Satta Badal
Author:
Datta DesaiPublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 256
₹
320
Available
‘भाकरी का करपली, पान का सडलं, घोडं का अडलं' याला आपल्या लोकसंस्कृतीत एकच उत्तर आहे : ‘फिरवलं नाही म्हणून!' आपल्या प्रजासत्ताकाचे पंचाहत्तरावे वर्ष आपण पूर्ण करत असताना ‘देशात लोकशाहीची कोंडी का झाली, कल्याणकारी विकास का अडला, सामाजिक न्याय का खुंटला' याचे उत्तर शोधण्याची गरज निर्माण झाली आहे. हे उत्तर ‘सत्ता बदलली नाही म्हणून' असे असू शकेल का?
मग प्रश्न येतो की ‘सत्ता' म्हणजे काय आणि ‘बदल' म्हणजे काय?
देश स्वतंत्र होताना झालेला सत्ता-बदल हे ‘सत्ता हस्तांतरण' होते, ते क्रांतिकारी परिवर्तन नव्हते असे म्हटले गेले. आपली चौकट बदलली, तरी अनेक बाबतीत ती तशीच राहिली. देशाने अनेक बरीवाईट वळणे घेतली. काही प्रश्न सुटत गेले, अनेक प्रश्न तसेच राहिले, तर बरेच नवे प्रश्न उभे होत गेले. परिणामी आज आपला देश जगाच्या नजरेत भरेल अशी अफाट संपन्नता, विकासाच्या घोषणा, प्रचंड विसंगती, असह्य विषमता व घुसमटवून टाकणारे वातावरण अनुभवतो आहे. ही साधीसुधी कोंडी नाही. हा राष्ट्रीय स्वरूपाचा चक्रव्यूह आहे!
हा चक्रव्यूह नेमका काय आहे? तो कसा भेदता येईल? त्यासाठी देशाच्या राजकारणाला कोणती मूलगामी वैचारिक-राजकीय कलाटणी मिळायला हवी? ‘मूलगामी कलाटणी' म्हणजे काय? त्यातून देशातील प्रत्येक व्यक्तीची अर्थपूर्ण जीवनाकडे वाटचाल कशी सुरू होईल? याची चर्चा हे पुस्तक करते.
त्यामुळेच हे पुस्तक या देशावर व इथल्या विविधतेवर प्रेम करणाऱ्या प्रत्येकासाठी आहे. विषमता आणि विध्वंस यांनी अस्वस्थ होणाऱ्या भारतीय माणसासाठी हे पुस्तक आहे. विचारांचे स्वातंत्र्य आणि कृतीचे महत्त्व ओळखणाऱ्या प्रत्येकासाठी ते आहे. नवे काही घडवण्यासाठी उत्सुक असलेल्या प्रत्येक युवक-युवतीसाठी हे पुस्तक आहे.
Satta Badal | Datta Desai
सत्ता बदल | दत्ता देसाई
ISBN: 9788196774844
Pages: 236
Avg Reading Time: 8 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Beeswin Shatabdi Mein Darshanshastra
- Author Name:
Suman Gupta
- Book Type:

-
Description:
‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की इस सातवीं पुस्तक में डॉ. सुमन गुप्ता ने समकालीन दार्शनिक चिन्तन की दो मुख्य प्रवृत्तियों—भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद—का मार्क्सवादी दृष्टि से अध्ययन किया है। इन दोनों विचारधाराओं को उनके सही सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए, डॉ. गुप्ता ने इनकी प्रचलित व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका तर्क है कि गूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के आवरण में इन विचारधाराओं की अमूर्त तत्त्वमीमांसी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है, जो एक सही विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करने के स्थान पर यथार्थ को विरूपित करती है। भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों के दृष्टिकोण के विपरीत, डॉ. सुमन गुप्ता ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है, जो न केवल इन चिन्तनधाराओं के विविध पक्षों का एकीकरण करता है बल्कि उनके सामाजिक यथार्थ की जड़ों में भी जाता है। सुमन गुप्ता ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की संकल्पना मनुष्य को एक ऐसे अमूर्त रूप में चित्रित करती है जो अपने सामाजिक क्रियाकलाप से अपना या अपने चारों ओर की दुनिया का रूपान्तरण करने में असमर्थ है।
डॉ. गुप्ता ने समकालीन दर्शन की इन दोनों प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा प्रस्तुत की है, बल्कि वह विश्व-दृष्टि भी सामने रखी है जिसे वे सही मानती हैं।
सुमन गुप्ता ने भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद का विवेचन साधारण कुशलता से किया है लेकिन उनकी पद्धति निस्सन्देह विवादमूलक है, जिसके फलस्वरूप यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के प्रति एक नई दृष्टि विकसित करने में सहायक होगी और जो पाठक दर्शनशास्त्र की सार्थकता को जीवन की यथार्थ समस्याओं से जोड़कर देखना चाहते हैं, उनके लिए यह निश्चय ही रोचक और पठनीय सिद्ध होगी।
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
- Book Type:

- Description: कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
Crystallized Memories
- Author Name:
Chekuri Rama Rao +1
- Book Type:

- Description: English translation of Chekuri Rama Rao's Award winning Telugu Essays, Smruti Kinankam,
Prakriti Ka Dwandwavad
- Author Name:
Friedrich Engels
- Book Type:

-
Description:
उन्नीसवीं सदी के आरंभ में, और उससे भी अधिक मध्यकाल में, गणित, ज्योतिष, भौतिकी, रसायन तथा जीव-विज्ञान के क्षेत्र में आविष्कारों और उपलब्धियों का एक तांता-सा लग गया था। नए तथ्यों और प्राकृतिक नियमों की स्थापना हुई, नए सिद्धांतों तथा नई परिकल्पनाओं का बीजारोपण हुआ, और विज्ञान के नए उपांग अस्तित्व में आए।
एंगेल्स ने दिखाया कि प्राकृतिक विज्ञान की उस विजय-यात्रा में तीन सर्वोपरि उत्कर्ष हैं–जैव कोशिका की खोज, ऊर्जा की अविनाशिता, रूपांतरण के नियम की खोज और डार्विनवाद। सन् 1838 तथा 1839 ई. में मत्थियस याकोब श्लेईडैन और थियौडोर श्वान ने वनस्पति एवं पशु कोशिकाओं की एकरूपता सिद्ध की। उन्होंने सिद्ध किया कि कोशिका जीवधारियों की मूल रचना-इकाई है, और उन्होंने आंगिक संरचना के एक सांगोपांग कोशिका सिद्धांत की स्थापना की। इस प्रकार उन्होंने जीव-जगत की एकता को प्रमाणित किया। सन् 1842 और 1847 के बीच के काल में जुलियस मायर, जैम्स जूल, विलियम ग्रोव, एल.ए. कोल्डिंग और हरमान हैल्महोल्ट्ज ने ऊर्जा की अविनाशिता तथा रूपांतरण के नियम की खोज करके इसे प्रमाणित किया। परिणामतः प्रकृति का उद्घाटन एक ऐसी अविरत प्रक्रिया के रूप में हुआ जिसमें द्रव्य की एक प्रकार की सर्वव्यापी गति दूसरे प्रकार में बदलती रहती है। 'प्रकृति का द्वंद्ववाद' में जिन विषयों का समावेश है, उनकी रचना एंगेल्स ने 1873 से 1886 ई. तक के काल में की थी। प्रकृति विज्ञान के इतिहास, विशेषतः पुनर्जागरण से उन्नीसवीं सदी के मध्यकाल तक के इतिहास से, पर्याप्त साक्ष्य लेकर एंगेल्स ने दर्शाया है कि प्रकृति विज्ञान का विकास अंततोगत्वा व्यावहारिक आवश्यकताओं से, उत्पादन से, निर्धारित होता है।
हिन्दी में इस पुस्तक की लम्बे समय से प्रतीक्षा थी लेकिन इसके जटिल पाठ के चलते किसी ने इसके अनुवाद का साहस नहीं किया। विज्ञान और प्रगतिशील सोच के हिमायती गुणाकर मुळे ही ऐसे व्यक्ति थे, जो इस पुस्तक की अहमियत को समझते थे और अनुवाद में इसके साथ न्याय कर सकते थे! कुछ पृष्ठों का जो अनुवाद वे किसी कारणवश नहीं कर पाए थे, वह बाद में कराया गया और पूरी पांडुलिपि को व्यवस्थित किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में और पांडुलिपि को प्रकाशन योग्य स्थिति तक लाने में श्रीमती शांति गुणाकर मुळे की भूमिका उल्लेखनीय रही है।
आधारभूत मार्क्सवादी साहित्य में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अमूल्य है।
Gopan Aur Ayan : Khand 1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description: गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Ins and Outs of INDIAN THEATRE
- Author Name:
H S Shivaprakash
- Rating:
- Book Type:

- Description: Anthology of Essays on Contemporary Indian Theatre
Dalit, Alpsankhyak Sashaktikaran
- Author Name:
Santosh Bhartiya
- Book Type:

-
Description:
भारत से लेकर सम्पूर्ण विश्व के शक्तिहीन, दबे-कुचले, सामाजिक रूप से पिछड़े और सताए हुए
लोग और उनके समूह जब आपस में मिलकर शक्ति-सम्पन्न होने का संकल्प लें, तो इसे बड़े बदलाव के भावी संकेत
के रूप में लिया जाना चाहिए। इतिहास बनने की शुरुआत ऐसे ही होती है। जो इसकी अगुआई करते हैं, उन्हें
इतिहास अपने सिर-माथे बैठाता है, क्योंकि अगर वे आगे नहीं बढ़ते तो यात्रा अपने अन्तिम चरण पर पहुँचती ही
नहीं। दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण की यात्रा शुरू हो चुकी है। इस यात्रा का ध्येय है शक्तिहीन, दबे-कुचले, और
सामाजिक रूप से भेदभाव के शिकार दलितों और अल्पसंख्यकों को शक्ति-सम्पन्न करना व उनके सामाजिक आधार
को मज़बूत करते हुए उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार करना।
पुस्तक का महत्त्वपूर्ण अंश है डॉ. मनमोहन सिंह का कथन। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शक्तिहीनों
को शक्ति-सम्पन्न बनाने तथा दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण के प्रयास को अपना पूरा समर्थन देने की घोषणा की।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने साफ़ कहा कि अब सहूलियत देने से काम नहीं चलेगा, वंचितों
को शिरकत भी देनी होगी। बाबा साहेब अम्बेडकर ने ग़रीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण की लड़ाई को
वैज्ञानिक विचार का आधार दिया तथा उसे हथियार बनाया। उसी कड़ी में यह एक प्रयास है ताकि आज दलित,
अल्पसंख्यक सशक्तीकरण के लिए लड़नेवाले लोग न केवल अपना वैचारिक आधार मज़बूत कर सकें, बल्कि उसे
हथियार के रूप में भी इस्तेमाल कर सकें।
यह पुस्तक उन सबके लिए उपयोगी होगी जो ग़रीबों और वंचितों की लड़ाई में या तो शामिल होना चाहते हैं या
उन्हें सहयोग देना चाहते हैं। राजनीति और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक भारत के परिवर्तन की इस
लड़ाई को समझने का आधार बनेगी।
Aadhi Raat Koi Dastak De Raha Hai
- Author Name:
K.R. Malkani
- Book Type:

- Description: जै सा कि लेखक खुद कहते हैं, यह जेल-डायरी नहीं है, न ही यह इमरजेंसी का वृत्तांत है। इसकी बजाय यह आपातकाल पर पार्श्व प्रकाश है। मल्कानी ने एक बंदी के रूप में जेल में जो कुछ भी देखा, सुना और महसूस किया, उन पर अपने अनुभवों को लिखा है। हिसार, रोहतक और तिहाड़—इन तीन जेलों में उन्होंने इक्कीस महीने बिताए, जहाँ उनकी मुलाकात अपराधियों से लेकर आला नेताओं समेत तरह-तरह के लोगों से हुई। यह उनके विषय में एक बेहद मानवीय दस्तावेज है, जो कभी मनोरंजक, कभी मायूस करनेवाला तो कभी-कभी पीड़ादायी हो जाता है। जेल में एकांत में बिताए गए लंबे समय ने लेखक को हिंदू-मुसलिम समस्या पर गहन विश्लेषण का अवसर दिया, जिसके विषय में उन्होंने नई और उम्मीद जगानेवाली बातें लिखी हैं। पूरी संवेदनशीलता के साथ लिखी गई इस पुस्तक में मर्मस्पर्शी छोटी-छोटी कहानियाँ हैं, जिनमें सियासी ज्ञान भी है, और जिनके कारण पढ़ने में यह पुस्तक बेहद रोचक हो जाती है। यह न केवल किसी एक व्यक्ति का दृष्टिकोण सामने रखती है, बल्कि सभी बंदियों के जीवन की झलक भी दिखाती है।
Champaran Andolan 1917
- Author Name:
Ashutosh Partheshwar
- Book Type:

- Description: चंपारन की संघर्ष-कथा जिस प्रकार राजकुमार शुक्ल के बिना पूरी नहीं हो सकती, उसी प्रकार ‘प्रताप’ के बिना भी पूरी नहीं हो सकती। ‘प्रताप’ ही वह पत्र है, जिसने पहली बार मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ कहा था। 4 जनवरी, 1915 के अंक में ‘प्रताप’ ने चंपारन की पीड़ा सुनाते हुए कहा, ‘‘देश के एक भाग के सीधे-सादे शांतिप्रिय आदमियों की यह हालत है। विदेशों में भारतवासियों पर जो अत्याचार हुआ या हो रहा है, वह इस अत्याचार के मुकाबले में अधिक नहीं है।...बाहर के अत्याचार की जड़ उखाड़ फेंकने से घर के इस अँधेरे को दूर करना अधिक हितकर है। निःसंदेह जो अपनी सहायता आप नहीं करता, उसकी सहायता मनुष्य तो दूर रहा, परमात्मा भी नहीं करता। बिहार में क्रियाशीलता की कमी है, पर हम इस बात को कदापि नहीं भूल सकते कि च्यूँटी में भी दम है और बहुत तंग किए जाने पर वह काट खाती है।’’ महेश्वर प्रसाद के ‘बिहारी’ पत्र से विदा होने के पश्चात् चंपारन के दुःख को देश-दुनिया को सुनाने का दायित्व ‘प्रताप’ ने सँभाल लिया। ‘प्रताप’ को गांधी अपने सिद्धांत, व्यवहार, करुणा एवं परदुःखकातरता के लिए ‘प्रिय’ थे तो ‘चंपारन’ अपनी ‘ट्रेजडी’ के कारण। इस पुस्तक में ‘प्रताप’, ‘अभ्युदय’, ‘भारतमित्र’, ‘द बिहार हेराल्ड’, ‘हितवाद’, ‘पायोनियर’ जैसे पत्रों में प्रकाशित चंपारन से संबंधित समाचार-रिपोर्ट आदि संकलित हैं। चंपारन की अंतर्कथा को प्रामाणिकता से समझने के लिए यह प्राथमिक स्रोत है। निस्संदेह, भारतीय इतिहास के इस महत्त्वपूर्ण अध्याय को पढ़ने-समझने के लिए ‘चंपारन आंदोलन 1917’ एक पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है।
GK QUIZ
- Author Name:
Anish Bhasin
- Book Type:

- Description: "सवाल करना और उनके जवाब पाने की उत्सुकता व्यक्ति में सहज ही खोजी जा सकती है। पृथ्वी कैसे बनी? महासागर कहाँ से आए? महाद्वीप कैसे बने? मनुष्य का क्रमविकास कैसे हुआ? पृथ्वी पर जंतु ज्यादा हैं या मनुष्य? मनुष्य को दहलानेवाले जलजले, सुनामी, ज्वालामुखी कैसे बनते हैं? इस प्रकार के प्रश्नों के प्रति व्यक्ति आरंभ से ही जिज्ञासु रहा है। प्रश्न करने और उनका समुचित समाधान पाने से व्यक्ति की मेधा और तर्क शक्ति को बल मिलता है। इसी ज्ञानार्जन से व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करता है। आज के युग में हर क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्द्धा है और प्रतियोगी को हर परीक्षा में नएनए प्रकार के प्रश्नों का सामना करना पड़ता है। प्रस्तुत पुस्तक भी प्रश्नोत्तरी द्वारा ज्ञानवर्द्धन की कड़ी में एक महती प्रयास है। इसके अध्ययन से पाठक लाभान्वित होकर सफलता के नए सोपान चढ़ेंगे। इसका एकएक प्रश्न उत्तर के साथ जुड़कर आपकी जानकारी में श्रीवृद्धि कर सकता है।"
Kaha-Suni
- Author Name:
Doodhnath Singh
- Book Type:

- Description: ‘इस किताब में दूधनाथ सिंह के चार साक्षात्कार और चार आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हैं। साक्षात्कार एक तरह का विशिष्ट शास्त्रार्थ होता है। प्रश्नों के आलोक में यह शास्त्रार्थ लेखक तरह-तरह से करता है। कभी आत्म-मन्थन, आत्म-प्रकाश, कभी अपने समय, समाज, इतिहास, साहित्य, कला आदि पर टिप्पणियाँ और प्रतिक्रियाएँ, कभी मतभेद-सहमति और सौमनस्य, कभी अपनी क्षुब्धता, उदासी या ख़ुशी का इज़हार, कभी अपनी ही आस्थाओं पर प्रश्नचिह्न, कभी कलह, वैमनस्य और फिर प्रेम; कभी गहन विश्लेषण और आत्म-स्वीकृति—एक अच्छे साक्षात्कार में एक कलाकार के विविधवर्णी छटाओं वाले रूप के दर्शन पाठक को होते हैं। इस तरह ‘साक्षात्कार’ तर्क-वितर्क की असमंजसपूर्ण, वक्र भाषा में लिपटा हुआ कलाकार के औचक पकड़े गए चिन्तन का निचोड़ है, एक नए क़िस्म का भाष्य है, आलोचना का एक खिलंदरा राग है। ‘कहा-सुनी’ के चारों आलोचनात्मक निबन्ध लेखक के उपर्युक्त साक्षात्कारों के शास्त्रार्थों का ही फैलाव और वितान हैं। बातों और विचारों की अन्तिम तर्क-सिद्धि, परिणति और समापन हैं। फिर भी आलोचना की विधागत माँग के कारण उनमें तटस्थ और निर्वैयक्तिक विश्लेषण, तर्क-वितर्क के आघात-प्रतिघात, नियमन-अनुशासन यहाँ अधिक हैं। आशा है, यह किताब एक नए बौद्धिक आस्वाद के साथ पढ़ी-गुनी जाएगी।
Gopan Aur Ayan : Khand -1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description: गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
AAJ KI BAAT KAREN
- Author Name:
Helle Helle
- Book Type:

- Description: हेल्ले हेल्ले का जन्म 1965 में डेनमार्क के चौथे सबसे बड़े द्वीप लोलैंड के नगर नाकस्कॉव में हुआ था। उनका पालन-पोषण द्वीप लोलैंड के ही फेरी शहर रॉड्बी (Rødby) में हुआ था, जहाँ से नौकाएँ पुटगार्डन (जर्मनी) जाती हैं। साहित्य के प्रभाव में हेल्ले हेल्ले बचपन से थीं और अधिकांश समय पुस्तकालय में बिताती थीं। यह आभास उन्हें बहुत जल्दी ही हो गया था कि वह खुद भी एक लेखिका बनेंगी। रॉड्बी में करने के लिए बहुत कुछ नहीं था, इसलिए वे वयस्क होने पर कोपनहेगन शिफ्ट हो गईं। 1985 में उन्होंने कोपनहेगन विश्वविद्यालय में साहित्य अध्ययन में दाखिला लिया और एक लेखिका के रूप में उभरने लगीं। साहित्य में स्नातक करने के पश्चात् उन्होंने 1991 में राइटर्स स्कूल, कोपनहेगन से स्नातक किया। उनकी पहली पुस्तक वर्ष 1993 में प्रकाशित हुई और तब से ही उनका लोकप्रिय लेखन प्रशंसा और आलोचना दोनों का एक चर्चित विषय रहा है। उन्होंने अभी तक कई कहानियों के अलावा वयस्क साहित्य पर 10 उपन्यास और बाल साहित्य पर एक पुस्तक लिखी है। हेल्ले हेल्ले अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित हुई हैं डेनिश क्रिटिक्स पुरस्कार, डेनिश अकादमी का बीट्राइस पुरस्कार, पी.ओ. एनक्विस्ट अवार्ड और डेनिश कला परिषद् का प्रतिष्ठित लाइफटाइम अवार्ड। उनकी कहानियों और उपन्यासों का 22 भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उपन्यास Dette Burde Skrives I Nutid (...आज की बात करें) के लिए उनको प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कार गोल्डन लौरेल से नवाजा गया है।
Cinema Ka Ishq
- Author Name:
Pitras Bukhari
- Book Type:

- Description: पितरस बुख़ारी का पूरा नाम पीर सैयद अहमद शाह बुख़ारी है। आपका ताल्लुक़ पाकिस्तान के पेशावर से हैं। शुरूआती तालीम पाकिस्तान ही में पायी और एम.ए. करने के बाद इंग्लिस्तान की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में डिग्री हासिल की। लाहौर में बतौर उस्ताद आपकी ख़िदमात रहीं और कई बरस तक ऑल इंडिया रेडियो में अलग-अलग ओहदों पर रहे। 1952 में यूनाइटेड नेशन्स में नुमाइन्दे चुने गए, जहाँ 1954 तक रहे। पितरस के लिखे मज़ामीन ज़माने भर में मशहूर हैं मगर इस किताब में मुन्तख़ब 11 मज़ामीन का एक अलग मक़ाम है। आपका लिखा हुआ मिज़ाह उर्दू अदब में बेशक़ीमती सरमाया है। यही वजह है कि आपके इन्तेक़ाल के अगले ही रोज़ न्यूयॉर्क टाईम्स (6 दिसम्बर 1958) ने अपने इदारिया में उनको याद करते हुए 'सिटिज़न सिटिज़न ऑफ वर्ल्ड' कहा। 2013 में पाकिस्तानी हुक़ूमत के ज़रिए आपको मुल्क का दूसरा सबसे बड़ा सिटिज़न अवॉर्ड 'हिलाल-ए-इम्तियाज़' भी दिया गया। शुऐब शाहिद का तआल्लुक़ बुनियादी तौर पर उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर से है। इस वक़्त आपकी शिनाख़्त मुल्क के एक मशहूर बुक कवर डिज़ाइनर के तौर पर होती है। दुनिया की कई मशहूर किताबों पर बतौर आर्टिस्ट काम करने के सबब आपकी अदबी दुनिया में एक ख़ास मक़बूलियत है। मुल्कगीर और बैनुलअक़्वामी सतह पर कई अवार्ड्स के साथ आपका नाम रहा है। आपके लिखे मज़ामीन, ख़ुतूत और बिलख़ुसूस उर्दू मिज़ाह से मुताल्लिक मज़ामीन हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बहुत से रिसालों में अक्सर शाया होते हैं और आप अवाम-ए-ख़ास-ओ-आम में अपने मुन्फ़रद अन्दाज़ के लिए काफ़ी मकबूल हैं। इन दिनों क्लासिकल उर्दू अदब को देवनागरी रस्मुल-ख़त में लाने का तारीख़ी काम अंजाम दे रहे हैं।
Namvar Sanchayita
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

- Description: यह है हिन्दी के ख्यातिप्राप्त आलोचक डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन का उत्तमांश। नामवर जी हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में स्वीकृत हैं, लेकिन मूलत: वे एक लोकवादी आलोचक हैं। जिस ‘लोक’ को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्य के प्रतिमान के रूप में व्यवहृत किया था और जिसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने क्रान्तिकारी अर्थ प्रदान किया, उसे वे मार्क्सवाद की सहायता से ‘वर्ग’ तक ले गए हैं। लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को विदेशी, संकीर्ण और रूढ़िबद्ध विचार प्रणाली के रूप में ग्रहण नहीं किया है। सच्चाई तो यह है कि साहित्य के नए मूल्य के लिए उन्होंने प्रत्येक मोड़ पर लोक की तरफ़ देखा है। अकारण नहीं कि हिन्दी में वे साहित्य की दूसरी परम्परा के अन्वेषक हैं, जो उस लोक की परम्परा है, जो असंगतियों और अन्तर्विरोधों का पुंज होते हुए भी विद्रोह की भावना से युक्त होता है। नामवर जी की आलोचना हिन्दी में ग़ैर-अकादमिक आलोचना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। ‘कहानी : नई कहानी’ में उन्होंने व्यक्तिगत निबन्ध की शैली में आलोचना लिखी, जिसमें बात से बात निकलती चलती है और अत्यन्त सार्थक। ‘कविता के नए प्रतिमान’ उनके विलक्षण परम्परा–बोध, गहन विश्लेषण और पारदर्शी अभिव्यक्ति का स्मारक है। इसी तरह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में उन्होंने ऐसी आलोचना प्रस्तुत की है, जो एक तरफ़ अतिशय ज्ञानात्मक है और दूसरी तरफ़ अतिशय संवेदनात्मक। यह सर्जनात्मकता आचार्य द्विवेदी के साहित्य से उनके निजी लगाव के कारण सम्भव हुआ है। नामवर जी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर प्रकाशित यह संचयिता महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से हिन्दी जगत् को दिया गया एक उपहार है, जो उसे पिछली शती के उत्तरार्ध के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी आलोचक के अवदान से परिचित कराएगा।
1000 Jeev Jantu Prashnottari
- Author Name:
Menaka Gandhi
- Book Type:

- Description: 1000 जीव-जंतु प्रश्नोत्तरी ' में संसार भर के समस्त जीवों-चाहे वे जल में वास करनेवाले हैं या जमीन पर रहनेवाले हैं अथवा गगन में स्वच्छंद विचरण करनेवाले; जमीन पर रेंगनेवाले, पानी में तैरनेवाले या जमीन पर जीवन के लिए संघर्ष करनेवाले हैं-उनकी आदतों, वातावरण, रहन-सहन, शिकार एवं भोजन प्राप्ति, उनकी संतति तथा उनकी जीवन- रक्षा की पद्धति से संबंधित रहस्यपूर्ण व जानकारीपरक वर्णन है । जीव-जगत् का समग्र दिग्दर्शन करानेवाले जंतु विज्ञान का विशद् ज्ञान कराने के उद्देश्य से एक हजार प्रश्नों का संकलन बड़ी सूझ-बूझ और सुबोध एवं सरल भाषा में किया गया है । प्रस्तुत पुस्तक को पढ़कर पाठकगण जीव-जंतुओं के अनोखे संसार की रोचक जानकारी प्राप्त कर इस क्षेत्र में अपने ज्ञान का विस्तार सहज ही कर पाएँगे ।
Hum Bheed Hain
- Author Name:
Raghuvansh
- Book Type:

-
Description:
रघुवंश ने 'आधुनिकता’ को केवल 'व्यक्ति’ की विशिष्टता के रूप में नहीं, बल्कि अपने समाज के गतिशील होने की सांस्कृतिक आकांक्षा के वैशिष्ट्य के रूप में समझने की चेष्टा की। दरअसल वे सांस्कृतिक चिन्तक थे। संस्कृति को परम्परा की रूढ़ियों से मुक्त करके उन्होंने अपने समय के समाज को विभिन्न समस्याओं से सन्दर्भित किया। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक दृष्टि से भारतीय समाज के लिए क्या ग्राह्य है और किस रूप में ग्राह्य है, इसके विश्लेषण में पूर्वग्रह-रहित होकर रघुवंश जी ने समय-समय पर जो लेख-निबन्ध इत्यादि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे, उनका संकलन उनकी इस पुस्तक में किया गया है। राजनीति, धर्म, शिक्षा और विकास के नए मॉडलों पर रघुवंश जी के क्या विचार थे, उनको जानने में इस पुस्तक की उपयोगिता असन्दिग्ध है।
रघुवंश ‘मनुष्य की सांस्कृतिक उपलब्धियों’ की कसौटी पर अपने समय और समाज की स्थितियों को परखने के हिमायती थे। इस पुस्तक में संकलित लेखों से यह भी पता चलता है कि उन्होंने अपने चिन्तन का फलक कितना व्यापक रखा। इसीलिए वे शिक्षा, राजनीतिक व्यवस्थाओं और साम्प्रदायिक संकटों को समझने और समझाने में निरन्तर संलग्न रहे।
यह पुस्तक 'हम भीड़ हैं’ हमें बताती है कि उनमें आधुनिकता और विकास का एक ऐसा स्वरूप पहचानने की व्याकुलता थी, जो काल की दृष्टि से 'नया’ हो और देश की दृष्टि से 'भारतीय’ हो। यही आकांक्षा रघुवंश जी को आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिन्तकों की ओर आकृष्ट करती रही।
Darvin Aani Jivsrushtiche Rahasya
- Author Name:
Nanda Khare +1
- Book Type:

- Description: उत्क्रांतीचा सिद्धान्त ही मानवी इतिहासातील सर्वांत महत्त्वपूर्ण संकल्पना आहे. जीवनाच्या जवळपास प्रत्येक क्षेत्रात मूलभूत परिवर्तन घडवून आणणारा हा सिद्धान्त डार्विनने मांडला, त्याला आता दीडशे वर्षे झाली आहेत. आजच्या गतिमान जगात ह्या सिद्धान्ताचं स्थान काय? आज तो कालबाह्य ठरला आहे का? त्याची पुनर्मांडणी करायला हवी का? माणसाच्या विकासात अधिक महत्त्वाचे काय, नैसर्गिक प्रकृती, की पालनपोषण? मार्क्सवाद आणि स्त्रीवाद या विसाव्या शतकातल्या महत्त्वाच्या विचारप्रणालींवर या सिद्धान्ताने काय प्रभाव पाडला? भारतीय विचारपरंपरेवर डार्विनचा काही परिणाम झाला का? जातिव्यवस्था आणि शेतीवरील अरिष्ट या भारताच्या दृष्टीनं कळीच्या मुद्यांबाबत हा सिद्धान्त काय सांगतो? रंगभेद आणि जातिभेद यांचं तो समर्थन करतो का? वैज्ञानिक शेती ही उत्क्रांतीविरोधी आणि पर्यायानं निसर्गविरोधी आहे का? गेल्या वीस-पंचवीस वर्षांत उदयाला आलेल्या मेंदूजैवविज्ञानाच्या अनेक अंगांना हा सिद्धान्त कसा काय लागू पडू शकतो ? अशा अनेक प्रश्नांची उत्तरं शोधणारा ग्रंथ. महाराष्ट्रातल्या नव्या पिढीतल्या बारा विद्वान आणि व्यासंगी लेखकांनी सिद्ध केलेला. - सुबोध जावडेकर Darvin Aani Jivsrushtiche Rahasya : Nanda Khare,Ravindra Rukmini Pandharinath डार्विन आणि जीवसृष्टीचे रहस्य : संपादक : रवीन्द्र रुक्मिणी पंढरीनाथ । नंदा खरे
Jambudweepe Bharatkhande
- Author Name:
Dr. Mayank Murari
- Book Type:

- Description: भारतीय चिंतन में कल्प की अवधारणा का समय के साथ-साथ व्योम, यानी देश के हिसाब से भी विचार किया गया है। पृथ्वी के द्वारा सूर्य का परिभ्रमण करने से संवत्सर काल बनता है। इसी प्रकार जब सूर्य अपनी आकाशगंगा का चक्कर लगाता है तो उसका एक चक्र पूरा होने के समयखंड को मन्वंतर कहा जाता है। इस प्रकार आकाशगंगा भी इस ब्रह्मांड में किसी ध्रुवतारे या सप्तर्षि या अन्य तारे का चक्कर लगाती है, उसके एक चक्कर की गणना को ही कल्प कहा गया। हमारा सौरमंडल आकाशगंगा के बाहरी इलाके में स्थित है और उसके केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। इसे एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 22.5 से 25 करोड़ वर्ष लग जाते हैं। —इसी पुस्तक से भारतीय जीवन में देश और काल है। काल के साथ गति है और गति के संग जीवनदर्शन जुड़ा है। यह बात ही भारत को विशिष्ट बनाती है। कालचक्र, युगचक्र, ऋतुचक्र, धर्मचक्र, भाग्यचक्र और कर्मचक्र के विधान भारतीय सांस्कृतिक चेतना में समाए हुए हैं। सनातन के माहात्म्य, भारतीय चिंतन की वैज्ञानिकता और भारतीय जीवन-मूल्यों की पुनर्स्थापना करती विचारोत्तेजक पठनीय कृति।
MANAS MEIN LAUKIK JNAN
- Author Name:
Dr. Shrikrishna +1
- Book Type:

- Description: अपने दिल का हाल जानने अपोलो अस्पताल जाना हुआ। हमेशा की तरह मेरे दिल की जाँच-पड़ताल के बाद मेरे दिल के डॉक्टर ने पहली बार अपने दिल का हाल भी बयान किया। देश के जाने-माने इस हृदयरोग विशेषज्ञ के दिल में राम-ही-राम बसते हैं। रामचरितमानस के पाठ से इनका दिनारंभ होता है। इन्हें यह भी भान है कि अनंत लोग इनकी तरह मानस का नित्य वाचन करना चाहते हैं पर समयाभाव आड़े आ जाता है। ऐसे लोगों की सुविधा के लिए इन्होंने कोरोना काल की फुरसत का लाभ उठाकर रामचरितमानस में से वे छंद, दोहे, चौपाइयाँ और सोरठे छाँटे हैं, जिनमें लौकिक ज्ञान निहित है। इनकी विदुषी सहधर्मिणी डॉ. किरण गुप्ता के शब्दों में ‘सांसारिक जीवन के विविध पक्षों पर विराम लगाते हुए, मात्र अपने कार्य पर ही केंद्रित रहना संभवतः इनके चुनौतीपूर्ण काम की अनिवार्यता है। सात्त्विक, सादा, कर्मठ एवं अनुशासित जीवन तथा रोगियों के प्रति निरंतर निष्काम सेवाभाव ने ही संभवतः इन्हें अध्यात्म के उच्चतम पथ पर अग्रसित किया है।’ डॉ. किरण ने डॉ. एस.के. गुप्ता द्वारा चयनित पाठ्य-सामग्री को तारतम्यता देकर इस संकलन को परिपूर्णता भी दी है। डॉक्टर दंपती ने चाहा कि प्रकाशन पूर्व मुझे इसका संपादकीय दृष्टि से अवलोकन करना चाहिए। मैंने वही किया। कहना न होगा, मानस के इस संक्षिप्त संस्करण के पठन ने इसकी उपयोगिता तो स्वयंसिद्ध की ही, मैं इसके चयनकर्ता की सोच, पारखी नजर, गुणग्राह्यता और इनकी सहधर्मिणी की सार-संक्षिप्तता का प्रशंसक हुए बिना भी न रह सका। —आमुख से...
Customer Reviews
0 out of 5
Book
Be the first to write a review...