Pichhla Baqi
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यह कहकर कि विष्णु खरे हिन्दी में बिलकुल अलग ढंग की कविता लिखते थे (उनकी ख़ास अपने रंग की कविता की बात है यह, उन कुछेक कविताओं की नहीं जो उनकी उतनी ख़ास नहीं हैं), हम ज़रूर एक बड़ी बात कहते हैं। पर उनका अपना रंग क्या है, यह बताए बग़ैर बात अधूरी है। पहली ही नज़र में उन्हें अलग दिखा देनेवाली चीज़ है उनकी कविता का बाना; ऐसा बाना जिसमें से 'कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हैं—भावनात्मकता, लयात्मकता, आवेग और बहाव, लगाव और आत्मीयता, सहानुभूति और करुणा तक...। पहली नज़र में वे कविता होने का दावा करनेवाली गद्यात्मक कहानियाँ मालूम होती हैं। उनका कहानीपन भी वर्णनात्मक लगता है, कथात्मक नहीं, मानो जान-बूझकर लयहीन, गद्यात्मक, मनमाने तौर पर लम्बी या छोटी पंक्तियों में कुछ चीज़ों के बारीक वर्णन में घटना या पात्र जोड़ दिए गए हैं; आप कविता से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ, रुचियाँ, आदतें लेकर उनके पास जाते हैं और निराश होते हैं; आप कहानी की तरह उसे पढ़ना चाहते हैं तो पाते हैं कि जिन तत्त्वों (सूक्ष्म निरीक्षण, मानसिक या घटनागत मोड़, आश्चर्य इत्यादि) को आप कहानी पढ़ने के बाद खोजते या निकालते, वे ढाँचे की तरह—मांस-मज्जा-मोटापे से रहित—आपके सामने हैं, पूरी कहानी नहीं। कविता के रूप में आप जिस ताप, आवेग और शब्दों की मितव्ययिता चाहते हैं, वह नहीं है। कविता के रूप में उक्त तत्त्वों को जिन आवरण-आच्छादनों के साथ चाहते हैं, वे आवरण-आच्छादन भी नहीं हैं। कहानी की दृष्टि से शब्दों की कंजूसी, कविता की दृष्टि से शब्दों की इफ़रात। ‘अकेला आदमी’, ‘कोशिश’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताएँ आपको तब भी अपनी संस्कारगत काव्य-रुचियों के क़रीबतर जान पड़ती हैं। इससे बरबस आप विष्णु खरे की दूसरी कविताओं को समझने की, उनमें ‘कवितापन’ खोजने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी यह कोशिश लगातार चलती है; होते-होते आप कवि के मुरीद भी हो जा सकते हैं। समय इन कविताओं में एक तरह से सर्वव्याप्त आयाम है जिसमें देश या स्थान भी समाहित है। 'टेबिल’ में वह चार पीढ़ियों का क़िस्सा बनता है। ‘हँसी’ में वह हमारा अपना ज़माना है, जब पुरस्कृत बालक भूखा, पैदल, थका, शील्डों के बोझ से दबा घर पहुँचता है, जहाँ ख़ुद ही उसे ताला खोलना है; समारोह में विशेष स्वागत अतिथियों का है, सड़क पर पुलिस की घुड़क है, दूसरे दिन स्कूल में क़तार में वह निरीह इकाई मात्र है। एक संवेदनहीन, मूल्यहीन, क्रूर समाज का समय। 'गर्मियों की शाम’ में वह हमारी यौन-नैतिकता, अच्छाई, किशोर-मन की कसमसाहट का समय है। ‘स्वीकार’ और ‘डरो’ में, ‘दूरबीन’ और ‘वापस’ में और ‘कार्यकर्ता’ और ‘कोमल’ में हमारे समय का समाज-संगठन, व्यक्ति-सत्ता, व्यंग्य, तल्ख, विडम्बना, अक्सर दुरदुराए जाते आम इनसान संकेतित हैं। समय पर यही आँख ‘मुक़ाबला’ में प्रागैतिहासि फ़ैंटेसी को समेट लाती है। बचपन, कैशोर्य, जवानी, बुढ़ापा; सफलता, रोग, दैन्य, छोटे शहरों की उदासी और उदास आकर्षण, बड़े शहरों का दृश्य (‘वापस’) उनमें तरह-तरह से आता है। समय के लिए विष्णु खरे काल या महाकाल जैसे प्रत्यय नहीं अपनाते, और इस नुक्ते में उनकी काव्य-चेतना के दो रुझान स्पष्ट हैं। ‘समय’ शब्द हमारे समय में अंग्रेज़ी के ‘टाइम’ का प्रत्ययान्तर है, और प्रचलित आधुनिकतावाद में वह प्रगति, इतिहास, उत्तरोत्तर आगे बढ़नेवाला, रैखिक विकास का अर्थ लिए हुए है; व्यतीत हो जानेवाला समय है, ‘कालो न यात:’ वाला, आवर्तित, चक्राकार काल नहीं। लेकिन विष्णु खरे इसको ‘अर्थ’ और ‘अव्यक्त’ जैसी कविताओं में ‘एक प्रवहमान अनन्त लीला’ से जोड़ते हैं। आधुनिकता के विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक, विषयी-निरपेक्ष विषय-केन्द्रित दृष्टि के उपकरणों का उपयोग क्या वे अपनी मूल भारतीय दार्शनिक अवधारणाओं की पड़ताल करने में कर रहे हैं? सर्वातीत, लीला, स्थावर-जंगम जैसे शब्द उनके यहाँ बार-बार हैं, और केवल शब्द ही नहीं, उनके अर्थ को स्वीकार करनेवाली चेतना भी। यह चेतना—शक होता है कि—सचेत रूप से अपनाई हुई नहीं है, बल्कि उनमें ख़ुद-ब-ख़ुद है, इस देश-प्रदेश में पलने, बढ़ने के कारण। उसकी पुष्टि तरह-तरह के अध्ययनों से, हालाँकि भारतीय अवधारणा से कुछ भिन्न रूपोंवाले स्रोतों से होती है—दॉन हुआन, बोर्खेस के हवाले द्रष्टव्य हैं। तर्क से चलकर अतर्क्य तक पहुँचना इसीलिए सम्भव है। क्षणवाद को इस तरह वे विजित करते दीखते हैं। अस्तित्ववादी अकेलेपन और संत्रास की धारणाओं का आतंक इसीलिए उन पर नहीं दीखता। अन्तत: निष्कृति का द्वार उन्हें सहज ही पता है।
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यह कहकर कि विष्णु खरे हिन्दी में बिलकुल अलग ढंग की कविता लिखते थे (उनकी ख़ास अपने रंग की कविता की बात है यह, उन कुछेक कविताओं की नहीं जो उनकी उतनी ख़ास नहीं हैं), हम ज़रूर एक बड़ी बात कहते हैं। पर उनका अपना रंग क्या है, यह बताए बग़ैर बात अधूरी है। पहली ही नज़र में उन्हें अलग दिखा देनेवाली चीज़ है उनकी कविता का बाना; ऐसा बाना जिसमें से 'कवितापन’ के निशान मानो चुन-चुनकर हटा दिए गए हैं—भावनात्मकता, लयात्मकता, आवेग और बहाव, लगाव और आत्मीयता, सहानुभूति और करुणा तक...। पहली नज़र में वे कविता होने का दावा करनेवाली गद्यात्मक कहानियाँ मालूम होती हैं। उनका कहानीपन भी वर्णनात्मक लगता है, कथात्मक नहीं, मानो जान-बूझकर लयहीन, गद्यात्मक, मनमाने तौर पर लम्बी या छोटी पंक्तियों में कुछ चीज़ों के बारीक वर्णन में घटना या पात्र जोड़ दिए गए हैं; आप कविता से जुड़ी अपनी अपेक्षाएँ, रुचियाँ, आदतें लेकर उनके पास जाते हैं और निराश होते हैं; आप कहानी की तरह उसे पढ़ना चाहते हैं तो पाते हैं कि जिन तत्त्वों (सूक्ष्म निरीक्षण, मानसिक या घटनागत मोड़, आश्चर्य इत्यादि) को आप कहानी पढ़ने के बाद खोजते या निकालते, वे ढाँचे की तरह—मांस-मज्जा-मोटापे से रहित—आपके सामने हैं, पूरी कहानी नहीं। कविता के रूप में आप जिस ताप, आवेग और शब्दों की मितव्ययिता चाहते हैं, वह नहीं है। कविता के रूप में उक्त तत्त्वों को जिन आवरण-आच्छादनों के साथ चाहते हैं, वे आवरण-आच्छादन भी नहीं हैं। कहानी की दृष्टि से शब्दों की कंजूसी, कविता की दृष्टि से शब्दों की इफ़रात। ‘अकेला आदमी’, ‘कोशिश’ और ‘दोस्त’ जैसी कविताएँ आपको तब भी अपनी संस्कारगत काव्य-रुचियों के क़रीबतर जान पड़ती हैं। इससे बरबस आप विष्णु खरे की दूसरी कविताओं को समझने की, उनमें ‘कवितापन’ खोजने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी यह कोशिश लगातार चलती है; होते-होते आप कवि के मुरीद भी हो जा सकते हैं।
