Pratinidhi Kahaniyan: Manzoor Ehtesham
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Author:
Vandana Rag, Manzoor EhteshamPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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बड़े मानवीय विज़न और अपने परिवेश में धड़कते जीवन की सूक्ष्म हरकतों को एक सहज भाषा में पकड़ने वाले कथाकार मंज़ूर एहतेशाम की ये कहानियाँ हमें उनकी कथा-विधियों और विश्व दृष्टि, दोनों से परिचित कराती हैं। अपने यादगार उपन्यासों से जाने जानेवाले मंज़ूर अपनी कहानियों के छोटे फलक में बड़े सवाल उठाते हैं, जिनके दायरे में राजनीति, समाज, मनुष्य निर्मित आपदाओं से लेकर धार्मिक जड़ताओं से उपजी अमानवीयता तक आ जाती है। शिल्प के स्तर पर जोखिम उठाते हुए वे कैसे अपने समय के सत्य के पीछे दूर तक चले जाते हैं, इस संचयन में शामिल कहानियों से हमें यह भी पता चलता है। इस प्रस्तुति की सम्पादक वन्दना राग की यह टिप्पणी ठीक ही है कि ‘अपनी ख़ूबसूरत भाषा और बिम्बों के साथ-साथ मुलायम अहसासों का ऐसा ताना-बाना रचनेवाले’ कथाकार कम ही होंगे।
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बड़े मानवीय विज़न और अपने परिवेश में धड़कते जीवन की सूक्ष्म हरकतों को एक सहज भाषा में पकड़ने वाले कथाकार मंज़ूर एहतेशाम की ये कहानियाँ हमें उनकी कथा-विधियों और विश्व दृष्टि, दोनों से परिचित कराती हैं। अपने यादगार उपन्यासों से जाने जानेवाले मंज़ूर अपनी कहानियों के छोटे फलक में बड़े सवाल उठाते हैं, जिनके दायरे में राजनीति, समाज, मनुष्य निर्मित आपदाओं से लेकर धार्मिक जड़ताओं से उपजी अमानवीयता तक आ जाती है। शिल्प के स्तर पर जोखिम उठाते हुए वे कैसे अपने समय के सत्य के पीछे दूर तक चले जाते हैं, इस संचयन में शामिल कहानियों से हमें यह भी पता चलता है। इस प्रस्तुति की सम्पादक वन्दना राग की यह टिप्पणी ठीक ही है कि ‘अपनी ख़ूबसूरत भाषा और बिम्बों के साथ-साथ मुलायम अहसासों का ऐसा ताना-बाना रचनेवाले’ कथाकार कम ही होंगे।
Book Details
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ISBN9789360862206
-
Pages160
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘बिसात पर जुगनू’ सदियों और सरहदों के आर-पार की कहानी है। हिन्दुस्तान की पहली जंगे-आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले के पटना से शुरू होकर यह 2001 की दिल्ली में ख़त्म होती है। बीच में उत्तर बिहार की एक छोटी रियासत से लेकर कलकत्ता और चीन के केंटन प्रान्त तक का विस्तार समाया हुआ है। गहरे शोध और एतिहासिक अन्तर्दृष्टि से सम्पन्न इस कथा में इतिहास के कई विलुप्त अध्याय और उनके वाहक चरित्र जीवन्त हुए हैं। यहाँ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम की त्रासदी है तो पहले और दूसरे अफीम युद्ध के बाद के चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी। इनके साथ-साथ चलती है, समय के मलबे में दबी पटना कलम चित्र-शैली की कहानी, जिसे ढूँढ़ती हुई ली-ना, एक चीनी लड़की, भारत आई है। यहाँ फिरंगियों के अत्याचार से लड़ते दोनों मुल्कों के दु:खों की दास्तान एक-सी है और दोनों ज़मीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक-सी है। ऐसी कई गुमनाम स्त्रियाँ इस उपन्यास का मेरुदंड हैं। ‘बिसात पर जुगनू’ कालक्रम से घटना-दर-घटना बयान करनेवाला सीधा (और सादा) उपन्यास नहीं है। यहाँ आख्यान समय में आगे-पीछे पेंगें भरता है और पाठक से, अक्सर ओझल होते किंवा प्रतीत होते कथा-सूत्र के प्रति अतिरिक्त सजगता की माँग करता है।
—संजीव कुमार
Pratinidhi Kahaniyan : Mohan Rakesh
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Mohan Rakesh +1
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मोहन राकेश की कहानियां नई कहानी को एक अपूर्व देन के रूप में स्वीकार की जाती हैं। इस संकलन में उनकी प्राय सभी प्रतिनिधि कहानियां संग्रहीत हैं, जिनमें आधुनिक जीवन का कोई-न-कोई विशिष्ट पहलू उजागर हुआ है । राकेश मुख्यतः आधुनिक शहरी जीवन के कथाकार हैं, लेकिन उनकी संवेदना का दायरा मध्यवर्ग तक ही सिमित नहीं है । निम्नवर्ग भी पूरी जीवन्तता के साथ उनकी कहानियों में मौजूद है । इनके कथा-चरित्रों का अकेलापन सामाजिक संदर्भो की उपज है । वे अपनी जीवनगत जददोजहद में स्वतंत्र होकर भी सुखी नहीं हो पते, लेकिन जीवन से पलायन उन्हें स्वीकार नहीं । वे जीवन-संघर्ष की निरंतरता में विश्वास रखते हैं । पत्रों की इस संघर्ष शीलता में ही लेखक की रचनात्मक संवेदना आश्चर्यजनक रूप से मुखर हो उठती है । हम अनायास ही प्रसगानुकुल कथा-शिल्प का स्पर्श अनुभव करने लगते हैं, जो कि अपनी व्यंगात्मक सांकेतिकता और भावाकुल नाटकीयता से हमें प्रभावित करता है । इसके साथ ही लेखक की भाषा भी जैसे बोलने लगती है और अपने कथा-परिवेश को उसकी समग्रता में धारण कर हमारे भीतर उतर जाती है।
