Parinde
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Author:
Nirmal VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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परिन्दे निर्मल वर्मा का पहला कहानी-संग्रह है। सात कहानियों के इस संग्रह के पहले प्रकाशन (1958) के बाद जैसे हिन्दी कहानी को एक नया प्रस्थान मिला था। न सिर्फ़ इन कहानियों की भाषा के कारण, बल्कि इतिहास और समय के विशाल फलक पर मानव-नियति को समझने की एक नई दृष्टि और प्रविधि के कारण भी।</p> <p>नामवर सिंह ने ‘परिन्दे’ को नई कहानी धारा की पहली कहानी ठहराया था। उन्होंने सही ही कहा था कि हिन्दी भाषा के लिए जो काम कविता नहीं कर सकी, वह इन कहानियों के गद्य ने कर दिखाया।</p> <p>निर्मल जी के पात्र अपने वातावरण में इतने प्राकृतिक होते हैं कि वे यथार्थवादी कही जानेवाली कहानियों के विवरण-बहुल चरित्रों से ज़्यादा वास्तविक लगने लगते हैं। अपनी व्यक्ति-सत्ता में वे इतने सजीव और सम्भव लोग हैं कि उनका वर्णन करने के लिए कथाकार की भाषा को लम्बी-लम्बी डिटेल्स देने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बस उन्हें उनकी जगह पर आलोकित भर कर देती है, और हम देखते हैं कि ये हमारे अपने किसी हिस्से के कितने करीब हैं। वे हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाते हैं, जैसे अपनी जिन्दगी के कुछ महीन अनुभव।</p> <p>‘परिन्दे’ में संकलित सभी कहानियों में मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थिति से उत्पन्न अस्तित्वगत प्रश्नों को, स्वतंत्रता और मुक्ति की उसकी आन्तरिक व्याकुलता को समग्र अभिव्यक्ति मिली है। रोज़मर्रा जीवन की परिस्थितियों और पात्रों को निर्मल वर्मा यहाँ इस तरह अंकित करते हैं कि उनके पीछे हमें मानव की जिजीविषा की सुदीर्घ यात्रा अपने तमाम प्रश्नों और सन्देहों के साथ आती दिखाई देती है।
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परिन्दे निर्मल वर्मा का पहला कहानी-संग्रह है। सात कहानियों के इस संग्रह के पहले प्रकाशन (1958) के बाद जैसे हिन्दी कहानी को एक नया प्रस्थान मिला था। न सिर्फ़ इन कहानियों की भाषा के कारण, बल्कि इतिहास और समय के विशाल फलक पर मानव-नियति को समझने की एक नई दृष्टि और प्रविधि के कारण भी।</p>
<p>नामवर सिंह ने ‘परिन्दे’ को नई कहानी धारा की पहली कहानी ठहराया था। उन्होंने सही ही कहा था कि हिन्दी भाषा के लिए जो काम कविता नहीं कर सकी, वह इन कहानियों के गद्य ने कर दिखाया।</p>
<p>निर्मल जी के पात्र अपने वातावरण में इतने प्राकृतिक होते हैं कि वे यथार्थवादी कही जानेवाली कहानियों के विवरण-बहुल चरित्रों से ज़्यादा वास्तविक लगने लगते हैं। अपनी व्यक्ति-सत्ता में वे इतने सजीव और सम्भव लोग हैं कि उनका वर्णन करने के लिए कथाकार की भाषा को लम्बी-लम्बी डिटेल्स देने की जरूरत नहीं पड़ती, वह बस उन्हें उनकी जगह पर आलोकित भर कर देती है, और हम देखते हैं कि ये हमारे अपने किसी हिस्से के कितने करीब हैं। वे हमारी स्मृति का हिस्सा हो जाते हैं, जैसे अपनी जिन्दगी के कुछ महीन अनुभव।</p>
<p>‘परिन्दे’ में संकलित सभी कहानियों में मनुष्य की ऐतिहासिक अवस्थिति से उत्पन्न अस्तित्वगत प्रश्नों को, स्वतंत्रता और मुक्ति की उसकी आन्तरिक व्याकुलता को समग्र अभिव्यक्ति मिली है। रोज़मर्रा जीवन की परिस्थितियों और पात्रों को निर्मल वर्मा यहाँ इस तरह अंकित करते हैं कि उनके पीछे हमें मानव की जिजीविषा की सुदीर्घ यात्रा अपने तमाम प्रश्नों और सन्देहों के साथ आती दिखाई देती है।
