Pratinidhi Kahaniyan : Ajneya
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रचनाकर्म को अर्थवत्ता की खोज से जुड़ा मानने वाले अज्ञेय की कहानियाँ प्रचलित अर्थों में ‘यथार्थ’ से क़रीबी जताती भले ही मालूम न पड़ती हों लेकिन, उनके ही शब्दों में कहें तो, अर्थवत्ता की खोज की मानवीय जिजीविषा को वे सूक्ष्मता से उद्घाटित करती हैं। उनका यथार्थ-बोध बाहरी दृश्य-जगत के बजाय आन्तरिक सत्य पर अधिक आश्रित है, मानवीय जीवन-सन्दर्भ से परे कहानी के सन्दर्भ की स्वतंत्र सत्ता को वे स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि व्यक्ति-वैशिष्ट्य केन्द्रित है, वह सामाजिकता की विरोधी नहीं है। वस्तुतः जिस दौर में हिन्दी कहानी-लेखन में ‘यथार्थ’ से जुड़ाव और उसका चित्रण ही श्रेष्ठता की कसौटी समझा जा रहा था, उसी दौर में अज्ञेय ने अपनी कहानियों में यथार्थ को सामाजिकता की सतही सीमा तक सीमित न मानकर वैयक्तिक संवेदनाओं के आधार पर उसको रचने या परखने को प्राथमिकता दी। दुर्भाग्य से इसे सामाजिक चेतना के अभाव के रूप में देखा गया। यह उनकी रचनात्मकता का सही आकलन नहीं था। यह ऐसा अवरोध था जिसको हटाए बिना उनकी कहानियों के मर्म तक पहुँचना सम्भव नहीं हो सकता। आज के कथित उत्तर-आधुनिक बल्कि अधुनान्तिक समय में अज्ञेय की कहानियाँ मानवीय जीवन के ऐसे अनेक प्रासंगिक पहलुओं की तरफ ध्यान दिलाती हैं जिन्हें अतीत की रूढ़ बहसों से फैले धुन्ध में देखना कठिन था।
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रचनाकर्म को अर्थवत्ता की खोज से जुड़ा मानने वाले अज्ञेय की कहानियाँ प्रचलित अर्थों में ‘यथार्थ’ से क़रीबी जताती भले ही मालूम न पड़ती हों लेकिन, उनके ही शब्दों में कहें तो, अर्थवत्ता की खोज की मानवीय जिजीविषा को वे सूक्ष्मता से उद्घाटित करती हैं। उनका यथार्थ-बोध बाहरी दृश्य-जगत के बजाय आन्तरिक सत्य पर अधिक आश्रित है, मानवीय जीवन-सन्दर्भ से परे कहानी के सन्दर्भ की स्वतंत्र सत्ता को वे स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि व्यक्ति-वैशिष्ट्य केन्द्रित है, वह सामाजिकता की विरोधी नहीं है। वस्तुतः जिस दौर में हिन्दी कहानी-लेखन में ‘यथार्थ’ से जुड़ाव और उसका चित्रण ही श्रेष्ठता की कसौटी समझा जा रहा था, उसी दौर में अज्ञेय ने अपनी कहानियों में यथार्थ को सामाजिकता की सतही सीमा तक सीमित न मानकर वैयक्तिक संवेदनाओं के आधार पर उसको रचने या परखने को प्राथमिकता दी। दुर्भाग्य से इसे सामाजिक चेतना के अभाव के रूप में देखा गया। यह उनकी रचनात्मकता का सही आकलन नहीं था। यह ऐसा अवरोध था जिसको हटाए बिना उनकी कहानियों के मर्म तक पहुँचना सम्भव नहीं हो सकता। आज के कथित उत्तर-आधुनिक बल्कि अधुनान्तिक समय में अज्ञेय की कहानियाँ मानवीय जीवन के ऐसे अनेक प्रासंगिक पहलुओं की तरफ ध्यान दिलाती हैं जिन्हें अतीत की रूढ़ बहसों से फैले धुन्ध में देखना कठिन था।
Book Details
-
ISBN9789360864699