समय इन कविताओं में एक तरह से सर्वव्याप्त आयाम है जिसमें देश या स्थान भी समाहित है। 'टेबिल’ में वह चार पीढ़ियों का क़िस्सा बनता है। ‘हँसी’ में वह हमारा अपना ज़माना है, जब पुरस्कृत बालक भूखा, पैदल, थका, शील्डों के बोझ से दबा घर पहुँचता है, जहाँ ख़ुद ही उसे ताला खोलना है; समारोह में विशेष स्वागत अतिथियों का है, सड़क पर पुलिस की घुड़क है, दूसरे दिन स्कूल में क़तार में वह निरीह इकाई मात्र है। एक संवेदनहीन, मूल्यहीन, क्रूर समाज का समय। 'गर्मियों की शाम’ में वह हमारी यौन-नैतिकता, अच्छाई, किशोर-मन की कसमसाहट का समय है। ‘स्वीकार’ और ‘डरो’ में, ‘दूरबीन’ और ‘वापस’ में और ‘कार्यकर्ता’ और ‘कोमल’ में हमारे समय का समाज-संगठन, व्यक्ति-सत्ता, व्यंग्य, तल्ख, विडम्बना, अक्सर दुरदुराए जाते आम इनसान संकेतित हैं। समय पर यही आँख ‘मुक़ाबला’ में प्रागैतिहासि फ़ैंटेसी को समेट लाती है। बचपन, कैशोर्य, जवानी, बुढ़ापा; सफलता, रोग, दैन्य, छोटे शहरों की उदासी और उदास आकर्षण, बड़े शहरों का दृश्य (‘वापस’) उनमें तरह-तरह से आता है।
समय के लिए विष्णु खरे काल या महाकाल जैसे प्रत्यय नहीं अपनाते, और इस नुक्ते में उनकी काव्य-चेतना के दो रुझान स्पष्ट हैं। ‘समय’ शब्द हमारे समय में अंग्रेज़ी के ‘टाइम’ का प्रत्ययान्तर है, और प्रचलित आधुनिकतावाद में वह प्रगति, इतिहास, उत्तरोत्तर आगे बढ़नेवाला, रैखिक विकास का अर्थ लिए हुए है; व्यतीत हो जानेवाला समय है, ‘कालो न यात:’ वाला, आवर्तित, चक्राकार काल नहीं। लेकिन विष्णु खरे इसको ‘अर्थ’ और ‘अव्यक्त’ जैसी कविताओं में ‘एक प्रवहमान अनन्त लीला’ से जोड़ते हैं। आधुनिकता के विश्लेषणात्मक, वैज्ञानिक, विषयी-निरपेक्ष विषय-केन्द्रित दृष्टि के उपकरणों का उपयोग क्या वे अपनी मूल भारतीय दार्शनिक अवधारणाओं की पड़ताल करने में कर रहे हैं? सर्वातीत, लीला, स्थावर-जंगम जैसे शब्द उनके यहाँ बार-बार हैं, और केवल शब्द ही नहीं, उनके अर्थ को स्वीकार करनेवाली चेतना भी। यह चेतना—शक होता है कि—सचेत रूप से अपनाई हुई नहीं है, बल्कि उनमें ख़ुद-ब-ख़ुद है, इस देश-प्रदेश में पलने, बढ़ने के कारण। उसकी पुष्टि तरह-तरह के अध्ययनों से, हालाँकि भारतीय अवधारणा से कुछ भिन्न रूपोंवाले स्रोतों से होती है—दॉन हुआन, बोर्खेस के हवाले द्रष्टव्य हैं। तर्क से चलकर अतर्क्य तक पहुँचना इसीलिए सम्भव है। क्षणवाद को इस तरह वे विजित करते दीखते हैं। अस्तित्ववादी अकेलेपन और संत्रास की धारणाओं का आतंक इसीलिए उन पर नहीं दीखता। अन्तत: निष्कृति का द्वार उन्हें सहज ही पता है।
Book Details
-
ISBN9788171194193
-
Pages99
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारतीय स्त्री-कविता को बहुत दिनों से तलाश थी एक ऐसे स्त्री-स्वर की जिसके लेखन में निराला की नायिका पूरे ठस्से के साथ हँसती दिखाई दे, सबको दाँव देती हुई-सी हँसी। शान्ति नायर के कविता-संग्रह ‘ज्यामिति’ की कविताओं में सबको दाँव देती उसी हँसी का ताना-बाना मुझे विस्मय-विमुग्ध कर गया। उनमें बृहत्तर जगत के सरोकार अधिक मुखर और स्पष्ट रूप से सामने आते हैं, पर कविता की व्यंजना शक्ति की तिलांजलि दिये बग़ैर। संग्रह की ‘मैच द फ़ॉलोइंग’, ‘संजीवनी’, ‘दूध फटना’, ‘अनुष्ठान’ जैसी कविताओं में हमारे राजनीतिक-सामाजिक जीवन की समस्त विडम्बनाएँ जिस सजग बाँकपन के साथ व्यक्त हैं, वह किसी को भी एक झटके में उठाकर बैठा सकती हैं। ‘ट्रैफ़िक जाम’ कविता भास्वर प्रमाण है इस बात का कि पढ़ी-लिखी मध्यवर्गीय स्त्रियों पर अब कोई यह अभियोग लगा नहीं सकता कि दमित वर्गों-वर्णों की स्त्रियों का दुख उनके निजी दुखों में शामिल नहीं। चौके-चूल्हे, पास-पड़ोस, हाट-बाज़ार, दैनन्दिन जीवन के अन्य जीवंत प्रसंगों से धारोष्ण बिम्ब उठाकर जैसे भक्त-कवयित्रियाँ ध्वनि और रस-बोध से उच्छल कविताएँ सहज ही रच देती थीं, शान्ति नायर भी घरेलू बिम्बों को अद्भुत दार्शनिक उठान दे लेती हैं—‘अनिद्रा’ कविता में उदासीनता में ख़मीर का उठकर रात की सीमा के पार फूल जाना एक ऐसा बिम्ब है जो स्त्री ही साध सकती है। इसी तरह ‘पुट्टू’ कविता में तैयार पुट्टू को साँचे के