Rasyatra : Meri Sangeet Yatra
Author:
Pt. Mallikarjun MansurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
जिस महान गायक को ‘जयपुर-अतरौली घराने का सरताज’, ‘शुद्ध संगीत का आख़िली पुरोधा’ और इसके अलावा भी बहुत कुछ कहा जाता था, ‘रसयात्रा’ उन्हीं पं. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा है। ऐसा लगता है कि वे सिर्फ़ गाने के लिए ही पैदा हुए थे। महज़ दस साल की छोटी उम्र से लेकर 82 साल की उम्र तक, अपने जीवन के आख़िरी दिनों तक उन्होंने गाया।
उनका जन्म धारवाड़ के पास मंसूर नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ। संगीत की शिक्षा उन्होंने दो प्रमुख घरानों—ग्वालियर और जयपुर-अतरौली में प्राप्त की। उनकी गायकी इसीलिए अनोख़ी थी कि उन्होंने इन दोनों घरानों को सफलतापूर्वक मिलाया और अपनी एक अलग पहचान बनाई।
उनकी गायकी के पीछे सिर्फ़ इन दो घरानों की दो प्रणालियाँ ही नहीं, बल्कि उनके तीन गुरुओं—ग्वालियर घराने के पं. नीलकंठ बुआ अलुरमठ, उस्ताद मंज़ी ख़ान और जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद बुर्जी ख़ान की वैचारिक शैलियाँ भी थीं। वह अप्रचलित रागों का भंडार थे, जिन्हें उन्होंने अपनी कई महफ़िलों में पेश किया जिससे सैकड़ों श्रोताओं को अविस्मरणीय आनन्द मिला, जो आज भी उनके प्रदर्शन को याद करते हैं।
अपने कई चाहने वालों के आग्रह पर उन्होंने 1980 में अपनी संगीत-यात्रा को दर्ज किया और इसे ‘रसयात्रा’ नाम दिया। इस पुस्तक को 1984 में कन्नड़ भाषा की ‘बेस्ट बुक’ के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उनके बेटे, पं. राजशेखर मंसूर ने अपनी छात्रा डॉ. चन्द्रिका कामथ के साथ मिलकर इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और अब यह हिन्दी में आपके सामने है।
यह एक ऐसे इनसान की दिल छू लेने वाली कहानी है जिसे सच में जीनियस कहा जा सकता है, फिर भी वह हमेशा एक निराडम्बर और सामान्य व्यक्ति के रूप में ही रहे। वे ख़ुद को संगीत में कुछ बड़ा हासिल करने वाला नहीं बल्कि सुर और लय का एक सच्चा ‘साधक’ मानते थे।
यह हमारे देश के संगीत-इतिहास का एक ज़रूरी और अनोखा दस्तावेज़ है।
ISBN: 9789360861452
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Bakhtiar K Dadabhoi
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- Description: "कुशल पायलट, नवप्रवर्तक उद्यमी, संस्थान निर्माता, परमार्थी व महान् जन-प्रबंधक जे. आर.डी टाटा उन राष्ट्र- निर्माताओं में थे, जो आबाल-वृद्ध सभी के प्रेरणा-स्रोत रहे हैं । एक उद्योगपति के रूप में उनको टाटा उद्योग समूह को अंतरराष्ट्रीय पटल पर लाने का श्रेय प्राप्त है । श्री टाटा विज्ञान व कलाओं के संरक्षक रहे । साहित्य, ललित-कलाओं, तेज रफ्तार कारों, स्कीइंग एवं उड़ान में उनकी गहरी रुचि थी । उन्होंने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, नेशनल सेंटर फॉर द परफार्मिग आर्ट्स एवं अन्य अनेक संस्थानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । जे. आर.डी टाटा को जन-प्रेरक के रूप में सदा याद किया जाएगा । सही व्यक्ति को सही काम के लिए चुनने की उनमें विलक्षण क्षमता थी । किसी टीम को सुगठित करने, विभिन्न कर्मियों से सबसे अच्छे परिणाम हासिल करना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी । वह जिजीविषा से परिपूर्ण थे और नवाचार व उद्यम की प्रेरणा देने में अत्यंतमुखर । अपने सभी कर्मियों को अगाध स्नेह करनेवाले, दूरदर्शी, युग -निर्माता जे. आर.डी टाटा के जीवन से प्रेरणा और शिक्षा देनेवाली उपयोगी पुस्तक ।
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