Dharam Ka Marm
(0)
Author:
Akhilesh MishraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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संस्कृत, पालि, अंग्रेज़ी, प्राकृत, उर्दू, अर्थशास्त्र, खगोलशास्त्र, गणित और भाषाविज्ञान आदि भाषाओं और विषयों के अधिकारी विद्वान अखिलेश मिश्र के बौद्धिक व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि उन्होंने ज्ञान को कर्म से जोड़ा। जीवन-भर वे ज्ञान, कर्म, वाणी और लेखनी की एकाग्र शक्ति के साथ जनसंघर्षों में संलग्न रहे। अस्सी के दशक में जब साम्प्रदायिक शक्तियाँ उभार पर थीं, उन्होंने अपनी पूरी ताक़त साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष में झोंक दी। साक्षरता और जन-शिक्षण में उनकी बहुत गहरी और निजी दिलचस्पी थी।</p> <p>इस पुस्तक में उनके राष्ट्रीय सहारा में जनवरी 1997 से दिसम्बर 1998 तक ‘धर्म-संस्कृति’ के अन्तर्गत लिखे गए निबन्धों को संकलित किया गया है। ये निबन्ध साबित करते हैं कि मिश्र जी हिन्दी के स्वतन्त्रचेता और विवेकशील विचारकों की गौरवशाली परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थे।</p> <p>डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में : ‘उनके विचार से धर्म गुण है और हर वस्तु की तरह मनुष्य का गुण धर्म होता है जिसे मनुष्यता अथवा मानवता कहते हैं।’ और, ‘जो गुण धर्म का मर्म के लेखक के प्रति श्रद्धावनत होने को विवश करता है वह है उसकी निर्भयता।’</p> <p>धर्म, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्र आदि पदों को लेकर आज पैदा की जा रही धुन्ध के बीच ये निबन्ध हमें निश्चय ही रोशनी दिखाएँगे।
Read moreAbout the Book
संस्कृत, पालि, अंग्रेज़ी, प्राकृत, उर्दू, अर्थशास्त्र, खगोलशास्त्र, गणित और भाषाविज्ञान आदि भाषाओं और विषयों के अधिकारी विद्वान अखिलेश मिश्र के बौद्धिक व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि उन्होंने ज्ञान को कर्म से जोड़ा। जीवन-भर वे ज्ञान, कर्म, वाणी और लेखनी की एकाग्र शक्ति के साथ जनसंघर्षों में संलग्न रहे। अस्सी के दशक में जब साम्प्रदायिक शक्तियाँ उभार पर थीं, उन्होंने अपनी पूरी ताक़त साम्प्रदायिकता विरोधी संघर्ष में झोंक दी। साक्षरता और जन-शिक्षण में उनकी बहुत गहरी और निजी दिलचस्पी थी।</p>
<p>इस पुस्तक में उनके राष्ट्रीय सहारा में जनवरी 1997 से दिसम्बर 1998 तक ‘धर्म-संस्कृति’ के अन्तर्गत लिखे गए निबन्धों को संकलित किया गया है। ये निबन्ध साबित करते हैं कि मिश्र जी हिन्दी के स्वतन्त्रचेता और विवेकशील विचारकों की गौरवशाली परम्परा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थे।</p>
<p>डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में : ‘उनके विचार से धर्म गुण है और हर वस्तु की तरह मनुष्य का गुण धर्म होता है जिसे मनुष्यता अथवा मानवता कहते हैं।’ और, ‘जो गुण धर्म का मर्म के लेखक के प्रति श्रद्धावनत होने को विवश करता है वह है उसकी निर्भयता।’</p>
<p>धर्म, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्र आदि पदों को लेकर आज पैदा की जा रही धुन्ध के बीच ये निबन्ध हमें निश्चय ही रोशनी दिखाएँगे।
Book Details
-
ISBN9788126708031
-
Pages392
-
Avg Reading Time13 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भाषान्तर में व्याख्या का सूक्ष्म प्रकार अनिवार्य होता है और वही अनुवाद का वर्तमान और अतीत के मध्य संवाद बनाकर बहुत कुछ को परम्परा में जीवित तथा प्रगतिशील रखता है। अतः ग्रन्थ में अनुवाद के लिए उपयुक्त भाषा, पुरातन ध्वनि बहुलता और समसामयिक सजीवता के संरक्षण की दृष्टि से तत्सम, तद्भव एवं देशी शब्दों के समन्वित प्रयोग किए गए हैं। साथ ही, गम्भीर और बहुमुखी अर्थों को स्पष्ट करने के लिए क्रियापदों के अनुवाद, दुरूह पदों के अर्थनिर्वचन में धातुपाठ, निरुक्त की पद्धति एवं आधुनिक तथा तुलनात्मक व्याकरण के अनुसरण से सहायता ली गई है।
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- Description: आधुनिक कुंभ पर्व का धार्मिक रूप से प्रचार-प्रसार आदिगुरु शंकराचार्य ने किया था। उन्होंने पर्व की शुरुआत धार्मिक मान्यताओं को बढ़ावा देने और हिंदुओं को अपनी सनातन संस्कृति की पहचान दिलाने के उद्देश्य से की थी। आज भी कुंभ पर्व मुख्यतः साधु-संत समाज का ही पर्व माना जाता है। वस्तुतः कुंभ पर्व सनातन है। अग्नि पुराण, गरुड़ पुराण, वराह पुराण, कूर्म पुराण, वामन पुराण, मत्स्य पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, पद्म पुराण, शिव पुराण, विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, लिंग पुराण, हरिवंश पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, वाल्मीकि रामायण तथा अन्य प्राचीन ग्रंथों, जैसे ऋग्वेद, अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण में वर्णित आख्यानों से कुंभ पर्व की प्राचीनता का अनुमान लगाया जा सकता है। गौतम बुद्ध ने नदियों के तट पर आयोजित कुंभ पर्व को ‘नदी पर्व’ कहा है। विष्णु पुराण के अनुसार—‘‘हजारों स्नान कार्तिक में, सैकड़ों स्नान माघ मास में किए हों तथा करोड़ों बार वैशाख में नर्मदा स्नान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य एक बार कुंभ पर्व में स्नान करने से प्राप्त होता है।’’ —इसी पुस्तक से
