की, जबकि इसकी वैश्विक कल्याणकारी दृष्टि विश्व के प्राचीनतम साहित्य में भी उपलब्ध है। राष्ट्रवाद, और विशेष रूप से भारतीय राष्ट्रवाद क्या है, इसकी व्यापकता और इतिहास क्या है, इन सब बिंदुओं पर छाए हुए धुंध को दूर करना आवश्यक था, इसलिए यह पुस्तक की आवश्यकता प्रतीत हुई। राष्ट्रवाद को सही मायने में उसके सभी पक्षों के साथ संपूर्णता में व्याख्यायित करती विदुषी नीरजा माधव की यह पुस्तक वास्तव में एक चिंतनपरक राष्ट्रीय प्रकाश-स्तंभ है, जिसकी उपादेयता सार्वकालिक है।
Stree : Lamba Safar
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

- Description: मैं इस बारे में ज़्यादा जिरह नहीं करना चाहती कि स्त्री-मुक्ति का विचार हमें किस दिशा में ले जाएगा, लेकिन मुझे हमेशा लगता रहा है, कि अपनी जिस संस्कृति के सन्दर्भ में मैं स्त्री-मुक्ति की चर्चा करना और उसके स्थायी आधारों को चीन्हना चाहती हूँ, उसमें पहला चिन्तन भाषा पर किया गया था। जब दो शब्दों का संस्कृत में समास होता है, तो अक्सर अर्थ में अन्तर आ जाता है। इसलिए स्त्री, जो हमारे मध्यकालीन समाज में प्रायः मुक्ति के उलट बन्धन, और बुद्धि के उलट कुटिल त्रिया-चरित्र का पर्याय मानी गई, मुक्ति से जुड़कर, उन कई पुराने सन्दर्भों से भी मुक्त होगी, यह दिखने लगता है। अब बन्धन बनकर महाठगिनी माया की तरह दुनिया को नचानेवाली स्त्री जब मुक्ति की बात करे, तो जिन जड़मतियों ने अभी तक उसे पिछले साठ वर्षों के लोकतांत्रिक राज-समाज की अनिवार्य अर्द्धांगिनी नहीं माना है, उनको ख़लिश महसूस होगी। उनके लिए स्त्री की पितृसत्ता राज-समाज परम्परा पर निर्भरता कोई समस्या नहीं, इसलिए इस परम्परा पर उठाए उसके सवाल भी सवाल नहीं, एक उद्धत अहंकार का ही प्रमाण हैं। इस पुस्तक के लेखों का मर्म और उनकी दिशा समझने के लिए पहले यह मानना होगा कि एक जीवित परम्परा को समझने के लिए सिर्फ़ मूल स्थापनाओं की नजीर नाकाफ़ी होती है, जब तक हमारी आँखों के आगे जो घट रहा है, उस पूरे कार्य-व्यापार पर हम ख़ुद तटस्थ निर्ममता से चिन्तन नहीं करते, तब तक वैचारिक शृंखला आगे नहीं बढ़ सकती।
Samjun Gheu Ya Manala
- Author Name:
Dr. Shrirang Bakhle +1
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- Description: सारं आयुष्य दुःखद घटनांनी भरलेलं असतानाही काही लोक आनंदी दिसतात, तर काहींच्या आयुष्यात सुखाची रेलचेल असूनही ते दुःखी-कष्टी दिसतात. याचं रहस्य त्या त्या व्यक्तीच्या मानसिकतेमध्ये दडलेलं असतं. म्हणजेच तुम्हाला होणारा आनंद आणि तुम्हाला होणारं दुःख हे तुमच्या आयुष्यात जे घडतं त्यावर अवलंबून नसतं, तर ते तुम्ही त्या घटनांकडे कसे बघता यावर अवलंबून असतं. त्यामुळेच ‘माणसाचं मन' याला विशेष महत्त्व प्राप्त होतं. किंबहुना आपल्या व्यक्तिमत्त्वाची सर्वात महत्त्वाची बाजू ही आपलं मन असते. म्हणजे व्यक्ती म्हणून आपण जे कोणी असतो त्यामागे प्रामुख्याने आपलं मन असतं. आपलं मन जसा विचार करतं किंवा जे सांगतं तसेच आपण घडत असतो.असं असलं तरी आपण एकूण शारीरिक आरोग्याबाबत जेवढे जागरूक असतो तेवढे मनाच्या आरोग्याबाबत नसतो. किंबहुना मनाचंही आरोग्य जपायचं असतं हेच आपल्या गावी नसतं. कारण मन म्हणजे काय? ते काम कसं करतं? त्याची अवस्था कशी आहे? कशी असावी? याबद्दल आपण पूर्णपणे अज्ञानी असतो. त्यामुळे आपलं मन आजारी आहे की निरोगी हेच आपल्याला उमगत नाही. डॉ. श्रीरंग बखले यांनी नेमका हाच धागा पकडून हे पुस्तक लिहिलं आहे. अर्थात हे पुस्तक केवळ मनाच्या कार्यप्रणालीबद्दलच माहिती देते असं नाही, तर एकटेपणा, दुःख, भीती, संताप, व्यसन या बरोबरीनेच आनंद, उत्साह, कुतूहल, सर्जनशीलता अशा अनेक पैलूंकडे बघण्याची एक नवी दृष्टी देतं. तेव्हा मनाचं आरोग्य जपायला मदतगार ठरू शकणारा हा मार्गदर्शक आपल्या हाती असायलाच हवा. Samjun Gheu Ya Manala :Dr. Shrirang Bakhle Translated By : Sumedha Kale समजून घेऊ या मनाला : डॉ. श्रीरंग बखले : अनुवाद : सुमेधा काळे
Hatya Aur Atamhatya Ke Beech Mariya
- Author Name:
Veriar Elwin
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Description:
इस किताब का आधारभूत उद्देश्य हिंसा अपराधों के पीछे छिपे मनोविज्ञान को समझना है जो सबसे कम बिगड़े तथा भारतीय आदिवासियों में श्रेष्ठ प्रजाति के लोगों द्वारा किए जाते हैं, तथा वे परिस्थितियाँ जो यहाँ के आदमी, औरतों को आत्महत्या करने के लिए उकसाती हैं।
ऐसी कृति तथा शोधकार्य उन आदिवासियों को, जो जजों तथा मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधी करार दिए जाते हैं, सावधानी तथा बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से समझने तथा उनके साथ सलूक करने के लिए मार्गदर्शन दे सकते हैं। यह कृति निश्चित रूप से दंडित करने तथा आदिवासी कैदियों के साथ जेल में किए जानेवाले व्यवहार पर भी प्रश्न उठाती है। इस किताब के शुरुआती पृष्ठों में मारिया जीवन की विविधता को सारांश में बतलाया गया है। इस संक्षिप्तता में ही उनके अनेक विविध पक्षों को उजागर किया गया है। यह किताब अपराधों के अध्ययन की अपेक्षा सामाजिक नृतत्त्व विज्ञान के लिए एक अमूल्य योगदान है।
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