Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon
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मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था।</p> <p>‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही।</p> <p>बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है।</p> <p>मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा/हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा/फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना/नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े/वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’</p> <p>सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है।</p> <p>—राजेन्द्र कुमार
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मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था।</p>
<p>‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही।</p>
<p>बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है।</p>
<p>मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा/हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा/फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना/नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े/वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’</p>
<p>सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है।</p>
<p>—राजेन्द्र कुमार
Book Details
-
ISBN9788180317491
-
Pages163
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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जीवन और जगत् के प्रति उनकी सजग, सतर्क, संवेदनशील दृष्टि समूचे काव्य-जगत से झाँकती है। जड़ता हमारे समाज को चारों तरफ़ से घेर रही है, ऐसे में मानवीय संवेदना को जीवित और सुरक्षित रखना कवि की प्राथमिकता है—‘सवाल यह नहीं है/कि किसे कम मिला/और किसके हिस्से में/ज़्यादा आया है/मेरी पीड़ा/अपने ही/बँट जाने की है।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं को तीन भागों में बाँटा जा सकता है। एक वह, जिसके केन्द्र में प्रकृति है। दूसरा वह, जिसमें इहलोक झाँकता है और कर्म के लिए प्रेरित करता है। तीसरा वह, जिसमें अमूर्त व गूढ़ विषयों पर महत्त्वपूर्ण कविताएँ हैं। बहुत सारे अवरोध तो उसके अपने ही हाथों खड़े किए गए हैं। चिड़िया भीग जाती है, नदी भर जाती है, धरती गीली हो जाती है, पर वह न भीग पाता है, न भर पाता है, न गीला हो पाता है। बचने की जुगत में रीता ही रह जाता है। भीगना, भरना, गीला होना व्यापक सन्दर्भ खोलते हैं। प्रकृति से यह दूरी उसे अधूरा ही रखती है—‘पर बहुत मुश्किल है/इस तरह/आदमी का/भीगना और/भर जाना/आदमी के पास/बचने के/उपाय हैं न।’
इन कविताओं में आकाश शामिल होता है चिड़िया की उड़ान में। चिड़िया की, घर पहुँचने की दृढ़ता को असीम सखा भाव से सहलाता है। प्रकृति से बड़ा कोई कलाकार नहीं और न ही प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक, सखा। प्रकृति न कोई भेदभाव करती है, न जाति-बिरादरी के आधार पर बँटवारा। कठघरे, घेरे तो हमारे अपने बनाए हैं—‘आकाश सबका/ दीवारें हमारी अपनी/नदी सबकी/गागर हमारी अपनी/धरती सबकी/आँगन हमारा अपना/बिराट सबका/सीमाएँ हमारी अपनी।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से गुज़रकर चीज़ें वह नहीं रहतीं जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नज़रिया अलहदा हो जाता है। इन कविताओं में ‘घर’ रह-रहकर आता है और घर एक समाधान, दिशा, दृष्टि की तरह आता है। वह दृष्टि, जो ‘मेरे घर’ को ‘अपना घर’ बनाती है—‘तुम मेरे घर/नहीं आती/अपने घर आती हो/पर अपने घर/आने के लिए/तुम्हारा मेरे घर आना/मुझे अच्छा लगता है/सचमुच/तुम्हारे घर ने/मेरे घर को/अपना घर बना दिया है।’ वहीं घर-1 व घर-2 कविताओं में घर भिन्न तरह से आता है, जहाँ ‘अपना घर’ कविता में सबके लिए गुंजाइश है। वह मेरे घर से अपना घर बनता है। पर यहाँ बड़ा घर होता है। अतीत, अनागत, वर्तमान के बावजूद। घर—1 कविता यही कहती है—‘चिड़ियों के लिए/और शायद/हम सभी के लिए/अतीत/अनागत/और वर्तमान का/इतना ही अर्थ है/कि हमें हर बार/रहने के लिए/एक घर बनाना है।’ एक छत की जद्दोजहद तो हमेशा रही है और सम्बन्धों के सगेपन को जीने की चाह भी और जहाँ यह हो, वहाँ तो घर होता ही है। ‘खिड़की’ कविता में व्याप्त घर इसी तरफ़ इशारा करता है।
ये कविताएँ कर्म के लिए उकसाती हैं। होश और जोश दोनों ही स्थितियों में कर्म की सीढ़ी बनाने की बात कहती हैं। इन कविताओं के केन्द्र में मनुष्य है। ये कविताएँ अपने-अपने ख़ुदाओं को बनानेवाले मनुष्य से मनुष्य बनने का आग्रह करती हैं—‘सवाल सिर्फ़/योग्यता का नहीं/हू-ब-हू होने का है/स्वयं को/भगवान मानने/मनवाने का नहीं स्वयं भगवान बन जाने का है/और फिर इस बार/ना सही भगवान/एक बेहतर/इनसान तो बन जाएँ।’
मुनि क्षमासागर जी की कविताएँ, प्रकृति को इतना पारदर्शी बना देती हैं कि उसमें भूत-वर्तमान-भविष्य, सत्ता, नश्वरता, व्यवस्था और जनजीवन के जटिल सम्बन्धों की पहचान आसानी से हो जाती है। ये कविताएँ प्रकृति को इतना अर्थगर्भित और व्यापक बना देती हैं कि इसमें हमारे समय और समाज की आहट अनन्त सम्भावनाएँ उत्पन्न करती हैं। इन कविताओं से गुज़रना प्रकृति, कर्म और घर के नज़दीक होना है। चिड़िया की तरह अपने आकाश, पेड़, नदी, परिवेश को जीना है। कुल मिलाकर अपने नज़दीक आना है, चिड़िया की तरह लौट आना है।
—प्रताप राव कदम
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ग़ज़ल एक विधा के रूप में जितनी लोकप्रिय है, ग़ज़ल कहनेवाले के लिए उसे साधना उतना ही मुश्किल है। दो मिसरों का यह चमत्कार भाषा पर जैसी उस्तादाना पकड़ और कंटेंट की जैसी साफ़ समझ माँगता है, वह एक कठिन अभ्यास है। और अक्सर सिर्फ़ अभ्यास उसके लिए बहुत नाकाफ़ी साबित होता है। यह तक़रीबन एक ग़ैबी है जो या तो होती है या नहीं होती।
मोनिका सिंह की ये ग़ज़लें हमें शदीद ढंग से अहसास कराती हैं कि उन्हें ग़ैब का यह तोहफ़ा मिला है कि ज़ुबान भी उनके पास है और कहने के लिए बात भी। और बावजूद इसके कि ये उनका मुख्य काम नहीं है, उन्होंने ग़ज़ल पर ग़ज़ब महारत हासिल की है। अपने भीतर की उठापटक से लेकर दुनिया-जहान के तमाम मराहिल, ख़ुशियाँ और ग़म वे इतनी सफ़ाई से अपने अशआर में पिरोती हैं कि हैरान रह जाना पड़ता है। शब्दों की किसी बाज़ीगरी के बिना और बिना किसी पेचीदगी के वे अपना मिसरा तराशती हैं जिसमें लय भी होती है और मायने भी।
‘यह सबक मुझको सिखाया तल्ख़ी-ए-हालात ने, साफ़-सीधी बात कहनी चाहिए मुबहम नहीं।' मुबहम यानी जो स्पष्ट न हो। यही साफ़गोई इनकी ग़ज़ल की ख़ूबी है, और दूसरे यह कि ज़िन्दगी से दूर वे कभी नहीं जातीं। वे पूछती हैं—‘जिस मसअले का हल ज़माने पास है तेरे, क्यूँ बेसबब उसकी पहल तू चाहता मुझसे।’ दिल के मुआमलों में भी उनके ख़यालों की उड़ान अपनी ज़मीन को नहीं छोड़ती। दर्द का गहरा अहसास हो या कोई ख़ुशी उनकी ग़ज़ल के लिए सब इसी दुनिया की चीज़ें हैं। ‘ढल रहा सूरज, उसे इक बार मुड़ के देख लूँ, रात लाती कारवाँ ज़ुल्मत भरा वीरान सब/ख़ौफ़ आँधी का कहाँ था, गर मिलाती ख़ाक में, बारहा मिलते रहे मुझसे नए तूफ़ान सब।’
उम्मीद है हिन्दी पाठकों को ये ग़ज़लें अपनी-सी लगेंगी।
Phir Kabhi Aana
