Shishir Samagra
Author:
Sabitri BadaikPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
शिशिर टुडू सबके आत्मीय थे। उनके व्यक्तित्व की जो सबसे बड़ी खूबी सबको आकर्षित करती थी, वह थी उनके आदिवासियत से लबरेज होने के बावजूद हमारे-आपके जैसे सामान्य ‘इनसान’ होना। उनमें न आदिवासी होने की हीनता थी और न दंभ। एक निहायत विनम्र, सहृदय और जिंदादिल इनसान थे वे, जिन्हें किसी ने कभी भी तीखा होते नहीं देखा, न सुना। आदिवासियत का सबसे बड़ा गुण यह कि वह समभाव से जीवन के सुख-दुख को ग्रहण करता है। अपनी भवनाओं को संयत रूप में प्रकट करता है। शिशिर टुडू इसके मूर्त रूप थे। कला, संस्कृति और संघर्ष से जुड़ा उनका लंबा जीवनानुभव था। हिंदी, अंग्रेजी सहित कई आदिवासी भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। वे एक संवेदनशील व्यक्ति थे और लिखते वक्त उनकी भाषा-शैली जीवंत हो उठती थी। वे फिल्मकार भी थे। लेकिन उन्होंने कभी भूले से भी अपने व्यक्तित्व की इन खूबियों का प्रदर्शन नहीं किया। वे बस जरूरत के हिसाब से उसका यथा समय उपयोग करते थे। उन्होंने अपने ज्ञान का, यश और आर्थिक क्षमता बढ़ाने में दुरुपयोग नहीं किया। वे अपने मूल से गहरे जुड़े, देश-दुनिया के अद्यतन ज्ञान से संपन्न आदिवासी थे। वे हमें हमेशा याद रहेंगे, एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में।
ISBN: 9789353226251
Pages: 280
Avg Reading Time: 9 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: सत्य और असत्य क्या है, इसको बताया नहीं जा सकता। समय और परिस्थिति के अनुसार यह परिवर्तित होता रह सकता है। ईश्वर का अस्तित्व अनाम है, कोई धर्मशास्त्र या धर्मशास्त्री उसे नहीं जान सका। फिर भी यह खोज चलती रहती है। ऐसी ही एक खोज का नतीजा है यह पुस्तक। एक साधारण व्यक्ति को एक दिन सहसा अपने दैनंदिन जीवन की निरर्थकता का भान होता है और यह हिमालय की यात्रा को चल पड़ता है। मकसद है उस सम्पूर्ण की उपलब्धि जिसके लिए हर युग का मनुष्य अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर भटका और जो युगों-युगों से हमारे आधे-अधूरे अस्तित्व को आकर्षित करता रहा। अपनी इस यात्रा के मोड़ों, बाधाओं, पड़ावों और उपलब्धियों का लेखा-जोखा लेखक ने अपनी इस डायरी में प्रस्तुत किया है। हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों, घाटियों और कन्दराओं में बसे साधुओं-वैरागियों और इस क्षेत्र के जनजीवन के दृश्यों के साथ अपनी इस डायरी में लेखक ने अपने भीतर के ‘व्यक्ति’ से मुठभेड़ के ब्यौरे भी दर्ज किए हैं। एक भिन्न बोध की पुस्तक।
Pravasi Ki Kalam Se
- Author Name:
Badal Sarkar
- Book Type:

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Description:
भारतीय रंगमंच के दिशा-प्रवर्तकों में से एक बादल सरकार के पत्रों, डायरियों आदि का यह संग्रह उनके निर्माणकारी दिनों का लेखा-जोखा है, जिससे हम उनके व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके संवेदनशील रंगकर्मी की संरचना को समझने की शुरुआत भी कर सकते हैं।
मूल रूप से बांग्ला में ‘प्रबासेर हिजिबिजी’ शीर्षक से प्रकाशित इस पुस्तक में सितम्बर, 1957 से सितम्बर, 1959 तक के उनके लन्दन प्रवास (दो साल), जुलाई 1963 से मार्च 1964 तक के उनके फ्रांस प्रवास (नौ महीने) और जुलाई 1964 से जून 1967 तक (तीन साल) के नाइजीरिया प्रवास का रचनात्मक साक्ष्य है। यह उनके संघर्षमय जीवन के एक कालखंड का अत्यन्त मार्मिक एवं प्रामाणिक दस्तावेज़ भी है।
ग्रन्थ में एक जगह उन्होंने लिखा है कि जो बातें दूसरों से कही जा सकती थीं, वे पत्रों के माध्यम से कही गई हैं। जिन्हें अपने तईं ही रखना चाहता था, वे डायरी के पृष्ठों में ग्रथित हैं और जो डायरी में भी नहीं कही जा सकीं, वे कविताओं का बाना पहनकर व्यक्त हुई हैं।
क़रीब डेढ़ सौ पृष्ठों की इस सामग्री को काल-क्रमानुसार सँजोया गया है जिससे एक ख़ूबसूरत चित्र बना है जिसकी नाना रेखाएँ, नाना रंग, नाना आकार-प्रकार अपनी पूरी प्रामाणिकता के साथ आवश्यकता एवं प्रसंगानुसार उकेरे गए हैं।
Ulua, Bulua Aur Main
- Author Name:
Ramsagar Prasad Singh
- Book Type:

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Description:
इस ग्लोबलाइज़्ड दुनिया में जहाँ चारों ओर समरूपता का हठ पाँव पसार रहा है, ऐसे में ‘उलुआ, बुलुआ और मैं’ भरी दुपहरी में छाँव की तरह है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह रचना व्यक्ति के साथ-साथ अपने समय, अंचल और ग्राम्य-संस्कृति की भी कथा कहती है। वैसे तो हर व्यक्ति का जीवन अगर दर्ज हो जाए तो महाकाव्य का विषय है। मुक्तिबोध ने सच ही कहा है कि 'मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है।' इस रचना की चमक इतिहास की धार में बह रहे क़िस्से, शब्द और लोग-बाग हैं जिन्हें लेखक ने शिद्दत के साथ पकड़ने की कोशिश की है। यह रचना आज़ादी के पहले और उसके बाद के कुछ समय के बदलावों का साहित्य रचती है। साहित्य की परम्परा से वाक़िफ़ लोगों को इसमें रेणु, रामवृक्ष बेनीपुरी और शिवपूजन सहाय जैसे मिट्टी के रचनाकारों की छवि दिखाई पड़ सकती है। साथ ही वैसे इतिहास और संस्कृतिकर्मी जो लोगों के सुख-दु:ख, खान-पान, आचार-व्यवहार, लोकगाथाओं आदि को भी इतिहास-अध्ययन का विषय मानते हैं, उनके लिए भी यह रचना फलदायी साबित होगी। शैली के तौर पर यह कभी आपको आत्मकथा, कभी उपन्यास, कभी कहानी तो कभी ललित निबन्ध का अहसास कराती चलती है।
कुल मिलाकर ‘उलुआ, बुलुआ और मैं' अपने समय और समाज के निर्वासित लोगों, शब्दों, गँवई संस्कृति और समय की आपा-धापी में छूट रहे जीवन के विविध राग-रंगों को फिर से साहित्य की दुनिया में पुनर्जीवित करने का एक प्रयास है।
—अरुण कमल
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