Sonak Pijra
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मानव-दुर्दशाक बढ़ैत परिमाण, मानव-मूल्यक खुल्लमखुल्ला अपमानक वातावरण सँ मुक्तिक कामना हरदम सँ जन-आकांक्षा रहलए। कविताक लेल ई आकांक्षा, जीवन-राग छी जे पीड़ा आ कचोटक ताल पर बजैत रहैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता अही कचकैत पीड़ाक माझ सँ गमन करैए। आइ जाहि तथाकथित 'जनतांत्रिक व्यवस्था' सँ शासित छी हमरा लोकनि, ताहि मे पद-प्राप्ति होइते 'सेवक' अधिनायक भ' जाइए, भाग्य-विधाता बनि जाइए। अपेक्षा करैए जे ओकरा सँ जन-अधिकारक बात नइँ कयल जाए। कोनो प्रश्न नइँ पूछल जाए। कर्तव्यक चर्चा नइँ कयल जाए। जन के लेल एकमात्र उपाय छै, ठेहुनिया रोपि दसो नह जोड़ि, अनुनय, विनय, प्रार्थना, मनुहार, चिरौरी कयल जाए—हे प्रभो! (भक्तक) आनंददाता, कनी एम्हरो तकियउ! खाली ओएह सब मनुख नइँ जकर संपत्ति दिनानुदिन विशाल भेल जाइए। बाकी जनता सेहो अही देशक वासी छी... एम्हरो तकियउ... जनतंत्रक नाम पर एहि विकराल बिडम्बना सँ सोझाँ-सोंझी होइत वैद्यनाथ मिश्रक कविता गंहीर उतरैत तीक्ष्ण व्यंग्य मे परिणत भ' जाइए। सूक्ष्म-पर्यवेक्षण आ स्पष्ट संलिप्तता सँ भरल-पुरल वैद्यनाथ मिश्रक कविता, विम्ब-विधानक सरलता सँ अपरूप काव्यानुभूतिक सृष्टि करैए, सोचबाक लेल बिलमबैए आ चेतना केँ हिलकोरैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता स्वयं आ समय सँ साक्षात्कार करबैए। एहि अनुभूतिक लेल पढऩाइ आवश्यक शर्त। —कुणाल
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मानव-दुर्दशाक बढ़ैत परिमाण, मानव-मूल्यक खुल्लमखुल्ला अपमानक वातावरण सँ मुक्तिक कामना हरदम सँ जन-आकांक्षा रहलए। कविताक लेल ई आकांक्षा, जीवन-राग छी जे पीड़ा आ कचोटक ताल पर बजैत रहैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता अही कचकैत पीड़ाक माझ सँ गमन करैए। आइ जाहि तथाकथित 'जनतांत्रिक व्यवस्था' सँ शासित छी हमरा लोकनि, ताहि मे पद-प्राप्ति होइते 'सेवक' अधिनायक भ' जाइए, भाग्य-विधाता बनि जाइए। अपेक्षा करैए जे ओकरा सँ जन-अधिकारक बात नइँ कयल जाए। कोनो प्रश्न नइँ पूछल जाए। कर्तव्यक चर्चा नइँ कयल जाए। जन के लेल एकमात्र उपाय छै, ठेहुनिया रोपि दसो नह जोड़ि, अनुनय, विनय, प्रार्थना, मनुहार, चिरौरी कयल जाए—हे प्रभो! (भक्तक) आनंददाता, कनी एम्हरो तकियउ! खाली ओएह सब मनुख नइँ जकर संपत्ति दिनानुदिन विशाल भेल जाइए। बाकी जनता सेहो अही देशक वासी छी... एम्हरो तकियउ... जनतंत्रक नाम पर एहि विकराल बिडम्बना सँ सोझाँ-सोंझी होइत वैद्यनाथ मिश्रक कविता गंहीर उतरैत तीक्ष्ण व्यंग्य मे परिणत भ' जाइए। सूक्ष्म-पर्यवेक्षण आ स्पष्ट संलिप्तता सँ भरल-पुरल वैद्यनाथ मिश्रक कविता, विम्ब-विधानक सरलता सँ अपरूप काव्यानुभूतिक सृष्टि करैए, सोचबाक लेल बिलमबैए आ चेतना केँ हिलकोरैए। वैद्यनाथ मिश्रक कविता स्वयं आ समय सँ साक्षात्कार करबैए। एहि अनुभूतिक लेल पढऩाइ आवश्यक शर्त। —कुणाल
Book Details
-
ISBN9789391925345
-
Pages120
