Yeh Jo Kaya Ki Maya Hai
Author:
PriyadarshanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 120
₹
150
Available
एक रचनाकार की पहचान इससे भी होती है कि वह अपने समकालीनों के बीच होते हुए उनसे कितना अलग है और अपने समय को दर्ज करने और उसके विकल्पों को देखने की उसकी प्रविधियाँ किस हद तक उसकी ‘अपनी’ हैं। इस अर्थ में प्रियदर्शन का नया संग्रह ‘यह जो काया की माया है’ कविता के आम प्रचलनों से बहुत हटकर है जिसमें यथार्थ के अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति के उपकरण भी कुछ अलग ढंग के हैं।</p>
<p>इस संग्रह में ‘हमें जानवरों से क्षमा माँगनी चाहिए’, ‘काया का वर्णन’, ‘सोचने के कई तरीक़े होते हैं’, ‘धर्म की कविता’, ‘अधर्म की कविता’, ‘करुणा की कविता’, ‘ताक़तवर की कविता’, ‘कमज़ोर की कविता’ जैसी कई कविताएँ संकलित हैं जिनकी संरचना में भी ऐसी ही भिन्नता दिखाई देती है : उनमें कहीं अनुचिन्तनात्मक प्रवृत्ति मिलती है तो कहीं सूक्तियों जैसा चुटीलापन और कहीं अवधारणाओं और परिभाषाओं जैसी संक्षिप्ति।</p>
<p>प्रियदर्शन अपने वक़्त की शिनाख़्त कुछ ऐसी वस्तुओं, चिह्नों, बिम्बों और अवधारणाओं से करते हैं जो आमफ़हम होने के बावजूद आमतौर पर अनदेखे रहते हैं और उन्हें कविता का विषय लगभग नहीं माना जाता।</p>
<p>इस संग्रह की कुछ कविताएँ प्रत्यक्ष राजनीतिक व्यंग्य हैं और उनके विषय तात्कालिक और तक़ाज़ों से भरे हुए हैं, लेकिन अगर कविता की सत्ता-विमर्श से अलग एक ‘उच्चतर’ राजनीति होती है तो इस संचयन की ज़्यादातर कविताएँ राजनीतिक कही जाएँगी : ‘देशभक्ति एक ख़तरनाक शब्द है/किसी तलवार की तरह/जिससे तुम्हारी गर्दन बस यह पूछने के लिए/उड़ाई जा सकती है कि आज की तारीख़ में दाल की क़ीमत क्या है?’ </p>
<p>—मंगलेश डबराल
ISBN: 9788183619493
Pages: 134
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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अस्तित्व के रहस्य पर चिन्तन हमारी परम्परा का एक मौलिक सरोकार रहा है लेकिन पता नहीं क्यों, इसे कुछ दशकों से हिन्दी कविता के लिए अस्पृश्य समझ लिया गया है। इसलिए जब कुमार अंबुज बिना किसी छद्म रहस्यवाद या अध्यात्म के ‘मैं क्या हूँ’ जैसी रचना लाते हैं जिसमें ‘मैं’ कभी एक पत्ता है, झुकी हुई मीनार, दु:ख का एक थक्का रक्त की तरह, काली मिट्टी का ढेला, अपने ही अचेतन का अनचीन्हा अटकता सुर, कोई पराजित जीवन अटका हुआ नैतिक वाक्य में, या एक संकल्प गिरता-पड़ता-उठता हुआ बार-बार, तो यह अज्ञेय के आत्मचिन्तन का नहीं, मुक्तिबोध और शमशेर के आत्मचिन्तन का प्रसार है और आज की हिन्दी कविता के एक परहेज़ को तोड़ना है। ‘सापेक्षता’, ‘सब शत्रु सब मित्र’, ‘धुंध’, ‘शाम’, ‘रात’, ‘चमक’, ‘चोट’, ‘अनुवाद’, ‘काल-बोध’ आदि कुमार अंबुज की ऐसी कविताएँ हैं जिनमें वे अपने नितान्त निजी अनुभवों, जायज़ों, आकलनों, संशयों, अवसादों और पराजयों तक गए हैं। उन्होंने धीरे-धीरे एक ऐसी भाषा और शिल्प अर्जित कर लिए हैं जिनमें नितान्त अनायासिता और किफ़ायतशारी से वे बहुत लगती हुई बातें कह डालते हैं। अंबुज की कुछ ही रचनाओं में आंशिक अचकचाहट, वह भी कविता को एक सम पर ले आने में ही, नज़र आती है वरना वर्णनात्मक या इतिवृत्तात्मक रचनाओं में भी वे विस्तार को निभा ले जाते हैं। कोई भी कवि हमेशा बेहतरीन कविताएँ नहीं दे पाता लेकिन कुमार अंबुज के यहाँ थोड़ी-सी ही कमतर रचना ढूँढ़ पाना कठिन है। ऐसा सजग आत्म-निरीक्षण हिन्दी में विरल है।
