The Sour Mango Tree
(1)
Author:
Nataraj Huliyar, P LankeshPublisher:
Penguin IndiaLanguage:
EnglishCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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The Sour Mango Tree is a homage to a life less ordinary. Palya Lankesh was an author, journalist, screenplay writer, poet and translator. His multi-faceted and prolific oeuvre encompasses essays scripts and stories, among much else. This volume is a translation of his memoir, Hulimavina Mara which includes his prose and poetry and is a rare glimpse into the mind of the maverick. Twenty-five years after Lankesh left us, this volume enables us to truly appreciate the significance of his legacy.
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The Sour Mango Tree is a homage to a life less ordinary. Palya Lankesh was an author, journalist, screenplay writer, poet and translator. His multi-faceted and prolific oeuvre encompasses essays scripts and stories, among much else. This volume is a translation of his memoir, Hulimavina Mara which includes his prose and poetry and is a rare glimpse into the mind of the maverick. Twenty-five years after Lankesh left us, this volume enables us to truly appreciate the significance of his legacy.
Book Details
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ISBN9780143470120
-
Pages352
-
Avg Reading Time12 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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“जिस मनुष्य की मूर्ति की मैं यहाँ स्थापना करना चाहता हूँ, वह तीस करोड़ नर-नारियों के दो सहस्र वर्षव्यापी आध्यात्मिक जीवन का परिपूर्ण रूप है। यद्यपि चालीस वर्ष हुए, उसका देहावसान (सन् 1886) हो चुका है, तथापि उसकी आत्मा आधुनिक भारत को प्राणदान कर रही है। वह गांधी के समान कर्मवीर नहीं था, कला या विचार में गेटे व टैगोर के समान प्रतिभाशाली नहीं था। वह बंगाल के एक छोटे से गाँव का रहनेवाला ब्राह्मण था, जिसका बाह्य जीवन संकीर्ण रूढ़ियों की सीमा में आबद्ध था। उसमें उल्लेख योग्य कोई विशेष घटना न थी, और तात्कालिक सामाजिक व राजनीतिक हलचल से वह सर्वथा पृथक् था; परन्तु उसके आन्तरिक जीवन में नाना देवताओं और मानवों का एक विचित्र समावेश था। उसका अभ्यन्तरीय जीवन उस सकल शक्ति की मूलाधार स्वरूपिणी दैवी ‘शक्ति’ का अंशमात्र था, जिस दैवी शक्ति की मिथिला के प्राचीन कवि विद्यापति और बंगाल के कवि रामप्रसाद ने वन्दना की है।
—रोमां रोलां
Binpatachi Chaukat - yatanamay parikramecha nital aawishkar
- Author Name:
Indumati Jondhale
- Book Type:

- Description: ‘बिनपटाची चौकट' दोन खांबांवर उभी आहे.एक खांब आहे, ऋजुतेचा आणि दुसरा खांब आहे, क्रूरतेचा.या दोन्ही अनुभवांतूनइंदूचे आयुष्य आकाराला आले आहेआणि म्हणून ते विदारक आहे.सरळसोट जगणे असते तर‘बिनपटाची चौकट' उभीच राहिली नसती.पट नसलेली चौकट समाजव्यवस्थेची आहे,मनुष्यसमूहाची आहे आणिआतल्या आत खदखदणाऱ्याआत्मप्रत्ययी अनुभवांची आहे.इंदूमती जोंधळे यांची ‘बिनपटाची चौकट'यातनामय परिक्रमेचानितळ आविष्कार आहे.गेल्या दशकातील मराठी निर्मितीनेज्याचा अक्षरवाङ्मयात गौरवाने समावेश करावाअसे हे आत्मकथन आहे.‘स्मृतीचित्रा'पेक्षाही हे अधिक दाहक आहे.- डॉ. गंगाधर पानतावणे(फेबु्रवारी, 1999) Binpatachi Chaukat | Indumati Jondhale बिनपटाची चौकट | इंदुमती जेोंधळे
Sarvahara Saamant : D. P. Tripathi
- Author Name:
Raghavendra Dubey Bhaau
- Book Type:

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Description:
एक ऐसे व्यक्ति के बारे में लिखना, जो अपने जीवन काल में ही लीजेंड बन चुका हो, वास्तव में दुस्साहस ही कहलाएगा। लेकिन मुझे यह दुस्साहस करना ही था क्योंकि जिस व्यक्ति की शान में मैं ये शब्द कह रहा हूँ, आखिरकार उसी ने तो दुस्साहस करना सिखाया था। मैं जानता हूँ कि मेरे ही शब्द मुझसे छल करेंगे, जब मैं डी. पी. त्रिपाठी को शब्दों की श्रद्धांजलि दूँगा।
17 मार्च, 1983 को लन्दन के हाईगेट कब्रिस्तान में कार्ल मार्क्स की कब्र पर बोलते हुए उनके दोस्त फ्रेडरिक एंजिल्स ने कहा था, “तमाम पीड़ा और पीड़ादायकों की कटु आलोचनाओं को यूँ तो कार्ल मार्क्स अनदेखा ही करते थे। जवाब तभी देते थे जब अत्यन्त जरूरी हो जाए। लोगों का प्यार और उनसे मिलनेवाली प्रतिष्ठा के बीच उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। साइबेरिया से लेकर कैलिफोर्निया और यूरोप से लेकर अमेरिका तक में लोगों ने शोक मनाया। मैं जोर देकर कहना चाहता हूँ कि उनकी जिन्दगी में उनके हजारों विरोधी थे लेकिन उनमें एक भी उनका व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।” डी. पी. त्रिपाठी के जाने पर भी कुछ ऐसा ही हुआ था। डी. पी. मार्क्स नहीं थे लेकिन दोनों के बीच एक बात में तो साम्य अवश्य है कि डी. पी. त्रिपाठी के जीवन में भी कोई उनका शत्रु नहीं था। वे अजातशत्रु थे। उनके पास विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों के साथ बेहतर रिश्ता बनाने और कायम रखने का हुनर तो था ही, अपनी प्रतिबद्धताओं और सरोकारों के प्रति हमेशा सचेत रहना भी उन्हें अलहदा दर्जे का अधिकारी बनाता है।
विचार और सरोकार को अपने जीवन में साकार करने वाला उनके जैसा विरले होते हैं। विचार और चिन्तन की उनकी उत्कंठा ने ‘थिंक इंडिया’ जैसे जर्नल को जन्म दिया। विचारों की स्वायत्तता का उनका आग्रह इतना प्रबल था कि जिस विचार से वे सर्वथा इत्तेफाक नहीं रखते थे या यूँ कहें कि जिस विचार के विरोधी होते थे, उस विचार को भी बहस के बीच में ले आने का प्रयत्न करते थे।
डी. पी. त्रिपाठी ने राजनीति को अपना ठिकाना तो जरूर बनाया, लेकिन उनका मन कविता में ही रचा रहा। यदि मैं कहूँ कि वे राजनीति की कविता थे, तो शायद गलत नहीं होगा। उनके विरोधी विचार के लोग भी उनकी इज्जत करते थे। सच कहें, तो वे इस युग के धरोहर थे, आज के सुकरात थे। जो भी उनके सम्पर्क में आया, उनसे मुहब्बत कर बैठा।
—कुमार नरेंद्र सिंह
Ek Dalit Ki Aatmkatha
- Author Name:
Ram Rakshadas
- Book Type:

