Potraj
(0)
Author:
Parth PolkePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
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“मेरा बाप पोतराज था। पोतराज कमर में रंग-बिरंगे खंडों के चीथड़े तथा कपड़े पहनते हैं। पोतराज की उस पोशाक को आभरान कहते हैं। आभरान मुझे यहाँ की व्यवस्था द्वारा पोतराज को दिए हुए राजवस्त्र लगते हैं। हाँ, ऐसे राजवस्त्र जो ज़िन्दगी को चीथड़े-चीथड़े कर डालते हैं। आभरान पहनकर अपने बदन को कोड़ों से फटकारता हुआ मेरा बाप—आबा—हमारे लिए घर-घर भीख माँगता रहा। सारी ज़िन्दगी उसने पोतराज के रूप में खटते-घसीटते बिताई। आख़िर उसी में वह मरा। मरना सबको है; लेकिन यहाँ की व्यवस्था ने न जाने कितने लोगों को बिना सहमते-संकोचते, बड़े आराम से बलि चढ़ाया है। मेरे आबा उन्हीं में से एक हैं। पोतराज के जिस आभरान को उतारना आबा के लिए सम्भव नहीं हुआ, मैंने उसे उतारा। उसकी होली जलाते हुए भी मेरा मन भीतर ही भीतर आबा और बाई की यादों से बेचैन रहा। मैं उपेक्षा तथा ग़रीबी की लपटों की आँच सहनेवाले अनेकों में से एक हूँ। व्यवस्था द्वारा दी गई वेदना का साक्षी हूँ। भुक्तभोगी हूँ। ये वेदनाएँ मुझ जैसे अनेक की अनेक पीढ़ियों को चुभती रही हैं। मैं दु:खों और वेदनाओं को कुरेदते हुए जीना नहीं चाहता; लेकिन एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहता हूँ कि यह सारा दु:ख-दर्द हमें ही क्यों भोगना पड़ता है।” ‘पोतराज’ में उपस्थित लेखक पार्थ पोलके के ये शब्द सहसा हृदय को विचलित कर देते हैं। मूल मराठी भाषा में लिखित चर्चित आत्मकथा का यह हिन्दी अनुवाद पाठकों को निश्चित रूप से एक नवीन सामाजिक दृष्टि प्रदान करेगा। सघन संवेदना, समानता के तीखे प्रश्न, अभाव के असमाप्त अरण्य और अदम्य जिजीविषा—ये तत्त्व इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं।
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“मेरा बाप पोतराज था। पोतराज कमर में रंग-बिरंगे खंडों के चीथड़े तथा कपड़े पहनते हैं। पोतराज की उस पोशाक को आभरान कहते हैं। आभरान मुझे यहाँ की व्यवस्था द्वारा पोतराज को दिए हुए राजवस्त्र लगते हैं। हाँ, ऐसे राजवस्त्र जो ज़िन्दगी को चीथड़े-चीथड़े कर डालते हैं।
आभरान पहनकर अपने बदन को कोड़ों से फटकारता हुआ मेरा बाप—आबा—हमारे लिए घर-घर भीख माँगता रहा। सारी ज़िन्दगी उसने पोतराज के रूप में खटते-घसीटते बिताई। आख़िर उसी में वह मरा। मरना सबको है; लेकिन यहाँ की व्यवस्था ने न जाने कितने लोगों को बिना सहमते-संकोचते, बड़े आराम से बलि चढ़ाया है। मेरे आबा उन्हीं में से एक हैं।
पोतराज के जिस आभरान को उतारना आबा के लिए सम्भव नहीं हुआ, मैंने उसे उतारा। उसकी होली जलाते हुए भी मेरा मन भीतर ही भीतर आबा और बाई की यादों से बेचैन रहा।
मैं उपेक्षा तथा ग़रीबी की लपटों की आँच सहनेवाले अनेकों में से एक हूँ। व्यवस्था द्वारा दी गई वेदना का साक्षी हूँ। भुक्तभोगी हूँ। ये वेदनाएँ मुझ जैसे अनेक की अनेक पीढ़ियों को चुभती रही हैं। मैं दु:खों और वेदनाओं को कुरेदते हुए जीना नहीं चाहता; लेकिन एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहता हूँ कि यह सारा दु:ख-दर्द हमें ही क्यों भोगना पड़ता है।” ‘पोतराज’ में उपस्थित लेखक पार्थ पोलके के ये शब्द सहसा हृदय को विचलित कर देते हैं।
मूल मराठी भाषा में लिखित चर्चित आत्मकथा का यह हिन्दी अनुवाद पाठकों को निश्चित रूप से एक नवीन सामाजिक दृष्टि प्रदान करेगा। सघन संवेदना, समानता के तीखे प्रश्न, अभाव के असमाप्त अरण्य और अदम्य जिजीविषा—ये तत्त्व इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं।
Book Details
-
ISBN9788183614719
-
Pages220
-
Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: परम पूज्य दलाई लामा – खामोश लोगों की ओर से यह पुस्तक परम पूज्य दलाई लामा की आत्मकथात्मक कृति Voice for the Voiceless का हिंदी अनुवाद है। इसमें उन्होंने तिब्बत और तिब्बती लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए चीन के विरुद्ध अपने सात दशकों के शांतिपूर्ण संघर्ष को आत्मीयता से वर्णित किया है। पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं जो चीन द्वारा तिब्बत और तिब्बतीयों को लेकर खड़े किए जाते हैं- और जो पाठकों के मन में भी स्वाभाविक रूप से उठते हैं। इसके साथ ही, अगली दलाई लामा की घोषणा और उससे जुड़ी जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई है, जो वर्तमान में चीन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में गंभीर बहस का विषय बना हुआ है। इसकी भाषा और शैली प पू दलाई लामा के व्यक्तित्व की तरह ही सहज और सरल है।
Rajpath Se Lokpath Par
- Author Name:
Vijayaraje Scindia
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- Description: "मेरे मानस पर अपने जीवनसाथी का ऐसा चित्र उभरता, जो देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे सूरमाओं में सबसे पहली पंक्ति का तेजपुंज हो।...स्वदेशी आग्रह का माहौल कुछ ऐसा बना कि प्रत्येक नागरिक विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर देशभक्तों की पंक्ति में आ खड़ा होने लगा। इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने प्रतिज्ञा की कि न केवल विदेशी वस्त्र अपितु अन्य कोई विदेशी वस्तु भी प्रयोग में नहीं लाऊँगी। अंग्रेज अधिकारियों के यहाँ जाना-आना रहता था, मैंने निर्णय लिया कि अब उनसे कोई संबंध नहीं रखूँगी। अतः उनके क्लबों, चाय-पार्टियों या भोज-समारोहों में जाना मैं टालने लगी। सफेद घोड़े पर एक लड़का सवार था और काले घोड़े पर एक लड़की। प्राणिउद्यान के एक नौकर ने पूछने पर बताया कि वे जिवाजीराव महाराज और उनकी बहन कमलाराजे थे। अर्थात् स्वयं महाराज सिंधिया अपनी बहन के साथ थे। हम लोगों द्वारा देखे गए उस प्रासाद, किले, उद्यान और उस शेर के भी स्वामी। नानीजी के मानस पर वह दृश्य बिजली की तरह कौंध गया। सहसा उनके मुँह से निकला, ‘‘हमारी नानी (मैं) की उनके साथ कितनी सुंदर जोड़ी लगेगी!’’ इतना सुनते ही मामा और सभी हँस पड़े। किसी के मुँह से निकला, ‘‘कल्पना की उड़ान ऊँची है।’’ मुझे लगा, राजनीतिक जीवन में रहकर सिद्धांतों एवं मूल्यों के संवर्धन के लिए जूझते रहना ही अपना कर्तव्य है। अतः मेरे मन में यह बोध जागा कि सम विचारवाले लोगों के साथ कार्य करना अधिक परिणामकारी होगा। ऐसे लोगों का दल, जिन्हें भ्रष्टाचार की लत नहीं लगी थी, मुझे अपना प्रतीत होने लगा।...वैचारिक दृष्टि से मुझे जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी की रीति-नीति अच्छी लगती थी, अतः दोनों ही दल मुझे करीबी लगते थे। किंतु मैं यह निर्णय नहीं कर पा रही थी कि दल की सदस्य बनूँ। अंततः मैंने दोनों ही दलों के टिकट पर चुनाव लड़ने का निश्चय कर लिया। मध्य प्रदेश विधानसभा के करेरा निर्वाचन क्षेत्र से मैं जनसंघ की प्रत्याशी बन गई। —इसी पुस्तक से तिहाड़ कारागृह नहीं है, यह धरती का नरक-कुंड है। और इस नरक-कुंड में वे लोग धकेल दिए गए थे, जिनके तपोबल से इंदिराजी का सिंहासन डिग रहा था।...तिहाड़ जेल में स्थान-स्थान पर गंदगी का ढेर जमा रहता। दुर्गंधयुक्त वायु में घुटन महसूस होती। भोजन के समय थाली पर से भिनभिनाती मक्खियों को लगातार दूसरे हाथ से उड़ाना पड़ता। कानों में कीट-पतंगों की आवाजें गूँजती रहतीं। अँधेरे में जुगनू का प्रकाश और कानों में झींगुर की झनकार। जीना दूभर था। इन सबके बावजूद हम चैन से थे। किंतु खुली हवा में साँस लेनेवाली इंदिराजी क्या चैन से थीं! उन्हें तो दिन में भी तारे नजर आ रहे थे। अयोध्या ईंट और पत्थर की बनी नगरी नहीं है। यह भारत की आत्मा और