MadhyaKalin Dharm-Sadhna
(0)
Author:
Hazariprasad DwivediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
600
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्यकालीन धर्म-साधना' यद्यपि भिन्न-भिन्न अवसर पर लिखे गये निबन्धों का संग्रह ही है, तथापि आचार्य द्विवेदी जी ने प्रयत्न किया है कि ये लेख परस्पर विच्छिन और असम्बद्ध न रहें और पाठकों को मध्यकालीन धर्म-साधनाओं का संक्षिप्त और धारावाहिक परिचय प्राप्त हो जाए। दो प्रकार के साहित्य से इन धर्म-सानाओं का परिचय संग्रह किया गया है— (1) विभिन्न सम्प्रदायों के साधना-विषयक और सिद्धान्त-विषयक ग्रन्थ; और (2) साधारण काव्य-साहित्य। इस प्रकार पुस्तक में आलोचित अधिकांश धर्म-साधनाएँ शास्त्रीय रूप में ही आई हैं। जिन सम्प्रदायों के कोई धर्म-ग्रन्थ प्राप्त नहीं हैं या जो धर्म-साधनाएँ साधारण काव्य-साहित्य में नहीं आ सकी हैं, वे छूट गई हैं। हमारे देश की धर्म-साधना का इतिहास बहुत विपुल है। विभिन्न युग की सामाजिक स्थितियों से भी इसका सम्बन्ध है। फलस्वरूप इस पुस्तक में प्रयत्न किया गया है कि उत्तर भारत की प्रधान धर्म-साधनाएँ यथासम्भव विवेचित हो जाएँ और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का भी सामान्य परिचय पाठक को मिल जा
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्यकालीन धर्म-साधना' यद्यपि भिन्न-भिन्न अवसर पर लिखे गये निबन्धों का संग्रह ही है, तथापि आचार्य द्विवेदी जी ने प्रयत्न किया है कि ये लेख परस्पर विच्छिन और असम्बद्ध न रहें और पाठकों को मध्यकालीन धर्म-साधनाओं का संक्षिप्त और धारावाहिक परिचय प्राप्त हो जाए। दो प्रकार के साहित्य से इन धर्म-सानाओं का परिचय संग्रह किया गया है—
(1) विभिन्न सम्प्रदायों के साधना-विषयक और सिद्धान्त-विषयक ग्रन्थ; और (2) साधारण काव्य-साहित्य। इस प्रकार पुस्तक में आलोचित अधिकांश धर्म-साधनाएँ शास्त्रीय रूप में ही आई हैं। जिन सम्प्रदायों के कोई धर्म-ग्रन्थ प्राप्त नहीं हैं या जो धर्म-साधनाएँ साधारण काव्य-साहित्य में नहीं आ सकी हैं, वे छूट गई हैं।
हमारे देश की धर्म-साधना का इतिहास बहुत विपुल है। विभिन्न युग की सामाजिक स्थितियों से भी इसका सम्बन्ध है। फलस्वरूप इस पुस्तक में प्रयत्न किया गया है कि उत्तर भारत की प्रधान धर्म-साधनाएँ यथासम्भव विवेचित हो जाएँ और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि का भी सामान्य परिचय पाठक को मिल जा
Book Details
-
ISBN9789389243314
-
Pages157
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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