Des
Author:
Sanjay ChaturvediPublisher:
Antika Prakashan Pvt. Ltd.Language:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 123
₹
150
Available
संजय चतुर्वेदी लगभग चालीस वर्षों से हिंदी कविता के केंद्र में प्रखर हस्तक्षेप की तरह अडिग हैं। सच कहा जाय तो उनकी अद्वितीय कविताई आज हिंदी के आँगन में वह अकेला दिया है जो अपसंस्कृति के अंधकार और झंझावात से निडर जूझ रहा है। यह सचमुच हमारे देश के हृदय में बसे हुए 'देस' की कविता है जिसमें पाठक खुद अपना झिलमिलाता हुआ प्रतिबिम्ब भी देख पायेगा।अद्भुुत भाषा और कहन वाली यह औघड़ कविता अपने शब्द और बिम्ब धरती के कोने-कोने से चुन कर हमारे लिए लाई है। एकदम समसामयिक काव्यरूप के साथ-साथ भक्तिकालीन कविता का मर्मस्पर्शी संगीत और ओज आपको अचानक द्रवित कर देगा। कहीं पद, कहीं सवैया, कहीं घनाक्षरी, कहीं दोहे, कहीं निर्द्वंद्व निर्झर सा बहता हुआ गीत तो कहीं मुक्त छंद का तरंगित विस्तार। भाषा और काव्यसृष्टि पर ऐसा अधिकार दूर-दूर तक किसी समकालीन का नहीं। इसके पीछे तगड़ी साधना और सत्य की अविचल टेक है। इस कविता में हमारे अस्तित्व पर आक्रांता आततायी सांस्कृतिक पाखंड के खिलाफ सीधे-सीधे आमने-सामने की लड़ाई है। संजय चतुर्वेदी संभवत: अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी कविता इस देशव्यापी छल-छद्म का पर्दाफाश करती है।यह लड़ाई कविता में ही नहीं स्वयं अपने भीतर भी अपनी काहिली, गफलत और आत्मविस्मृति के विरुद्ध सतत चलने वाली लड़ाई है। बार-बार ऐसा लगता है जैसे हमारा सामना अपने समय की सबसे प्रतिभाशाली, जागृत और ईमानदार सृजनदृष्टि से है। यह संग्रह हिंदी कविता के आत्म के विस्तार और दुर्गम रास्तों की यात्रा है। और यह भी—कि जैसे बहुत दिनों बाद आप अपने घर लौटें।—दिनेश कुमार शुक्ल
ISBN: 9789391925161
Pages: 112
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
रने एमिल शार्, जिन्हें अल्बैर् कामू अपने समय का महानतम कवि मानते थे, का जन्म दक्षिणी फ्रांस के प्रोवॉन्स प्रदेश के एक नामी और ख़ूबसूरत क़स्बे, ईल-सुर-सोर्ग में, 7 जून, 1907 को हुआ था। उन्होंने अपने जीवन का ज़्यादातर समय पेरिस और प्रोवान्स में बिताया।
शार् ने अपने बिम्ब और प्रतिमाएँ दक्षिण फ्रांस में बीते अपने बचपन से और वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों से ली हैं। वो कोई देहाती कवि नहीं थे, लेकिन देहात के दृश्यों का प्रभाव उनकी कविताओं में भरपूर मिलता है। प्रकृति के प्रति शार् की आस्था उतनी ही दृढ़ थी जितनी अपनी कविताओं के शिल्प के प्रति। उन्होंने सोर्ग नदी के प्रदूषण, वान्तू—जिस पर प्रैटार्क ने 1336 में विजय प्राप्त की थी—और मौं मिराइल पहाड़ों की चोटियों पर न्यूक्लियर रिएक्टरों के लगाने पर शहरी आपत्ति जताई थी।
शार् की सृजनात्मक दृष्टि पर, उनके कविता लिखने के उद्देश्य और शिल्प पर जिन लोगों का प्रभाव रहा, उनमें ग्रीक दार्शनिक हेरा क्लाइटस, फ़्रैंच कलाकार जॉर्ज दि लातूर और कवि आर्थर रैम्बो को प्रमुख माना जाता है। रैम्बो का साया उनके बिम्बों पर स्पष्ट दिखता है, ख़ास तौर से उनकी सूक्ष्म, घनीभूत गद्य कविताओं में। शार् पर एक और प्रभाव रहा अति यथार्थवाद का।
शार् एक ही विधा में लिखना पसन्द नहीं करते। उन्होंने मुख्य रूप से तीन विधाओं (forms) में कविताएँ लिखी हैं : मुक्त छन्द, गद्य कविता, और सूक्ति। वो अपनी पद्य कविताओं (Verse Poems) और गद्य कविताओं में उन्हीं विषयों को परिवर्द्धित करते हैं जिन्हें उन्होंने अपनी सूक्तियों में उठाया।
अपनी आख़िरी किताब के प्रकाशन तक शार् इस धारणा के समर्थक रहे कि कला, साहित्य और संगीत पारस्परिक रूप से प्रतिरोध की आवश्यक अभिव्यक्ति में जुड़े हुए हैं।
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