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विचार का आईना शृंखला के अन्तर्गत ऐसे साहित्यकारों, चिन्तकों और राजनेताओं के ‘कला साहित्य संस्कृति’ केन्द्रित चिन्तन को प्रस्तुत किया जा रहा है जिन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। इसके पहले चरण में हम मोहनदास करमचन्द गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, राममनोहर लोहिया, रामचन्द्र शुक्ल, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा, सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और गजानन माधव मुक्तिबोध के विचारपरक लेखन से एक ऐसा मुकम्मल संचयन प्रस्तुत कर रहे हैं जो हर लिहाज से संग्रहणीय है।
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ ऐसे लेखक हैं जो परम्परा और आधुनिकता, पूरब और पश्चिम के सन्धि-बिन्दु पर खड़े दिखाई देते हैं। लगभग मिथकीय जीवन जीनेवाले अज्ञेय क्रांतिकारी, सैनिक, अध्यापक, अधिकारी और सम्पादक का जीवन जीते हुए उसी के समानान्तर कवि, कथाकार, उपन्यासकार, अनुवादक और निबन्धकार भी रहे। जैसे उनके व्यक्तित्व में बहुत सारी तहें शामिल थीं वैसे ही उनके रचनाकार की भी बहुत सारी पर्तें रहीं और वे सभी रूपों में अद्वितीय रहे। बतौर सम्पादक उन्होंने हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता को दिशा देने का काम किया। वे व्यक्ति-स्वातंत्र्य के प्रबल पक्षधर होते हुए भी समष्टि के हामी थे। हमें उम्मीद है कि उनके कला, साहित्य और संस्कृति सम्बन्धी प्रतिनिधि निबन्धों की यह किताब अपने पाठकों को वह बौद्धिक संतुष्टि देने में सफल रहेगी जिसके लिए अज्ञेय जाने जाते हैं।
Pratinidhi Kavitayein : Ajneya
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Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
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सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ भारतीय साहित्य इतिहास के सबसे चर्चित और लोकप्रिय कवियों में हैं। पिछली शताब्दी के अनेक साहित्य आन्दोलन और प्रवृत्तियों का केन्द्र रहे कवि अज्ञेय का व्यक्तित्व समर्थ कथाकार और आलोचक का भी है। कविता उनके व्यक्तित्व का केन्द्र बिन्दु है। वे व्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता को सबसे अधिक महत्त्व देते थे। भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में भी सक्रिय रहे कवि अज्ञेय का कृतित्व 1930 के आसपास प्रारम्भ होकर उनके निधन 1987 तक चलता है। उनके अनेक कविता-संग्रह हिन्दी की श्रेष्ठ कृतियों में अग्रगण्य हैं। अज्ञेय की कविताओं पर मनोविश्लेषण, अस्तित्ववाद, आधुनिकता और गैर रूमानियत का असर देखा जाता है। धर्म मुक्त आध्यात्मिकता भी उनके काव्य में मौजूद रहस्यवाद का एक पक्ष है। राजकमल प्रकाशन की प्रतिनिधि कविताएँ शृंखला में अज्ञेय की यह पुस्तक पाठकों को उनके काव्य के श्रेष्ठतम का आस्वाद देगी।
Pratinidhi Kavitayein : Ajneya
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya'
20% off₹ 199
₹ 159.2
Available
Ajneya Ki Lokpriya Kahaniyan
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Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya'
