Hum Bheed Hain
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Author:
RaghuvanshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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रघुवंश ने 'आधुनिकता’ को केवल 'व्यक्ति’ की विशिष्टता के रूप में नहीं, बल्कि अपने समाज के गतिशील होने की सांस्कृतिक आकांक्षा के वैशिष्ट्य के रूप में समझने की चेष्टा की। दरअसल वे सांस्कृतिक चिन्तक थे। संस्कृति को परम्परा की रूढ़ियों से मुक्त करके उन्होंने अपने समय के समाज को विभिन्न समस्याओं से सन्दर्भित किया। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक दृष्टि से भारतीय समाज के लिए क्या ग्राह्य है और किस रूप में ग्राह्य है, इसके विश्लेषण में पूर्वग्रह-रहित होकर रघुवंश जी ने समय-समय पर जो लेख-निबन्ध इत्यादि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे, उनका संकलन उनकी इस पुस्तक में किया गया है। राजनीति, धर्म, शिक्षा और विकास के नए मॉडलों पर रघुवंश जी के क्या विचार थे, उनको जानने में इस पुस्तक की उपयोगिता असन्दिग्ध है।</p> <p>रघुवंश ‘मनुष्य की सांस्कृतिक उपलब्धियों’ की कसौटी पर अपने समय और समाज की स्थितियों को परखने के हिमायती थे। इस पुस्तक में संकलित लेखों से यह भी पता चलता है कि उन्होंने अपने चिन्तन का फलक कितना व्यापक रखा। इसीलिए वे शिक्षा, राजनीतिक व्यवस्थाओं और साम्प्रदायिक संकटों को समझने और समझाने में निरन्तर संलग्न रहे।</p> <p>यह पुस्तक 'हम भीड़ हैं’ हमें बताती है कि उनमें आधुनिकता और विकास का एक ऐसा स्वरूप पहचानने की व्याकुलता थी, जो काल की दृष्टि से 'नया’ हो और देश की दृष्टि से 'भारतीय’ हो। यही आकांक्षा रघुवंश जी को आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिन्तकों की ओर आकृष्ट करती रही।
Read moreAbout the Book
रघुवंश ने 'आधुनिकता’ को केवल 'व्यक्ति’ की विशिष्टता के रूप में नहीं, बल्कि अपने समाज के गतिशील होने की सांस्कृतिक आकांक्षा के वैशिष्ट्य के रूप में समझने की चेष्टा की। दरअसल वे सांस्कृतिक चिन्तक थे। संस्कृति को परम्परा की रूढ़ियों से मुक्त करके उन्होंने अपने समय के समाज को विभिन्न समस्याओं से सन्दर्भित किया। राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक दृष्टि से भारतीय समाज के लिए क्या ग्राह्य है और किस रूप में ग्राह्य है, इसके विश्लेषण में पूर्वग्रह-रहित होकर रघुवंश जी ने समय-समय पर जो लेख-निबन्ध इत्यादि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे, उनका संकलन उनकी इस पुस्तक में किया गया है। राजनीति, धर्म, शिक्षा और विकास के नए मॉडलों पर रघुवंश जी के क्या विचार थे, उनको जानने में इस पुस्तक की उपयोगिता असन्दिग्ध है।</p>
<p>रघुवंश ‘मनुष्य की सांस्कृतिक उपलब्धियों’ की कसौटी पर अपने समय और समाज की स्थितियों को परखने के हिमायती थे। इस पुस्तक में संकलित लेखों से यह भी पता चलता है कि उन्होंने अपने चिन्तन का फलक कितना व्यापक रखा। इसीलिए वे शिक्षा, राजनीतिक व्यवस्थाओं और साम्प्रदायिक संकटों को समझने और समझाने में निरन्तर संलग्न रहे।</p>
<p>यह पुस्तक 'हम भीड़ हैं’ हमें बताती है कि उनमें आधुनिकता और विकास का एक ऐसा स्वरूप पहचानने की व्याकुलता थी, जो काल की दृष्टि से 'नया’ हो और देश की दृष्टि से 'भारतीय’ हो। यही आकांक्षा रघुवंश जी को आचार्य नरेन्द्र देव, डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे चिन्तकों की ओर आकृष्ट करती रही।
