Yeh Prithvi Tumhein Deta Hoon
(0)
Author:
Durga Prasad Singh, MarkandeyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry₹
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मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था। ‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही। बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है। मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए— ‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’ सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है। —राजेन्द्र कुमार
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मार्कण्डेय की ख्याति एक कथाकार के रूप में विशेष है। लेकिन उन्होंने कविता और कहानी साथ-साथ लिखना शुरू किया था। सन् 1954 में उनका पहला कहानी-संग्रह ‘पान-फूल’ और सन् 1956 में पहला कविता-संग्रह—‘सपने तुम्हारे थे’ नाम से आया था।
‘सपने तुम्हारे थे’ के बाद उनका फिर कोई दूसरा काव्य-संग्रह नहीं आया। लेकिन फिर सन् 2006 की जनवरी में सतीश जमाली द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘नई कहानी’ का अंक एकाएक हाथ लगा। देखा, उसमें मार्कण्डेय की भी छह कविताएँ थीं। मार्कण्डेय जी से पूछा तो पता चला कि ये कविताएँ 1980 के दशक में लिखी गई कविताओं में से छाँटकर ‘नई कहानी’ में छपने को दी गई थीं। इस तरह यह भेद खुला कि मार्कण्डेय ने अपने कवि को ‘सपने तुम्हारे थे’ के साथ कोई अन्तिम विदाई नहीं दे दी थी। अलबत्ता काव्य-रचना के क्षेत्र में एक लम्बा मौन ज़रूर उन्होंने साध रखा था, जो शायद सन् 1980 के दशक में टूटा—भले ही बहुत थोड़े समय के लिए ही सही।
बहरहाल, प्रस्तुत संग्रह में मार्कण्डेय के पहले काव्य-संकलन ‘सपने तुम्हारे थे’ की कविताओं के साथ सन् 1980 के दशक में लिखी गई उनकी कविताओं को भी सम्मिलित किया गया है।
मार्कण्डेय कविता की ‘कला’ सीखने से ज़्यादा चाव रखते हैं यह सीखने में कि कविता में शब्दों को किसी सार्थक उद्देश्य से कैसे जोड़ा जाए। ‘अभी तो मैं सीख रहा हूँ’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ देखिए—
‘‘अगर सम्भव हुआ तो निहाई ले आऊँगा
हथौड़े से पीटूँगा, हँसिया बनाऊँगा
फिर मैं सीखूँगा शब्दों को गर्म करना
नाबदानों और वेश्यालयों में पड़े-पड़े
वे घिनौने, बदकार और चापलूस हो गए हैं...’’
सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मगर यह सब सीखने में मार्कण्डेय के कवि-रूप को कितनी सफलता मिली या यह सब सीखने में कविता का क्या-क्या दाँव पर लगा—इसकी जाँच–परख इन कविताओं के पाठक अपने विवेक से करेंगे, ऐसी आशा है।
—राजेन्द्र कुमार
Book Details
-
ISBN9788180317491
-
Pages163
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है। अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है। —सुमित्रानन्दन पंत
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है। काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है। उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
Hari Patang Par Hara Patanga
- Author Name:
Varun Grover +1
- Book Type:

- Description:
Age group 9-12 years कथा शुरू ऐसे होती है ……….एक है घोड़ा दो सवार हैं ….तीन लोक के चार द्वार हैं। यह अपनी हरियाली के लिये अपना बादल आप बनाने के सफर का किस्सा है। भटक भटक के किस्से किस्से जमा किए बादल के हिस्से वरुण ग्रोवर ने इस लम्बी कविता में ऐसी भाषा, बिम्ब और लय अपनाये हैं कि पुराने समय की खोजी यात्राएँ साकार होने लगती हैं। और वह यात्रा भी जो यात्रियों में अपने समय को समझने के लिए चलती है। इसमें एलन शॉ के चित्रों का वैविध्य बेमिसाल है। चित्रों में माया सभ्यता से लेकर अब तक के आम इंसान हैं। सब अपने-अपने तरीकों से अपने बादलों की खोज में दिखाई देते हैं। जैसे यह इंसानी सभ्यता की अनवरत खोज है। इस तरह किताब में दो कविताएँ हैं। दूसरी कहें कि पहलीॽ कि पहले के भी पहले की कविता, एलन शॉ की है।