बाहर कर देने की ख़ातिर जो धक्का दिया जाता है, उसका मर्म स्त्री, एक समधीत स्त्री ही समझ सकती है जो घर के काम ही नहीं करती, सब कामों से समय चुराकर पढ़ती भी है, जिसमें यह समझने की भी विलक्षण प्रज्ञा है कि जीवन की असल चुनौती है ज्ञान का संज्ञान में बदलना। दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना—कैसे—यह आपको शान्ति नायर की कविताएँ बख़ूबी समझा देती हैं। स्त्री की पसलियों का ‘लाड़ला दर्द’, ‘कर्तव्य के बिछावन’ पर यहाँ कुनमुनाकर सोता है पर नींद में मुस्कुराता हुआ।
Jhukna Kisi Ko Ropna Hai
- Author Name:
Shriprakash Shukla
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नब्बे के बाद की हिन्दी कविता को कवियों की जिस पीढ़ी ने अपने सरोकारी एवं सतत लेखन से सँवारा-बनाया है उनमें श्रीप्रकाश शुक्ल एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविताई का विस्तार तीन दशकों में फैला हुआ है, लेकिन इसकी खासियत है इसका सातत्य। 1999 में श्रीप्रकाश शुक्ल का पहला संग्रह ‘अपनी तरह के लोग’ के आने से लेकर 2022 में सातवें संग्रह ‘वाया नई सदी’ तक की यात्रा में एक निरन्तरता है। ये कृतियाँ क्रमशः संस्कृति, दर्शन और राजनीतिक चेतना की धुरी पर अपने समय को कातती हैं। इनके पूरे परिस्पन्द के बीच एक चीज सर्वनिष्ठ है और वह है लोकभाषा और जनपदीयता। बनारस अंचल श्रीप्रकाश शुक्ल की कविताओं की शिराओं में रक्त बनकर दौड़ रहा है। सोनभद्र, मिर्जापुर, प्रयाग और गाजीपुर का ‘लोकेल’ उनकी कविता में बुनियाद की तरह बिछा हुआ है। उनकी कविताओं पर इस क्षेत्र की लोककथाओं, लोक धुनों और गीतों का गहरा असर है। आख्यान-परम्परा का तो सबसे गहरा और व्यापक। श्रीप्रकाश शुक्ल की आख्यान शैली में लोक और शास्त्र दोनों में मौजूद दन्तकथाओं, किंवदन्तियों और मिथकीयता के आधुनिक सन्दर्भों का काव्यमय सन्धान अद्भुत और व्यापक है। लोककथाओं व मिथकीय पृष्ठभूमि के साथ श्रीप्रकाश शुक्ल ने बहुत साभिप्राय लोक देवों-देवियों, लोकनायकों और अति साधारण किरदारों के साथ मामूली जगहों, पेशों, रिवाजों व चीजों को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। प्रशस्त इतिहासबोध और जनपदीयता के भीतर से कविता में इतिवृत्त और प्रकृति के संश्लेष के कारण श्रीप्रकाश शुक्ल इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधि कवि हैं।
Patthar Ki Bench
- Author Name:
Chandrakant Devtale
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चन्द्रकान्त देवताले की ये कविताएँ किसी साँचे या कार्यक्रम में ढली नहीं हैं बल्कि वे दूसरों के दिए गए और वक़्त-ज़रूरत स्वयं अपने भी काव्य-एजेंडा को तोड़ती हैं। चूँकि चन्द्रकान्त ने कविताएँ लिखना उस समय शुरू किया था जब प्रतिबद्ध होने के लिए किसी कार्ड या संघ की ज़रूरत नहीं हुआ करती थी, इसलिए वे भारतीय समाज तथा जनता से जन्मना तथा स्वभावत: जुड़े हुए हैं। उनकी कविता की जड़ें बेहद निस्संकोच रूप से हमारे गाँव-खेड़े, क़स्बे और निम्न-मध्यवर्ग में हैं और वहीं से जीने और लड़ने की प्रेरणा प्राप्त करती है। और वह जीवन इतना वैविध्यपूर्ण और स्मृतिबहुल है कि कविता के लिए वह कभी कम नहीं पड़ता। चन्द्रकान्त देवताले की मौलिक प्रतिबद्धता इसीलिए हिन्दी के अवसरवादी गिरोहों और प्रमाणपत्र-उद्योग को और हास्यास्पद बना देती है। दरअसल चन्द्रकान्त जैसे कवि अपने सृजनात्मक शक्ति-स्रोतों के आगे इतने विवश रहते हैं कि उन्हें अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने के अलावा कुछ भी और परेशान नहीं करता। एक वजह यह भी है कि चन्द्रकान्त