Mitti Ki Gaadi
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Priyamvad
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मिट्टी की गाड़ी प्रियंवद की लघु कहानियों का संग्रह है। मिट्टी की गाड़ी को 2018 में फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स, नई दिल्ली द्वारा 11-17 वर्ष की आयु वर्ग में उत्कृष्टता प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ। Age group 9-12 years
Dharohar Kahaniyaan : Rahul Sankrityayan
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Rahul Sankrityayan +1
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कौन ऐसा पाठक है जिसने एक बार प्रेमचन्द की कहानियों को पढ़ा हो और उन्हें भूल पाया हो! यह इसलिए कि हम उनकी रचनाओं को उनके देदीप्यमान, प्रखर व्यक्तित्व की लौ में देखने, ग्रहण करने लगते हैं। जहाँ उनकी रचनाएँ हमारे सामने जीवन का प्रामाणिक, जीवन्त चित्र प्रस्तुत करती हैं, सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं के प्रति हमें सचेत करती हैं, वहीं वे हमारे दिल में सद्भाव जगाती हैं, हमारे मस्तिष्क को झकझोरती हैं, हमें जिन्दगी को देखने समझने का नजरिया देती हैं। —भीष्म साहनी
Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada
- Author Name:
Usha Priyamvada +1
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उषा प्रियम्वदा को पढ़ना एक साथ बहुत से बिम्बों में घिर जाना है। बिम्ब जो घुमड़ते बादलों की तरह अनायास तैरते चले आते हैं और एक सार्थक संगति में गुँथकर पहले दृश्य का रूप लेते हैं। कहानियों में परम्परा के निर्वहण की अभ्यस्तता और उसे तोड़ देने की सजगता एक साथ गुँथी हुई मिलती है। 1952 से 1989 तक के कालखंड में फैली उषा प्रियम्वदा की कहानियों का अधिकांश साठ के दशक में उनके विदेश प्रवास के बाद आया है। ज़ाहिर है, डायस्पोरा मनोविज्ञान रिवर्स कल्चरल शॉक से उबरने की क्रमिक प्रक्रिया को नॉस्टेल्जिया में तब्दील कर देता है। इसलिए उषा जी की कहानियों की ज़मीन भले ही विदेशी हो गई हो, वहाँ की खुली संस्कृति और उदार वर्जनामुक्त माहौल से सम्बन्धों में सहजता और कुंठाहीनता पनपी हो, लेकिन उनकी नायिका स्वयं को भारतीयता के संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यही वजह है कि दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध बनाते हुए भी वह अपराध-बोध और लोकापवाद के भय से ग्रस्त रहती है। सरपट दौड़ते हुए अचानक ठिठककर खड़े हो जाना, और फिर बिना कुछ कहे अपनी खोह में दुबक जाना उनकी स्त्री की विशेषता है। उषा जी बेहद महीन और कलात्मक पच्चीकारी के साथ उसके चारों ओर रहस्यात्मकता का वातावरण बुनती हैं, जो एक सम्मोहक तिलिस्म का रूप धरकर पाठक के भीतर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता चला जाता है, ठीक कृष्णा सोबती की लम्बी कहानी 'तिन पहाड़' की जया की तरह।
Pratinidhi Kahaniyan : Bhisham Sahni
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Bhisham Sahni +1
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भीष्म साहनी के कथा-साहित्य से गुज़रना अपने समय को बेधते हुए गुज़रना है। हिन्दी के प्रगतिशील कहानीकारों में उनका स्थान बहुत ऊँचा है। यहाँ उनके सात कहानी-संग्रहों से प्राय: सभी प्रतिनिधि कहानियों को संकलित कर लिया गया है। युग-सापेक्ष सामाजिक यथार्थ, मूल्यपरक अर्थवत्ता और रचनात्मक सादगी इन कहानियों के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो हमारे लिए किसी भी काल्पनिक और मनोरंजक दुनिया को ग़ैर-ज़रूरी ठहराते हैं। विभिन्न जीवन-स्थितियों में पड़े इनके असंख्य पात्र आधुनिक भारतीय समाज की अनेक जटिल परतों को पाठकों पर खोलते हैं। उनकी बुराइयाँ, उनका अज्ञान और उनके हालत व्यक्तिगत नहीं, सार्वजनीन और व्यवस्थाजन्य हैं। इसके साथ ही इन कहानियों में ऐसे चरित्रों की भी कमी नहीं, जो गहन मानवीय संवेदना से भरे हुए हैं और अपने-अपने यथास्थितिवाद से उबरते हुए एक सार्थक सामाजिक बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करते हैं। वे न तो अपनी भयावह और दारुण दशा से आक्रान्त होते हैं न निराश, बल्कि अपने साथ-साथ पाठकों को भी संघर्ष की एक नई उर्जा से भर जाते हैं।
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