Zindagi Ka Kya Kiya
(0)
Author:
Dhirendra AsthanaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Biographies-and-autobiographies₹
199
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''मुम्बई की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, दो ख़ास अध्यायों के बिना वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। पहला धर्मवीर भारती का 'धर्मयुग' अध्याय, और दूसरा धीरेन्द्र अस्थाना का 'सबरंग' अध्याय। मैं अगर कहूँ कि 'सबरंग' ने सप्ताह में महज़ एक ही दिन का अपना साथ देकर दैनिक 'जनसत्ता' को मुम्बई में जमाया, तो ग़लत नहीं होगा...मुम्बई है ही ऐसी जगह जो किसी भी संवेदनशील रचनात्मक कलाकार मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती। परिणाम देखा जा सकता है कि उर्दू के मंटो, बेदी, इस्मत, कृश्न चन्दर और हिन्दी के शैलेश मटियानी, राजेन्द्र अवस्थी, जगदंबाप्रसाद दीक्षित, गोविन्द मिश्र, सत्येन्द्र शरत और महावीर अधिकारी से लेकर धीरेन्द्र अस्थाना तक ने मुम्बई को केन्द्र में रखकर बेहतरीन साहित्य की रचना की। धीरेन्द्र ने मुम्बई की महानगरीय त्रासदियों, अजनबियतों, व्यावसायिक मानसिकताओं और व्यवहारकुशलताओं को अगर नहीं बख्शा तो यहाँ की उदारताओं, उन्मुक्तताओं, संघर्षों-स्वप्नों की सफलता की सम्भावनाओं, उपलब्धियों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया। मुम्बई के असर में लिखी गई उनकी कुछ रचनाएँ हैं—'उस रात की गन्ध’, 'नींद के बाहर', 'मेरी फर्नांडिस, क्या तुम तक मेरी आवाज़ पहुँचती है', 'उस धूसर सन्नाटे में', 'पिता' और उपन्यास 'देशनिकाला'। आलोक भट्टाचार्य 'धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकलकर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे ख़ुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है। धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक़सान भी उठाता है।'
Read moreAbout the Book
''मुम्बई की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, दो ख़ास अध्यायों के बिना वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। पहला धर्मवीर भारती का 'धर्मयुग' अध्याय, और दूसरा धीरेन्द्र अस्थाना का 'सबरंग' अध्याय। मैं अगर कहूँ कि 'सबरंग' ने सप्ताह में महज़ एक ही दिन का अपना साथ देकर दैनिक 'जनसत्ता' को मुम्बई में जमाया, तो ग़लत नहीं होगा...मुम्बई है ही ऐसी जगह जो किसी भी संवेदनशील रचनात्मक कलाकार मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती। परिणाम देखा जा सकता है कि उर्दू के मंटो, बेदी, इस्मत, कृश्न चन्दर और हिन्दी के शैलेश मटियानी, राजेन्द्र अवस्थी, जगदंबाप्रसाद दीक्षित, गोविन्द मिश्र, सत्येन्द्र शरत और महावीर अधिकारी से लेकर धीरेन्द्र अस्थाना तक ने मुम्बई को केन्द्र में रखकर बेहतरीन साहित्य की रचना की। धीरेन्द्र ने मुम्बई की महानगरीय त्रासदियों, अजनबियतों, व्यावसायिक मानसिकताओं और व्यवहारकुशलताओं को अगर नहीं बख्शा तो यहाँ की उदारताओं, उन्मुक्तताओं, संघर्षों-स्वप्नों की सफलता की सम्भावनाओं, उपलब्धियों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया। मुम्बई के असर में लिखी गई उनकी कुछ रचनाएँ हैं—'उस रात की गन्ध’, 'नींद के बाहर', 'मेरी फर्नांडिस, क्या तुम तक मेरी आवाज़ पहुँचती है', 'उस धूसर सन्नाटे में', 'पिता' और उपन्यास 'देशनिकाला'।
आलोक भट्टाचार्य
'धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकलकर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे ख़ुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है। धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक़सान भी उठाता है।'
Book Details
-
ISBN9788126729999
-
Pages180
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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साल 1987; दिन 22 मई; समय तक़रीबन आधी रात। ग़ाज़ियाबाद से सिर्फ़ पन्द्रह-बीस किलोमीटर दूर मकनपुर गाँव की नहर के किनारे आज़ाद भारत का सबसे भयावह हिरासती हत्याकांड हुआ था। पी.ए.सी. ने मेरठ के हाशिमपुरा मुहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को यहाँ नहर की पटरी पर लाकर मार दिया था। विभूति नारायण राय उस समय गाजियाबाद के पुलिस कप्तान थे।
