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वो लकड़ी के तख़्ते पे ऐसे खड़ी है कि हर पोर कीलों से जैसे जड़ी है अभी उस का बेटा, अभी उस का शौहर चलाएँगे ख़ंजर की बौछार उस पर कभी हाथ के रुख़, कभी पीठ पीछे कभी सिर के ऊपर तो कंधे के नीचे तमाशाई साँसों को रोके हुए हैं तमाशा हर इक बार यूँ देखते हैं कि जैसे वो पहले-पहल देखते हों
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वो लकड़ी के तख़्ते पे ऐसे खड़ी है
कि हर पोर कीलों से जैसे जड़ी है
अभी उस का बेटा, अभी उस का शौहर
चलाएँगे ख़ंजर की बौछार उस पर
कभी हाथ के रुख़, कभी पीठ पीछे
कभी सिर के ऊपर तो कंधे के नीचे
तमाशाई साँसों को रोके हुए हैं
तमाशा हर इक बार यूँ देखते हैं
कि जैसे वो पहले-पहल देखते हों
Book Details
-
ISBN9789347265082
-
Pages112
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हैं।दूसरा सप्तक से चर्चित हुए कवि शमशेर बहादुर सिंह को कभी अज्ञेय ने ‘कवियों का कवि’ कहा था और हिन्दी कविता जगत में उनकी पहचान शमशेरियत से हुई थी। इस शमशेरियत की बानगी देखिए—‘बात बोलेगी, हम नहीं, भेद खोलेगी बात ही।’ यह पंक्ति समकालीन कविता का मुहावरा बन चुकी है। इसमें सन्देह नहीं कि शमशेर हमारे समय के ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपनी लम्बी काव्य-यात्रा में हिन्दी कविता को समृद्ध किया है। उनकी कविताएँ कवि की प्रतिबद्धता और जिजीविषा का प्रमाण प्रस्तुत करती-सी प्रतीत होती हैं।
प्रकृति-प्रेम और मानवीय रूप-सौन्दर्य शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं के केन्द्र बिन्दु हैं।
Taak Dhinadhin Bacche Nache
- Author Name:
Rameshraaj
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- Description: मन को लुभाते बालगीत - ताक धिना धिन बच्चे नाचें प्रख्यात कवि रमेशराज बहुआयामी प्रतिभा के धनी है। आपने ग़ज़ल के समानांतर 'तेवरी' आंदोलन चलाया। 'तेवरी' की सार्थकता को सिद्ध करने के लिए 'तेवरीपक्ष' त्रैमासिक पत्रिका के साथ-साथ अनेक तेवरी संग्रहों का संपादन किया। आपने रसपरंपरा में एक नए रस 'विरोध' की स्थापना की। यही नहीं 'साधारणीकरण' जैसे सर्वमान्य सिद्धांत को चुनौती देते हुए एक नए सिद्धांत 'आत्मीयकरण' को प्रतिपादित किया। कवि रमेशराज एक अच्छे बालगीतकार भी हैं। आपके विगत एक वर्ष के भीतर दो बालगीत संग्रह प्रकाशित होने के उपरांत सद्यः प्रकाशित बालगीत संग्रह 'ताक धिनाधिन बच्चे नाचे' में विविध मौसमों के ऐसे बालगीत हैं जिनमें जाड़े के प्रकोप में स्वेटर अलाव, अंगीठी, गर्म चाय का जिक्र है तो वसंत के आते ही फूल भंवरों, तितलियों की बच्चों के मन को लुभाती मोहक छटाओं के दृश्य हैं।कोयल की प्यारी प्यारी कुहू कुहू की बोली है। होली के वे मदमाते पल हैं जिनमें बच्चे नकली मूछें लगाकर, पिचकारी हाथ में लेकर हुरियारे बने हुए धमाचौकड़ी मचाते हैं। रंग गुलाल उड़ाते है। बच्चों के मन को हर्षित करने वाले प्राकृतिक दृश्यों जैसे बर्फ के पहाड़, नदी, झरनों, विविध त्योहारों पर लिखे गए इन बालगीतों में मिठास है, उल्लास है। इनमें चलते हुए पटाखे है, फुलझडियां हैं। रंगबिरंगी अनारों से फूटती आतिशबाजी है। पतंगें हैं, छक्के लगाता बल्ला है। गेंद है। टिकटिक करती घड़ी है। नाचते मोर हैं। टर्र टर्र करते मेढक हैं। इन गीतों की शब्दावली सरस और रोचक है। विश्वास है इस संग्रह का स्वागत बच्चे ही नहीं साहित्य जगत के रसिक पूरे मनोयोग से करेंगे। आपकी 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है।अलीगढ़ के ग्रन्थायन प्रकाशन की ओर से आपको *साहित्यश्री* पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
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