Nihshabd Noopur : Rumi Ki 100 Gazalein
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Rumi +1
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रूमी ईरान के सर्वाधिक प्रसिद्ध कवि हैं। उनकी ग़ज़लें ऊर्जस्वी काव्य के दुर्लभ उदाहरणों में से हैं। रूमी की ग़ज़लें सामान्य कविताओं की तुलना में अलग हैं। इनकी प्रत्येक ग़ज़ल का हर शे’र आत्म-अनुभूति की परिपूर्णता से उच्छलित है। इनकी कविता केवल काव्यात्मक चमत्कारों को प्रदर्शित कर पाठकों को लुब्ध करने में पर्यवसित नहीं होती, बल्कि दिल से निकलकर मस्तिष्क और हृदय को भिगोती हुई आत्मा तक का स्पर्श कर लेती है। प्रस्तुत पुस्तक उनकी चुनिन्दा 100 ग़ज़लों का अनुवाद है। इस पुस्तक के माध्यम से रूमी पहली बार सीधे फ़ारसी से हिन्दी में अनूदित हुए हैं। इसमें सबसे पहले फ़ारसी ग़ज़लों का देवनागरी में लिप्यन्तरण प्रस्तुत किया गया है, फिर साथ में ही उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। अन्त में मूल ग़ज़लें फ़ारसी लिपि में भी रखी गई हैं। पुस्तक के अन्त में दिए गए अनेक परिशिष्टों के माध्यम से फ़ारसी काव्य-भाषा को समझने के महत्त्वपूर्ण उपकरण जुटाए गए हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त सभी छन्दों को ईरानी तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय रीति से समझाया गया है। क्लासिकल फ़ारसी कविता के सम्यक् परिचय के लिए आवश्यक संक्षिप्त फ़ारसी व्याकरण जोड़ा गया है। अन्त में प्रत्येक शब्द का अर्थ भी दिया गया है। इस प्रकार मूल से जुड़े रसपूर्ण अनुवाद की प्रस्तुति के साथ ही यह पुस्तक रूमी-रीडर के तौर पर भी उपयोग में आने योग्य है।
Kavi Man Jani Man :Aadivasi Stri Kavitayen
- Author Name:
Vandana Tete
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आदिवासी जनी (स्त्री) मन का धरातल बिलकुल दूसरी तरह का है। आदिवासियत के दर्शन पर खड़ा। समभाव जिसकी मूल प्रकृति है। प्राकृतिक विभेद के अलावा जहाँ इनसान अथवा सत्ता द्वारा कृत्रिम रूप से थोपा हुआ कोई दूसरा भेद नहीं है। हालाँकि कुछ बन्दिशें हैं, परन्तु सामन्ती क्रूरता और धार्मिक आडम्बरों के क़िले में आदिवासी स्त्री बिलकुल क़ैद नहीं है। ‘कवि मन जनी मन’ संकलन में वृहत्तर झारखंड के आदिवासी समुदायों की स्त्री-रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। कवियों में से एक या दो को छोड़कर प्राय: सभी अपनी-अपनी आदिवासी मातृभाषाओं में लिखती हैं। परन्तु संकलन में शामिल कविताएँ मूल रूप से हिन्दी में रची गई हैं। कुछ का हिन्दी अनुवाद है जिसे कवयित्रियों ने स्वयं किया है। हिन्दी में आदिवासी स्त्री-कविताओं का मूल या अनुवाद लाना इसलिए ज़रूरी लगा कि यह समझ बिलकुल साफ़ हो जाए कि नसों में दौड़नेवाला लहू चाहे कितनी पीढ़ियों का सफ़र तय कर ले, अपना मूल स्वभाव नहीं छोड़ता। यानी रचने का, गढ़ने का और बचाने का स्वभाव। अपने लिए ही नहीं बल्कि सबके लिए सम्पूर्ण समष्टि की चिन्ता का स्वभाव। पहाड़ी नदी की तरह चंचल, पोखरे की तरह गम्भीर, घर के बीचोंबीच खड़ा मज़बूत स्तम्भ या कि आर्थिक-सांस्कृतिक पौष्टिकता लिये महुआ-सी महिलाएँ अपने समुदाय की रीढ़ हैं। ठीक वैसे ही उनका लेखन है। वे अपनी कविताओं से विमर्श करती हैं। उनके विमर्श में वर्चस्व की आक्रामकता नहीं बचाव के युद्धगीत हैं। और है रचने का दुर्दम्य आग्रह जिसका सबूत यह संकलन है।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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