Rasyatra : Meri Sangeet Yatra
(0)
Author:
Mrityunjay, Pt. Mallikarjun MansurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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जिस महान गायक को ‘जयपुर-अतरौली घराने का सरताज’, ‘शुद्ध संगीत का आख़िली पुरोधा’ और इसके अलावा भी बहुत कुछ कहा जाता था, ‘रसयात्रा’ उन्हीं पं. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा है। ऐसा लगता है कि वे सिर्फ़ गाने के लिए ही पैदा हुए थे। महज़ दस साल की छोटी उम्र से लेकर 82 साल की उम्र तक, अपने जीवन के आख़िरी दिनों तक उन्होंने गाया। उनका जन्म धारवाड़ के पास मंसूर नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ। संगीत की शिक्षा उन्होंने दो प्रमुख घरानों—ग्वालियर और जयपुर-अतरौली में प्राप्त की। उनकी गायकी इसीलिए अनोख़ी थी कि उन्होंने इन दोनों घरानों को सफलतापूर्वक मिलाया और अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी के पीछे सिर्फ़ इन दो घरानों की दो प्रणालियाँ ही नहीं, बल्कि उनके तीन गुरुओं—ग्वालियर घराने के पं. नीलकंठ बुआ अलुरमठ, उस्ताद मंज़ी ख़ान और जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद बुर्जी ख़ान की वैचारिक शैलियाँ भी थीं। वह अप्रचलित रागों का भंडार थे, जिन्हें उन्होंने अपनी कई महफ़िलों में पेश किया जिससे सैकड़ों श्रोताओं को अविस्मरणीय आनन्द मिला, जो आज भी उनके प्रदर्शन को याद करते हैं। अपने कई चाहने वालों के आग्रह पर उन्होंने 1980 में अपनी संगीत-यात्रा को दर्ज किया और इसे ‘रसयात्रा’ नाम दिया। इस पुस्तक को 1984 में कन्नड़ भाषा की ‘बेस्ट बुक’ के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उनके बेटे, पं. राजशेखर मंसूर ने अपनी छात्रा डॉ. चन्द्रिका कामथ के साथ मिलकर इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और अब यह हिन्दी में आपके सामने है। यह एक ऐसे इनसान की दिल छू लेने वाली कहानी है जिसे सच में जीनियस कहा जा सकता है, फिर भी वह हमेशा एक निराडम्बर और सामान्य व्यक्ति के रूप में ही रहे। वे ख़ुद को संगीत में कुछ बड़ा हासिल करने वाला नहीं बल्कि सुर और लय का एक सच्चा ‘साधक’ मानते थे। यह हमारे देश के संगीत-इतिहास का एक ज़रूरी और अनोखा दस्तावेज़ है।
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जिस महान गायक को ‘जयपुर-अतरौली घराने का सरताज’, ‘शुद्ध संगीत का आख़िली पुरोधा’ और इसके अलावा भी बहुत कुछ कहा जाता था, ‘रसयात्रा’ उन्हीं पं. मल्लिकार्जुन मंसूर की आत्मकथा है। ऐसा लगता है कि वे सिर्फ़ गाने के लिए ही पैदा हुए थे। महज़ दस साल की छोटी उम्र से लेकर 82 साल की उम्र तक, अपने जीवन के आख़िरी दिनों तक उन्होंने गाया।
उनका जन्म धारवाड़ के पास मंसूर नाम के एक छोटे से गाँव में हुआ। संगीत की शिक्षा उन्होंने दो प्रमुख घरानों—ग्वालियर और जयपुर-अतरौली में प्राप्त की। उनकी गायकी इसीलिए अनोख़ी थी कि उन्होंने इन दोनों घरानों को सफलतापूर्वक मिलाया और अपनी एक अलग पहचान बनाई।
उनकी गायकी के पीछे सिर्फ़ इन दो घरानों की दो प्रणालियाँ ही नहीं, बल्कि उनके तीन गुरुओं—ग्वालियर घराने के पं. नीलकंठ बुआ अलुरमठ, उस्ताद मंज़ी ख़ान और जयपुर-अतरौली घराने के उस्ताद बुर्जी ख़ान की वैचारिक शैलियाँ भी थीं। वह अप्रचलित रागों का भंडार थे, जिन्हें उन्होंने अपनी कई महफ़िलों में पेश किया जिससे सैकड़ों श्रोताओं को अविस्मरणीय आनन्द मिला, जो आज भी उनके प्रदर्शन को याद करते हैं।
