Aaj Ri Kavitavan

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Language:

Rajasthani

Category:

Poetry

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आज री राजस्थानी कवितावाँ एक कानी तो आपरी धरती री परंपरावा सूं कट्योडी है अर दूजै कानी वा हाल आपरी न्यारी पीछाण भी नीं बना पाई है। इण पोथी में गेली करयोड़ी आज री कवितावाँ इण साचनै तो उजागर करसी ही पण आपरै विसय अर बरवाण री विविधता नै भी सामरत करसी।

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ISBN
saaajrikavitavan
Pages
150
Avg Reading Time
5 hrs
Age
18+ yrs
Country of Origin
India

Format:

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About the Book

आज री राजस्थानी कवितावाँ एक कानी तो आपरी धरती री परंपरावा सूं कट्योडी है अर दूजै कानी वा हाल आपरी न्यारी पीछाण भी नीं बना पाई है। इण पोथी में गेली करयोड़ी आज री कवितावाँ इण साचनै तो उजागर करसी ही पण आपरै विसय अर बरवाण री विविधता नै भी सामरत करसी।

Book Details

  • ISBN
    saaajrikavitavan
  • Pages
    150
  • Avg Reading Time
    5 hrs
  • Age
    18+ yrs
  • Country of Origin
    India

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Aaj Ri Kavitavan captures contemporary Rajasthani poetry at a crossroads — rooted in the soil's centuries-old oral traditions yet struggling to articulate a distinctive modern identity. Published by Sahitya Akademi, this collection gathers verse that reflects the tensions of a language caught between folk memory and urban anonymity, between inherited doha rhythms and the pull of free verse experimentalism. The poems span subjects from agrarian decline and migration to urban alienation and gender politics, revealing a literary culture aware of its rich past yet uncertain of its place in India's multilingual literary landscape. What emerges is not a singular poetic voice but a spectrum of approaches — some elegiac, some defiant, some tentatively exploratory — each testing what Rajasthani verse can carry in the twenty-first century. The anthology does not resolve the identity crisis it diagnoses; instead, it offers a candid record of poets writing through that very uncertainty.

इण किताब नै पढ़तां मनै कांई अनुभव मिलसी?

आपनै एक साच्ची अर असहज यात्रा रो अनुभव मिलसी — कवितावां जिकी आपरी जड़ां खोजै अर नवी पीछाण री तलास में भटकै। ई रचनावां में एक खिंचाव है — परंपरागत छंद अर आधुनिक मुक्त शैली रै बिचाळै, गांव री याद अर सहर री बेगानगी रै बिचाळै। पाठक नै इण कवितावां में कोई एक साफ़ आवाज़ कोनी मिलसी, बल्कि घणखरी आवाज़ां मिलसी जिकी आपरै समै री पीड़ा अर संभावनावां नै अलग-अलग तरीकै सूं बयान करै। पढ़तां-पढ़तां आपनै लागसी कै राजस्थानी कविता आपरै आप सूं सवाल पूछ रयोड़ी है — अर ओ सवाल ही इण संग्रह री ताकत है।

इण किताब किणनै पढ़णी चाइजै अर पाठक सूं कांई अपेक्षा राखै?

  • वां पाठकां नै जिकां नै राजस्थानी भाषा री समकालीन स्थिति में रुचि है — साहित्यिक संकट अर प्रयोग दोनूं में
  • वां नै जिकां नै क्षेत्रीय भारतीय भाषावां री पीछाण री लड़ाई समझणी है
  • काव्य पारखियां नै जिकां नै परंपरा अर आधुनिकता रै टकराव में रस आवै
  • पाठक सूं अपेक्षा है कै वै सीधै जवाब री जगह खुलै सवालां नै स्वीकारै, अर विविधता नै कमज़ोरी कोनी बल्कि ईमानदारी मानै

इण किताब रो विसय आज रै भारतीय पाठकां खातर सांस्कृतिक रूप सूं कित्ता प्रासंगिक है?

राजस्थानी कविता री पीछाण रो संकट आज रै भारत में हरेक क्षेत्रीय भाषा रो संकट है — हिंदी अर अंग्रेज़ी रै दबाव में, शहरीकरण अर पलायन रै कारण, डिजिटल युग में मौखिक परंपरावां रै लुप्त होवतां। ई किताब दिखावै कै कित्तै राजस्थानी कवि आपरी बोली नै ज़िंदा राखण खातर लड़ रया है, पण साथै ई नवै विसयां — विस्थापन, लिंग, आधुनिकता — नै छूवण खातर भाषा नै खींच रया है। आज जद भारतीय भाषावां आपरी जगह बचावण खातर जूझ रयोड़ी है, इण संग्रह री बेचैनी एक बड़ी साच री गवाही है।

इण लेखक री दीठ इण विसय नै कांई खास बणावै?

इण संग्रह री ख़ासियत है कै ओ कोई एक काव्य-दर्शन थोपै कोनी — बल्कि राजस्थानी कविता री वर्तमान स्थिति नै ईमानदारी सूं दर्ज करै। साहित्य अकादमी रै संपादन में संकलित इण कवितावां नै चुनतां विविधता अर प्रयोगशीलता नै प्राथमिकता दीजी है, कोई एक स्कूल रै पक्ष में कोनी। परंपरा सूं जुड़ी रचनावां अर बिलकुल मुक्त प्रयोग — दोनूं नै जगह दीजी है। ओ संपादकीय साहस — खुद नै परिभासित करण री जगह खुद सूं सवाल पूछणो — इण किताब नै एक प्रामाणिक दस्तावेज़ बणावै।

इण किताब नै पढ़ लेवण रै बाद पाठक रै मन में कांई रह जासी?

  • एक भासा री बेचैनी अर संभावना दोनूं री गहरी समझ
  • इण बात रो अहसास कै साहित्यिक पीछाण कोई दियोड़ी चीज़ कोनी — वा लगातार बणती अर टूटती रैवै
  • राजस्थानी मिट्टी, परंपरा अर समकालीन जीवन रै बिचाळै रै तनाव री यादगार छवियां
  • इण सवाल रो जवाब खोजण री ललक कै क्षेत्रीय भारतीय कविता किण तरीकै आगै बधै — परंपरा नै छोड़ कोनी, पण उणनै नवै सिरै सूं जीवै

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