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- Description: शाहीन अब्बास को पढ़ते समय उनके यहाँ मौजूद मुश्किल ख़यालों को रवानी से बयान कर देने की ख़ूबी जिस तरह उजागर होती है, वह एक ख़ुशगवार हैरत से दो-चार करवाती है। उनके कलाम में रिवायत और जदीदियत का ऐसा मिलन है जो आम तौर पर शायरी करने वाले दूसरे शायरों के यहाँ इस ख़ूबसूरती से कम ही अपनी जगह बना पाता है। शाहीन अब्बास की ग़ज़ल को पढ़े बग़ैर इस दौर की शेरी समझ को पूरी तरह ख़ुद में उतार पाना ना-मुमकिन-सा काम है। वह अपनी शायरी में शहर के बदलते हुए इनसान, जज़्बों की टूट फूट और सियासत को भी कई बार उस बारीक ऐनक से देखते हैं, जिसकी वजह से उनकी ग़ज़ल में मौजूद इशारे पढ़ने वाले पर ज़्यादा आसानी से वाज़ेह होते चले जाते हैं। वह पिछले तीस-पैंतीस बरस से ग़ज़ल की दुनिया में अपने अनोखे उस्लूब का जादू जगा रहे हैं और उनकी आवाज़ वक़्त के साथ-साथ और मज़बूत होती जा रही है। आसान ज़बान और दुश्वार ख़यालात से बुनी गई उनकी ग़ज़ल ‘इश्क़-ओ-आशिक़ी’ के अलावा वुजूद और ज़हन से जुड़े मसलों की तरफ़ भी बख़ूबी इशारे करती है। वह हर लिहाज़ से एक ना-क़ाबिल-ए-फ़रामोश शायर हैं, जिन्होंने अपने ज़माने में ही अपनी बेहतरीन शेरी और फ़िक्री दुनियाओं के नक़्शे बना लिए हैं। उनको पढ़ कर शेर कहने का सच्चा सलीक़ा सीखा जा सकता है।
Bela
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

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Description:
‘बेला' और ‘नए पत्ते' के साथ निराला-काव्य का मध्यवर्ती चरण समाप्त होता है। 'बेला' उनका एक विशिष्ट संग्रह है, क्योंकि इसमें सर्वाधिक ताज़गी है। अफ़सोस कि निराला-काव्य के प्रेमियों ने भी इसे लक्ष्य नहीं किया, इसे उनकी एक गौण कृति मान लिया है। ‘नए पत्ते' में छायावादी सौन्दर्य-लोक का सायास किया गया ध्वंस तो है ही, यथार्थवाद की अत्यन्त स्पष्ट चेतना भी है। ‘बेला' की रचनाओं की अभिव्यक्तिगत विशेषता यह है कि वे समस्त पदावली में नहीं रची गईं, इसलिए ‘ठूँठ' होने से बच गई हैं।
इस संग्रह में बराबर-बराबर गीत और ग़ज़लें हैं। दोनों में भरपूर विषय-वैविध्य है, यथा—रहस्य, प्रेम, प्रकृति, दार्शनिकता, राष्ट्रीयता आदि। इसकी कुछ ही रचनाओं पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। ‘रूप की धारा के उस पार/कभी धँसने भी दोगे मुझे?', ‘बातें चलीं सारी रात तुम्हारी; आँखें नहीं खुलीं तुम्हारी।', ‘लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो/भरा दौंगरा उन्हीं पर गिरा।' बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर, पर, भर दिया गया हूँ।' आदि। राष्ट्रीयता ज़्यादातर उनकी ग़ज़लों में देखने को मिलती है।
