Sukul Ki Bibi
Author:
Suryakant Tripathi 'Nirala'Publisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Available
प्रस्तुत संग्रह में निराला की चार कहानियाँ संगृहीत हैं और चारों का रंग अलग-अलग है। ‘क्या देखा’ में अगर हीरा नामक महिला की व्यथा-कथा है, तो ‘कला की रूपरेखा’ में एक सत्य घटना के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि कला जीवन से निरपेक्ष नहीं हो सकती, पहचाननेवाली आँख हो तो जीवन में ही कला का अस्तित्व दिखाई देगा। ‘सुकुल की बीवी’ निराला के विद्रोही तेवर की कहानी है। एक मुसलमान पिता और हिन्दू माँ की सन्तान पुरखराज का विवाह सुकुल जी से कराने में निराला सहायक बनते हैं। उस समय के समाज में यह अकल्पनीय था। चौथी कहानी ‘श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी’ में व्यंग्य का स्वर है। श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी छायावाद के विरोध में उपदेशात्मक लेख लिखकर लोकप्रियता अर्जित करती हैं। उनकी सफलता अवसरवाद की सफलता है।</p>
<p>कुल मिलाकर यह छोटा-सा संग्रह कहानी के क्षेत्र में निराला की विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता है, और आशा है कि नए रूप-रंग में प्रकाशित यह संस्करण पाठकों को प्रीतिकर लगेगा।
ISBN: 9788126705559
Pages: 79
Avg Reading Time: 3 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इन कहानियों के केन्द्र में सामान्य मनुष्य हैं। लगभग निम्न-मध्यमवर्ग के व्यक्ति। संग्रह की कहानियाँ इन व्यक्तियों के छोटे-छोटे सुखों और दु:खों को व्यक्त करती हैं। लेखक ने सूक्ष्म पर्यवेक्षण का परिचय देते हुए जैसे इस जीवन को शब्दों में पुनरुज्जीवित किया है।
बहुतेरी कहानियाँ स्त्रियों के अन्तरंग की झलक हैं। लेखक ने ‘स्त्री-विमर्श’ के ‘मार्मिक मुहावरे’ का लोभ त्यागकर यथार्थ को इसके सम्यक् स्वरूप में प्रस्तुत किया है। यही कारण है कि ‘वह फूल छूना चाहती है’, ‘प्रतीक्षा’, ‘कुन्ता’, ‘ढाल’ जैसी कहानियाँ मन में बस जाती हैं।
हरीश चन्द्र पाण्डे की अभिव्यक्ति में अनुभवों का वैविध्य है। ‘बोहनी’, ‘साथी’ व ‘प्रोत्साहन’ कहानियों से इसे परखा जा सकता है। अपनी सरलता और सहजता में ये रचनाएँ बेजोड़ हैं। शब्द-स्फीति के संक्रामक समय में लेखक का संयम और सन्तुलन सराहने योग्य है। भाषा में अद्भुत लय है, जैसे—‘अरे भई, शब्द की अपनी एक सुगन्ध होती है? व्याप्ति होती है?...बुरूंश कहते ही चारों ओर उजाला-सा फैल जाता है। फूलों से लदी पहाड़ियों और घरों की देहरियाँ कौंधने लगती हैं?’
इन कहानियों को पढ़ना सहज दिखते जटिल यथार्थ से गुज़रना है।
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