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कुशीनगर (देवरिया) में सन् 1911 में जन्म। पहले बारह वर्ष की शिक्षा पिता (डॉ. हीरानंद शास्त्री) की देख-रेख में घर ही पर। आगे की पढ़ाई मद्रास और लाहौर में। एम.ए. अंग्रेजी में प्रवेश, किंतु तभी देश की आजादी के लिए एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन में शामिल होना। शिक्षा में बाधा तथा सन् ’30 में बम बनाने के आरोप में गिरफ्तारी। जेल में रहकर ‘चिंता’ और ‘शेखर : एक जीवनी’ की रचना। क्रमशः सन् ’36-37 में ‘सैनिक’, ‘विशाल भारत’ का संपादन। सन् ’43 से ’46 तक ब्रिटिश सेना में भर्ती। सन् ’47-50 तक ऑल इंडिया रेडियो में काम। सन् ’43 में ‘तार सप्तक’ का प्रवर्तन और संपादन। क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे सप्तक का संपादन। ‘प्रतीक’, ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘वाक्’, ‘एवरीमैन’ पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से पत्रकारिता में नए प्रतिमानों की सृष्टि। देश-विदेश की अनेक यात्राएँ, जिनसे भारतीय सभ्यता की सूक्ष्म पहचान और पकड़, विदेश में भारतीय साहित्य और संस्कृति का अध्यापन। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, जिनमें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ सन् ’79, यूगोस्लाविया का अंतरराष्ट्रीय कविता सम्मान ‘गोल्डन रीथ’ सन् ’83 भी शामिल। सन् ’80 से वत्सल निधि के संस्थापन और संचालन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति के बोध निर्माण में कई नए प्रयोग। अज्ञेय का संपूर्ण रचना-संसार डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में प्रकाशित है।
Ajneya Ki Lokpriya Kahaniyan
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya'
20% off₹ 350
₹ 280
Available
Halant
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Hrishikesh Sulabh
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हृषीकेश सुलभ के कथा संकलन ‘हलंत’ की कहानियाँ हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा का विकास प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों में भारतीय समाज की परम्परा, जीवनदृष्टि, समसामयिक यथार्थ और चिन्ताओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ विकृतियों और विसंगतियों का भी चित्रण है। मनुष्य की सत्ता और प्रवृत्ति की भीतरी दुर्गम राहों से गुज़रते हुए भविष्य के पूर्वाभासों और संकेतों को रेखांकित करने की कलात्मक कोशिश इन कहानियों की अलग पहचान बनती है। यथार्थ के अन्त:स्तरों के बीच से ढेरों ऐसे प्रसंग स्वत:स्फूर्ति उगते चलते हैं, जो हमारे जीवन की मार्मिकता को विस्तार देते हैं। संचित अतीत की ध्वनियाँ यहाँ संवेदन का विस्तार करती हैं और इसी अतीत की समयबद्धता लाँघकर यथार्थ जीवन की विराटता को रचता है।
हृषीकेश सुलभ की कहानियाँ भाषा और शिल्प के स्तर पर नए भावबोधों के सम्प्रेषण की नई प्रविधि विकसित करती हैं। नई अर्थछवियों को उकेरने के क्रम में इन कहानियों का शिल्प पाठकों को कहीं आलाप की गहराई में उतारता है, तो कहीं लोकलय की मार्मिकता से सहज ही जोड़ देता है। जीवन के स्पन्दन को कथा-प्रसंगों में ढालती और जीवन की संवेदना को विस्तृत करती ये कहानियाँ पाठकों से आत्मीय और सघन रिश्ता बनाती हैं।
