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पचास से अधिक वर्षों तक भारतीय राजनीति और समाज को बेहद क़रीब से देखने-समझने वाले यशस्वी पत्रकार मार्क टली की दूसरी कथाकृति है—धीमी वाली फ़ास्ट पैसेंजर। इस किताब की कहानियों के लिए वह एक बार फिर अपनी मशहूर बेस्टसेलर, द हार्ट ऑफ़ इंडिया के इलाक़े में लौटते हैं, और हमें बीती सदी के आठवें दशक के उस दौर में ले जाते हैं, जब भारत चौराहे पर था और आर्थिक उदारीकरण की बयार बहने वाली थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण दुनिया को रेखांकित करती ये कहानियाँ तमाम अविस्मरणीय लोगों की ज़िन्दगी का ख़ाका हैं—ऐसे साधारण लोग जो ढुलमुल हुकूमत, बेईमानी, भ्रष्टाचार और समाज में ऊँच-नीच जैसी ख़ामियों से पार पाने के तरीक़े खोजते हैं। सन्त रविदास का मन्दिर बनाने के लिए एक दब्बू दलित बुज़ुर्ग परम्पराओं को चुनौती देता है; एक किसान की साफ़गो और चतुर पत्नी अपने परिवार को अपने पति की मूर्खताओं से बचाती है; एक ख़त्म हो रही रेलवे लाइन का वजूद बचाने के लिए एक पूर्व प्रधानाध्यापक आम लोगों की लड़ाई का नेतृत्व करती है; एक राजनेता का बेटा इस सच से वाकिफ होता है कि राजनीति कुल मिलाकर पारिवारिक पेशा नहीं है। एक शान्तिप्रिय और निरुत्साही पुलिस सब-इंस्पेक्टर हत्या के एक हाई-प्रोफाइल मामले को सुलझाकर सबको चौंका देता है; एक अनीश्वरवादी शख़्स भिक्षु बन जाता है। धीमी वाली फ़ास्ट पैसेंजर उत्तर भारत के गाँवों में लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की हलचलों के बारे में जोश और ज़हानत, संवेदना और करुणा के नज़रिये से दर्ज की गई कहानियों का बेहद दिलकश संग्रह है।

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पचास से अधिक वर्षों तक भारतीय राजनीति और समाज को बेहद क़रीब से देखने-समझने वाले यशस्वी पत्रकार मार्क टली की दूसरी कथाकृति है—धीमी वाली फ़ास्ट पैसेंजर। इस किताब की कहानियों के लिए वह एक बार फिर अपनी मशहूर बेस्टसेलर, द हार्ट ऑफ़ इंडिया के इलाक़े में लौटते हैं, और हमें बीती सदी के आठवें दशक के उस दौर में ले जाते हैं, जब भारत चौराहे पर था और आर्थिक उदारीकरण की बयार बहने वाली थी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण दुनिया को रेखांकित करती ये कहानियाँ तमाम अविस्मरणीय लोगों की ज़िन्दगी का ख़ाका हैं—ऐसे साधारण लोग जो ढुलमुल हुकूमत, बेईमानी, भ्रष्टाचार और समाज में ऊँच-नीच जैसी ख़ामियों से पार पाने के तरीक़े खोजते हैं। सन्त रविदास का मन्दिर बनाने के लिए एक दब्बू दलित बुज़ुर्ग परम्पराओं को चुनौती देता है; एक किसान की साफ़गो और चतुर पत्नी अपने परिवार को अपने पति की मूर्खताओं से बचाती है; एक ख़त्म हो रही रेलवे लाइन का वजूद बचाने के लिए एक पूर्व प्रधानाध्यापक आम लोगों की लड़ाई का नेतृत्व करती है; एक राजनेता का बेटा इस सच से वाकिफ होता है कि राजनीति कुल मिलाकर पारिवारिक पेशा नहीं है। एक शान्तिप्रिय और निरुत्साही पुलिस सब-इंस्पेक्टर हत्या के एक हाई-प्रोफाइल मामले को सुलझाकर सबको चौंका देता है; एक अनीश्वरवादी शख़्स भिक्षु बन जाता है।

धीमी वाली फ़ास्ट पैसेंजर उत्तर भारत के गाँवों में लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी की हलचलों के बारे में जोश और ज़हानत, संवेदना और करुणा के नज़रिये से दर्ज की गई कहानियों का बेहद दिलकश संग्रह है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
230 grams
ISBN-13
9788119835843
Pages
264
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

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