Book Details
-
ISBN9789360867973
-
Pages184
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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निर्मल वर्मा के कथा-शिल्प में उसी तरह मौजूद रहता है, जैसे हमारे जीवन में—लगातार मौजूद लेकिन अदृश्य। उससे हमारे दुःख और सुख तय होते हैं, वैसे ही जैसे उनके कथा-पात्रों के होते हैं। कहानी का विस्तार उसमें बस यह करता है कि इतिहास के उन मूक और भीड़ में अनचीन्हे ‘विषयों’ को एक आलोक-वृत्त से घेरकर नुमायाँ कर देता है, ताकि वे दिखने लगें, ताकि उनकी पीड़ा की सूचना एक जवाबी सन्देश की तरह इतिहास और उसकी नियन्ता शक्तियों तक पहुँच सके। इस प्रक्रिया में अगर उनकी कथा कुछ ऐसे व्यक्तियों को रच देती है जिनकी वैयक्तिकता की आभा हमारे लिए ईर्ष्या का कारण हो उठे, तो यह उनका व्यक्तिवाद नहीं है, व्यक्ति के स्तर पर एक वैकल्पिक मनुष्य का ख़ाक़ा तैयार करने की कोशिश है।
इस उपन्यास के चरित्रों की पीड़ा और उस पीड़ा को पहचानने, अंगीकार करने की उनकी इच्छा और क्षमता उन्हें हमारे मौजूदा असहिष्णु समाज के लिए मूल्यवान बनाती है। वह चाहे रायन हो, इंदी हो, फ्रांज हो या मारिया, उनमें से कोई भी अपने दुख का हिसाब हर किसी से नहीं माँगता फिरता। चेकोस्लोवाकिया की बर्फ़-भरी सड़कों पर अपने लगभग अपरिभाषित-से प्रेम के साथ घूमते हुए ये पात्र जब पन्नों पर उद्घाटित होते हैं, तो हमें एक टीसती हुई-सी सान्त्वना प्राप्त होती है, कि मनुष्य होने का जोखिम लेने के दिन अभी लद नहीं गए।
‘वे दिन’ निर्मल वर्मा का प्रथम उपन्यास है। यह क्रिसमस के चन्द शान्तिपूर्ण दिनों की गाथा है, एक अवसादपूर्ण प्रेमकथा जो बर्फ़ और धूप, छुट्टियों के ख़ालीपन, पुराने शहर के पुलों और टावरों के बीच चुपचाप चलती है। हर पात्र का अपना अतीत है, जो यूरोप की युद्धोत्तर पीढ़ी की अभिशप्त छाया से जुड़ा है, और उपन्यास के विभिन्न पात्रों को जोड़नेवाली एक ‘रहस्यमय’ नियति भी है, जो छोटी-से-छोटी घटना को अर्थवत्ता प्रदान करती है।
Ek Chithda Sukh
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Nirmal Verma
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एक चिथड़ा सुख सुख की चाह लिये चलते हुए लोगों की कहानी है—सुख को जीतने के लिए भागते-दौड़ते लोगों की नहीं। इस उपन्यास के पात्र जो किसी-न-किसी तरह कहीं से उखड़े हुए हैं, कोई हताशा जिनके भीतर बिंधी है, अपने जीवन को कोई अर्थ देना चाहते हैं, अपने-आपको पा लेना चाहते हैं, पूरा होना चाहते हैं, ये लोग हमारी उस दुनिया का एक ज़्यादा उजला प्रति-संसार रचते हैं, जहाँ हर कोई ख़ुद को पूरा मानते हुए, जीवन को तलाश की तरह नहीं, युद्ध की तरह शुरू करते हैं। निर्मल वर्मा के लेखन में उतरते ही जो सुख हमें अपने पास खींच लेता है, उसका उत्स इसी जगह है; कि वह सुस्पष्ट-सुव्यवस्थित उपलब्धि की हमारी दुनिया के मामूलीपन का विस्तार नहीं है, उसका विपर्यय है। वह एक आईने की तरह हमारे सामने आता है जिसमें हम अपनी छूँछी कुंठाओं के उथलेपन को देख पाते हैं, उनसे मुक्त हो जाते हैं। ‘एक चिथड़ा सुख’ के पात्र अपनी अपूर्णताओं में यह और बेहतर ढंग से कर पाते हैं। दिल्ली इस उपन्यास का भूगोल है। यहाँ वह भी एक पात्र की तरह दिखाई देती है और अपने इन अति संवेदनशील रहवासियों को अपनी पृष्ठभूमि में और साफ़, वेध्य दिखा पाती है।
