Dinkar Ke Geet
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भारतीय संस्कृति और परम्परा से गहरे जुड़े दिनकर के इस गीत-संग्रह में विविधता और बहुलता एक बड़े कैनवस पर देखने को मिलती है।</p> <p>इस संग्रह में मातृभूमि की सौंधी गंध और करुण वेदना का मार्मिक मिश्रण इस तरह मूर्त है कि संवाद सहज ही स्थापित किया जा सकता है। यहाँ प्रेम अनेक रूपों में अपने वैशिष्ट्य को लिए हुए है। ऐतिहासिक और मिथकीय पात्र भी इतने जाने-पहचाने कि सम्बद्धता एक मौलिक पाठ की तरह ध्वनित होती प्रतीत होती है। और इतना ही नहीं, इन गीतों में गायक भी हैं, नायक भी; पंछी भी हैं, परियाँ भी; सावन भी है, भ्रमरी भी; प्रतीक्षा भी है, आश्वासन भी; स्वाधीनता के लिए आह्वान भी है, हाथों में मशाल भी। इन गीतों को एक सम्पूर्णता में देखें तो कह सकते हैं कि ये एक राष्ट्रकवि द्वारा रचित ज़मीनी गीत हैं। दिनकर जी का कहना भी है कि, “ये गीत इसलिए हैं कि ये गाए जा सकते हैं, बहुत कुछ उसी प्रकार जैसे छन्द में रची हुई प्रत्येक कविता गाई जा सकती है। वैसे इस संग्रह में दो-चार ऐसे भी गीत हैं जो स्वराज्य की लड़ाई के समय छात्रावासों में गाए जाते थे, सड़कों पर, सभाओं और जुलूसों में तथा कभी-कभी गुसलख़ानों में भी गाए जाते थे। मेरा सौभाग्य कि जनता ने मेरी कई कविताओं को भी गीत बना दिया। ‘माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेसी’ इस कविता को तो मिथिला के नटुए भी नाच-नाच कर गाते हैं।”</p> <p>‘दिनकर के गीत’ पाठ और गायन दोनों में एक-सा आस्वाद पैदा करनेवाला एक बेमिसाल और विरल संग्रह है।
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भारतीय संस्कृति और परम्परा से गहरे जुड़े दिनकर के इस गीत-संग्रह में विविधता और बहुलता एक बड़े कैनवस पर देखने को मिलती है।</p>
<p>इस संग्रह में मातृभूमि की सौंधी गंध और करुण वेदना का मार्मिक मिश्रण इस तरह मूर्त है कि संवाद सहज ही स्थापित किया जा सकता है। यहाँ प्रेम अनेक रूपों में अपने वैशिष्ट्य को लिए हुए है। ऐतिहासिक और मिथकीय पात्र भी इतने जाने-पहचाने कि सम्बद्धता एक मौलिक पाठ की तरह ध्वनित होती प्रतीत होती है। और इतना ही नहीं, इन गीतों में गायक भी हैं, नायक भी; पंछी भी हैं, परियाँ भी; सावन भी है, भ्रमरी भी; प्रतीक्षा भी है, आश्वासन भी; स्वाधीनता के लिए आह्वान भी है, हाथों में मशाल भी। इन गीतों को एक सम्पूर्णता में देखें तो कह सकते हैं कि ये एक राष्ट्रकवि द्वारा रचित ज़मीनी गीत हैं। दिनकर जी का कहना भी है कि, “ये गीत इसलिए हैं कि ये गाए जा सकते हैं, बहुत कुछ उसी प्रकार जैसे छन्द में रची हुई प्रत्येक कविता गाई जा सकती है। वैसे इस संग्रह में दो-चार ऐसे भी गीत हैं जो स्वराज्य की लड़ाई के समय छात्रावासों में गाए जाते थे, सड़कों पर, सभाओं और जुलूसों में तथा कभी-कभी गुसलख़ानों में भी गाए जाते थे। मेरा सौभाग्य कि जनता ने मेरी कई कविताओं को भी गीत बना दिया। ‘माया के मोहक वन की क्या कहूँ कहानी परदेसी’ इस कविता को तो मिथिला के नटुए भी नाच-नाच कर गाते हैं।”</p>
