Mitti Ki Sugandh
(0)
Author:
Gajanan Madhav MuktibodhPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
795
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Available
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<span style="font-weight: 400;">इस संकलन की लगभग सभी कहानियाँ प्रवासी भारतीयों के जीवन-संघर्ष</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">अनुभव और ऊहापोह की कहानियाँ हैं</span><span style="font-weight: 400;">; </span><span style="font-weight: 400;">लेकिन भारत की मिट्टी की सुगंध हर कहानी में रची-बसी है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">चाहे वह लत हो</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">तमाशा खत्म हो या काल सुंदरी। घर का ठूँठ की चन्नी विभाजन</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">टूटन और बिखराव की पीड़ा के चलते तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद ठूँठ होकर रह जाती है। पराया देश का नायक रंग और नस्ल भेद के दमघोंटू वातावरण में जी रहा है। अभिशप्त का नायक प्रवासी जीवन से तालमेल न बिठा पाने के संकट से ग्रस्त है तो सुबह की स्याही लंदन की स्याह और संकीर्ण मानसिकता का परिचय कराती है। पुराना घर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">नए वासी में पश्चिमी संस्कृति में अपनी पहचान के गुम हो जाने का दर्द है तो सर्द रात का सन्नाटा में अपनों से छले जाने की पीड़ा। आदमखोर उपभोक्ता संस्कृति की स्वार्थांधता की परतें खोलती है तो फिर कभी सही... भौतिक मूल्यों और मानव-मन की भटकन का विश्लेषण करती है। इस बार कहानी...</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">बुधवार की छुट्टी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">बेघर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">एक मुलाकात और चाँदनी भी प्रवासी मन की पीड़ाओं का सघन ब्यौरा देने वाली कहानियाँ हैं। अपने देश से बाहर रहते हुए अपने देश की मिट्टी से जुड़ने की ललक से भरे रचनाकारों की ये कहानियाँ निश्चय ही हिंदी के कथा-जगत् में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।</span>
Read moreAbout the Book
<span style="font-weight: 400;">इस संकलन की लगभग सभी कहानियाँ प्रवासी भारतीयों के जीवन-संघर्ष</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">अनुभव और ऊहापोह की कहानियाँ हैं</span><span style="font-weight: 400;">; </span><span style="font-weight: 400;">लेकिन भारत की मिट्टी की सुगंध हर कहानी में रची-बसी है</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">चाहे वह लत हो</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">तमाशा खत्म हो या काल सुंदरी। घर का ठूँठ की चन्नी विभाजन</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">टूटन और बिखराव की पीड़ा के चलते तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद ठूँठ होकर रह जाती है। पराया देश का नायक रंग और नस्ल भेद के दमघोंटू वातावरण में जी रहा है। अभिशप्त का नायक प्रवासी जीवन से तालमेल न बिठा पाने के संकट से ग्रस्त है तो सुबह की स्याही लंदन की स्याह और संकीर्ण मानसिकता का परिचय कराती है। पुराना घर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">नए वासी में पश्चिमी संस्कृति में अपनी पहचान के गुम हो जाने का दर्द है तो सर्द रात का सन्नाटा में अपनों से छले जाने की पीड़ा। आदमखोर उपभोक्ता संस्कृति की स्वार्थांधता की परतें खोलती है तो फिर कभी सही... भौतिक मूल्यों और मानव-मन की भटकन का विश्लेषण करती है। इस बार कहानी...</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">बुधवार की छुट्टी</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">बेघर</span><span style="font-weight: 400;">, </span><span style="font-weight: 400;">एक मुलाकात और चाँदनी भी प्रवासी मन की पीड़ाओं का सघन ब्यौरा देने वाली कहानियाँ हैं। अपने देश से बाहर रहते हुए अपने देश की मिट्टी से जुड़ने की ललक से भरे रचनाकारों की ये कहानियाँ निश्चय ही हिंदी के कथा-जगत् में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं।</span>
Book Details
-
ISBN9788171194216
-
Pages195
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
‘शंख-नाद’ संग्रह की कहानियों की रचना किसी एक काल-खंड में नहीं हुई। लेकिन कतिपय विशेषताएँ इनमें समान रूप से विद्यमान हैं, और ये विशेषताएँ इन्हें हिन्दी के अन्य कथाकारों की कहानियों से अलग करती हैं। इनकी एक विशेषता यह है कि यद्यपि इनमें भारतीय समाज के एक युग की तसवीर है, यह तसवीर देश और काल की सीमाओं को पार कर सार्वभौमिक और सर्वयुगीन हो जाती है। हर कहानी का एक अलग कथ्य है, जो पूरी तरह से भारतीय समाज के यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है; लेकिन पात्रों का जो व्यक्तित्व उभरता है, वह मानव-चरित्र के उस यथार्थ को प्रतिच्छवित करता है जो हर भूमि और हर काल में अपरिवर्तित रहता है।
इन पात्रों के चित्रण में कहानीकार उतना ही तथ्यपरक है जितना ईश्वर अपनी सृष्टि में है। इससे पाठक पर स्वयमेव एक दायित्व आ जाता है; वह अपने-आपको आनन्द की तलाश करने वाले एक दर्शक के साथ-साथ उचित-अनुचित में भेद करने वाले न्यायाधीश की भूमिका में पाता है। हिन्दी में ऐसी कहानियाँ कम हैं, और यह संग्रह कहानीकारों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगा।
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