हृषीकेश सुलभ के कथा-संसार में एकान्त के साथ-साथ भीड़ की हलचल भी है। सपनों की कोमल छवियों के साथ चिलचिलाती धूप का सफ़र है। पसीजती हथेलियों की थरथराहट है, तो विश्वास से लहराते हाथों की भव्यता भी है। भावनाओं और संवेदनाओं के माध्यम से अपना आत्यन्तिक अर्थ अर्जित करती इन कहानियों में क्रूरता और प्रपंच के बीच भी जीवन का बिरवा उग आता है, जो मनुष्य की संवेदना के उत्कर्ष और जिजीविषा की उत्कटता को रेखांकित करता है।
Vasant Ke Hatyare
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Hrishikesh Sulabh
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हृषीकेश सुलभ के कथा-संकलन ‘वसंत के हत्यारे’ की कहानियाँ हिन्दी की यथार्थवादी कथा-परम्परा का विकास प्रस्तुत करती हैं। इन कहानियों में भारतीय समाज की परम्परा, जीवन-दृष्टि, समसामयिक यथार्थ और चिन्ताओं की अभिव्यक्ति के साथ-साथ विकृतियों और विसंगतियों का भी चित्रण है। मनुष्य की सत्ता और प्रवृत्ति की भीतरी दुर्गम राहों से गुज़रते हुए भविष्य के पूर्वाभासों और संकेतों को रेखांकित करने की कलात्मक कोशिश इन कहानियों की अलग पहचान बनाती है। यथार्थ के अन्तःस्तरों के बीच से ढेरों ऐसे प्रसंग स्वतःस्फूर्त उगते चलते हैं, जो हमारे जीवन की मार्मिकता को विस्तार देते हैं। संचित अतीत की ध्वनियाँ यहाँ संवेदन का विस्तार करती हैं और इसी अतीत की समयबद्धता लाँघकर यथार्थ जीवन की विराटता को रचता है।
हृषीकेश सुलभ की कहानियाँ भाषा और शिल्प के स्तर पर नए भावबोधों के सम्प्रेषण की नई प्रविधि विकसित करती हैं। नई अर्थच्छवियों को उकेरने के क्रम में इन कहानियों का शिल्प पाठको को कहीं आलाप की गहराई में उतारता है, तो कहीं लोकलय की मार्मिकता से सहज ही जड़ देता है। जीवन के स्पन्दन को कथा-प्रसंगों में ढालती और जीवन की संवेदना को विस्तारित करती ये कहानियाँ पाठकों से आत्मीय और सघन रिश्ता बनाती हैं।
हृषीकेश सुलभ के कथा-संसार में एकान्त के साथ-साथ भीड़ की हलचल भी है। सपनों की कोमल छवियों के साथ चिलचिलाती धूप का सफ़र है। पसीजती हथेलियों की थरथराहट है, तो विश्वास से लहराते हाथों की भव्यता भी है। भावनाओं और संवेदनाओं के माध्यम से अपना आत्यन्तिक अर्थ अर्जित करती इन कहानियों में क्रूरता और प्रपंच के बीच भी जीवन का बिरवा उग आता है, जो मनुष्य की संवेदना के उत्कर्ष और जिजीविषा की उत्कटता को रेखांकित करता है।
Tuti Ki Aawaz
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Hrishikesh Sulabh
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हृषीकेश सुलभ की कहानियाँ तेज़ी से बदले और बदलते हुए समाज की कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ उन कारकों की गहरी और सघन पहचान करती हैं जिनके कारण, आज के समय में, आदमी तुच्छ और अपदार्थ हुआ है। उनकी कहानियाँ पढ़कर प्राय: ही भीष्म साहनी और अमरकान्त की बहुत-सी कहानियाँ याद आती हैं। हृषीकेश सुलभ की कहानियाँ एक ओर यदि राजनीति में मनुष्य की स्थिति और नियति को परिभाषित करती हैं, वहीं वे एक कारक के रूप में साम्प्रदायिकता के उभार को भी पर्याप्त बेधक दृष्टि से देखती हैं।