देवताले ने मानव-जीवन और अस्तित्व को कभी भी एक-आयामीय नहीं समझा है, इसलिए उनकी इन कविताओं में, और पिछली कविताओं में भी, जहाँ भारतीय समाज और राजनीति की तमाम विडम्बनाओं और कुरूपताओं के विरुद्ध एक खुला ग़ुस्सा है, वहीं परिवार, मित्रों, कामगारों, बच्चों और चीज़ों की आत्मीय उपस्थिति भी है। इनके साथ-साथ चन्द्रकान्त ने अपना एक निहायत व्यक्तिगत जीवन जीने और मानव-अस्तित्व की कुछ चुनौतियों पर चिंतन करने के अपने एकान्त अधिकार को बचाए रखा है और इसीलिए इन कविताओं में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के कई ऐसे हवाले और आयाम मिलेंगे जो हिन्दी कविता में दुर्लभ हैं। जिस ‘प्रेम’ या ‘ऐन्द्रिकता' को एक खोज की तरह कविता में वापस लाने के दावे कहीं-कहीं किए जा रहे हैं, वह चन्द्रकान्त देवताले की पिछले तीन दशकों की रचनाधर्मिता में एक प्रमुख सरोकार तथा लक्षण रहा है और यदि अन्तिम परिवर्तन मृत्यु है तो उस पर भी चन्द्रकान्त देवताले ने बिना रुग्ण हुए कुछ अद्वितीय कविताएँ लिखी हैं। काव्य-भाषा और शिल्प पर भी जाएँ तो चन्द्रकान्त देवताले की ये कविताएँ एक अत्यन्त सुखद विकास का प्रमाण हैं। अपनी अन्तरंग रचनाओं में कवि की भाषा अब अधिक से अधिक पारदर्शी हुई है और उसमें साठ और सत्तर के दशक की सघनता और गठीलापन समय और अनुभव के प्रवाह से मँजकर एक विरल संगीतात्मकता तक पहुँचे हैं। चन्द्रकान्त देवताले अपनी समष्टिपरक कविताओं में हमेशा सीधे सम्बोधन की भाषा के क़ायल रहे हैं और वैसी रचनाओं में उनके शब्द और मारक तथा लक्ष्यवेधी हुए हैं। उनके कुछ बिम्ब और कूटशब्द जैसे पत्थर, चट्टान, चाकू, समुद्र आदि इन कविताओं में भी लौटे हैं लेकिन ज़्यादा निखर कर। ‘लैब्रेडोर’ कविता शृंखला में चन्द्रकान्त देवताले ने सजगता और संघर्ष का एक सर्वथा नया तथा सार्वजनिक माध्यम चुना है जबकि ‘गाँव तो भूल नहीं सकता था मेरी हथेली पर’ तथा ‘नागझिरी’ जैसी कविताओं में वे अपने अनुभव और पाठक के बीच किसी भी अलंकरण को नहीं आने देते। ये लम्बी कविताएँ हैं और स्मरण दिलाती हैं कि ‘भूखंड तप रहा है’ जैसी रचना का यह सृजेता हिन्दी के उन बहुत कम कवियों में से है जिनसे लम्बी कविता भी सध पाती है। हिन्दी कविता के इन दिनों में जब दुर्भाग्यवश अधिकांश प्रतिभाशाली युवा और अधेड़ कवि भी बहुत जल्दी अपनी सम्भावनाओं के सीमान्त पर पहुँच रहे लगते हैं, चन्द्रकान्त देवताले की ये कविताएँ अपने प्रतिबद्ध ग़ुस्से की बार-बार धधकती उपस्थिति, गहरी मानवीयता और मर्मस्पर्शिता तथा निजी रिश्तों, संकटों, चिन्ताओं की स्वीकारोक्तियों की सदानीरा वैविध्यपूर्ण जटिलता से उन पर लौटने को बाध्य करती हैं। ‘आग’ चन्द्रकान्त के प्रिय बिम्बों में से है और उनकी कविता ठीक आग की तरह हिन्दी की अधिकांश रही कविता और आलोचना को राख कर देती है और अपनी जाज्वल्यमान उपस्थिति स्वीकारने पर बाध्य करती है। जिन कवियों को समझे बिना बीसवीं सदी की हिन्दी कविता का कोई भी आकलन बौद्धिक दारिद्र्य से विकलांग माना जाएगा, चन्द्रकान्त देवताले उनमें से एक रोमांचक, अमिट हस्ताक्षर हैं।
Yadi Pyar Karo
- Author Name:
Taslima Nasrin +1