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: ‘मेरा उजाड़ पड़ोस’ दिनेश जुगरान का चर्चित काव्य-संग्रह है। संग्रह की कविताएँ हमारे आज के आस्थाहीन समय के सत्य और संकट को, जिसमें जीवन-मूल्य पूरी तरह अपनी क़दरो-क़ीमत खो चुके हैं, एक अत्यन्त प्रभावशाली भाषा और मुहावरे में परिभाषित करती हैं। इनमें उस शफ़्फ़ाक़ और बेहिस दुनिया की परतें खुलकर सामने आती हैं जिसमें 'होशियार लम्हों' की 'साज़िश' के चलते, यह एहसास कि 'ज़हरीले बीज, टूटे फावड़े और/बिना धार की खुरपियों से/नई क्यारियाँ कैसे बनेंगी', एक गहरी उदासी और असहायता का बोध छोड़ जाता है। लेकिन यह हार मान लेनेवालों की कविताएँ नहीं हैं। इनका सरोकार ज़िन्दगी से है जहाँ हार-जीत साथ-साथ चलते हैं। दुनिया का बिगाड़, दिनेश जुगरान पर भी इस तरह असरअन्दाज़ होना चाहता है कि वह भीड़ का हिस्सा और ख़ुद अपना तमाशा हो जाएँ, लेकिन इससे उनकी ज़िन्दगी के लिए शिद्दत और गर्मजोशी कम नहीं होती। वह कहते हैं—'मैंने अभी तक/हार नहीं मानी है/जीना चाहता हूँ/अपना ही किरदार/धरती को रख लिया है/अपनी ज़बान पर/और पहाड़ों की धड़कनों को/पहन लिया है अपनी साँसों में।' दिनेश जुगरान की कविता हमें अपने अन्तराल तक देखने की शक्ति प्रदान करती है और लगता है हम किसी जादुई गोले में अपनी ज़िन्दगी के अन्तर्विरोधों से रू-ब-रू होते हुए उन रहस्यों तक पहुँच रहे हैं जिन पर किसी कारणवश अभी तक पर्दा पड़ा हुआ था। वे कविताओं के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की पड़ताल करते हुए, उसका अतिक्रमण करने का प्रयास भी करते हैं। कविता दिनेश जुगरान के लिए किसी बदलाव का नारा नहीं, व्यक्ति के स्वतंत्र होने का एहसास है। उनका लहज़ा, ख़ुद से बात करने का, और कविता का परिदृश्य एक बड़ी दुनिया के उजाड़ होने का ख़तरा और वह कुछ महत्त्वपूर्ण, जो उसके विरोध में किए जाने से रह गया, जिसका किया जाना अब पहले से भी ज़्यादा ज़रूरी मगर दुश्वार है। कविता तब होती है जब शब्द पहचाने अर्थ से बाहर जाकर नए जीवन-सत्यों को पारदर्शिता के साथ सामने रख पाएँ। दो वाक्यों के बीच की ख़ामोशी ही कभी-कभी वह रहस्यात्मकता होती है जिसे समझने में उम्रें बीत जाती हैं। जीवन की हर यात्रा दिनेश जुगरान के भीतर से गुज़रकर किसी बिम्ब, उपमा या प्रतीक में रूपान्तरित होती, ऐसे विरोधाभासों का सामना कराती है, जो लगता है किसी और तरह से व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं हो सकता। जैसे मैं देख और समझ सकता हूँ, उस एक मछली को जो ‘पानी से ऊपर उठाकर मुँह’ किसी को पुकारना चाहती है; जान सकता हूँ, उस ‘अज्ञात भय’ के टुकड़े को जो ‘उन डरी हुई तितलियों में/शामिल हो गया है/जो पहाड़ों से/नीचे गिर रही हैं।’ ‘आने से पहले ही चुपचाप/गुज़र जाता है लम्हा’ के अनुभव का शरीक, मैं महसूस कर सकता हूँ—‘मेरी डूबी हुई नाव का/सबसे मज़बूत हिस्सा/मेरी हथेलियों में/अभी भी चिपका हुआ है।’ या ‘सूर्योदय और सूर्यास्त का/फ़ासला’ ‘किस प्रकार पिता के माथे की लकीरों में/नापा जा सकता है’, और कैसे ‘बचपन के रहस्य/अन्दर ही अन्दर जकड़ गए हैं/चेहरे और शब्दों के दायरे/अब मुझे बाँध नहीं पाते/मेरे अन्दर की शीशे की खान/चूर-चूर हो चुकी है।’ जब वह कहते हैं—‘उसके नन्हे आँसू/एक दरिया छीनकर ले गया है’ तो जो मर्म उत्पन्न होता है, वह किसी दूसरी शब्दावली में कल्पना कर पाना सम्भव नहीं लगता। इसे उनकी भाषा पर अद् भुत पकड़ भी कहा जा सकता है और ज़िन्दगी की असलियत की गहरी समझ भी। उनकी भाषा और मुहावरा आनेवाले समय में लिखी जानेवाली कविता पर, देर तक और दूर तक, असरअन्दाज़ होगा। दिनेश जुगरान अपनी कविता में जिस रूपक का प्रयोग करते हैं, वह उनके दुनिया के अनुभव और निजी सोच के द्वन्द्वात्मक संघर्ष का निचोड़ होता है। आपबीती के जगबीती बनने की प्रक्रिया में निजी जीवन-सत्य व्यक्तिगत सीमाओं का अतिक्रमण कर विराट जीवन-सत्य के विभिन्न रूप रच लेते हैं। संक्षेप में ‘मेरा उजाड़ पड़ोस’ एक ऐसा महत्त्वपूर्ण काव्य-संग्रह है, जो हमारे मुश्किल संकटग्रस्त समय को आईना दिखाते हुए, हमें अपने भीतर के उजाड़ तक देखने की सलाहियत देता है। लगता है—‘हवा के वजन की तरह/लम्हा चेहरे पर उतरता हुआ’ के अन्दाज़ में। —मंज़ूर एहतेशाम
Danuphak Phool Jakan
- Author Name:
Vidyanand Jha
- Book Type:

- Description: देसक इतिहास आइ अपन निर्दयतम दौर सँ गुजरि रहल अछि जखन भाषा मे अपन अन्त:करणक रक्षा क' सकब एक कठिन चुनौती बनल अछि। मैथिलीक बहुलांश कवि-समुदाय केँ हमरा लोकनि आइ जत' रौरव के उत्सव मनबैत देखबा लेल अभिशप्त छी, विद्यानंद ने तँ अपन जनानुभव सँ एकात भेला अछि आ ने अभिव्यक्तिक जरब उठेबा मे कनियो थकमकाइत छथि। देसवासीक नियति केँ प्रभावित केनिहार हरेक प्रपंच पर हुनका लग अपन कविता छनि। नाना प्रकारक मानवीय आ प्राकृतिक उत्पातक बीच ओ साधारण जन पर पड़ैत एकर प्रभावे केँ उचित-अनुचितक दिशानिर्देशक मानैत रहला अछि। स्मृति सेहो कोना उपस्थित होइत छैक, से हम सब एत' बारंबार देखि सकै छी। हुनक काव्यानुभवक अनुरूपे हुनकर ई संग्रह सेहो विविधता आ व्यापकता सँ भरल अछि। समकालीन कविताक लेल अवश्ये ई एक महत्त्वपूर्ण बात थिक जे हमर ई कवि अपन हरेक नव संग्रह मे पछिला संग्रह सँ आगू बढ़ल देखाइत छथि। हुनकर पाठक लोकनि से एहू संग्रह मे देखि सकता। —तारानंद वियोगी # विद्यानंदक कविता मे आत्म निरीक्षणक एक टा अद्भुत पद्धति छनि। अस्तित्ववादक आधुनिक परम्पराक देशज आ लौकिक सहज विमर्श सँ जेना बियाह होइत हो। जतबे भावोत्तेजित ततबे निरीह, शांत, आ प्रतीतिकर। खेतिहर, गामक लोक, ऑरवेल, अम्बेडकर आ महात्मा गांधी—एहन अनेक पात्र हिनक काव्य मे सजीव भ'क' संवाद करैत अछि। कवि केँ धन्यवाद जे ओ अपन काव्य रचना मे सतत सत्यपरक, तथ्यपरक आ साहित्यिक सौन्दर्यपरक संतुलनक संग समुचित संसार गढ़ैत रहलाह अछि। —देव नाथ पाठक
Ishqnama
- Author Name:
Khwaja Ruknuddin Ishq
- Rating:
- Book Type:

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Description:
इस किताब में ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ के प्रसिद्ध फ़ारसी और उर्दू कलाम का संग्रह किया गया है. सूफ़ी-संतों के कलाम जनमानस में लोकप्रिय तो रहे हैं, लेकिन हिन्दी के पाठकों को इन्हें पढ़ने का अवसर कभी नहीं मिला. हिंदी पाठकों के लिए पहली बार ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ का कलाम देवनागरी में पेश किया जा रहा है. इस किताब के संपादक रय्यान अबुल
उलाई हैं.
