Vivah
(0)
Author:
Devdutt PattanaikPublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction₹
280
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‘विवाह' - पुराणांचे अभ्यासक श्री.देवदत्त पट्टनायक यांच्या या पुस्तकातून भारतीय विवाहांच्या अनेक कथा आपल्या भेटीला येतात. त्यांनी या कथा वेद, पुराणे, तमिळ आणि संस्कृत साहित्य, तसंच विविध प्रदेशातल्या अभिजात, लोक आणि आदिवासी जमातीच्या साहित्याचा अभ्यास करून जमवल्या आहेत. त्यांना हे साहित्य कधी लिखित तर कधी मौखिक स्वरूपात उपलब्ध झालं. विवाहाबाबतच्या भारतीय परंपरा, रीतिरिवाज आणि श्रद्धा यांच्यामधली विविधता आणि प्रवाहितता स्पष्ट करण्यासाठी त्यांनी तीन लाख चौ. मी. भारतीय भूभागाचा आणि तीन हजार वर्षांहूनही अतिशय प्राचीन असलेल्या अशा इतिहासाचा धांडोळा घेतला आहे. Vivah | Devdutt Pattanaik Translated By : Amita Naidu विवाह | देवदत्त पट्टनायक अनुवाद : अमिता नायडू
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‘विवाह' - पुराणांचे अभ्यासक श्री.देवदत्त पट्टनायक यांच्या या पुस्तकातून भारतीय विवाहांच्या अनेक कथा आपल्या भेटीला येतात. त्यांनी या कथा वेद, पुराणे, तमिळ आणि संस्कृत साहित्य, तसंच विविध प्रदेशातल्या अभिजात, लोक आणि आदिवासी जमातीच्या साहित्याचा अभ्यास करून जमवल्या आहेत. त्यांना हे साहित्य कधी लिखित तर कधी मौखिक स्वरूपात उपलब्ध झालं. विवाहाबाबतच्या भारतीय परंपरा, रीतिरिवाज आणि श्रद्धा यांच्यामधली विविधता आणि प्रवाहितता स्पष्ट करण्यासाठी त्यांनी तीन लाख चौ. मी. भारतीय भूभागाचा आणि तीन हजार वर्षांहूनही अतिशय प्राचीन असलेल्या अशा इतिहासाचा धांडोळा घेतला आहे.
Vivah | Devdutt Pattanaik
Translated By : Amita Naidu
विवाह | देवदत्त पट्टनायक
अनुवाद : अमिता नायडू
Book Details
-
ISBN9789390060917
-
Pages210
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Nyay Ka Ganit
- Author Name:
Arundhati Roy
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Description:
किसी लेखक की दुनिया कितनी विशाल हो सकती है, इस संग्रह के लेखों से उसे समझा जा सकता है। ये लेख विशेषकर तीसरी दुनिया के समाज में एक लेखक की भूमिका का भी मानदंड कहे जा सकते हैं। अरुंधति रॉय भारतीय अंग्रेजी की उन विरल लेखकों में से हैं जिनका सारा रचनाकर्म अपने सामाजिक सरोकार से उपजा है। इन लेखों को पढ़ते हुए जो बात उभरकर आती है, वह यह कि वही लेखक वैश्विक दृष्टिवाला हो सकता है जिसकी जड़ें अपने समाज में हों। यही वह स्रोत है जो किसी लेखक की आवाज को मजबूती देता है और नैतिक बल से पुष्ट करता है। क्या यह अकारण है कि जिस दृढ़ता से मध्य प्रदेश के आदिवासियों के हक में हम अरुंधति की आवाज सुन सकते हैं, उसी बुलन्दी से वह रेड इंडियनों या आस्ट्रेलिया के आदिवासियों के पक्ष में भी सुनी जा सकती है। तात्पर्य यह है कि परमाणु बम हो या बोध का मसला, अफगानिस्तान हो या इराक, जब वह अपनी बात कह रही होती हैं, उसे अनसुना-अनदेखा नहीं किया जा सकता। वह ऐसी विश्व-मानव हैं जिसकी प्रतिबद्धता संस्कृति, धर्म, सम्प्रदाय, राष्ट्र और भूगोल की सीमाओं को लाँघती नजर आती है। ये लेख भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान से लेकर सर्वशक्तिमान अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान तक के निहित स्वार्थों और क्रिया-कलापों पर समान ताकत से आक्रमण करते हुए उनके जन विरोधी कार्यों को उद्घाटित कर असली चेहरे को हमारे सामने रख देते हैं। एक रचनात्मक लेखक के चुटीलेपन, संवेदनशीलता, सघनता व दृष्टि-सम्पन्नता के अलावा इन लेखों में पत्रकारिता की रवानगी और उस शोधकर्ता का-सा परिश्रम और सजगता है जो अपने तर्क को प्रस्तुत करने के दौरान शायद ही किसी तथ्य का इस्तेमाल करने से चूकता हो।
यह मात्र संयोग है कि संग्रह के लेख पिछली सदी के अन्त और नई सदी के शुरुआती वर्षों में लिखे गए हैं। ये सत्ताओं के दमन और शोषण की विश्वव्यापी प्रवृत्तियों, ताकतवर की मनमानी व हिंसा तथा नव-साम्राज्यवादी मंशाओं के उस बोझ की ओर पूरी तीव्रता से हमारा ध्यान खींचते हैं जो नई सदी के कन्धों पर जाते हुए और भारी होता नजर आ रहा है। अरुंधति रॉय इस अमानुषिक और बर्बर होते खतरनाक समय को मात्र चित्रित नहीं करती हैं, उसके प्रति हमें आगाह भी करती हैं : यह समय मूक दर्शक बने रहने का नहीं है।
–पंकज बिष्ट
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