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प्रेम। अकुंठ प्रेम। निर्बंध प्रेम। देह और आत्मा को आप्लावित करता प्रेम। शरीर के सर्वांग को कँपाता आग-सा जलता, बर्फ़-सा शीतल प्रेम। प्रेम जिसके चिह्न देर तक साथ रहते हैं, देह पर भी, मन पर भी, रूह के भीतर गहरे अँधेरे में भी। यादों में चहकता, उम्मीद और इन्तज़ार में छटपटाता प्रेम! प्रेम की इन कविताओं को तसलीमा नसरीन के अलावा भला कौन लिख सकता था। प्रेम के समूचे अनुभव को शब्द देने के लिए एक साहसी क़लम की ज़रूरत हर दौर में पड़ेगी, उनके पास वह क़लम है, वह साहस भी। उनके भीतर की प्रेमाकांक्षी स्त्री कहती है—‘यदि प्यार करो’ तो उसे कहो, और इस तरह कहो कि ‘चिड़ियाँ कहें, पेड़ के पत्ते, फूल बोलें, आकाश बोले, मेघ-वर्षा बोलें, धूप बोले, चन्द्रमा की रोशनी बोले, पड़ोसी बोलें, तालाब का घाट बोले, कि तुम मुझे प्यार करते हो।’ ‘यदि प्यार करो’ में संकलित तसलीमा नसरीन की इन कविताओं में वह सब कुछ है जिसका आविष्कार प्रेम ने अब तक किया है—बेशर्त समर्पण भी, अधिकार भी, ईर्ष्या भी, और हाँ, अपने होने का गहरा बोध भी, अपने अस्तित्व को अपनी हद में सम्पूर्ण बनाए रखने की ज़िद भी, क्योंकि अगर मैं ही नहीं हूँगी तो प्यार कौन करेगी, और तुम किससे प्यार करोगे? तसलीमा का प्यार न समाज के सामने शर्मिन्दा है, न उम्र के सामने अवश, न मानक-स्वीकृत रिश्तों की चहारदीवारी तक सीमित। यह सम्पूर्ण प्रेम है, जैसा उसे होना चाहिए।
Shoonya Ki Jheel Mein Prem
- Author Name:
Mayank Murari
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‘शून्य की झील में प्रेम’ में लौकिक प्रेम को अलौकिक प्रेम में परिवर्तित होते हुए देखना सुखद अनुभूति है। प्रेम जिसकी महिमा आदिकाल से आराध्य देवताओं से लेकर साधारण मनुष्य तक व्याप्त है जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया और जब तक जीवित रहा।-ख़ुदेजा ख़ान मयंक मुरारी का नवीनतम कविता-संग्रह ‘शून्य की झील में प्रेम’ विश्व के प्रेम साहित्य को नए अरमानों से सुसज्जित करने का सुपर्ण सुयत्न है जिसके महत्त्व पर ख़ुदेजा ख़ान और स्वयं कवि ने यथेष्ट प्रकाश डाला है। कुछ आरम्भिक उद्धरण इसे पूर्णता प्रदान करते हैं। इसमें मेरे जैसे पाठक के लिए कुछ भी जोड़ पाना असम्भव है। यह प्रेम का मधु है जो मौन की अपेक्षा करता है। मयंक जी सिद्धहस्त एकान्त निस्पृह साधक हैं जिनका कवि-कर्म किसी तारीफ का मोहताज नहीं। उन्होंने इन टुकड़ों में अपना हृदय-रस उड़ेल दिया है जो समस्त भारतीय मानस को रसाप्लावित करेगा। शून्य की झील इश्क और अध्यात्म के सामासिक ऐश्वर्य को इंगित करने वाला प्रतीक बन मयंक मुरारी की काव्य-साधना का महत्तम राग बन जाती है। इसी के साथ वे न केवल हिन्दी बल्कि सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के उन सारस्वत कवियों के शिरोमणि बनने की ओर अग्रसर हैं जो इश्क़ के रूहानी और डिवाइन तत्वों का प्रतिनिधित्व करने की सामर्थ्य रखते हैं। प्रत्येक टुकड़े की शिरोरेखा की भाँति प्रदत्त गद्य मुखड़े पूरी पुस्तक को नई रश्मियों से आलोकित करते हैं। यह पुस्तक सहृदय पाठकों का हृदय हार बने, यही कामना है। अस्तु। अरुण कमल
Alfaaz Sitaaron Jaise
- Author Name:
Malvi Malhotra
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अब कहाँ आँसू हैं उसके नाम के ज़ब्त मैं जाने कहाँ से लाई हूँ मालवी मल्होत्रा यूँ तो एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं, सिने-स्क्रीन का एक जाना-पहचाना चेहरा, लेकिन इसके अलावा वे एक संजीदा ग़ज़लगो भी हैं। यह उनकी ग़ज़लों की किताब है जिसमें ग़मे-दौराँ और ग़मे-जानाँ को एक साथ समेटने वाली उनकी कुछ यादगार ग़ज़लें शामिल हैं। प्रेम की अलग-अलग मनःस्थितियों और अहसासात को शे’रों में पिरोते हुए ये ग़ज़लें हमें मजबूर करती हैं कि हम उन्हें बार-बार पढ़ें। एक शे’र देखें,ग़ा वो ज़माने को आया था देकर मगर शर्म से थी मैं क्यों पानी-पानी इसी तरह के कई शे’र इन ग़ज़लों में आपके सामने बार-बार आते हैं जिनमें इश्क़ का पारम्परिक फ़्रेम अपनी हदों को बढ़ाता दिखता है। कुछ ग़ज़लें यहाँ ऐसी भी हैं जो समाज और आसपास के मौजूदा हालात की तरफ़ हमारा ध्यान खींचती हैं; मसलन कोरोना के दौर के हवाले से लिखी गई ग़ज़लें और क़ौमी एकता की ज़रूरत को रेखांकित करती ग़ज़लें।
