Gange bare gauri bare
(1)
Author:
Dr. Mirza BasheerPublisher:
Bahuroopi BooksLanguage:
KannadaCategory:
Short-story-collections₹
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ಪ್ರಾಣಿಗಳ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಪಶುವೈದ್ಯರ ಜಿಜ್ಞಾಸೆಯ ಪ್ರಯಾಣ A veterinary doctor’s intriguing journey in the world of animals
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ಪ್ರಾಣಿಗಳ ಜಗತ್ತಿನಲ್ಲಿ ಪಶುವೈದ್ಯರ ಜಿಜ್ಞಾಸೆಯ ಪ್ರಯಾಣ
A veterinary doctor’s intriguing journey in the world of animals
Book Details
-
ISBN9788195851607
-
Pages240
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कई बार ख़याल आता है कि यदि मेरी पहली कहानी बिना छपे ही लौट आती तो क्या लिखने का यह सिलसिला जारी रहता या वहीं समाप्त हो जाता...क्योंकि पीछे मुड़कर देखती हूँ तो याद नहीं आता कि उस समय लिखने को लेकर बहुत जोश, बेचैनी या बेताबी जैसा कुछ था। जोश का सिलसिला तो शुरू हुआ था कहानी के छपने, भैरव जी के प्रोत्साहन और पाठकों की प्रतिक्रिया से।
अपने भीतरी ‘मैं’ के अनेक-अनेक बाहरी ‘मैं’ के साथ जुड़ते चले जाने की चाहना में मुझे कुछ हद तक इस प्रश्न का उत्तर भी मिला कि मैं क्यों लिखती हूँ? जब से लिखना आरम्भ किया, तब से न जाने कितनी बार इस प्रश्न का सामना हुआ, पर कभी भी कोई सन्तोषजनक उत्तर मैं अपने को नहीं दे पाई तो दूसरों को क्या देती? इस सारी प्रक्रिया ने मुझे उत्तर के जिस सिरे पर ला खड़ा किया, वही एकमात्र या अन्तिम है, ऐसा दावा तो मैं आज भी नहीं कर सकती, लेकिन यह भी एक महत्त्वपूर्ण पहलू तो है ही। किसी भी रचना के छपते ही इस इच्छा का जगना कि अधिक से अधिक लोग इसे पढ़ें, केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ें भी—संवेदना के स्तर पर उसके भागीदार भी बनें यानी कि एक की कथा-व्यथा अनेक की बन सके, बने...केवल मेरे ही क्यों, अधिकांश लेखकों के लिखने के मूल में एक और अनेक के बीच सेतु बनने की यह कामना ही निहित नहीं रहती?
मैंने चाहे कहानियाँ लिखी हों या उपन्यास या नाटक—भाषा के मामले में शुरू से ही मेरा नज़रिया एक जैसा रहा है। शुरू से ही मैं पारदर्शिता को कथा-भाषा की अनिवार्यता मानती आई हूँ। भाषा ऐसी हो कि पाठक को सीधे कथा के साथ जोड़ दे...बीच में अवरोध या व्यवधान बनकर न खड़ी हो। कुछ लोगों की धारणा है कि ऐसी सहज-सरल, बकौल उनके सपाट भाषा, गहन संवेदना, गूढ़ अर्थ और भावना के महीन से महीन रेशों को उजागर करने में अक्षम होती है। पर क्या जैनेन्द्र जी की भाषा-शैली इस धारणा को ध्वस्त नहीं कर देती? हाँ, इतना ज़रूर कहूँगी कि सरल भाषा लिखना ही सबसे कठिन काम होता है। इस कठिन काम को मैं पूरी तरह साध पाई, ऐसा दावा करने का दुस्साहस तो मैं कर ही नहीं सकती, पर इतना ज़रूर कहूँगी कि प्रयत्न मेरा हमेशा इसी दिशा में रहा है।
—भूमिका से
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