Cheeron Par Chandani
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Nirmal Verma
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निर्मल वर्मा कहते हैं, ‘अकसर सोचता हूँ, कौन-सा सही तरीक़ा है, किसी देश के जातीय गुण जानने का! शायद बहुत छोटी बातों से, जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है, जिन्हें नज़रअन्दाज़ किया जा सकता है’—निर्मल वर्मा का यात्री-मन शहरों, देशों, समाजों, ऐतिहासिक स्थलों, म्यूज़ियमों, पबों और बारों में किसी भी देश के भूत-भविष्य और वर्तमान को ऐसी ही छोटी-छोटी बातों से जानता और पाठक तक पहुँचाता है। शायद इसीलिए उनके यात्रा-विवरणों को पढ़ना न थकाता है, न बोझिल करता है, उलटे हम जैसे अपने ऊपर ठहरी अपने दैनन्दिन जीवन की थकान को उनके गद्य के प्रवाह में तिरोहित करते जाते हैं; हल्के और प्रकाशित महसूस करते हुए।
‘चीड़ों पर चाँदनी’ (प्रथम प्रकाशन 1964) न सिर्फ़ निर्मल वर्मा के उत्कृष्ट गद्य का नमूना है, बल्कि एक यात्रा-वृत्तान्त के रूप में भी यह पुस्तक एक मानक का दर्ज़ा हासिल कर चुकी है। जिन यात्राओं का वर्णन इस पुस्तक में उन्होंने किया है, वे सिर्फ़ बाहर की यात्राएँ नहीं हैं, न सिर्फ़ उस क्षण तक सीमित जब वे की जा रही थीं—ये भीतर की यात्राएँ भी हैं, और स्मृतियों की भी, इतिहास की भी। उन शहरों और सड़कों की यात्राएँ जिन पर कहीं अतीत के विध्वंसों के अवशेष आपको चौंका देते हैं, अवसाद से भर देते हैं तो कहीं महान लेखकों, चित्रकारों, कलाकारों की कालातीत मौजूदगी उम्मीद से भर देती है, जिन्होंने अपने समय में मनुष्य के लिए दूर तक जानेवाली राहें बनाई थीं।
कहानी, निबन्ध, डायरी और यात्रा-वृत्त—इन सब विधाओं का परिपाक इस पुस्तक में हुआ है। इन यात्राओं से गुज़रते हुए हम एक से ज्यादा स्तरों पर समृद्ध होते हैं।
Sahitya Ka Aatm-Satya
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Nirmal Verma
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हिन्दी के अग्रणी रचनाकार के साथ-साथ देश के श्रेष्ठ बुद्धिजीवियों में गिने जानेवाले निर्मल वर्मा ने जहाँ हिन्दी को एक नई कथाभाषा दी वहीं एक नवीन चिन्तन भाषा के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनका साहित्य और चिन्तन न केवल उत्तर-औपनिवेशिक समाज में मौजूद कुछ बहुत मौलिक प्रश्नों और चिन्ताओं को रेखांकित करता है, बल्कि एक लेखक की गहरी बौद्धिक और आध्यात्मिक विकलता को भी व्यक्त करता है। उनका चिन्तनपरक निबन्ध-साहित्य भारतीय परम्परा और पश्चिम की चुनौतियों के द्वन्द्व की नई समझ भी हमें देता है।
इतिहास और स्मृति उनके प्रिय प्रत्यय हैं। उनके चिन्तन में इतिहास के ठोस और विशिष्ट अनुभव हैं। उनका इतिहास-बोध बहुत को भुलाकर रचा-बसा बोध नहीं है बल्कि वह भूलने के षड्यंत्र को लगातार प्रतिरोध देता है जिसका मूलाधार स्मृति है। वहाँ परम्परा स्मृति का अंग भी है और इसे सहेजने-समझने का साधन भी।
भाषा के सवाल को निर्मल वर्मा साहित्य तक ही सीमित नहीं मानते। उनका मानना है कि एक पूरी संस्कृति के मर्म और अर्थों को सम्प्रेषित करने की सम्भावना उसके भीतर अन्तर्निहित है। वे सवाल उठाते हैं कि यदि हम वैचारिक रूप से स्वयं अपनी भाषा में सोचने, सृजन करने की सामर्थ्य नहीं जुटा पाते तो हमारी राजनैतिक स्वतंत्रता का क्या मूल्य रह जाएगा?