Ladkiyaan Hain To
- Author Name:
Rajendra Prasad Pandey
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राजेन्द्र प्रसाद पांडेय की कविताओं की दुनिया काफी बड़ी और वैविध्यपूर्ण है। उनमें मनुष्य से लेकर पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के प्रति भी संवेदना प्रकट हुई है। उनमें सरकारी योजनाओं की निरर्थकता और जनता की स्वार्थ-भावना का भी चित्रण हुआ है। ‘अधबना पुल, ईंटें और पुलघाट’ उनकी ऐसी ही कविता है, जिसमें व्यवस्था की नीतियों का पर्दाफाश हुआ है। ‘परबाबा की विदाई’ में मनुष्य की जिजीविषा, इच्छाओं और सद् विचारों का अच्छा चित्रण हुआ है। ‘सुख के दुख’, ‘कहाँ हो नन्दिता कँवर’, ‘बीज’, ‘दुख है पहचान का मरना’, ‘संस्कार युद्ध’, ‘लालन-पालन’, ‘नाच रही हो माँ’, ‘बेटी’, ‘रक्षाबन्धन पर दीदी को प्रणाम’, ‘पीपल को प्रणाम’ आदि उनकी बेहतरीन कविताएँ हैं। ये कविताएँ एक तरफ मानवीय मूल्यों और रिश्तों को सींचती हैं तो दूसरी तरफ हमारे समय की शिनाख्त करती हैं। साथ ही हमें जगाती और सचेत भी करती हैं।
Dhoop Ke Liye Shukriya Ka Geet Tatha Anya Kavitayen
- Author Name:
Mithilesh Kumar Rai
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यथार्थ के अनुभवमूलक अन्वेषण और संवेदना के नए धरातल के कारण युवा कवि मिथिलेश कुमार राय के इस संग्रह की कविताएँ अलग से आकर्षित करती हैं। ग्रामीण जीवन के यथार्थ की अभिव्यक्ति के लिए अब तक जो फ्रेम हिंदी कविता में बने या बनाए गए, ये कविताएँ उन ढाँचों या चौकठों से बाहर की कविताएँ हैं। हिंदी में ग्रामीण जीवन के चित्रण को लेकर बनी बद्धमूल धारणाओं को और नई अवधारणाओं को विकसित करने का उपक्रम 1990 के बाद से निरंतर होता रहा है। फिर भी, मिथिलेश की कविताओं को पढ़ते हुए एक सुखद आश्चर्य होता है कि लोक जीवन के बारे में अब भी इतना कुछ, इतना नया, इतना अनूठा और इतना मार्मिक भी; कहने को बचा रह गया था। संग्रह की पहली ही कविता 'लक्ष्मी देवी उपले बढिय़ा थोपती है' की शुरुआती पंक्तियाँ द्रष्टव्य है— लछमी देवी उपले बढिय़ा थोपती हैंसम्मान के पर्चे पर इनका भी नाम चढऩा चाहिए महोदयलछमी देवी सानी इतना अच्छा लगाती हैंकि नाद जब ख़ाली हो जाता हैभैंसें तभी गर्दन ऊपर करती हैंसंग्रह में एक कविता है—'चावल लेने पड़ोसी के घर दौड़ती हैं स्त्रियाँ।' इस तरह की कविता में प्राय: अभाव का चित्रण होता है, लेकिन मिथिलेश लिखते हैं कि चावल, चीनी, चायपत्ती आदि माँगने जाने वाली स्त्रियाँ पड़ोसियों के साथ नेह-छोह के रिश्तों को जुगाने के लिए भी जाती हैं। ज़ाहिर है, कहन का यह नया ढंग यथार्थ की नई समझ के चलते ही आया है। निस्संदेह लोक अस्मिता की नई पहचान के कारण युवा कवि का यह संग्रह अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करने में सफल होगा। —मदन कश्यप
Dhoop Ke Liye Shukriya Ka Geet Tatha Anya Kavitayen
Mithilesh Kumar Rai
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Available
KASMAI DEVAYA
- Author Name:
Arun Mishra
- Book Type:

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हमारे कवियों की कविता से प्रकृति के विविध अवयव धीरे-धीरे गायब हो गए हैं। ऐसे समय में मिश्रजी की कविताएँ सुखद अनुभूति प्रदान करती हैं। उनके पास भाषा, शिल्प और शब्दों का अद्भुत भंडार है।’’ ‘‘श्री मिश्र प्रकृति से गहराई से जुड़े हैं, वे काव्य सृजन के लिए बार-बार प्रकृति के पास जाते हैं। प्रकृति उनके साथ पूरा सहयोग भी करती है। वे लोप होती हुई संवेदनाओं के कवि हैं।’’ —प्रो. कुँवर पाल सिंह
