Dharam Ke Naam Par
(0)
Author:
Geetesh Sharma, Kusum JainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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धर्म के सही चरित्र एवं स्वरूप से परिचित हुए बिना विवेकहीनता, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। इस दिशा में यह पुस्तक एक सार्थक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वग्रह के तीन धर्मों—हिन्दू, ईसाई और इस्लाम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए हिंसा, नारी और दासत्व के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर तथ्यपरक व वस्तुगत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।</p> <p>धर्म का बीभत्स और बर्बर रूप आज हम देख रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के रक्तरंजित इतिहास को दोहराया जा रहा है। धार्मिक-स्थल अपराधियों के शरण-स्थल बने हुए हैं। धर्म का अपराध के साथ गठजोड़ चिन्तित करता है। भजन-कीर्तन-प्रवचन के आयोजनों और धार्मिक-स्थलों के निर्माण में बेशुमार वृद्धि हुई है, वहीं हत्या, बलात्कार, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार बढ़े हैं। स्वयं मनुष्य अपनी नियति तथा भाग्य का निर्माता है। समता, स्वतंत्रता और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी ऐसी व्यवस्था जो मनुष्य को इन अधिकारों से वंचित करती है, वह मानव-विरोधी है, चाहे वह धर्म हो या साम्राज्यवाद या फासीवाद या निजी स्वार्थों पर आधारित विकृत तथा जनविरोधी जनतंत्र। मनुष्य सर्वोपरि है, उसके ऊपर कोई नहीं, न धर्म न ईश्वर।
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धर्म के सही चरित्र एवं स्वरूप से परिचित हुए बिना विवेकहीनता, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। इस दिशा में यह पुस्तक एक सार्थक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वग्रह के तीन धर्मों—हिन्दू, ईसाई और इस्लाम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए हिंसा, नारी और दासत्व के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर तथ्यपरक व वस्तुगत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।</p>
<p>धर्म का बीभत्स और बर्बर रूप आज हम देख रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के रक्तरंजित इतिहास को दोहराया जा रहा है। धार्मिक-स्थल अपराधियों के शरण-स्थल बने हुए हैं। धर्म का अपराध के साथ गठजोड़ चिन्तित करता है। भजन-कीर्तन-प्रवचन के आयोजनों और धार्मिक-स्थलों के निर्माण में बेशुमार वृद्धि हुई है, वहीं हत्या, बलात्कार, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार बढ़े हैं। स्वयं मनुष्य अपनी नियति तथा भाग्य का निर्माता है। समता, स्वतंत्रता और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी ऐसी व्यवस्था जो मनुष्य को इन अधिकारों से वंचित करती है, वह मानव-विरोधी है, चाहे वह धर्म हो या साम्राज्यवाद या फासीवाद या निजी स्वार्थों पर आधारित विकृत तथा जनविरोधी जनतंत्र। मनुष्य सर्वोपरि है, उसके ऊपर कोई नहीं, न धर्म न ईश्वर।
Book Details
-
ISBN9788126725663
-
Pages236
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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