अपने कई चाहने वालों के आग्रह पर उन्होंने 1980 में अपनी संगीत-यात्रा को दर्ज किया और इसे ‘रसयात्रा’ नाम दिया। इस पुस्तक को 1984 में कन्नड़ भाषा की ‘बेस्ट बुक’ के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उनके बेटे, पं. राजशेखर मंसूर ने अपनी छात्रा डॉ. चन्द्रिका कामथ के साथ मिलकर इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया और अब यह हिन्दी में आपके सामने है।
यह एक ऐसे इनसान की दिल छू लेने वाली कहानी है जिसे सच में जीनियस कहा जा सकता है, फिर भी वह हमेशा एक निराडम्बर और सामान्य व्यक्ति के रूप में ही रहे। वे ख़ुद को संगीत में कुछ बड़ा हासिल करने वाला नहीं बल्कि सुर और लय का एक सच्चा ‘साधक’ मानते थे।
यह हमारे देश के संगीत-इतिहास का एक ज़रूरी और अनोखा दस्तावेज़ है।
Book Details
-
ISBN9789360861452
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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मलिका अमर शेख उस समय मात्र उन्नीस बरस की थीं जब वे मराठी के युग-प्रवर्तक कवि नामदेव ढसाल के साथ विवाह-बन्धन में बँध गईं। लेकिन जल्द ही यह शादी टूट गई। दलित पैंथर्स के सह-संस्थापक नामदेव न तो एक पति के रूप में, न पिता के रूप में, और न ही एक पुरुष के रूप में वैसे निकले जैसी उम्मीद मलिका ने की थी। यह मुख्यतः उस विवाह की कहानी है, जिसमें हम उस स्त्री से मिलते हैं जो एक पुरुष-संसार में अपनी जगह ढूँढ़ने की कोशिश में है। लेकिन यह कहानी मराठी दलित आन्दोलन के अन्तर्विरोधों, मुम्बई शहर, उसके कवियों और एक्टिविस्टों की कहानी भी है। मूल रूप से मराठी में प्रकाशित यह आत्मकथा छपते ही एक सनसनी बन गई थी। व्यक्तिगत बनाम राजनीतिक, वाम विचारधारा बनाम दलित आन्दोलन और अपने पति के प्रति प्रेम और घृणा के बीच फँसी एक स्त्री की यह आत्मकथा कई मायनों में एक दस्तावेज़ की हैसियत रखती है।
Yogigatha, Yogi Adityanath Ki Jivangatha
- Author Name:
Shantanu Gupta
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यह जीवनी आपको अपने चार खंडों में योगी आदित्यनाथ के जीवन के चार पहलुओं से होकर ले जाती है। पुस्तक का आरंभ योगी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के वर्तमान रूप, 2017 की उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति, यू.पी. का सी.एम. चुने जाने के तथ्यों और पंचम तल (यू.पी. के सीएम का दफ्तर) से होता है। दूसरा खंड आपको योगी आदित्यनाथ के पाँच बार के सांसद के रूप में लंबे कार्यकाल, चुनावी जीत, संसद् में उनकी कुशल भागीदारी, उनके तथाकथित विवादित भाषणों की सच्चाई, लव-जिहाद की उनकी सोच के पीछे का तर्क, घर वापसी, हिंदू युवा वाहिनी और भाजपा के साथ उनके संबंध से परिचित कराता है। तीसरे खंड में लेखक अपने पाठकों को गोरखनाथ मठ के महंत अवेद्यनाथ, योगी आदित्यनाथ, उनकी कठोर यौगिक दिनचर्या, नाथ पंथ के गुरुओं और कई दशकों से मठ की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से होकर ले जाते हैं। आखिरी खंड में लेखक अपने पाठकों को उत्तराखंड के इलाके में पले अजय सिंह बिष्ट के बचपन से जुड़ी कुछ बेहद दिलचस्प और उनके अपनों के मुँह से कही बातों के साथ छोड़ देते हैं, जो गायों, खेतों, पहाड़ों, नदियों के बीच पला-बढ़ा और आगे चलकर एक सांसद और मुख्यमंत्री बना।
Kalpantak Yogi Brahmarishi Devraha Baba Jivan Parichay Book In Hindi
- Author Name:
Amit Kumar Pandey
