Seeta Se Shuru
Author:
Navnita DevsenPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Unavailable
‘सीता से शुरू...’ महज़ कथा–प्रवाह ही नहीं है। इस विविध कथा–चित्र का एक छोर पौराणिक काल से बँधा है; दूसरा, मातृसत्तात्मक परिवार से और अन्त में, वर्तमान समय के आधुनिक मूल्यबोध से जुड़ा है। कुल मिलाकर, औरत की ज़िन्दगी के आदि–मध्य–अन्त के पर्वों की अन्तर्कथा!</p>
<p>नवनीता देव सेन की हर कृति का प्रसाद गुण सरस–गम्भीर स्थापन पाठकों को मुग्ध करता है। प्रस्तुत कथा–संग्रह औरत के अन्तर्मन और जीवन का बयान है। ये औरताना कहानियाँ नहीं हैं, औरत की कहानियाँ हैं। लेखिका ने अखंड काल–क्रम में साँस लेती हुई औरत के अनन्त दु:ख, शाश्वत व्यक्तित्व और समकालीन जटिलताओं की राह पर उसकी अभियान–कथा को क़लमबन्द किया है। लेखिका के शब्दों में—‘सीता से शुरू की गई यात्रा’, वर्तमान युग में, आधुनिक औरत को अपने ही कटघरे में ला खड़ा करती है। इस कथा का पहला पर्व है—पौराणिकी और तीसरा पर्व है आधुनिकी। लेकिन मध्यवर्ती पर्व मातृयार्की के इर्द–गिर्द बुना गया है—यानी, मातृयार्की माँ से याराना। अपनी माँ के बारे में हँसी–ख़ुशी से झलमल ऐसे उपाख्यान विरल हैं। कल्पना और वास्तविकता के मणिकांचन संयोग से ये कहानियाँ शाश्वत सत्य के अमृत–मंत्र की साक्षी बन गई हैं।
ISBN: 9788126708598
Pages: 176
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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वक़्त।विरोधी मनोभावों और विचारों को परत-दर-परत उघाड़ती हैं ये कहानियाँ। इनकी विशेषता—कलात्मक उपलब्धि है—भाषा और शिल्प का विषयवस्तु के मुताबिक़ ढलते जाना। माध्यम, रूप और कथावस्तु एकरस-एकरूप हैं यहाँ। मसलन, ‘इति’ में मौत के वक़्त की बदहवासी, ‘थकान’ में प्रेम के अवसान का अवसाद, ‘चकरघिन्नी’ में उन्माद की मनःस्थिति, या ‘मार्च माँ और साकुरा’ में निश्छल आनन्द के उत्सव के लिए इस्तेमाल की गई भाषा ही क्रमशः बदहवासी, अवसाद, उन्माद और उत्सव की भाषा हो जाती है।
पर अन्ततः ये दु:ख की कहानियाँ हैं। दु:ख बहुत, बार-बार और अनेक रूपों में आता है इनमें। ‘यहाँ हाथी रहते थे’ और ‘आजकल’ में साम्प्रदायिक हिंसा का दु:ख, ‘इतना आसमान’ में प्रकृति की तबाही और उससे बिछोह का दु:ख, ‘बुलडोज़र’ और ‘तितलियाँ’ में आसन्न असमय मौत का दु:ख, ‘थकान’ और ‘लौटती आहट’ में प्रेम के रिस जाने का दु:ख। एक और दु:ख, बड़ी शिद्दत से, आता है ‘चकरघिन्नी’ में। नारी स्वातंत्र्य और नारी सशक्तीकरण के हमारे जैसे वक़्त में भी आधुनिक नारी की निस्सहायता का दु:ख।
हमारी ज़िन्दगी की बदलती बहुरूपी असलियत तक बड़े आड़े-तिरछे रास्तों से पहुँचती हैं ये कहानियाँ। एक बिलकुल ही अलग, विशिष्ट और नवाचारी कथा-लेखन से रू-ब-रू कराते हुए हमें।
Mujhe Bahar Nikalo
- Author Name:
Govind Mishra
- Book Type:

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Description:
‘जाओ, मित्र जाओ। लम्बी पसरी ज़िन्दगी में कुछ अच्छी चीज़ें, कुछ बहुत मीठे क्षण दे गए तुम। यही क्या कम रहा। जीवन की झोली में कहीं कुछ ठहरता है, जो तुम ठहरते। एक ही काम तो है जो हम ता-ज़िन्दगी करते रहते हैं...प्लेटफ़ार्म पर खड़े होकर लोगों को विदा करना...किसी को जीवन के पार, किसी को जीवन के भीतर ही।...जब तक एक दिन खुद भी विदा नहीं हो जाते।” (कहानी ‘लहर’ से)
गोविन्द मिश्र ने अपने पहले के संग्रहों में अगर कहीं जीवन-स्थितियों के विभिन्न रंगों को रेखांकित किया, या सामाजिक सियनों पर नज़र गड़ाते हुए सामाजिक, राजनीतिक, व्यवस्था पर चोट की, या जैसे 'पगला बाबा' में जीवन के सौन्दर्य को झलकाया...तो 'मुझे बाहर निकालो' की कहानियों का स्वर उन सब चीज़ों को सम्मिलित करते हुए भी उनसे नितान्त अलग है जो उनकी निरन्तर चलती हुई कथायात्रा को इंगित करता है।
अलग-अलग परिवेश की जीवन-स्थितियाँ जो सामाजिक परिवेश के इस या उस पक्ष से जुड़ती हैं, उन पर कटाक्ष भी करती हैं, पर कहानियों का बुनियादी स्वर जीवन के सरकने, बीतने और उनसे उत्पन्न पीड़ा का है, जैसे जीवन का बुनियादी तत्त्व यही हो। कहीं 'नॉस्टेल्जिया' का दर्द है तो कहीं सिर्फ़ बीतने के अहसास की दबी-दबी चुभन...जो इन कहानियों को मानव-जीवन के मूल पक्ष से जोड़ती है—जीवन में जो हर समय में कुल मिलाकर ऐसा ही रहा है। इसलिए निस्संकोच कहा जा सकता है कि ये कहानियाँ सार्वकालिक कहानियाँ हैं—वे जिन तक लेखक तात्कालिक यथार्थ को लाँघकर पहुँचता है और जो हर युग में प्रासंगिक होती हैं, उतने ही चाव से पढ़ी जाती हैं।
संग्रह की अन्तिम तीन कहानियाँ कथात्रयी हैं, जिन्हें एक साथ एक लम्बी कहानी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है और अलग-अलग भी।
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