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ओड़िया के वरिष्ठ कवि सीताकान्त महापात्र का यह संग्रह मृत्यु के विरुद्ध जीवन की हठ और प्रकृति में निबद्ध जीवन की अलग-अलग सम्भावनाओं का आख्यान है। जीवन के मौन क्षणों को भाषा में अंकित करते हुए वे इन कविताओं में जिस तरह जिजीविषा की नि:शब्द बोली को स्वर देते हैं वह अद्भुत है। चाहे यमराज से दोस्ताना बातें करते हुए उन्हें फिर कभी आने के लिए कहना हो या पृथिवीवासी वृक्षविरोधी यमदूतों को सम्बोधित वृक्ष-संहिता की कविताओं में बिंधा वृक्षालाप, और संग्रह की अन्य कविताएँ, सीताकान्त जी मनुष्य और प्रकृति से बने समवेत लोक की उत्तरजीविता की कामना को मंत्र की तरह जपते हैं।
“कल नहीं रहूँगा मैं/कुआँ-कुआँ का स्वर सुनाई दे रहा होगा/नन्ही मुस्कान होगी उसकी/फूल होंगे, मधुमक्खियाँ होंगी/ईश्वर उस बच्चे की मुस्कान देख तब भी आशान्वित होंगे।”
मरण के ऊपर जीवन की सम्भावनाओं को धन की तरह संचित करती ये पंक्तियाँ एक बड़े कवि की ओर से अपने आगे आनेवाले समय को शुभ आमंत्रण की तरह प्रकट होती हैं। एक अन्य कविता में वे कहते हैं :
“कितनी ख़ुशी से/इन्तिज़ार करती है लॉन की घास/दो नन्हे पैरों को चूमने का/फूलों के गमले गिर जाने का/तरह-तरह के रंग पहचाने जाने के लिए/रंग-बिरंगी दवा की गोलियाँ/पन्नी की क़ैद से मुक्त हो बाहर आने को।”
लेकिन धरती के जीवन को किसी परालोक का उपहार वे नहीं मानते। मनुष्य की संघर्ष-शक्ति और अपनी दुनिया आप सिरजने, बचाने और बढ़ाने की उद्दाम इच्छा को वे दैवी शक्ति से स्वतंत्र एक सत्ता के रूप में रेखांकित करते हैं, और जिस तरह यम को वापस जाने के लिए कहते हैं उसी तरह देवताओं को भी सुना देते हैं कि हमारे उद्धार के लिए नहीं, आप अवतार लेकर आते हैं, तो अपनी किसी परेशानी के कारण आते होंगे।
“स्वर्ग की चकाचौंध से चौंधियाकर/दीर्घ तनु, दिव्य रूप देवता गण/उससे अधीर हो भाग आते हैं हमारे बीच/धरातल के अँधेरे में/...दो, उन्हें अपना साथी बनने दो।”
Zindagi Ghazal Ho Gai
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1851 की जंगे–आज़ादी में हिन्दुस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होनेवाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफ़े–अव्वल के शायरों में गिना जाता है। धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं।
‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है। उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी। वही गुलो–बुलबुल, वही साग़ रो–मीना, वही शीरीं–फ़रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज़र आते हैं। लेकिन अकबर इसी रवायत पर क़ायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते।
लेकिन ख़ुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ। जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए। यूँ तो जाफ़र, मीर, सौदा, ग़ालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाक़ायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता। ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है।
विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है, उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता। इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे। बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज़मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दु:ख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज़हार भी किया है। लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदेही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ़ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
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