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Zindagi Ka Kya Kiya

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'मुम्बई की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, दो ख़ास अध्यायों के बिना वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। पहला धर्मवीर भारती का 'धर्मयुग' अध्याय, और दूसरा धीरेन्द्र अस्थाना का 'सबरंग' अध्याय। मैं अगर कहूँ कि 'सबरंग' ने सप्ताह में महज़ एक ही दिन का अपना साथ देकर दैनिक 'जनसत्ता' को मुम्बई में जमाया, तो ग़लत नहीं होगा...मुम्बई है ही ऐसी जगह जो किसी भी संवेदनशील रचनात्मक कलाकार मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती। परिणाम देखा जा सकता है कि उर्दू के मंटो, बेदी, इस्मत, कृश्न चन्दर और हिन्दी के शैलेश मटियानी, राजेन्द्र अवस्थी, जगदंबाप्रसाद दीक्षित, गोविन्द मिश्र, सत्येन्द्र शरत और महावीर अधिकारी से लेकर धीरेन्द्र अस्थाना तक ने मुम्बई को केन्द्र में रखकर बेहतरीन साहित्य की रचना की। धीरेन्द्र ने मुम्बई की महानगरीय त्रासदियों, अजनबियतों, व्यावसायिक मानसिकताओं और व्यवहारकुशलताओं को अगर नहीं बख्शा तो यहाँ की उदारताओं, उन्मुक्तताओं, संघर्षों-स्वप्नों की सफलता की सम्भावनाओं, उपलब्धियों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया। मुम्बई के असर में लिखी गई उनकी कुछ रचनाएँ हैं—'उस रात की गन्ध’, 'नींद के बाहर', 'मेरी फर्नांडिस, क्या तुम तक मेरी आवाज़ पहुँचती है', 'उस धूसर सन्नाटे में', 'पिता' और उपन्यास 'देशनिकाला'।'' —आलोक भट्टाचार्य ''धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकलकर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे ख़ुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है। धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक़सान भी उठाता है।'

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'मुम्बई की हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, दो ख़ास अध्यायों के बिना वह पूर्ण नहीं हो सकेगा। पहला धर्मवीर भारती का 'धर्मयुग' अध्याय, और दूसरा धीरेन्द्र अस्थाना का 'सबरंग' अध्याय। मैं अगर कहूँ कि 'सबरंग' ने सप्ताह में महज़ एक ही दिन का अपना साथ देकर दैनिक 'जनसत्ता' को मुम्बई में जमाया, तो ग़लत नहीं होगा...मुम्बई है ही ऐसी जगह जो किसी भी संवेदनशील रचनात्मक कलाकार मन पर अपना गहरा प्रभाव छोड़े बिना नहीं रहती। परिणाम देखा जा सकता है कि उर्दू के मंटो, बेदी, इस्मत, कृश्न चन्दर और हिन्दी के शैलेश मटियानी, राजेन्द्र अवस्थी, जगदंबाप्रसाद दीक्षित, गोविन्द मिश्र, सत्येन्द्र शरत और महावीर अधिकारी से लेकर धीरेन्द्र अस्थाना तक ने मुम्बई को केन्द्र में रखकर बेहतरीन साहित्य की रचना की। धीरेन्द्र ने मुम्बई की महानगरीय त्रासदियों, अजनबियतों, व्यावसायिक मानसिकताओं और व्यवहारकुशलताओं को अगर नहीं बख्शा तो यहाँ की उदारताओं, उन्मुक्तताओं, संघर्षों-स्वप्नों की सफलता की सम्भावनाओं, उपलब्धियों को भी नज़रअन्दाज़ नहीं किया। मुम्बई के असर में लिखी गई उनकी कुछ रचनाएँ हैं—'उस रात की गन्ध’, 'नींद के बाहर', 'मेरी फर्नांडिस, क्या तुम तक मेरी आवाज़ पहुँचती है', 'उस धूसर सन्नाटे में', 'पिता' और उपन्यास 'देशनिकाला'।''

—आलोक भट्टाचार्य

''धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकलकर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे ख़ुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है। धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक़सान भी उठाता है।'

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2017
Weight
202 grams
ISBN-13
9788126729999
Pages
180
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 21.5 cm
Language
Hindi

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