- Description: 15 जुलाई, 1962 को मैं किसी तरह बी.ए. पास कर गया। उस समय पूरा परिवार कर्ज में डूबा हुआ था, घर-गृहस्थी चलाने और पटना में रहकर पढ़ाई करने, पुस्तकें खरीदने के लिए रुपयों की जरूरत थी। आमदनी के नाम पर कॉलेज से मिलनेवाली छात्रवृत्ति एकमात्र साधन था। इससे मेरे और परिवार के खर्च की पूर्ति नहीं हो पाती थी, इसलिए मजबूरी में कर्ज लेना पड़ता था। थोड़ी-बहुत खेती थी, जिससे कुछ महीने का खर्च निकल जाता था। इतना ही नहीं, 5 अप्रैल, 1961 को हमारे एक लड़का भी हो गया, जिसकी परवरिश और दवा-दारू का खर्च बढ़ गया। ऐसी विकट परिस्थिति में मेरे शुभचिंतकों ने राय दी कि मुझे तुरंत नौकरी कर लेनी चाहिए; हमारी स्थिति आगे पढ़ने की नहीं है । सामने पुस्तकें खुली रहती थीं और आँखों के सामने पत्नी का मलिन चेहरा मानसपटल पर कौंध जाता था। पत्नी चाहकर भी मेरी पढ़ाई में बाधक बनना नहीं चाहती थी। मेरे मन में तूफान मचा हुआ था। एक तरफ घर की माली हालत को दुरुस्त करना और दूसरी ओर अपने अरमानों तथा लक्ष्यों को प्राप्त करना, दोनों जरूरी कार्य थे। दोनों की राहें जुदा थीं। एक को छोड़ना ही पड़ेगा। इसी पुस्तक से- संघर्षों, कष्टों और अभावों से जूझकर अपनी अदम्य इच्छाशक्ति तथा जिजीविसाह के बल पर पढ़ाई पूरी कर जीवन में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणाप्रद आत्मकथा।
Ajaatshatru Atalji
- Author Name:
Bharat Bhushan
- Book Type:

- Description: "• शांति के पक्षधर होने के बावजूद प्रधानमंत्री के रूप में अटलजी ने परमाणु परीक्षण कर पूरी दुनिया को अहम संदेश दिया था। • ठंड के मौसम में बस लेकर लाहौर पहुँचकर अटलजी ने भारत-पाक रिश्तों में एक नई ऊर्जा पैदा की थी। • आज भले ही अटलजी भौतिक रूप में हमारे मध्य न हों, लेकिन अपने ओजस्वी, तेजस्वी, यशस्वी विचारों के कारण वे सदैव हम भारतीयों के हृदय में रहेंगे। • अपने राजनीतिक विरोधियों को भी अपना बना लेने में अटलजी माहिर थे। सबको साथ लेकर चलने की अद्भुत कला उनमें थी। • अपने विचारों की वजह से अटलजी देश ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय थे। • अटलजी अपनी बोलने की कला से गंभीर माहौल को भी खुशनुमा बना देते थे। • संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिए गए भाषण से अटलजी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अलग ही छवि बनी, जिसकी उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी प्रशंसा की। अपनी मर्मस्पर्शी लेखनी, ओजस्वी वक्तृत्वकला, संवेदनशील कविता, राजनीतिक दृढ़ता, अप्रतिम राष्ट्रनिष्ठा और प्रेरणाप्रद पारस्परिकता केकारण ही अटलजी बने अजातशत्रु। "
Milkha Singh
- Author Name:
R B Gurubasavaraj
- Book Type:

- Description: DESCRIPTION AWAITED
Greatest Speeches Of Vivekananda
- Author Name:
Swami Vivekanand
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- Description: "This book is a collection of Swami Vivekananda’s speeches and intends to inspire the readers with his words. It is the voice of Vivekananda that has been captured here, a voice that calls us from our slumber of ignorance and leads to the path of enlightenment and awakening. His speeches can help us become a better version of ourselves. A core concept that he believed in was that of ‘family’ and how it can form the basis of harmony and brotherhood on a macro scale. His speeches do indicate towards accepting catch other, like we do in a family. According to him, the whole world can form a family if we live wich harmony and right tolerance. His speeches also portray the secularism of India, the love for the country to which he belonged to and was proud of the diversity and empathy. His speeches should be read by everyone across the borders and one must understand the true depth of his words. The speeches in Chicago represent what Vivekananda truly believed in and what he stood for. His philosophies — shall constantly inspire us and help move forward cowards a bright and fruitful future.
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