निराला की ग़ज़लें एक प्रयोग के तहत लिखी गई हैं। उर्दू शायरी की एक चीज़ उन्हें बहुत आकर्षित करती थी। वह भी उसमें पूरे वाक्यों का प्रयोग। उन्होंने हिन्दी में भी ग़ज़लें लिखकर उसे हिन्दी कविता में लाने का प्रयास किया। लेकिन निराला-प्रेमियों ने उसे एक नक़ल-भर मान उन्हें असफल ग़ज़लकार घोषित कर दिया। सच्चाई यह कि आज हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, उनके पुरस्कर्ता भी निराला ही हैं। ये ग़ज़लें मुसलसल ग़ज़लें हैं। मैं स्थानाभाव में उनकी एक ग़ज़ल का एक शे’र ही उद्धृत कर रहा हूँ :
तितलियाँ नाचती उड़ाती रंगों से मुग्ध कर-करके,
प्रसूनों पर लचककर बैठती हैं, मन लुभाया है।
Quaid Mein Aazad Qulam
- Author Name:
Anand Mohan
- Book Type:

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Description:
कविता भावप्रधान होने के कारण हृदय का व्यापार है, पर अनेक कविताओं में उदात्त विचारों की शृंखला भी उतनी ही आकर्षक और मोहक होती है और वैसी कविताएँ हृदय को संकीर्णताओं से उठाकर मुक्तावस्था में ले जाती हैं। इसके लिए कवि को उपयुक्त शब्द-विधान में निपुण होना चाहिए।...‘क़ैद में आज़ाद क़लम’ आनन्द मोहन की काव्यकृति है। काव्य की प्रमुख चिन्ता जीवन-मूल्यों को बचाए रखने की होती है, जिससे मानवता की श्रीवृद्धि होती रहे। मानव-मूल्यों के ह्रास की चिन्ता ‘क़ैद में आज़ाद क़लम’ के कवि की अधिकांश कविताओं में कलात्मक ढंग से अभिव्यक्त हुई है। जीवन-व्यापार की व्यापक विस्तृति में जहाँ छल-छद्म है, झूठ है, फ़रेब है, अन्याय-अत्याचार है, विसंगति और व्यभिचार है, वहाँ-वहाँ कविता में ‘शौर्य की हुंकार’ है। इनका सम्पूर्ण काव्य मार्मिक अनुभूतियों की वाग्वैदग्ध्यपूर्ण अभिव्यक्ति है।
—परिशंसा से
Lokpriyata Ke Shikhar Geet
- Author Name:
Vishnu Saxena
- Book Type:

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Description:
गीत तो गंगा की पावन पवित्र धारा के समान है। गीत का इतिहास बताता है कि हज़ारों वर्षों से चली आ रही इस परम्परा के साथ भले ही वक़्त छेड़छाड़ करता रहा हो, लेकिन उसके मूल स्वरूप को कोई नहीं बिगाड़ पाया, इसलिए ये गंगा पहले भी अपनी शान्त लहरों से जनमानस को आप्लावित करती रही और आज भी कर रही है।
मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक, गीत अपना अस्तित्व बनाए रखता है, इसलिए हर अवसर पर गीत किसी न किसी रूप में हमारे सामने आकर खड़ा हो जाता है। वैसे अब तक गीतों के अनेक संकलन प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन यह संकलन कई मायनों में अपने आप में इसलिए अनूठा है कि इसमें उन गीतों को शामिल किया गया है जो अपने समय में लोगों के गले का कंठहार बने। ये गीत इतने लोकप्रिय हुए कि कवि की पहचान बन गए।
प्रस्तुत संकलन में काव्य मंच के सभी लोकप्रिय गीतकारों के सर्वप्रिय, चर्चित गीतों को तो शामिल किया गया है, इसके अलावा उन गीतों को भी स्थान दिया गया है जो गीत लोकप्रिय तो होने चाहिए थे, लेकिन उन्हें समय पर उचित मंच नहीं मिला। इसलिए गीतकारों के गीतों की संख्या में भी समानुपात नहीं रखा गया है।
विश्वास है, हिन्दी गीतों का यह ख़ूबसूरत गुलदस्ता हिन्दी काव्य-प्रेमियों को महक तो देगा ही, साथ में तृप्ति का आभास भी कराएगा...।
Taseer
- Author Name:
Sulabha Kore
- Book Type:

- Description: A Collection Of Hindi Poems by Sulabha Kore
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