ANUBHAV KE BOL
Author:
Ramji BhaiPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
परिवार और समाज प्रबोधन में कथाओं का विशेष महत्त्व है। अनेक गुण एवं जीवन-मूल्य कहानियों के माध्यम से समाज और व्यक्तियों के जीवन में उतरते हैं।
महापुरुष, संत या समाज के प्रभावी लोगों की कथाओं की एक विस्तृत-विलक्षण धारा भारत में है, किंतु कभी-कभी सहज, सरल, निरक्षर या कभी-कभी तो बालकों की कहानियाँ भी बड़ी प्रेरणादायक और दिशा-दर्शक होती हैं, ऐसा सभी का व्यापक अनुभव है। वेद और उपनिषदों में उल्लिखित अनेक महत्त्व के तत्त्व एवं सत्य को सामान्य लोगों तक पहुँचाने के उद्देश्य से अपने यहाँ पुराणों की रचना की गई है। संत, महात्मा या कथाकार द्वारा रोचक कहानियों के माध्यम से वेद और उपनिषदों में निहित गहन तत्त्व जनसामान्य तक पहुँचाने की परंपरा आज भी चल रही है।
‘अनुभव के बोल’ संग्रह की कहानियाँ परिवार-प्रबोधन और लोक-प्रबोधन की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी। अनेक कहानियाँ पढ़ते समय हृदय को झकझोरती हैं, छू जाती हैं, आँखें नम कर जाती हैं। जिन महान् जीवन-मूल्यों के कारण मानवता समृद्ध होती है, ऐसे चिरकाल तक चलनेवाले समयातीत मूल्यों की शिक्षा सहज ही इन कहानियों को पढ़ने से होगी।
ISBN: 9789390378968
Pages: 176
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: 'दस्तखत' राम कुमार आत्रेय रचित लघुकथाओं का संकलन है जिसमें 64 कहानियाँ हैं। आत्रेय जी की लघुकथाएँ 'गागर में सागर' लोकोक्ति को चरितार्थ करती हुई प्रतीत होती हैं। चंद पंक्तियों के माध्यम से ही उनकी प्रत्येक कथा एक गहरा सन्देश दे जाती है। उनकी कथाओं में विषयों की गहन व्यापकता पायी जाती है। यह कथा संकलन भी एक ऐसी ही बगिया के समान है जिसमें लगभग हर रंग का फूल उपस्थित है। 'हनीट्रैप', 'आशीर्वाद', 'धर्मगुरु और तीन चोर' जैसी लघुकथाएँ समसामयिक सामजिक मुद्दों का तीखा विश्लेषण करती हैं। 'कोयल की कूक' तथा 'और वह' कथा प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को दर्शाती हैं। उनकी कथाएँ मानवीय संवेदनाओं की गहराई को बहुत सहज सरल शब्दों में पाठकों के समक्ष रखती हैं। 'जिद', 'सलाम रिश्ता', 'पूर्णिमा का चाँद' इसका जीवंत उदाहरण हैं। 'पिताजी सीरियस हैं', 'फर्क', 'मुर्दाखोर मोबाइल', 'बूढ़ा चौकीदार' कथाएँ वर्तमान समाज में बढ़ती हुई संवेदनहीनता को दर्शाती हैं। आज के युग में मानवीय मूल्यों के पतन और भावहीन प्राणहीन मानवीय संबंधों को आत्रेय जी ने सरल से शब्दों में गंभीर कथा का रूप दिया है। हास्य बोध को प्रकट करते हुए आत्रेय जी कुछ कथाओं में समाज पर व्यंग भी करते हैं जैसे 'पैसा', 'दस्तखत', 'हनुमानजी कहाँ हैं'। आत्रेयजी की कथाएँ अपने लघु रूप में ही हमारे तथाकथित सभ्य मानव समाज के समक्ष एक विशाल प्रश्नचिह्नï प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं को पढऩे के लिए आपको अलग से समय की व्यवस्था करने की आवश्यकता नहीं है। कुछ पल अगर आपके पास हैं तो आप कोई एक लघु कथा पढ़ सकते हैं। वे कुछ पल आपको उस कथानक पर सोचने पर विवश कर देंगे, आपके मानस पर एक गहरा दस्तखत कर देंगे। आईये पढ़ते हैं—'दस्तखत' —आयाम मेहता (अभिनेता)