<p>‘दिनकर के गीत’ पाठ और गायन दोनों में एक-सा आस्वाद पैदा करनेवाला एक बेमिसाल और विरल संग्रह है।
Book Details
-
ISBN9789389243734
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
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Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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विनोद की काव्य-संवेदना के विस्तार को देखने के लिए उनकी कविताओं की गहराई में उतरना होगा। उनकी काव्यात्मक जटिलता इसीलिए ऊपर से दिखाई पड़ती है क्योंकि उनकी काव्य संवेदना की तहें इकहरी न होकर दुहरी और कहीं तिहरी हैं।
देखा जाए तो उनकी काव्योपलब्धि में सिर्फ़ अनोखे काव्य-शिल्प का ही योगदान नहीं है, बल्कि उनकी काव्य-वस्तु में यथार्थ को ‘देखने’ का नज़रिया भी उनके अपने समकालीनों से अलहदा रहा है।
कहना चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल की कविता समकालीन कविता के दृश्य पर समकालीन जीवनानुभव को प्राचीनता से, प्रकृति से मनुष्य को जिस तरह उद्घाटित करती है, उससे कविता की एक दूसरी दुनिया की खिड़की खुलती है। इस दुनिया को देखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल जैसी ‘अतिरिक्त’ देखने की दृष्टि और कला चाहिए।
Maa Maati Manush
- Author Name:
Mamta Banerjee
- Book Type:

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Description:
ये ममता बनर्जी की कविताएँ हैं; ममता बनर्जी, जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और ‘फ़्रायर ब्रांड’ नेता, जिन्हें उनके दो टूक लहज़े और अक्सर ग़ुस्से के लिए भी जाना जाता है।
इन कविताओं को पढ़कर आश्चर्य नहीं होता। दरअसल सार्वजनिक जीवन में आपादमस्तक डूबे किसी मन के लिए बार-बार प्रकृति में सुकून के क्षण तलाश करना स्वाभाविक है। लेकिन ममता जी प्रकृति की छाँव में विश्राम नहीं करतीं, वे उससे संवाद करती हैं। प्रकृति के रहस्यों को सम्मान देती हैं, और मनुष्य मात्र से उस विराटता को धारण करने का आह्वान करती हैं जो प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है।
उनकी एक कविता की पंक्ति है ‘अमानवीयता ही है सभ्यता की नई सज्जा’—यह उनकी राजनीतिक चिन्ता भी है, और निजी व्यथा भी। और लगता है, इसका समाधान वे प्रकृति में ही देखती हैं। सूर्य को सम्बोधित एक कविता में कहा गया है : ‘पृथ्वी को तुम्हीं सम्हाल रखोगे/मनुष्यता को रखो सर्वदा पहले/जाओ मत पथ भूल’।
वे प्रकृति में जैसे रच-बस जाती हैं। उनका संस्कृति-बोध गहन है और मानवीय संवेदना का आवेग प्रखर। ‘एक मुट्ठी माटी’ शीर्षक कविता में जैसे यह सब एक बिन्दु पर आकर जुड़ जाता है—‘एक मुट्ठी माटी दे न माँ रे/मेरा आँचल भरकर/मीठापन माटी का सोने से शुद्ध/देखेगा यह जग जुड़कर/थोड़ा-सा धन-धान देना माँ/लक्ष्मी को रखूँगी पकड़/नई फसल से नवान्न करूँगी/धान-डंठल सर पर रख।’
कहने की आवश्यकता नहीं कि इन कविताओं में हम एक सफल सार्वजनिक हस्ती के मन के एकान्त को, और मस्तिष्क की व्याकुलता को साफ़-साफ़ शब्दों में पढ़ सकते हैं।
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