ये कहानियाँ उनके तीन संग्रहों में छपकर अब एकाग्र रूप से यहाँ संकलित हैं। यहाँ कहानियों का क्रम आगे से पीछे की ओर है—यानी बाद की कहानियाँ पहले दी गई हैं और पहले की बाद में। लेकिन कहानियों के लेखन-प्रकाशन वर्ष की चिन्ता के बिना भी इनके पाठ में कलागत कोई बड़ा अन्तर सामान्यत: पकड़ में नहीं आता। यहाँ किसी लेखक की अभ्यास के लिए लिखित आरम्भिक कहानियों जैसा कुछ नहीं है। इन कहानियों की रेंज बड़ी और व्यापक है—पत्रकारिता, स्त्री-यातना के प्रसंग, रंगमंच की दुनिया, दलित चेतना का उभार आदि से मिलकर इन कहानियों की दुनिया बनती है।
हृषीकेश सुलभ की कहानियों की भाषा अपने पात्रों और उनके परिवेश से गहरे जुड़ी भाषा का उदाहरण है। बिम्ब, प्रतीक और दूसरे काव्योपकरणों के इस्तेमाल में न सिर्फ़ यह कि वे कोई परहेज़ नहीं बरतते, बहुत सजगता से वे इन्हें सहेजते और सँवारते हैं। किरणें यहाँ फुदकती हुई ओसकणों को चुगती हैं। इसी तरह जाड़े की धूप के टुकड़े पक्षियों की तरह फुदकते हैं। इन कहानियों की भाषा की सबसे बड़ी सफलता संवादों में दिखाई देती है। एक दूसरे में घुलती और एकाकार होती ब्योरों और संवाद की यह भाषा इन कहानियों की पठनीयता को आश्चर्यजनक उठान देती है। बदलते हुए समय का अक्स इन कहानियों में एहतियात से रखे गए साफ़ शीशे में झलकते अक्स की तरह देखा और पढ़ा जा सकता है।
—मधुरेश
Pratinidhi Kahaniyan : Hrishikesh Sulabh
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Hrishikesh Sulabh
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“अपनी कहानियों पर बात करना मेरे लिए कठिन काम है। बहुत हद तक अप्रिय भी। लिखी जा चुकी और प्रकाशित हो चुकी कहानियों से अक्सरहाँ मैं पीछा छुड़ाकर भाग निकलता हूँ, पर मुझे लगता है कि यह मेरा भ्रम ही है। मेरी कहानियों के कुछ पात्र लगातार मेरा पीछा करते हैं और अपनी छवि बदलकर, किसी लिखी जा रही नई कहानी में घुसने की बार-बार कोशिशें करते हैं। कई बार तो घुस भी आते हैं और मैं उन्हें न रोक पाने की अपनी विवशता पर हाथ मलते रह जाता हूँ। जैसे, ‘वधस्थल से छलाँग’ का रामप्रकाश तिवारी, जो ‘यह ग़म विरले बूझे’ या ‘काबर झील का पाखी’ जैसी कहानियों में घुस आया। मैंने अपनी कहानियों में प्रवेश के लिए किसी एक रास्ते का चुनाव नहीं किया। हर कहानी में प्रवेश के लिए मेरी राह बदल जाती है। कभी किसी पात्र की बाँह पकड़कर प्रवेश करता हूँ, तो कभी कोई घटना या व्यवहार या स्मृति या विचार कहानी के भीतर पैठने के लिए मेरी राहों की निर्मिति करते हैं। हमेशा एक अनिश्चय और अनिर्णय की स्थिति बनी रहती है। हर बार नई कहानी शुरू करने से पहले मेरा मन थरथर काँपता है। शायद यही कारण है कि बहुत कम कहानियाँ लिख सका हूँ। मेरे कुछ मित्रों का मानना है कि कहानी और नाटक लिखने के बीच आवाजाही के कारण मेरी कहानियों पर आलोचकों की नज़र नहीं पड़ी। पर यह सच है कि नाटक और कहानी के बीच मेरी यह आवाजाही मुझे बहुत प्रिय है। हर बार नौसिखुए की तरह अथ से आरम्भ करना मुझे पुनर्नवा करता है। मैं यह करते रहना चाहता हूँ।” —भूमिका से