Sapna Nahi
- Author Name:
Gyanranjan
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Description:
ऐसे लेखक विरले ही होते हैं जिनकी रचनाएँ अपनी विधा को भी बदलती हों और उस विधा के इतिहास को भी। ज्ञानरंजन के बारे में यह बात निर्विवाद कही जा सकती है कि उनकी कहानियों के बाद हिन्दी कहानी वैसी नहीं रही जैसी कि उनसे पहले थी। उनके साथ हिन्दी गद्य का एक नया, आधुनिक, सघन और समर्थ व्यक्तित्व सामने आया जो उस दौर की भाषा में व्याप्त काव्यात्मक रूमान के बजाय काव्यात्मक सच्चाई से निर्मित हुआ था। ज्ञान की भाषा में उस पीढ़ी की भाषा थी जो भारतीय समाज में आज़ादी के महास्वप्नों के टूटने, परिवारों के बिखरने, मनुष्य के अकेला होते जाने और जीवन में अर्थहीनता के प्रवेश जैसे हादसों के बीच अपने विक्षोभ, अपनी हताशा और अपनी उम्मीद को पहचानने की बेचैन कोशिश कर रही थी। युवा होते समाज की इस आन्तरिक उथल-पुथल का इतना गहरा साक्षात्कार ज्ञानरंजन की कहानियों में मिलता है कि उनके अनेक चरित्र प्रेमचंद के कई चरित्रों की तरह हमारी स्मृति में अभिन्न रूप से शामिल हो गए। सन् साठ के बाद की हिन्दी कहानी एक महत्त्वपूर्ण प्रस्थान-बिन्दु या ‘कहानी का दूसरा इतिहास’ मानी गई और ज्ञानरंजन सामाजिक रूप से उसके सबसे बड़े रचनाकार कहे गए। लेकिन हर बड़े लेखक की तरह ज्ञानरंजन की कहानियाँ अपने दौर या समय को लाँघती गईं और इसीलिए आज भी पढ़ने पर उनकी प्राय: सभी कहानियाँ उतनी ही जीवन्त, प्रासंगिक और प्रामाणिक महसूस होती हैं। ‘क्षणजीवी’ जैसी कहानी लिखने और जीवन के निरर्थक क्षणों में अर्थ की खोज करनेवाले ज्ञानरंजन दरअसल हमारे समय के सबसे ‘दीर्घजीवी’ लेखकों में से हैं।
‘फेंस के इधर और उधर’, ‘पिता’, ‘शेष होते हुए’, ‘सम्बन्ध’, ‘यात्रा’, ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ आदि कहानियाँ जिस निम्न मध्यवर्गीय यथार्थ से मुठभेड़ के कारण प्रसिद्ध हुईं, वह भले ही बदल गया हो, लेकिन उस पर लिखी गई ये कहानियाँ कभी ‘पुरानी’ या ‘बासी’ नहीं हुईं। ज्ञानरंजन सरीखे कृती लेखक की ही यह सामर्थ्य है कि यथार्थ के पुराने पड़ जाने पर भी उसका अनुभव पुराना या समय-सापेक्ष नहीं हो जाता। बल्कि इन बहुचर्चित कहानियों में अभिव्यक्त विराट हलचल के बीच आनेवाले यथार्थ की अनेक आहटें भी हम सुन सकते हैं। संग्रह की अन्तिम और अद्भुत कहानी ‘अनुभव’ में तथाकथित उच्चवर्ग की विकृति और अश्लीलता के विवरणों में उस अपसंस्कृति का पूर्वाभास है जो आज हमारे समाज में चौतरफ़ा बजबजा रही है। वह एक स्वस्थ समाज की मृत्यु पर हिला देनेवाला शोकगीत है।
‘सपना नहीं’ ज्ञानरंजन की कालजयी कहानियों का संग्रह-भर नहीं है, यह हमारे समय का एक साहित्यिक दस्तावेज़ भी है और हमारे यथार्थ का साफ़ आईना भी है, जिसमें दिखते जीवन के बिम्ब पाठक को हमेशा उद्वेलित करते रहेंगे।
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