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"कल्पांतक योगी ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा' एक प्रेरणादायक पुस्तक है, जो भारतीय संत-परंपरा के महान् योगी ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा के जीवन और शिक्षाओं का दिग्दर्शन करवाती है। यह उनकी अद्वितीय साधना, तप और आत्मज्ञान की यात्रा पर ले जाती है, जिसमें उन्होंने मानवता के कल्याण के लिए अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाया। बाबा का जीवन गूढ़ रहस्यों से भरा हुआ था। उन्होंने साधारण जनों को ध्यान, प्रेम और करुणा का महत्त्व समझाया। उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं, जो हमें जीवन में संतुलन और शांति की ओर अग्रसर करती हैं। इस पुस्तक में ब्रह्मर्षि के शिष्यों के संस्मरण संकलित हैं। लोककल्याण के लिए बाबा की प्रकृति संगत महत्त्वपूर्ण घटनाओं, उनकी अलौकिक लीलाओं और उनके द्वारा दिए गए उपदेशों का विस्तृत वर्णन है। कुछ घटनाओं को लेखक ने गहन शोध और गुरुदेव के शिष्यों के अनुभव के माध्यम से बाबा की दिव्यता से जोड़ने का प्रयास किया है। पुस्तक पाठकों को आत्मज्ञान की ओर प्रेरित करती है और यह संदेश देती है कि सच्ची साधना से कोई भी व्यक्ति अपने जीवन को बदल सकता है। यह पुस्तक हर उस व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, जो आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में है। भारतीय संत परंपरा की अप्रतिम विभूति ब्रह्मर्षि देवरहा बाबा के दिव्य जीवन का यशोगान करती प्रेरक पुस्तक ।"
Karpuri Thakur
- Author Name:
Dr. Ranjana Kumari +1
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जननायक कर्पूरी ठाकुर की ख्याति मुख्यमंत्री के रूप में कम और 'विपक्ष के प्राण' के रूप में ज्यादा थी। समाजवादी धारा के अग्रणी नेता के रूप में कर्पूरीजी भारतीय राजनीति में प्रतिष्ठित रहे हैं। संसदीय मर्यादा और विधाओं के भरपूर पालन तथा संसदीय व्यवस्था में कर्पूरीजी की अटूट आस्था थी। बिहार विधानसभा तथा लोकसभा में उनकी भागीदारी अत्यन्त उच्चकोटि की रही है। इस पुस्तक में विभिन्न संसदीय विधाओं, राज्यपाल के अभिभाषण, प्रश्नकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, बजट, वाद-विवाद, लोक महत्त्व के विषयों, प्रस्तावों तथा अविश्वास प्रस्ताव आदि में नेता विपक्षी दल के रूप में कर्पूरीजी की भागीदारी का निरूपण किया गया है। इसके अतिरिक्त विभिन्न संसदीय विधाओं के सैद्धान्तिक पक्ष का अनुशीलन करते हुए उन सिद्धान्तों की कसौटी पर कर्पूरीजी की भूमिका का परीक्षण किया गया है। कर्पूरीजी की सदन के अन्दर नेता विपक्षी दल के रूप में निभाई गई भूमिका का विस्तृत विवरण देनेवाली यह पुस्तक भारतीय राजनीति के कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं की सूचना भी देती है।
Yatrik
- Author Name:
Shivani
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कथाकार और उपन्यासकार के रूप में शिवानी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई ज़मीं बनाई थी, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते थे। उन्होंने मानवीय संवेदनाओं और सम्बन्धगत भावनाओं की इतने बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की कि वे अपने समय में सबसे ज़्यादा पढ़े जानेवाले लेखकों में एक होकर रहीं।
कहानी, उपन्यास के अलावा शिवानी ने संस्मरण और रेखाचित्र आदि विधाओं में भी बराबर लेखन किया। अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को उन्होंने क़रीब से देखा, कभी लेखक की निगाह से तो कभी मनुष्य की निगाह से, और इस तरह उनके भरे-पूरे चित्रों को शब्दों में उकेरा और कलाकृति बना दिया।
इस पुस्तक में ‘चरैवेति’ और ‘यात्रिक’ शीर्षक रचनाएँ सम्मिलित हैं। आशा है, शिवानी के कथा-साहित्य के पाठकों को उनकी ये रचनाएँ भी पसन्द आएँगी।
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