यह पुस्तक लेखक द्वारा उसी समय लिए गए एक संकल्प का नतीजा है, जब वे धर्मनिरपेक्ष भारत की विकास-भूमि पर अपने लेखकीय और प्रशासनिक जीवन के सबसे जघन्य दृश्य के सम्मुख थे। साम्प्रदायिक दंगों की धार्मिक-प्रशासनिक संरचना पर गहरी निगाह रखनेवाले, और ‘शहर में कर्फ़्यू’ जैसे अत्यन्त संवेदनशील उपन्यास के लेखक विभूति जी ने इस घटना को भारतीय सत्ता-तंत्र और भारतवासियों के परस्पर सम्बन्धों के लिहाज़ से एक निर्णायक और उद्घाटनकारी घटना माना और इस पर प्रामाणिक तथ्यों के साथ लिखने का फ़ैसला लिया जिसका नतीजा यह पुस्तक है।
यह सिर्फ़ उस घटना का विवरण भर नहीं है, उसके कारणों और उसके बाद चले मुक़दमे और उसके फ़ैसले के नतीजों को जानने की कोशिश भी है। इसमें दु:ख है, चिन्ता है, आशंका है, और उस ख़तरे को पहचानने की इच्छा भी है जो इस तरह की घटनाओं के चलते हमारे समाज और देश की सामूहिकता के सामने आ सकता है—घृणा, अविश्वास और हिंसा का चहुँमुखी प्रसार।
उम्मीद करते हैं कि इस किताब को पढ़ने के बाद हम एक सभ्य नागरिक समाज के रूप में अपने आस-पास पसरते इस ख़तरे के प्रति सतर्क होंगे और इसे रोकने का संकल्प लेंगे, जिसके कारण हाशिमपुरा जैसे कांड वैधता पाते हैं।
Alap aur Antrang
- Author Name:
Govind Prasad
- Book Type:

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Description:
संवाद-संलाप—समाज से, अपने बीते हुए से, अपने आज से और अन्ततः अपने आप से—अपने के भी अपने से। उस अपने से जो दिन-रात समय की गर्दिश में तिल-तिल मिटता है, बनता है और इसी मिटने-बनने की प्रक्रिया में कहीं अपने समय और अपने समाज की धड़कनों को कुछ और क़रीब से सुन पाता है—यही गोचर-अगोचर सृष्टि का भीतर से सुनना—आलाप और अन्तरंग है। संवाद-संलाप में गुँथे होने के बावजूद विच्छिन्न चिन्तन से भरा यह स्वर-आलाप। स्वगत संवाद और एकालाप से लेकर संवाद-संलाप की व्याकुलता-भरी बहुवर्णी छवियाँ और भंगिमाएँ इसी आलाप की संस्कृति का आईना हैं। एक प्रकार से आलाप में आकार लेता राग का अन्तरंग...। इसी दुनिया में रहते हुए कब किसी और दुनिया(यह ‘और’ दुनिया दूसरी अथवा पराई नहीं बल्कि यह ‘और’ तो कहीं ज़्यादा अपनी है...अपने से भी ज़्यादा अपनी) में चला जाता हूँ; कोई है मुझ में जो मुझसे सवाल-दर-सवाल करता चला जाता है, कोई है मुझमें जो टूट-टूट कर अपने को फिर-फिर गढ़ता जाता है..., कोई है मुझमें जो रक्तस्नात-सा मेरी आँखों के सामने हर घड़ी मूर्तिवत् छाया रहता है...उसकी और उसमें समाई न जाने किस-किस की आर्त पुकार लगातार मेरा पीछा करती है—इसी आर्त पुकार से उपजे कुछ भाव-विचारों के अग्नि-स्फुलिंग चटक कर बिखर गए हैं—किसी टूटे हुए तारे की तरह। गोया टूटे हुए तारों का आलाप...टूटे हुए तारों की क्षणिक कौंध का यह बिखरा-बिखरा सिमटा हुआ-सा हुजूम...इस कौंध में जो जितना रोशन हो गया मेरे अघाए मन ने अधीत भाव से उसे प्रसादवत् ग्रहण कर लिया।
—इसी पुस्तक से
Yugon Ka Yatri : Nagarjun Ki Jeewani
- Author Name:
Taranand Viyogi
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- Description: मिथिला के बन्द समाज से बाहर निकलकर नागार्जुन ने अपनी तमाम रचनाओं और सहज सुलभ व्यक्तित्व से एक ऐसा जागरण किया जिसकी आज पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरत है। वे सच्चे अर्थों में क्लैसिकल मॉडर्न थे। तारानन्द वियोगी की यह जीवनी पाठक को नागार्जुन के अन्त:करण में प्रवेश कराने में सक्षम है। उनके घने साहचर्य में जो रहे हैं, वे इसे पढ़कर बाबा की उपस्थिति फिर से अपने भीतर महसूस करेंगे। अपनी सशक्त लेखनी से तारानन्द ने बाबा नागार्जुन को पुनर्जीवित कर दिया है। यहाँ तथ्य और सत्य का सन्तुलित समन्वय है। बाबा से जुड़े शताधिक जनों के अनुभव उन्होंने बड़ी सहृदयता से अन्तर्ग्रथित किए हैं। बाबा नागार्जुन को संसार से विदा हुए बीस वर्ष से ज़्यादा हुए। इस बीच हिन्दी-मैथिली की जो तरुण पीढ़ी आई है, वह भी इस कृति से बाबा नागार्जुन का सम्पूर्ण साक्षात्कार कर सकेगी। बाबा के बारे में एक जगह लेखक ने लिखा है, 'स्मृति, दृष्टान्त और अनुभव का ज़खीरा था उनके पास।' तारानन्द की इस जीवनी में भी ये तीनों बातें आद्यन्त मौजूद हैं। बाबा के जीवन-सृजन पर यह बहुत रचनात्मक, ऐतिहासिक महत्त्व का कार्य सम्पन्न हो सका है। मैं इतना ही कहूँगा कि बाबा की ऐसी प्रामाणिक जीवनी मैं भी नहीं लिख पाता। ‘युगों का यात्री' हिन्दी की कुछ सुप्रसिद्ध जीवनियों की शृंखला की अद्यतन सशक्त कड़ी है। —वाचस्पति, वाराणसी (दशकों तक नागार्जुन के क़रीब रहे अध्येता समीक्षक)
Samkaaleenon Se Samvad
- Author Name:
Vijay Bahadur Singh
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- Description: Book
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