Prayagraj Aur Kumbh : Sanskritik Vaibhav Ki Abhinav Gatha
- Author Name:
Zilani Bano
- Book Type:

- Description: यागराज को तीर्थराज कहा गया है। यह भारत का सर्वप्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्त्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है। यह हिन्दू-आस्था का एक महान केन्द्र तो है ही, यह हमारे देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केन्द्रबिन्दु भी है। प्रयागराज के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मत्स्य, पद्म और कूर्म पुराण के कई अध्यायों में मिलता है। कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान-दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है। उन श्रद्धालुओं को कभी कोई निमंत्रण नहीं देता, वे श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर वहाँ खिंचे चले आते हैं। हमारी सनातन सस्कृति का यह चुम्बकीय आकर्षण अनादिकाल से यथावत् बना हुआ है। श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है। यह परम्परा हमें अपनी मूल संस्कृति से जोड़े रखने के साथ ही सांस्कृतिक एकीकरण का पथ भी प्रशस्त करती है। स्वाभाविक रूप से प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास के बारे में जानना-समझना एक सुखद अनुभूति है। बहरहाल, अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास को इस पुस्तक में बहुत ही सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रामाणिकता और रोचकता का मणि-कांचन संयोग है। यह पुस्तक हमारे देश के सांस्कृतिक वैभव की एक अभिनव गाथा लेकर आई ह
Nanak Vani
- Author Name:
Jairam Mishra
- Book Type:

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Description:
नानक वाणी में धार्मिक, लौकिक और लौकिक-धार्मिक काव्य का सहज समन्वय है। इसमें कर्ममार्ग, योगमार्ग, भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग का विशद निरूपण है। नानक वाणी में शान्त, शृंगार, करुण, वीर, हास्य आदि रसों का अद्भुत परिपाक है। उनका प्रकृति चित्रण अत्यन्त मोहक और आकर्षक है। उनकी भाषा पूर्वी पंजाबी है, परन्तु उसमें ब्रजभाषा और खड़ी बोली का भी पुट है। मुहावरों और कहावतों का प्रचुर प्रयोग है। नानक के अनुसार परमात्मा एक है वह कर्तार है, वह भय से रहित है, बैर से रहित है, मूर्तिमान है, काल से रहित है, योनि के अन्तर्गत नहीं आता। नानक वाणी में जहाँ एक ओर गुरु गाम्भीर्य और ज्ञान-वैराग्य भक्ति का अमृत मन्थन है वहाँ उनकी भाषा में अद्भुत ओज और भक्ति है। उनकी रचना-शैली में काव्य का लालित्य, माधुर्य, विचार सम्पन्नता सब कुछ है। नानक वाणी हृदय और मस्तिष्क को स्पर्श ही नहीं करती प्रत्युत उन्हें अनुप्राणित भी करती है।
नानक वाणी में उन्नीस राग प्रयुक्त हुए हैं : राग श्री, माझ, गौरी, आसा, गुजरी, वडहंस, सोरठि, धनासिरी, तिलंग, सूही, बिलावल, रामकली, मारू, दुखारी, भैरउ, बसंत, सागर, मलार तथा प्रभाती। नानक वाणी संगीतमय है, विचारोत्तेजक है। नानक वाणी का यह संस्करण अपनी विशद् सारगर्भित भूमिका के कारण अधिक सुबोध और उपयोगी हो गया है। श्रीगुरु नानक देव की सम्पूर्ण वाणी का यह मूल्यवान संग्रह उनके सभी भक्तों और प्रेमियों के पास अवश्य होना चाहिए।
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg
- Author Name:
Vishen Lakhiani
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- Description: Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg Hindi Translation of The Buddha and The Badass: The Secret Spiritual Art of Succeeding at Work. क्या आपने गौर किया है कि कैसे कुछ लोग नौकरी में कमाल के भाग्यशाली होते हैं! वे बड़ी आसानी से समाधान सुझा देते हैं। वे सही लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग उनके अभियानों, कंपनियों, उनकी टीमों का हिस्सा बनना चाहते हैं। वे बड़े-बड़े काम मुसकराते हुए पूरा कर लेते हैं और वेतन में अच्छी वृद्धि के साथ ही प्रमोशन भी पा लेते हैं। ये सुपरस्टार कमाल की एकाग्रता और रचनात्मकता का प्रदर्शन कर खास दायरे का हिस्सा बन जाते हैं।यह पुस्तक बताती है कि उनके साथ कैसे जुड़ें। आप जहाँ भी हों, आप में अनोखी शक्तियाँ हैं। यह आधुनिक युग का भ्रम है कि कठिन परिश्रम और संघर्ष से ही सफलता मिलती है। आपके भीतर एक आत्मा है और एक बार आपने काम के क्षेत्र में इसकी पूरी शक्ति का प्रयोग किया, तो बस कमाल हो जाता है। अपने भीतर के बुद्ध और निर्भीक योद्धा को जगाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आपके काम करने के तरीके को बदलकर रख देगी। आप उन तरीकों को जान लेंगे, जो वास्तविकता के हर नियम को आपके पक्ष में ला देंगे।
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