Paka Hai Yah Kathal
- Author Name:
Nagarjun
- Book Type:

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Description:
जनचेतना की अभिव्यक्ति को मानदंड मानकर यदि सम्पूर्ण मैथिली साहित्य-धारा से तीन प्रतिनिधि कवियों को चुना जाए तो प्राचीन काल में विद्यापति, मध्यकाल में कवि फतुरी और नवजागरण काल में ‘यात्री' का नाम आएगा।
नागार्जुन ने इस सदी के तीसरे दशक के उत्तरार्द्ध में लिखना प्रारम्भ किया—‘वैदेह’ उपनाम से। उस समय के प्रारम्भिक लेखन पर मिथिला के परिनिष्ठ संस्कृत पंडिताऊपन का प्रभाव स्पष्ट है; क्योंकि इसी माहौल में उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल पा रहा था। लेकिन वे पंडितों को कूपमंडूपता में अधिक दिनों तक फँसे न रह सके। मिथिला के आम लोगों के बीच चले आए, लेकिन देश-विदेश की ताज़ा अनुभूतियों से तृप्त होने के मोह को भी छोड़ न पाए और वे मैथिली में ‘यात्री' नाम से चर्चित हो गए। पुन: देश-विदेश के अनुभव-अनुसन्धान के क्रम में बौद्ध भिक्षु नागार्जुन के रूप में जाने गए। आगे चलकर धर्म वग़ैरह का मुखौटा फेंकने के बाद भी हिन्दी में जनकवि बाबा नागार्जुन ही बने रहे।
लोकचेतना से जुड़े आज के किसी भी कवि को समझने के लिए उसके व्यक्तित्व, सन्दर्भ और भाव-उत्स को जानना आवश्यक है। ख़ासकर नागार्जुन जैसे कवि जो भाषा, भाव और शिल्प—तीनों दृष्टियों से जनता से जुड़े हैं, उन्हें समझने के लिए उनकी अभिव्यक्ति की मूल (मातृ) भाषा मैथिली की कविताओं को पढ़ना आवश्यक है जिनके माध्यम से उनके व्यक्तित्व की मुद्राओं, उनकी भूमि की सुगन्ध और ठेठ चुटीली सहजता को निरखा-परखा जा सकता है। इसीलिए जो बात, जो छुअन और उनकी ‘खुदी’ की पहचान इस संग्रह में उपलब्ध है, अन्यत्र सम्भव ही नहीं। ‘पका है यह कटहल’ बाबा नागार्जुन की मैथिली भाषा में लिखी गई कविताओं का पठनीय संकलन है।
VAH EK AUR MAN...
- Author Name:
Shri Praveen Kumar
- Book Type:

- Description: ये ज़रूरी नहीं कि सबका सच एक हो जाए, सबके अहसासात एक हो जाएँ, सबके नज़रिए, सबके फलस़फे एक हो जाएँ न मैं अपने जज़्बों को खुद थाम पाया कहाँ होंठ सीना, न मैं जान पाया सर्दजोशी का आलम, सुलगती़िफज़ाएँ न वो चुप हुआ है और न मैं बाज़ आया। रु़खसती रु़ख बदलने का भी नाम है बेरु़खी रोकना आज़माइश मेरी आँसुओं सा निकलकर कहाँ चल दिए धूल सी भर गई है नुमाइश मेरी। —इसी संग्रह से इस काव्य-संकलन में मानवीय रिश्तों का स्थायी भाव प्रेम, यत्र-तत्र-सर्वत्र है और उसी में रूबरू हुए दिल को छूनेवाले तमाम मंजरों का मर्यादित तस्करा भी है। समय के प्रवाह में जज्बातों को थामने, उनसे गुफ्तगू करने की कशिश गीतों और नज्मों में मुसलसल है, तो मसरूफियत के आगोश में अपनों से दूर हो जाने की पीड़ा भी कमोबेश इसमें शामिल है।
Aur Thodi Door
- Author Name:
Sachchidanand Visakh
- Book Type:

- Description: Poems
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5 out of 5
Book
10/03/2026
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good