Main Shayar Badnaam
Author:
Anand BakhshiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
Awating description for this book
ISBN: 9788119028924
Pages: 294
Avg Reading Time: 10 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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ये कविताएँ जीवन के खुरदुरे स्पर्श और उनमें मौजूद उसके सहज सौन्दर्य के सन्तुलन की कविताएँ हैं, जिसमें एक-दूसरे का निषेध नहीं बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति मिली है। यह देखना भी ख़ासा दिलचस्प और क़ाबिलेग़ौर है कि प्रतापराव कदम की निगाह समाज की तमाम उन विद्रूप ख़बरों की गहरी शिनाख़्त में भी शामिल रही है, जिसे कई बार धूर्त इरादों और नृशंसता से इधर-उधर कर दिया जाता है। वे इस अर्थ में राजनीतिक आशयों का भंडाफोड़ करनेवाले कवि भी ठहरते हैं। हैदराबाद में तसलीमा नसरीन पर हुए हमले की बात हो या फिर निठारी का जघन्य हत्याकांड—सभी जगह यह कवि अपनी कलम के नेज़े पर एक प्रश्नवाची राजनीतिक कविता को सम्भव बना रहा है।
एक हद तक इस संग्रह की कविताएँ, प्रश्न करती हुई कविताएँ भी हैं। यह देखना भी प्रासंगिक है कि ये अनगिन प्रश्न ढेरों तरीक़ों से कई दिशाओं में सम्भव हुए हैं। फिर वह कोसी नदी हो, शवयात्रा के आगे बाजा बजाने वाले लोग हों, विष्णु गणपत चौधुले के मार्फत पुलिस विभाग हो, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी हो, फ़ज़र की नमाज़ हो, कबड्डी का खेल हो या फिर नदी की मछली—कवि हर जगह गया है और अद्भुत रूप से अपनी काव्य भंगिमाओं को एक सार्थक संवाद दे पाया है।
भारतीय समाज के मध्यवर्ग के तमाम आख्यानों, इतिहास, स्मृति और राजनीति का अचूक इस्तेमाल करते हुए, साथ ही उसे बाज़ार की भाषा से दूर ले जाकर हर दिन दुःसाध्य होती जाती दुनिया और जीवन को खोजने-नबेरने का साहस दिखाती हुई इन कविताओं में मनुष्य की चिन्ताओं को बड़े फ़लक पर विमर्श का मौक़ा मिला है। इसी कारण इन कविताओं में ऐसे चरित्रा औ गतिविधियाँ सहज ही अपनी भागीदारी बना पाए हैं, जो एक साथ पढ़े जाने पर अपने समवेत प्रतिरोध का शोर रचते हैं।
प्रतापराव कदम, इन कविताओं के बहाने—राजनीतिक, धार्मिक एवं सामाजिक प्रपंचों पर ऐसा तीक्ष्ण प्रहार करते हैं कि यह देख पाना सम्भव लगता है कि मनुष्य की आकांक्षाओं और सपनों के समर्थन में कभी शब्द या भाषा भी खड़ी हो सकती है। यह इन कविताओं के माध्यम से बख़ूबी सम्भव हो सका है और शोर-शराबे वाले ऐसे कृतघ्न समय में अगर कोई कवि अपने भ्रम के सहारे जीवन की सहजता को बचाए रखता है, तो वह कोशिश कम नहीं मानी जा सकती—‘दूर से, अछड़ते जैसे कोई है झोपड़ी में/जैसे कोई फ़सल निहारते खड़ा बीच खेत/यही भरम बनाए-बचाए रखता है। (भरम)’
इसी भरम को पोसते हुए स्वयं कवि, उसकी कविता या पाठक ही नहीं, बल्कि वे तमाम लोग भी समृद्ध होते हैं, जिनके जीवन में इस तरह का कोई भरम या विश्वास बचा हुआ है।
—यतीन्द्र मिश्र
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