Samvedana Ke Swar
Author:
Dinesh AdhikariPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Unavailable
दिनेश अधिकारी नेपाली कवि हैं। हिन्दी में यह उनका पहला काव्य-संग्रह है। बहैसियत कवि अपने काव्य-कर्म के बारे में उनका कहना है कि आदमी और आदमी से जुड़े तमाम सन्दर्भ ही उनके लेखन की ऊर्जा बनते हैं। मौलिकता की उनकी अवधारणा ठीक उतनी ही विनम्र है जितनी ये कविताएँ। विनम्र लेकिन तत्वतः ठोस और अपने पैरों के नीचे की ज़मीं को भरी-पूरी नज़रों से देखती-आँकती हुई। वे कहते हैं कि एक ही विश्व के निवासी होने के कारण विषयवस्तु में समानता की सम्भावना प्रबल होती है। सो सृष्टा की मौलिकता को उसके प्रस्तुति-क्रम में खोजना चाहिए। लेकिन मौलिकता की एक कसौटी और भी है, वह है दृष्टि, जिसके दर्शन इस संग्रह की कविताओं में होते हैं। उनकी कविता पूछती है : ‘प्रदर्शन मात्र ही शक्ति है क्या?’ उनकी कविता बताती है : ‘कपड़ा फट जाता है, चमड़ी नहीं।’ उनकी कविता उद्घाटित करती है : ‘तर्क वास्तव में बेशर्म ही होता है...शासक की तरह बेहया।’ उनकी कविता स्वीकार करती है : ‘अकेले चलने का आनन्द तुम्हारे साथ चलते नहीं आता।’ ये कुछ पंक्तियाँ यद्यपि उनकी मौलिकता को रेखांकित करने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन इस</p>
<p>संग्रह की कविताओं की अर्थ और सन्दर्भ-व्याप्ति कहीं अधिक है।</p>
<p>बीच-बीच में नेपाली अभिव्यक्तियों के साथ ये कविताएँ अखिल मानवता को सम्बोधित करती हैं। ‘हर्क बहादुर’, ‘कहाँ रखें अब पैदा होनेवाले पुत्र को’, ‘मच्छरदानी के भीतर आदमी’, ‘आदमी का क़द’ और ‘विकासोन्मुख देश का आदमी’ जैसी अनेक कविताएँ कवि के आन्तरिक विस्तार का परिचय देती हैं।</p>
<p>संग्रह में प्रकाशित ‘गाँव की एक कविता’ बार-बार पढ़ने लायक़ कविता है जिसमें प्रस्तुत गाँव की तस्वीर भारत में भी जहाँ चाहे वहाँ देखी जा सकती है। हस्तक्षेप के रूप में देखें तो यह विचारणीय है जो यह कविता कहती <br />है : ‘गोद के शिशु को पीठ पर बाँधकर मज़े से निकल जाती है कोई भी माँ अपनी सन्तान पर भी बोझ बन सकती है—उसे पता नहीं।’ हिन्दी कविता के परिदृश्य में हमारे प्रिय पड़ोसी देश से आई यह दस्तक स्वागत योग्य है, पर उससे पहले ध्यान से पढ़ने योग्य।
ISBN: 9788126727643
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Dilfareb
- Author Name:
Rajkumar Kori Raz
- Book Type:

- Description: This book has no description
Waqt Zaroorat
- Author Name:
Avinash Mishra
- Book Type:

- Description: क़्त ज़रूरत’ की कविताएँ उस संवेदनशीलता का प्रतीक हैं, जिससे भारत एक सुन्दर देश बनता है। यहाँ की जनता, उसकी सामूहिकता और स्वत्व—सब मिलकर एक साझा भविष्य की रचना करते हैं; लेकिन आज इसी सुंदरता के साझेपन पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं। अविनाश मिश्र अपनी कविताओं के माध्यम से चेताते हैं कि नफ़रत की एक सामूहिक मानसिकता विकसित हो रही है। कविता, प्रेम और सद्भाव से आपूरित मन ही इस नफ़रत की काट है। इस संग्रह की कविताएँ इस ज़िम्मेदारी को स्वीकारती हैं। कविता के सत्त्व को कमज़ोर किए बिना, एक वेधक साहित्यिक संवेदनशीलता के साथ ये कविताएँ ‘समय की छुअन’ लिये हुए हैं। यहाँ समय का प्रत्येक स्पंदन है, लेकिन यह केवल दर्ज कर लिए जाने की बेचैनी के साथ नहीं आया है; बल्कि यह कविता की मूलभूत शर्त यानी शब्द और मानवीय सौन्दर्य के साथ आया है। इस संग्रह में किसिम-किसिम के अभागे लोग हैं—प्रेम से विहीन, भरपेट भोजन से वंचित और किसी जल रहे पेड़ की तरह घृणा से धुँधुआते लोग। अविनाश का कवि अपनी कविता के माध्यम से उनके लिए मैत्री और सद्भाव का हाथ बढ़ाता है। इक्कीसवीं सदी में शोर बहुत ज़्यादा है; इसके गए दो दशकों में भाषा, संवेदना और सामूहिकता का क्षरण बहुत तीव्रता से हुआ है। ऐसे में ये कविताएँ हमें असहाय कर देती हैं कि देखो—हम सब ये हो गए हैं। ये हमारे दुःख हैं, इन्हें देखो... ‘वक़्त ज़रूरत’ में दुःख की एक तान और उससे मुक्ति की छटपटाहट आरंभ से अंत तक विद्यमान है। इस संकलन की बहुत सारी कविताएँ उस फाँक की तरफ़ इशारा करती हैं, जहाँ व्यक्ति की याददाश्त उसे सबल बनाने के बजाय उसे कमज़ोर करती हैं और ‘सबको समझ में आ सकने वाली भाषा’ के चक्कर में रचनाकार अपनी भाषा से हाथ धो बैठता है। यह संग्रह भाषा की निष्कलुषता के लिए भी स्मरणीय है।
Jal Padya
- Author Name:
Taslima Nasrin
- Book Type:

- Description: दग्ध हृदय की अत्यन्त तरल और सजल अभिव्यक्ति हैं तसलीमा नसरीन की ये कविताएँ—अनवद्य जल पद्य है यह। जैसे पानी को मुट्ठी में बाँधकर नहीं रखा जा सकता, पानी की यह पुकार भी कुछ वैसी ही है। यह प्रवाह आपको बहाता है, डुबाता है, इसमें आप तैरते हैं और यह सीधे हृदय में उतर जाता है। नितान्त व्यक्तिगत-सी लगती ये कविताएँ दरअसल राख हो रहे जीवन को सजल और प्राणवान बनाने का उपक्रम हैं और गहरी जिजीविषा से उपजी हैं। जीवन के प्रति अदम्य मोह और ललक से भरी हैं ये कविताएँ। देश से, परिवेश से और परिवार से वंचित, निर्वासित जीवन बिता रही तसलीमा की इन कविताओं में यद्यपि दुःख की एक सर्वग्रासी छाया है लेकिन यह भी है कि दु:ख को जीकर-बरतकर ही उदात्त और महत्तर की आत्मोपलब्धि की जा सकती है। तसलीमा कहती हैं : ‘कविता को जन्म देने के लिए स्त्री होना होता है पहले।’ स्त्री-पुरुष के लिंग-भेद को अस्वीकार करती तसलीमा जीवन को अविभाज्य रूप में देखती हैं और ख़ुद के जीवन को ही काव्य-वस्तु बनाकर जिए और सहे जा रहे की नितान्त अकपट तथा साहसपूर्ण अभिव्यक्ति करती है। स्वीकार-अस्वीकार से लेकर धिक्कार-हाहाकार तक ये कविताएँ वैसी ही हैं जैसे जल की धारा चट्टान से टकराती है, उसे डुबाती है, उसका अतिक्रमण करती है और कई बार थककर चट्टान पर ही सिर रखकर सुस्ताती भी है। इन कविताओं में अपने प्रकृत रूप में उपस्थित हैं तसलीमा नसरीन।
Khule Mein Aawas
- Author Name:
Kamlesh
- Book Type:

-
Description:
हिन्दी साहित्य की निरन्तर बढ़ती स्मृति-क्षीणता के चलते अगर कइयों को कमलेश नाम
से कुछ ख़ास याद नहीं आएगा तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए। स्वयं कमलेश को नहीं होगा, क्योंकि पिछले बीस-पच्चीस बरसों से वे कम लिखते, बहुत कम छपाते और साहित्य के दृश्य और आयोजनों से दूर रहे हैं। लेकिन इससे यह बात मिट नहीं जाती कि वे हमारी पीढ़ी और उसके तुरत बाद की पीढ़ी के गाथा-पुरुष रहे हैं। तब की युवा कविता पर एक आलोचक की तरह पहली क़लम मैंने कमलेश और धूमिल की कविता पर ही चलाई थी और उन्हें ‘तलाश के दो मुहावरे’ कहा था।
कमलेश ने कम लिखा और जितना लिखा उसे मुनासिब सख़्ती से ख़ुद जाँचा और उसका कम ही सार्वजनिक किया। उनके यहाँ ऐन्द्रियता और सामासिक स्मृति का जो संगुम्फन है, वह हममें से कई के लिए ईर्ष्या का विषय रहा है।... अपने व्यक्तित्व और रचना के प्रति भयावह और बेहद दिखाऊ आत्मरति के इस युग में कमलेश हमेशा कुछ कहते कम, बुदबुदाते अधिक रहे हैं। उनके यहाँ कम ही अधिक है। उनकी कविता बासी नहीं हुई है, दशकों पहले की होने के बावजूद और बावजूद इधर कविता के व्यापक अख़बारीकरण के। उनके यहाँ जो अनुगूँजें हैं, उनकी कविता में जो अन्तर्ध्वनियाँ हैं, वे आज भी हम जैसे सुनकर अभिभूत होते हैं और वे अक्सर अन्यत्र सुनाई नहीं देतीं।
—अशोक वाजपेयी; ‘जनसत्ता’; 05 अगस्त, 2007
Pani ka Pta Puchh Rahi Thi Machhali
- Author Name:
Kamleshwar Sahu
- Book Type:

- Description: Poems
Teri Hansi Krishn Vivar Si
- Author Name:
Punam Sinha Shreysi
- Book Type:

- Description: Book
Tum Tab Aana
- Author Name:
Rakesh Kabeer
- Book Type:

-
Description:
राकेश कबीर की इन कविताओं से गुज़रते हुए जीवन के विभिन्न पहलुओं की विसंगतियों पर सबसे पहले ध्यान जाता है। राकेश की कविताओं में उनका पूरा समय मुकम्मल ढंग से व्यक्त होता दिखता है। राकेश एक ऐसे कवि हैं जो बिम्बों की आयातित शब्दावली से नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के अपने आत्मीय सम्बन्धों के बीच से कविता की नई ध्वनि तलाश करते हैं।
प्रकृति राकेश की कविताओं में विभिन्न प्रतीकों के रूप में आती है। उनकी कविताओं में आए बिम्बों की नवीनता इस बात में है कि ये प्रकृति के भीतर से ही उपजे हैं और अत्याचार से लड़ रहे हैं। इन्हें ऐसे व्यक्तियों के प्रतीक के तौर पर देखा जा सकता है जो व्यवस्था के अन्दर रहकर उसके अन्याय और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। एक आम नागरिक के जीवन में जो व्यवस्थागत विडम्बनाएँ हैं, राकेश का कवि वहीं से अपनी कविता की ज़मीन तलाशता है। ‘स्पर्श’ कविता में एक नौकरीपेशा पिता द्वारा अपनी नन्ही बेटी से बोला गया झूठ, कविता को प्राण देता है। कवि परिवार के इस लगाव और जुड़ाव के बीच कभी भी न तो अपने समाज को भूलता है और न समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को।
कुल मिलाकर कवि राकेश कबीर की कविताओं की ये चौथी किताब संवेदना और शिल्प के स्तर पर आगे बढ़ी हुई दिखती है क्योंकि इसमें जीवन के विविध पक्षों को समेटने का बेहतर प्रयास हुआ है। प्रकृति और प्राणी-जगत के बिम्बों का नवीन अर्थों में प्रयोग और झील की तरह ठहरी हुई व्यवस्था पर व्यंग्य करती कविताएँ इस संग्रह का हासिल हैं।
—नीलाम्बुज सरोज
Ek Bahut Komal Tan
- Author Name:
Leeladhar Mandoi
- Book Type:

- Description: Poems
Khirkiyan Jhank Rahin Kamre ke Par
- Author Name:
Pramod Upadyay
- Book Type:

- Description: Hindi nav geet by Pramod Upadhyay.
Pratinidhi Kavitayen : Bhawani prasad Mishra
- Author Name:
Bhawani Prasad Mishra
- Rating:
- Book Type:

-
Description:
बीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर नौवें दशक की शुरुआत तक कवि भवानी प्रसाद मिश्र की अनथक संवेदनाएँ लगातार सफ़र पर रहीं।
हिन्दी भाषा और उसकी प्रकृति को अपनी कविता में सँजोता और नए ढंग से रचता यह कवि न केवल घर, ऑफ़िस या बाज़ार, बल्कि समूची परम्परा में रची-पची और बसी अन्तर्ध्वनियों को जिस तरकीब से जुटाता और उन्हें नई अनुगूँजों से भरता है, वे अनुगूँजें सिर्फ़ कामकाजी आबादी की अनुगूँजें नहीं हैं, उस समूची आबादी की भी हैं जिसमें सूरज, चाँद, आकाश-हवा, नदी-पहाड़, पेड़-पौधे और तमाम चर-अचर जीव-जगत आता है। स्वभावत: इस सर्जना में मानव-आत्मा का सरस-संगीत अपनी समूची आत्मीयता और अन्तरंगता में सघन हो उठा है। कविता में मनुष्य और लोक-प्रकृति और लोक-जीवन की यह संयुक्त भागीदारी एक ऐसी जुगलबन्दी का दृश्य रचती है जिसे केवल निराला, किंचित् अज्ञेय और यत्किंचित् नागार्जुन जैसे कवि करते हैं।
कविता के अनेक रूपों, शैलियों और भंगिमाओं को समेटे यह कवि पारम्परिक रूपों के साथ-साथ नवीनतम रूपों का जैसा विधान रचता है, वह उसकी सामर्थ्य की ही गवाही देता है। मुक्त कविता, गीत-ग़ज़ल, जनगीत, खंडकाव्य, कथा-काव्य, प्रगीत कविता के साथ उसकी सीधी-सादी प्रत्यक्ष भावमयी शैली के साथ आक्रामक, व्यंग्य और उपहासमयी, सांकेतिक और विडम्बनादर्शी भंगिमाएँ भी यहाँ मौजूद हैं। कई एक साथी कवियों में जैसी एकरसता देखी जाती है, भवानी प्रसाद मिश्र ने उसे अपनी भंगिम-विपुलता और शैली-वैविध्य से बार-बार तोड़ा है।
Khul Gaya Hai Dwar Ek
- Author Name:
Ashok Vajpeyi
- Book Type:

-
Description:
अशोक वाजपेयी को पहले ‘देह और गेह का कवि’ कहा गया था। यह कहना निराधार नहीं था, लेकिन शनै:-शनै: उनकी दैहिक और गैहिक भावना का ऐसा विस्तार हुआ कि उसमें प्रकृति ही नहीं, सम्पूर्ण पृथ्वी सिमट आई। वे नई कविता के आख़िरी दौर के कवि हैं। उसके बाद से हिन्दी कविता में कई प्रकार के बदलाव हुए, पर उन्होंने अपना मार्ग कभी नहीं बदला। कारण यह कि उनकी कविता में स्वयं ऐसे आयाम प्रकट होते गए कि उन्हें कभी उसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। उनकी काव्य-यात्रा एक लम्बी काव्य-यात्रा है, जिसमें कवि ने कई मंज़िलें पार की हैं। आज उनकी कविता के बारे में दिनकर के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘वर्षा का मौसम गया, बाढ़ भी साथ गई, जो बचा आज वह स्वच्छ नीर का सोता है...।’
अशोक जी हमेशा ऊँचे सरकारी पदों पर रहे, लेकिन यह प्रीतिकर आश्चर्य की बात है कि उनकी कविता का नायक अभिजन न होकर साधारण जन है। इस साधारण जन को वे नज़दीक से जानते हैं और उसकी समस्त पीड़ाओं के साथ उसकी इतिहास-निर्मात्री शक्ति से भी परिचित हैं। स्वभावत: उनमें नक़ली क्रान्ति के लिए कोई बेचैनी नहीं है, जैसी कथित प्रगतिशीलों और जनवादियों में देखी जाती है। उनकी तरह वे समाज को साहित्य के ऊपर नहीं रखते, बल्कि साहित्य के अनुशासन में ही समाज और इसके अन्य पक्षों को स्वीकार करते हैं। साधारण जन का शत्रु कौन है? यह कवि से छिपा नहीं है, इसलिए बिना कविता को छोड़े वह उससे उसे आगाह करता है। आशा है, यह चयन हिन्दी के बृहत्तर पाठक-समुदाय को पसन्द आएगा, क्योंकि यह उसी को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। यह उसे समकालीन हिन्दी कविता का एक ऐसा दृश्य भी दिखलाएगा, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता।
Rudra Samagra
- Author Name:
Ramgopal Sharma 'Rudra'
- Book Type:

-
Description:
रामगोपाल शर्मा ‘रुद्र’ उत्तर-छायावाद काल के ऐसे कवि हैं, जो आधी शताब्दी से अधिक समय तक शब्द ब्रह्म की साधना में लीन रहे और उसकी लीलाएँ स्वयं देखते तथा हिन्दी काव्य प्रेमियों को दिखाते रहे। मस्ती, जिंदादिली और फक्कड़पन उनकी भी कविता का मिजाज है, लेकिन उनकी विशिष्टता यह है कि इसके साथ उनमें शास्त्रज्ञता और कलामर्मज्ञता का अद्भुत मेल है। ‘रुद्र’ जी ने अंतःप्रेरणा से कई शैलियों में काव्य-रचना की है। कभी उनकी शैली सरल है, कभी संस्कृतनिष्ठ और कभी उर्दू के लहजे से प्रभावित। सर्वत्र उनमें एक विदग्धता मिलती है, जिसे देखकर ही निराला ने उनके संबंध में अपना यह मत प्रकट किया था कि वे हिन्दी के एक ‘पाएदार शायर’ हैं। उनके शब्द जितने सटीक और व्यंजक हैं, बिंब उतने ही भास्वर।
धीरे-धीरे ‘रुद्र’ जी की अभिव्यक्ति सघन होती गई है, उनमें अर्थ-संकुलता बढ़ती गई है और उनके छंद छोटे होते गए हैं। लेकिन ताज्जुब है, इस दौर में भी उन्होंने ‘बंधु ! जरूरी है मुझको घर लौटना’ जैसे सरल गीत रचे, जो पुरानी और नई पीढ़ी के काव्यप्रेमियों को समान रूप से प्रिय हैं।
एक विद्वान् ने उनके संबंध में यह राय जाहिर की है कि चूंकि उन्होंने आलोचकों के कहने पर अपना मार्ग नहीं बदला, इसलिए वे उस पर काफी दूर निकल गए हैं। निश्चय ही इस कथन में सच्चाई है, क्योंकि उनके काल के अनेक कवि जहाँ अपनी जमीन छोड़कर अपनी चमक खोते गए हैं, या फिर धर्म और दर्शन की शरण में जाकर कोरे पद्यकार बनकर रह गए हैं, वहाँ ‘रुद्र’ जी की संवेदना लगातार गहरी होती गई है। प्रत्येक पीढ़ी के कवि अपने ढंग से समकालीन जीवन को प्रतिध्वनित करते हैं। ‘रुद्र’ जी साठ वर्षों के अपने कवि-जीवन में कभी अगतिक नहीं हुए और अपनी कविता में बदलती जीवन स्थितियों की अभिव्यक्ति करते रहे।
‘रुद्र समग्र’ क्यों? इसलिए कि इस लापरवाह, लेकिन बेहद खूबसूरत कवि की कविता को विस्मृत होने से बचा लिया जाए। यह वह कविता है, जो अपनी सीमाओं में हिन्दी कविता के एक महत्त्वपूर्ण दौर का ऐतिहासिक अभिलेख है और जिसका हिन्दी कविता के परवर्ती विकास में किसी न किसी रूप में योगदान भी है।
Mukarrar Irshad
- Author Name:
Irshad Khan Sikandar
- Book Type:

- Description: Book
Raswanti
- Author Name:
Ramdhari Singh Diwakar
- Book Type:

-
Description:
सौन्दर्य, संवेदना और प्रतिरोध के अद्वितीय कवि हैं रामधारी सिंह ‘दिनकर’, और इस बात को उनके आरम्भिक आत्ममंथन युग की रचना ‘रसवन्ती’ में भी लक्षित किया जा सकता है। इस संग्रह में प्रकृति या ऋतुओं का सौन्दर्य हो; स्त्री-पुरुष का प्रेम हो, पीड़ा का आरोह हो; संघर्ष-सरोकारों की छटपटाहट हो, सामाजिक मूल्य-ह्रास या आगत की रहस्यमयता हो—दिनकर एक साधक के रूप में सभी को निम्नतम से उच्चतम स्तर तक बग़ैर किसी दृष्टिबन्ध के साधते दृष्टिगत होते हैं। यह राष्ट्रकवि की उदात्त अन्तश्चेतना ही है कि वे अपनी परम्परा से विलग नहीं होते और कालिदास के जीवन को साक्षात् करते अपने रचना-लोक में उन्हें ‘कविगुरु’ कहते हैं।
उल्लेखनीय है कि ‘गीत-शिशु’, ‘रसवन्ती’, ‘बालिका से वधू’, ‘प्रीति’, ‘दाह की कोयल’, ‘नारी’, ‘अगुरु-धूम’, ‘पुरुष-प्रिया’, ‘पावस-गीत’, ‘कत्तिन का गीत’, ‘कालिदास’, ‘सावन में’, ‘भ्रमरी’, ‘रहस्य’, ‘शेष गान’ आदि रचनाएँ अपनी प्रांजल प्रवाहमयी भाषा, उच्चकोटि के छन्द विधान और सहज भाव-सम्प्रेषण के कारण इस संग्रह के प्राण-तत्त्व की तरह हैं, जो पढ़नेवाले की स्मृति में रच-बस जाती हैं।
वस्तुत: ‘रसवन्ती’ दिनकर के अन्वेषी मन की विशिष्ट और अविस्मरणीय कृति है।
Ghazal Dasta
- Author Name:
Muzaffer Hanafi
- Book Type:

- Description: This book has no description
Neel Gagan Ki Or
- Author Name:
Kunjilal Soni Kanchan
- Book Type:

- Description: Book
Subhadra Samagra
- Author Name:
Subhadra Kumari Chauhan
- Book Type:

- Description: Subhadra Samagra
Rasoi Ki Khidki Mein
- Author Name:
Sunita Jain
- Book Type:

- Description: Poems by Sunita jain
Ant Anant
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
यह संकलन सम्पूर्ण निराला-काव्य का परिचय देने के लिए नहीं, बल्कि इस उद्देश्य से तैयार किया गया है कि इससे पाठकों को उसकी मनोहर तथा उदात्त झाँकी-भर प्राप्त हो, जिससे वे उसकी ओर आकृष्ट हों और आगे बढ़ें।
निराला की ख़ासियत क्या है? वे प्रचंड रूमानी होते हुए भी क्लासिकी हैं, भावुक होते हुए भी बौद्धिक, क्रान्तिकारी होते हुए भी परम्परावादी तथा जहाँ सरल हैं, वहाँ भी एक हद तक कठिन। उनकी अपनी शैली है, अपनी काव्य-भाषा। अभिव्यक्ति की अपनी भंगिमाएँ और मुद्राएँ।
यह सर्वथा स्वाभाविक है कि उनके निकट जानेवाले पाठकों से यह अपेक्षा की जाए कि उनका काव्यानुभव बच्चन, दिनकर या मैथिलीशरण गुप्त तक ही सीमित न हो। जब वे किंचित् प्रयासपूर्वक उक्त कवियों से हटकर उनके काव्य-लोक में प्रवेश करेंगे, तो पाएँगे कि उनकी तुलना में वे उनके ज़्यादा आत्मीय हैं।
निराला के प्रसंग में सरलता का यह मतलब क़तई नहीं है कि उनकी कविताएँ पाठकों के मन में बेरोक-टोक उतर जाएँ। कारण यह है कि उनके लिए काव्य-राचन सशक्त भावनाओं का मात्र अनायास विस्फोट नहीं था, बल्कि वे अपनी प्रत्येक कविता को किंचित् आयासपूर्वक पूरी बौद्धिक सजगता के साथ गढ़ते थे। स्वभावतः उनकी सम्पूर्ण अभिव्यकि कलात्मक अवरोध से युक्त है, जिसे ग्रहण करने के लिए थोड़ा धैर्य और श्रम आवश्यक है।
इस पुस्तक में निराला के काव्य-विकास की तीनों अवस्थाओं—पूर्ववर्ती, मध्यवर्ती और परवर्ती—की सौ चुनी हुई सरल कविताएँ संकलित की गई हैं, प्राय रचना-क्रम से। आरम्भिक दोनों अवस्थाओं में सृजन के कई-कई दौर रहे हैं, कविता और गीत के, जिसकी सूचना अनुक्रम से लेकर पुस्तक के भीतर सामग्री-संयोजन तक में दी गई है।
पाठक मानेंगे कि यह कविता की एक नई दुनिया है, अधिक आत्मीय और प्रत्यक्ष, जिसे भाषा सजाती नहीं बल्कि अपनी भीतरी शक्ति से खड़ी करती है।
Seepiyaan
- Author Name:
Javed Akhtar
- Rating:
- Book Type:

- Description: कबीर, तुलसी, वृंद, रहीम और बिहारी आदि कवियों ने सदियों पहले अपनी गहरी अन्तर्दृष्टि और मानव-स्वभाव की समझ की बुनियाद पर कुछ बातें कहीं, और इसके लिए उन्होंने कविता का जो रूप चुना, वह था—दोहा। दो पंक्तियों में गुँथी-गठी एक सम्पूर्ण कविता जो तीर की तरह जाकर हमारी चेतना में गड़ जाती है। सैकड़ों सालों से ये दोहे हमारे साथ रहते आए हैं, कभी ये हमें हमारी ख़ामियाँ दिखाते हैं, कभी हमारे रहबर बन जाते हैं, और कभी कोई ऐसा सच बता जाते हैं जिसे हमारी दुनियावी निगाह देखकर भी नहीं देखती। ‘सीपियाँ’ में जावेद अख़्तर ने ऐसे ही कुछ दोहों को चुनकर उनके भीतर छिपे सत्य को आमफ़हम ज़बान में हर किसी के लिए सुलभ कर दिया है। जो बातें इनसे निकलकर आई हैं वे आज भी उतनी ही सच हैं, आज भी उतनी ही उपयोगी हैं, जितनी उस समय थीं, और आगे भी उतनी ही सार्थक रहेंगी। जावेद अख़्तर हमारी आज की रोज़मर्रा ज़िन्दगी से उन्हें जोड़ते हैं और बताते हैं कि कैसे उन पर अमल करके, उनसे मिलनेवाली सीख को अपनाकर हम ख़ुद को बेहतर इनसान और अपनी दुनिया को एक बेहतर समाज बना सकते हैं।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book