Usha Kiran Khan Ki Lokpriya Kahaniyan
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Author:
Ushakiran KhanPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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प्रस्तुत संग्रह में वरिष्ठ कथाकार उषा किरण खान की छोटी-बड़ी चौबीस कहानियों में नई और लोकप्रिय कथाएँ शामिल हैं। आत्मवंचना के युग में कई अच्छे-भले शिक्षित युवक आतंकवाद की राह में फँसा दिए जाते हैं—‘अम्मा मेरे भइया को भेजो...’ ऐसी ही कहानी है। ‘किसी से न कहना’, ‘लौट आ ओ समय’ तथा ‘गए माघ उनतीस दिन बाकी’ एक कथा-सीरीज है। अपने समय से संवाद करती बाल सखियाँ उम्र के चौथेपन में मिलती हैं। एक-दूसरे को अपने दिल की कहने-सुनने पर चाहकर भी सबकुछ बाँट नहीं पातीं, कि कहीं साथी इसके दुःख से अधिक दुःखी न हो जाएँ। इनमें स्त्री विमर्श इसी प्रकार का है। लेखिका अपने गाँव, महानगरों में बसी गाँव की स्त्रियों के भूख की, सम्मान की, अस्मिता की तनी गरदनवाली स्त्री की कहानी कहती है। उनके सारे पात्र यथार्थ से उपजे हैं, कल्पना से नहीं। सामाजिक संवेदना और मर्म को छूती लोकप्रिय कहानियों का अनूठा संग्रह।
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प्रस्तुत संग्रह में वरिष्ठ कथाकार उषा किरण खान की छोटी-बड़ी चौबीस कहानियों में नई और लोकप्रिय कथाएँ शामिल हैं। आत्मवंचना के युग में कई अच्छे-भले शिक्षित युवक आतंकवाद की राह में फँसा दिए जाते हैं—‘अम्मा मेरे भइया को भेजो...’ ऐसी ही कहानी है। ‘किसी से न कहना’, ‘लौट आ ओ समय’ तथा ‘गए माघ उनतीस दिन बाकी’ एक कथा-सीरीज है। अपने समय से संवाद करती बाल सखियाँ उम्र के चौथेपन में मिलती हैं। एक-दूसरे को अपने दिल की कहने-सुनने पर चाहकर भी सबकुछ बाँट नहीं पातीं, कि कहीं साथी इसके दुःख से अधिक दुःखी न हो जाएँ।
इनमें स्त्री विमर्श इसी प्रकार का है। लेखिका अपने गाँव, महानगरों में बसी गाँव की स्त्रियों के भूख की, सम्मान की, अस्मिता की तनी गरदनवाली स्त्री की कहानी कहती है। उनके सारे पात्र यथार्थ से उपजे हैं, कल्पना से नहीं। सामाजिक संवेदना और मर्म को छूती लोकप्रिय कहानियों का अनूठा संग्रह।
Book Details
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ISBN9789351863083
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Description:
1947 से अब तक हमारी राजनीति फ़सादात करानेवाले को पहचानने में, उसे नंगा करने में आगे नहीं आई। कारण ये कि फ़सादात कराना सारे देश की राजनीति के दाँव-पेच का अंग बन चुका है। राजनीति से जुड़े सारे दल एक दूसरे को इल्ज़ाम देते रहते हैं लेकिन फ़सादात की जाँच करनेवाले कमीशन कुछ और कहते हैं। इन सबसे अलग फ़सादात का जो चेहरा अपने असली रूप में हमारे सामने आता है वो केवल साहित्यकार, रचनाकार के ज़रिए ही आता है। लेखक और रचनाकार ही ने फ़सादात के बारे में सच-सच लिखा है। उसी ने फ़सादात के मुजरिम को पहचाना है। दु:ख झेलनेवाले के दु:ख को समझा है।
इस संग्रह में कुछ अफ़साने तो वो हैं जो बँटवारे के फ़ौरन बाद होनेवाले साम्प्रदायिक दंगों पर लिखे गए और कुछ वो हैं जो बाबरी मस्जिद के गिराए जाने से पहले और उसके बाद होनेवाले फ़सादात पर लिखे गए। इनमें कई अफ़साना-निग़ार ऐसे भी हैं जो ख़ुद इस तूफ़ान से गुज़रे थे। फ़सादात के कारण बदलते रहे और साथ ही उनके बारे में लेखक का रवैया भी बदलता रहा, फ़सादात का अधिकतर शिकार बननेवाला समुदाय लेखक की सारी सहानुभूति समेटने लगा। वे राजनैतिक दल भी पहचान लिए गए जो फ़सादात की आग लगाते रहते हैं। पहले के अफ़सानों में हिन्दू मुसलमान की और मुसलमान हिन्दू की जानो-माल की हिफ़ाज़त करते हैं लेकिन बाद के फ़सादात में लेखक ने ये महसूस किया कि फ़सादात जब भी भड़कते हैं तो हिन्दू-मुसलमान के मेल-जोल में एक फ़ासला-सा आ जाता है। इस ट्रेजिडी की गूँज ‘नींव की ईंट’, ‘सिंघारदान’, ‘ज़िन्दा दरगोर’ जैसे अफ़सानों में सुनाई देती है।
फ़सादात ने हमारे जीवन और सायकी में एक मुस्तक़िल दहशत और लूटे जाने का ख़ौफ़ और भय पैदा कर दिया है। इस भय, डर और ख़ौफ़ की सायकी को ‘बग़ैर आसमान की ज़मीन’, ‘आदमी’ और ‘खौफ़’ जैसे अफ़सानों में महसूस किया जा सकता है।
Contemporary Dogri Short Stories
- Author Name:
Ved Rahi
- Rating:
- Book Type:

- Description: English translation by Satnam Kaur of Dogri Diyan Namiyan Kahaniyan, edied by Ved Rahi. Sahitya Akademi 2013
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