Book Details
-
ISBN9789352211753
-
Pages280
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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' या आपल्या महाग्रंथाद्वारे! असा ग्रंथ की जो स्वातंत्र्य संग्रामाचा व स्वातंत्र्योत्तर देश उभारणीचा अनोख्या पद्धतीने अगदी मुळापासून वेध घेतो. ज्यात ‘रामायाण-महाभारत आणि भारतीय राष्ट्रवाद’, ‘छत्रपती शिवाजी, मराठेशाही आणि स्वातंत्र्याची वाटचाल’, ‘जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प’, ‘विवेकानंदांचा धर्म आणि त्यांची भारताची कल्पना’, ‘सावरकर-जीना आणि द्विराष्ट्रवाद’, ‘डावी कॉंग्रेस, उजवे राजकारण आणि सुभाषचंद्र बोस’, ‘चित्रपटांतून घडणारं भारतीयतेचं दर्शन’, ‘भारतीयता आणि बहुसांस्कृतिकता’ अशा विविध विषयांची सखोल मांडणी आहे. एक असा ग्रंथ की ज्याच्या दोन खंडातील आठ विभागात गुंफलेले साठ लेख आपल्याशी बोलतात - या सार्या गुंतागुंतीच्या आणि रोमांचकारी इतिहासावर. ते उकलतात या देशाचे असे अंतरंग की जे जितके विलोभनीय आहे तितकेच विषण्ण करणारेही आहे. विविध नामवंत लेखकांनी स्वतंत्र दृष्टिकोनांमधून आणि आपापल्या परिप्रेक्ष्यांतून भारतीय जीवनाच्या विविध क्षेत्रांचे आणि पैलूंचे केलेले परखड विश्लेषण! ज्यातून आपल्या समोर येतो भारताच्या भविष्याची निश्चित अशी दिशा उलगडणारा महाग्रंथ!! अनुक्रमणिका खंड : १ विभाग १ : आधुनिक भारताची जडणघडण : वाटा आणि वळणे १. बहुभाषिक राष्ट्र : इतिहास आणि भविष्य - अविनाश पांडे, रेणुका ओझरकर २. आर्यवादाचे औचित्य आणि भारतीय राष्ट्रवाद - हेमंत राजोपाध्ये ३. रामायण-महाभारताचे ‘लोकप्रिय’ राजकारण - श्रद्धा कुंभोजकर ४. प्रतिमांच्या कोंदणात अडकलेला मराठा इतिहास - प्राची देशपांडे ५. १८५७ : उठाव की स्वातंत्र्ययुद्ध? - अरविंद गणाचारी ६. इतिहासलेखन : दुहीचे की एकतेचे साधन? - जास्वंदी वांबुरकर विभाग २ : राजकीय इतिहास : विरोधाभास आणि वास्तव ७. राष्ट्रउभारणी : मुस्लिमांचे योगदान आणि भारतीयत्व - बशारत अहमद ८. भेदभावाच्या कोंडीत सापडलेला मुस्लीम राष्ट्रवाद - सरफराज अहमद ९. फाळणीआणि जीना-सावरकर - श्याम पाखरे १०. नेताजींचे‘गूढ’, कॉंग्रेस आणि उजवे राजकारण - रवी आमले ११. लोकशाही समाजवादाची वेगळी वाट - संजय मं गो १२. कम्युनिस्ट पक्ष : चढउताराचा आलेख - अशोक चौसाळकर १३. जालियनवाला बाग ते नमस्ते ट्रम्प : विरोधाभासी भारत - एस पी शुक्ला विभाग ३ : साहित्य-कला : भारतीय स्वातंत्र्याचे दर्शन १४. शोध सांगितिक भारतीयतेचा - नीला भागवत १५. मराठी कविता :स्वातंत्र्याचे उद्गार - रणधीर शिंदे १६. रंगभूमी : ‘राष्ट्रीय करमणूक’ की सामाजिक कल्लोळाचा वेध? - मकरंद साठे १७. भारतीयतेच्या शोधात हिंदी कादंबरी - सूर्यनारायण रणसुभे १८. संग्रहालये-स्मारकातील संस्कृती - दीपक घारे १९. दृश्यकला आणि बदलती भारतीय अभिव्यक्ती - नूपुर देसाई २०. लोकप्रिय भारतीय आरसा : हिंदी चित्रपट! - अशोक राणे विभाग ४ : लोकशाही, राजकीय बहुलता आणि राष्ट्रीय सुरक्षा २१. नागरिकत्व, राष्ट्र आणि लोकशाही : नवी आव्हाने - गणेश देवी २२. भारतीय लोकशाहीचे वेगळेपण ! - सुहास पळशीकर २३. राज्य कायद्याचे, पण न्याय किती? - उद्धव कांबळे २४. उपखंडातील भळभळती जखम : काश्मीर - प्रताप आसबे २५. पूर्वोत्तर भारत : सप्तभगिनी आणि सापत्नभाव - गायत्री लेले २६. शक्तिमान शेजारी आणि राष्ट्रवादांमधील तणाव - परिमल माया सुधाकर २७. भारतीय लष्कर आणि राष्ट्रीय सुरक्षा - विजय खरे २८. गुप्तचर यंत्रणा : सुशासन की सत्तेचे केंद्रीकरण? - अनंत बागाईतकर २९. संघराज्य,स्वायत्तता आणि अर्थपूर्ण लोकशाही - जयंत लेले ३०. स्वातंत्र्य - गोपाळ गुरु अनुक्रम खंड : २ विभाग १ : धर्म आणि संस्कृती : एकवचनी की बहुवचनी? १. विवेकानंद : वेष भगवा, स्वप्न समाजवादी भारताचे! - दत्तप्रसाद दाभोळकर २. धम्मक्रांतीचे सांस्कृतिक राजकारण - रावसाहेब कसबे ३. जमातवाद, दंगली आणि एकात्मता - इरफान इंजिनीयर ४. बदनाम धर्मनिरपेक्षता : एकात्म भारत घडणार कसा? - किशोर बेडकीहाळ ५. भारतीयता आणि सांस्कृतिक विविधता? - शांता गोखले ६. लोकसंस्कृतीचे सामर्थ्य आणि स्वातंत्र्य! - तारा भवाळकर ७. वेध विद्रोही जनसंस्कृतीचा - सचिन गरुड विभाग २ : राष्ट्रीयतेची साधने आणि स्वातंत्र्याची माध्यमे ८. हंटर ते नवे शैक्षणिक धोरण : विद्यार्थीकेंद्री शिक्षणाचा अभाव - डॉ.हेमचंद्र प्रधान ९. उच्चशिक्षण : सामाजिककडून आर्थिक मक्तेदारीकडे! - मिलिंद वाघ १०. राष्ट्रीय संस्था : देशाचा गौरवास्पद आधार - श्रीरंजन आवटे ११. विज्ञान-तंत्रज्ञान : भारत मागे पडतोय? - डी रघुनंदन १२. जनतेचे आरोग्य आणि राष्ट्राचे ‘स्वास्थ्य' - अनंत फडके १३. मैदान : क्रीडासंस्कृतीचे आणि राष्ट्रवादाचे? - पराग फाटक, ओंकार डंके १४. प्रसारमाध्यमांचे स्वातंत्र्य आणि राष्ट्रवादाचे कंपनीकरण - अभिषेक भोसले विभाग ३ : भारतीय विकासाचे पेच आणि पर्याय १५. वसाहत ते ‘अच्छे दिन' : विकासाचा पेच कायमचाच - शमा दलवाई १६. टाटा-बिर्ला ते अंबानी-अदानी : स्वातंत्र्योत्तर साटेलोटे-राज्य! - सचिन रोहेकर १७. शेतीची कोंडी आणि ‘इंडिया विरुद्ध भारत' - जयदीप हर्डीकर १८. ‘माता', ‘मंदिरे' आणि भारतीय जल-सिंचन! - प्रदीप पुरंदरे १९. सहकार : मार्ग जुना, दृष्टी नवी - गजानन खातू २०. सार्वजनिक क्षेत्र आणि खासगीकरणाचे ग्रहण - संजीव चांदोरकर २१. ‘विकासा'पलीकडचा गांधीमार्ग - पराग चोळकर २२. पर्यावरणीय संकट आणि विकासाचा शाश्वत पर्याय - के जे जॉय विभाग ४ : नवा भारत घडवणाऱ्या शक्ती २३. आदिवासींचा न संपलेला स्वातंत्र्यलढा! - देवकुमार आहिरे २४. भटक्या-विमुक्तांचे राष्ट्र कोणते? - नारायण भोसले २५. जातीचे द्वैत आणि राष्ट्रवादातील दुभंग - दिलीप चव्हाण, देवेंद्र इंगळे २६. बदलते जातवास्तव आणि अस्मितांचे राजकारण - शैलेंद्र खरात २७. अनिवासी भारतीय : ‘काळे पाणी' ते ‘गोरे' पाणी? - आनंद करंदीकर २८. कामगार चळवळीचे बदलते स्वरूप आणि नवी दिशा - अजित अभ्यंकर २९. सती ते पद्मावती : जोहार स्त्रियांचाच! - माया पंडित ३०. महिलांचे राजकीय नेतृत्व : बदल घडवेल? - संध्या नरे-पवार
Aurat Ki Aawaz
- Author Name:
Nasira Sharma
- Book Type:

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यह सदी जिस आवाज़ में बोल रही है वह औरत की आवाज़ है, यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सदियों जिसकी पीड़ा पुरुष-शासित समाज के तमाम आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक ढाँचों की नींव में बिना किसी शिकायत के अपनी बलि देती रही, जिसकी ख़ामोशी पर पुरुषों की वाचाल सभ्यता मानवता की अकेली और स्वयम्भू प्रतिनिधि बनी रही, वह औरत अब बोल रही है। सृष्टि में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर रही है। और कहना न होगा कि इससे एक बड़ा बदलाव मनुष्यता के लैंडस्केप में दिखाई देने लगा है। अनेक औरतें हैं जिन्होंने इस बिन्दु तक आने के लिए अपनी क़ुर्बानी दी है, अनेक हैं जिन्होंने अकेले आगे बढ़कर बाक़ी औरतों के लिए लिए कितने ही बन्द दरवाज़ों को खोला है। अनेक हैं जिनका नाम भी हम नहीं जानते। और अनेक हैं जिनके नाम इतिहास के निर्णायक मोड़ों पर उत्कीर्ण हो गए हैं। इस किताब में अलग-अलग देशों की उन औरतों से वार्ताएँ शामिल हैं जिन्होंने अपने दम-ख़म से, अपने इरादों और हिम्मत से ज़िन्दगी में एक मुकाम हासिल किया है, जिनका एक स्पष्ट नज़रिया है, और यह नज़रिया उन्होंने अपने संघर्षों से, अपनी खुली निगाह से कमाया है। इन्हें पढ़ते हुए हमें मालूम होता है कि आज उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। पूरी दुनिया और उसके निज़ाम की गहरी समझ भी उनके पास है और उसकी मरम्मत के लिए व्यावहारिक सुझाव भी। वे जानती हैं कि आने वाले समय को कैसा होना चाहिए और कैसा वह नहीं है। पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, इराक़, सीरिया और टर्की से लेकर जापान, रूस, फ़िलिस्तीन, इस्रायल, फ़्रांस, मलेशिया और लन्दन तक की विभिन्न राजनीतिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आने वाली इन महिलाओं से बातचीत की है नासिरा शर्मा ने जिन्हें हम एक सामर्थ्यवान रचनाकार के रूप में जानते हैं, विभिन्न भाषाओं के स्त्री-संवेदी और मानवतावादी साहित्य से भी वे हमें परिचित कराती रही हैं। ये वार्ताएँ साक्षात्कार के प्रचलित फ़्रेम से आगे बढ़कर दरअसल सरोकारों के समान और वैश्विक धरातल पर जाकर किए गए संवाद हैं—इस सदी की औरत की एक मुकम्मल आवाज़।
Stree : Lamba Safar
- Author Name:
Mrinal Pande
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मैं इस बारे में ज़्यादा जिरह नहीं करना चाहती कि स्त्री-मुक्ति का विचार हमें किस दिशा में ले जाएगा, लेकिन मुझे हमेशा लगता रहा है, कि अपनी जिस संस्कृति के सन्दर्भ में मैं स्त्री-मुक्ति की चर्चा करना और उसके स्थायी आधारों को चीन्हना चाहती हूँ, उसमें पहला चिन्तन भाषा पर किया गया था। जब दो शब्दों का संस्कृत में समास होता है, तो अक्सर अर्थ में अन्तर आ जाता है। इसलिए स्त्री, जो हमारे मध्यकालीन समाज में प्रायः मुक्ति के उलट बन्धन, और बुद्धि के उलट कुटिल त्रिया-चरित्र का पर्याय मानी गई, मुक्ति से जुड़कर, उन कई पुराने सन्दर्भों से भी मुक्त होगी, यह दिखने लगता है। अब बन्धन बनकर महाठगिनी माया की तरह दुनिया को नचानेवाली स्त्री जब मुक्ति की बात करे, तो जिन जड़मतियों ने अभी तक उसे पिछले साठ वर्षों के लोकतांत्रिक राज-समाज की अनिवार्य अर्द्धांगिनी नहीं माना है, उनको ख़लिश महसूस होगी। उनके लिए स्त्री की पितृसत्ता राज-समाज परम्परा पर निर्भरता कोई समस्या नहीं, इसलिए इस परम्परा पर उठाए उसके सवाल भी सवाल नहीं, एक उद्धत अहंकार का ही प्रमाण हैं। इस पुस्तक के लेखों का मर्म और उनकी दिशा समझने के लिए पहले यह मानना होगा कि एक जीवित परम्परा को समझने के लिए सिर्फ़ मूल स्थापनाओं की नजीर नाकाफ़ी होती है, जब तक हमारी आँखों के आगे जो घट रहा है, उस पूरे कार्य-व्यापार पर हम ख़ुद तटस्थ निर्ममता से चिन्तन नहीं करते, तब तक वैचारिक शृंखला आगे नहीं बढ़ सकती।
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