Joothi Gali
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Hrishikesh Sulabh
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‘जूठी गली’ जीवनानुभव का एक ऐसा लोक है जिसके भीतर वर्तमान की आँधी में इतिहास की धूल और राख उड़ती रहती है। जब अठारहवीं सदी के आरम्भ में पटना का नाम अज़ीमाबाद हुआ, उन्हीं दिनों जूठी गली की नींव पड़ी थी। उन दिनों से अब तक यह गली ज़िन्दा है। लोग जनमते और विदा होते रहे, मकान बिकते-ढहते-बनते रहे, जूठी गली अपना रूप बदलती रही और किसी ज़िन्दा इनसान की तरह धड़कती रही। इसके बाशिन्दे ख़बरों के रसिया हैं। ख़बरें इस गली में हवा के पर लगाकर उड़ती हैं। जन्म और मृत्यु दोनों के लिए यहाँ समान भाव से सुख-दुःख उपजता है। प्रेम और नफ़रत एक ही बटुए में रखकर लोग आपस में मिलते-जुलते हैं। जो ज़ुबान प्रशंसा करते नहीं थकती वह पीठ फेरते ही निन्दा रस उड़ेलने लगती है। इस गली में मध्यवर्गीय प्रपंचों के कीचड़ में लिथड़कर जीती स्त्रियों के साथ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जो पुरुषों के वर्चस्व को चुनौती देती हैं और परिदृश्य बदल जाता है। राजनीति ने अपने नाख़ूनों के खरोचों से जूठी गली को जो घाव दिए हैं, लोग उन्हें सहलाते हुए जीते हैं। इस गली में जाति-दंश की ज़हरीली हवा बहती है। प्रेम करनेवाले यहाँ सम्मान नहीं, हँसी के पात्र हैं। हृषीकेश सुलभ अपनी रचनाओं में स्वयं नहीं बोलते बल्कि उनके पात्रों का जीवन-व्यापार और परिवेश कथ्य को सघनता से प्रकट करता है। अपनी सहज भाषा की मार्मिकता और आत्मीय कहन के हुनर के सहारे वे कथा के बीहड़ में उतरते हैं और जीवन के ऐसे क्षणों को रचते हैं जो मानवीय गरिमा की रक्षा करते हैं। जूठी गली हमारे समय का जीवन्त दस्तावेज़ है।
Agnileek
- Author Name:
Hrishikesh Sulabh
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अग्निलीक’ उपन्यास आज़ादी के उत्तरार्द्ध की वह कथा है जिसके रक्त में आज़ादी के पूर्वार्द्ध यानी अठारह सौ सत्तावन के विद्रोह के गर्व की गरमाहट तो है, लेकिन अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ कभी जो हिदू-मुसलमान एक साथ लड़े थे, आज उसी ज़मीन पर बदली हुई राजनीति का खेल ऐसा कि उनके मंतव्य भी बदल गए है और मंसूबे भी। यह हिन्दी का सम्भवत: पहला उपन्यास है जिसमें हिन्दू-मुसलमान अपनी जातीय और वर्गीय ताक़त के साथ उपस्थित हैं। और यही कारण कि कथा शमशेर साँई के क़त्ल से शुरू होती है, उसकी गुत्थी मुखिया लीलाधर यादव और सरपंच अकरम अंसारी के बीच अन्तत: रहस्यमय बनी रहती है। क़ानून भी ताक़त के साथ ही खड़ा। असल में टूटते-छूटते सामन्तवाद के युग में अपने वर्चस्व को बनाए रखने की राजनीति क्या हो सकती है, इसे भावी मुखिया लीलाधर यादव की पोती रेवती के ज़रिए जिस रणनीति को लेखक ने गहराई से साधा है, उससे न सिर्फ़ बिहार को बल्कि भारतीय राजनीति में गहरी ज़ड़े जमा चुके वंशवाद को भी देखा-समझा जा सकता है। साथ ही यह भी कि इसको मज़बूत बनाने में रेशमा कलवारिन के रूप में उभरती हुई स्त्री-शक्ति का भी इस्तेमाल कितनी चालाकी से किया जा सकता है।