इस पुस्तक में उनके निबन्ध, कुछ प्रश्नोत्तर और विभिन्न पुरस्कारों को स्वीकार करते समय दिए गए वक्तव्य भी शामिल हैं।
Itihas Smriti Akanksha
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Nirmal Verma
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क्या मनुष्य इतिहास के बाहर किसी और समय में रह सकता है? क्या हम वही हैं जो हम दिखाई देते हैं या बीते हुए समय की प्रकृति, लाखों जीव-जन्तुओं और ख़ुद मनुष्य की सैकड़ों सृष्टियाँ हमारी चेतना में कहीं मौजूद हैं? क्या आज का मनुष्य अतीत की अनेकानेक विस्मृत सृष्टियों का स्मारक है? आधुनिक मनुष्य जिसका अस्तित्व इतिहास और स्मृति के दो छोरों पर अटका हुआ है, और जिसकी आत्मखंडित चेतना अवधारणा तथा वास्तविकता के बीच झूलती रहती है, अपने सत्य तक कैसे पहुँचता है? कलाकृति का सत्य क्या है? धार्मिक और सेक्युलर के विभाजन ने हमारे सांसारिक अनुभवों को कैसे प्रभावित किया? ये और ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिन पर निर्मल वर्मा इस पुस्तक में शामिल व्याख्यानों में अपनी विशिष्ट चिन्तन-शैली में विचार करते हैं। स्मृति, इतिहास, विचारधारा, कला-अनुभव और साहित्य के अनेक आधारभूत प्रश्नों पर उन्होंने निबन्धों में भी बार-बार विचार किया है, इन व्याख्यानों में वह प्रक्रिया और घनीभूत दिखाई देती है। ‘वत्सल निधि’ द्वारा आयोजित डॉ. हीरानन्द शास्त्री स्मारक व्याख्यान माला की दसवीं कड़ी (1990) के रूप में दिए गए ये व्याख्यान निर्मल वर्मा के चिन्तक पक्ष को गहराई से रेखांकित करते हैं और हमें पुन: उन प्रश्नों पर लौटने को आमंत्रित करते हैं जिन्हें हमने बीते दो-तीन दशकों में साहित्य-चिन्तन की परिधि से जैसे बाहर ही कर दिया है।
Har Barish Mein
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Nirmal Verma
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निर्मल वर्मा अपनी इस पुस्तक और इसके निबन्धों को भी, दो पूर्ण बिन्दुओं के बीच की कड़ी मानते थे। विधा के रूप में भी ये आलेख यात्रावृत्त और निबन्ध के बीच कहीं ठहरते हैं, ‘जहाँ न भोग का सुख है, न समाधान का निश्चय’। अपने दूसरे यूरोप प्रवास के दौरान उन्होंने यूरोप की धड़कन, उसके गौरव और शर्म के क्षणों को बहुत नज़दीक से देखा-सुना था। इस लिहाज से यह पुस्तक एक ऐसी नियतिपूर्ण घड़ी का दस्तावेज़ है, जब बीसवीं शती के अनेक काले-उजले पन्ने पहली बार खुले थे। दुब्चेक काल का प्राग-वसन्त, सोवियत-स्वप्न का मोह-भंग, पेरिस के बेरिकेडों पर उगती आकांक्षाएँ—ऐसी अभूतपूर्व घटनाएँ थीं, जिन्हें हमारी ढलती शताब्दी की छाया में निर्मल वर्मा ने पकड़ने की कोशिश की, किसी बने-बनाए आइने के माध्यम से नहीं बल्कि सम्पूर्णतया अपनी नंगी आँखों के सहारे।
शायद यही कारण है कि इस पुस्तक के निबन्ध कभी-कभी एक ऐसे ‘निर्वासित’ लेखक के रिपोर्ताज जान पड़ते हैं, जिनमें उन्होंने ‘युद्ध’ के मोर्चे पर घायल संस्कृतियों के घावों को जैसा देखा, वैसा ही आँकने की कोशिश की और भारतीय आत्मसन्तोष से हटकर, ख़ुद अपने देश की व्यवस्था को इन घावों में रिसते देखा।
वैज्ञानिक प्रगति के अकल्पनीय चरणों को पार करने के बाद आज भी जब हम देखते हैं कि इतिहास से न राजनीति ने कुछ सीखा है, न संस्कृतियों और धर्मों ने, तो इन निबन्धों को पढ़ना, इनकी अन्तर्दृष्टि तक पहुँचना और ज़रूरी जान पड़ता है।
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