राष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक है। इसीलिए जब रथयात्रा निकली तो हिंदू और मुसलमान दोनों इसमें समान रूप से शरीक हुए। राम और रहीम संग-संग चलते रहे। जनसभाओं में भी मुसलमान शिरकत करते रहे। न राग, न द्वेष; एक प्राण दो देह जैसी स्थिति थी। इस राष्ट्र-मिलन से उन मुट्ठी भर लोगों में खलबली मच गई, जो राजनीति की अँगीठी पर स्वार्थ की रोटियाँ सेंका करते थे। बाबरी ढाँचा टूटने का उनका भय और विरोध केवल इसी मात्र के लिए था। एक छोटे परिवार के दायरे से निकलकर विराट् में समाहित होने का सुख, वसुधैव कुटुंबकम् के आदर्श को जीने का प्रतीक था वह आयोजन। मुझसे छोटे से बने सुंदर, किंतु अति विशिष्ट मंदिर की सीढि़यों पर पैर का अँगूठा लगाने के लिए कहा गया। पर करती भी क्या! मजबूरी थी। उस मंदिर में एक ओर मेरे पति स्वर्गीय महाराज की मूर्ति रखी थी तो दूसरी ओर गुरुजी की। बीच में थे मेरे इष्टदेव श्रीकृष्ण। मैंने पाँव का अँगूठा नहीं, अपना माथा उस मंदिर से लगा दिया। इस प्रकार परदादी बनने का सुख मैंने संपूर्ण संघ परिवार के साथ जीया। ईश्वर से संपूर्ण भारतीय समाज के शुभ की कामना करती हूँ। —इसी पुस्तक से "
Nij Nainahin Dekhi
- Author Name:
Keshavchandra Verma
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Description:
केशवचन्द्र वर्मा का नाम इस कारण भी रेखांकित किया जाता है कि उन्होंने न केवल व्यंग्य-लेखन की हर विधा में सर्वप्रथम श्रेष्ठ उपलब्धियों वाली रचनाएँ कीं—चाहे हास्य व्यंग्य के उपन्यास हों, कहानियाँ हों, सम्पूर्ण नाटक और निबन्ध हों—परन्तु अन्य गम्भीर रचना के क्षेत्र में अपनी कविताओं और संगीत विषयक अनेक कृतियों को हिन्दी में पहली बार प्रस्तुत करने का श्रेय भी पाया है।
हिन्दी साहित्य के किताबी इतिहास से उसे मुक्त करके केशव जी ने जिस तरह अपनी पुस्तकों—‘ताकि सनद रहे’ और उसी क्रम में ‘निज नैनहिं देखी’ को अपने प्रामाणिक निजी साक्ष्य के रूप में प्रकाशित किया, वह निःसन्देह उन्हें इस क्षेत्र में भी सर्वश्रेष्ठ बनाती है। अपने समकालीनों में तो उनकी पहचान नितान्त विशिष्ट है ही—वे स्वयं अपनी रचना-प्रक्रिया को अपनी विविधता से चुनौती देते हैं। इसका साक्ष्य केशव जी का तमाम लेखन है।
Hum Nahin Change Bura Na Koy
- Author Name:
Surendra Mohan Pathak
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- Description: लोकप्रिय साहित्य हिन्दी अकादमिक जगत के लिए मूल्यांकन की चीज़ कभी नहीं रहा, लेकिन हिन्दी के शिक्षित समाज का बड़ा तबका उसके ही असर में रहता आया है। हमें लोकप्रिय साहित्य का बाज़ार तो दिखता है, उसकी आन्तरिक दुनिया की बनावट नहीं दिखती। ऐसे में लोकप्रिय लेखन के एक बड़े नाम सुरेन्द्र मोहन पाठक अपनी आत्मकथा लिखकर बहस और मूल्यांकन की एक नई ज़मीन तैयार कर रहे हैं। उनका अपना जीवन है भी ऐसा जिसके बारे में दूसरों को दिलचस्पी हो। कान में सुनने की मशीन, आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा लगाए, नौकरी करते हुए, तीन सौ से अधिक सफल उपन्यास लिखनेवाले पाठक जी अपने ही रचे किसी अमर किरदार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले हैं। लेखन के तौर-तरीक़े और ख़ुद के लिए तय किया हुआ अनुशासन अचरजकारी। लाखों पाठकों की रुचि को समझना, उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के दबाव को धत्ता बताते हुए, उनके दिमाग़ पर क़ब्ज़ा जमाना—यह कोई मामूली बात नहीं है। इन सब बातों को समझने में एक औज़ार का काम कर सकती है यह आत्मकथा—'हम नहीं चंगे बुरा न कोय’। यह सुरेन्द्र मोहन पाठक के लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा है। यह उनके समय के पल्प फ़िक्शन इंडस्ट्री को जानने के लिए भी ज़रूरी किताब है।
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