‘अग्निलीक’ अपने काल के घटना-क्रम में जीवन के कई मोड़ों से गुज़री रेशमा कलवारिन के साथ-साथ कई अन्य स्त्री-चरित्रों की अविस्मरणीय कथा बाँचता उपन्यास है। वह चाहे कभी प्रेम में रँगी यशोदा हो या उनकी पोती रेवती जिसके प्रेमी की उसका भाई ही अछूत होने के कारण हत्या कर देता है। सरपंच अकरम अंसारी के साथ बिन ब्याहे रहनेवाली उसी की फूफेरी बहन मुन्नी बी हो या शमशेर साँई को बेवा गुलबानो; सब अलग होते हुए भी उपन्यास को मुख्य कथा से अभिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। यह उपन्यास महात्मा गाँधी के सपनों के गाँवों का उपन्यास नहीं है, इसमें वे गाँव हैं जो ‘हिन्द स्वराज’ की क़ब्र पर खड़े हैं। यहाँ जो हैं कलाली के धंधे में हैं, गंजेड़ी-जुआरी भी हैं। यहाँ राजनीति में प्रतिद्वंद्वी कट्टर दुश्मन हैं। जिन्हें अपने बच्चों की शिक्षा की फिक्र है, गाँव छोड़ चुके हैं। लेकिन हाँ, यहाँ जो स्त्रियाँ हैं, वे सिर्फ भोग की वस्तु नहीं हैं, मुक्ति का साहस भी रचना जानती हैं।
अग्निलीक पुरबियों के जीवन-यथार्थ की दुर्लभ कथा है।
Daalia
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Hrishikesh Sulabh
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हृषीकेश सुलभ का नया नाटक ‘दालिया’ एक प्रेमकथा है। युद्ध, हिंसा-प्रतिहिंसा, सत्ता के मद, राजनीति के घातों-प्रतिघातों के बीच यहाँ प्रेम अंकुरित होता है। इस प्रेम की निष्कलुषता और पवित्रता में तपकर मनुष्य का अहं पिघलता है और मानवीय संवेदनाओं में ढलकर जीवन को नए अर्थ देता है। जो नैसर्गिक भावनाएँ और संवेदनाएँ जीवन की यात्रा में छूट जाती हैं या नष्ट हो जाती हैं, वे हमारे भावी जीवन के गर्भ में अपना बीज छोड़ जाती हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की कथा ‘दालिया’ के माध्यम से इस नाटक में ऐसे ही बीजों के अंकुरण का दृश्य-काव्य रचने का प्रयास किया गया है। यहाँ प्रकृति है, और है प्रकृति से मनुष्य के गहन और आत्मीय सम्बन्ध की रूप-छवियाँ। यह नाटक गहन एकान्त के बीच भीड़ के कलरव और भीड़ के बीच एकान्त की नीरवता की तलाश है। यहाँ इतिहास पारम्परिक रूप में उपस्थित नहीं है। यहाँ इतिहास के पगचिह्न हैं और इन्हीं पगचिह्नों के सहारे नाटक के चरित्र अपनी यात्रा पर निकलते हैं। कहानी में जो प्रकट है, उससे इतर जो प्रच्छन्न है, वही इस नाटक का केन्द्रीय कथ्य बनता है।
इसकी भाषिक संरचना इसके कथ्य को काव्यात्मक विस्तार देती है और साथ ही इसकी संरचना में ऐसी लोच-लचक है जिससे निर्देशक और अभिनेता को पर्याप्त स्पेस मिलता है, ताकि वे अपने समय और समाज की प्रतिध्वनियाँ रच सकें और जीवन की नई अर्थछवियाँ उकेर सकें। हृषीकेश सुलभ का यह नया नाटक भारतीय रंगमंच को नई रंगभाषा और नए मुहावरे देता है और भारतीय रंग परम्परा का पुनराविष्कार करते हुए निर्देशक को रंगचर्या तथा अभिनेताओं को अभिनटन के लिए पर्याप्त अवसर देता है।
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