Rasoi Ki Khidki Mein
- Author Name:
Sunita Jain
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Poems by Sunita jain
Prem Bhi Ek Yatana Hai
- Author Name:
Savita Singh
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अपने हठधर्मी स्त्रीवाद के लिए जानी जाती सविता सिंह की प्रेम कविता हिन्दी की दिलचस्प परिघटना इस मानी में है कि जैसे वह उस बहु परीक्षित सिद्धान्त का पुनर्स्मरण हो कि अपरिमेय कोमल को बचाने के लिए विकट दृढ़ता अपरिहार्य होती है। ‘प्रमे भी एक यातना है’ संग्रह सविता की अब तक की लिखी प्रेम कविताओं का संचयन है—प्रेम जो कैशोर्य, युवा और प्रौढ़ होते जीवन में लगभग उसी तापमान और तनाव में बना तो रहता है लेकिन उसमें आते सूक्ष्म बदलावों का अलक्षित रहना असंभव होता जाता है। मसलन प्रेम की चहलक़दमियों के दौरान जो प्रकृति बर्फ़ और बारिश में बाह्य का रोमांटिक परिपार्श्व निर्मित करती थी, वह आभ्यन्तर का हिस्सा बनती जाती है। सखा के उन्मन प्रतीक्षा पलों में वह सखी होती जाती है। चाँद, तारे, पत्तियाँ, फूल, चींटे-चींटियाँ—इनसे जीवन्त संवाद का जो नाता बनता है वह विफल होती मनुष्यता का नैसर्गिक विकल्प बनता जाता है। हिन्दी की स्त्री कविता में इस अपूर्वत्व को अलक्षित छोड़ देना वैचारिक अपराध से कम नहीं होगा। प्रकृति सविता की मुँहबोली बहन है—उसके साथ लेसबियन तन्मयता का आध्यात्मिक समकालीन हिन्दी की मार्मिक निधि। एको फ़ेमिनिज़्म की वह विरल उदाहरण हैं। सविता स्त्रीवाद के अध्येता और सिद्धान्तकार के तौर पर प्रहारात्मक होती हैं लेकिन अपनी कविता में वह बिना किसी आहट के धीमे पदचाप के साथ गुज़रती हैं। इसीलिए उन्होंने समकालीन कविता के शब्दकोष के सबसे मुलायम और अवसाद भरे पदों को चुना है। इतनी सारी प्रेम कविताओं को पढ़कर यह भी लगता है कि प्रेम को सोचने-समझने, उसमें संसक्त होने और उसके देह-विदेह में विकंपित बने रहने के सिवा उनके पास कोई काम नहीं है—प्रेम सबसे बड़ा मानवीय मूल्य है। युद्धों, कड़वाहट, वर्चस्ववाद के इस विषाक्त युग में सविता सिंह की कविता पारस्परिकता का अनन्त पुनर्वास करती है : ढहते सम्बन्धों के समय में मर्ममय मरम्मत का कॉस्मिक सख्य भाव! देवीप्रसाद मिश्र
Thithak Gai Boondein
- Author Name:
Arvind Kumar Singh
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अरविन्द कुमार सिंह की कविताओं से गुज़रते हुए हमें एक दुर्लभ संयोग दिखाई पड़ता है। एक तरफ़ उनकी भाषा में दिनकर का ओज है और दूसरी तरफ़ नागार्जुन के यहाँ दिखाई पड़ने वाली रोज़मर्रा जीवन की हलचलें। ये हजारीबाग की पहाड़ियों का सौन्दर्य है, हरिद्वार का कुम्भ स्नान है, गाँव के मेले की बिसरी हुई यादें हैं, नदियाँ हैं, शाम हैं। प्रकृति इन कविताओं में बार-बार आती है—इसके बहुत सारे रंग उनकी कविताओं में दिखाई पड़ते हैं। दूसरी तरफ़ मज़लूमों, किसानों, मज़दूरों की पीड़ा भी उनकी कविताओं में मुखर हुई है। ये कविताएँ हमारे समय, समाज, धरती और हमारे आसपास के लोगों की आकांक्षाओं, पीड़ाओं, भावनाओं का आईना बनती हैं। इनमें हम अपने समय की धड़कन को सुन सकते हैं। इनमें सौन्दर्य है, प्रकृति है, धूमिल गाँव हैं, नदियाँ हैं और उनके बीच मनुष्य का श्रम भी है और उसका समूचा सौन्दर्य भी है—जो इस धरती को सुन्दर बनाता है।
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