Fati Hatheliyan
Author:
Neha NarukaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Poetry0 Ratings
Price: ₹ 159.2
₹
199
Available
नेहा नरूका की कविताओं में भारतीय राजनीति के नवीन संस्करणजन्य भय और आशंकाएँ विन्यस्त हैं। वे रेखांकित करती हैं कि इस सदी में, ख़ासतौर पर पिछले दशक में राजनीति ने किस-किस तरह समाज को, जनचेतना को संक्रमित और प्रदूषित करने के उपक्रम किए हैं। उसके अक्स आम जीवन की दिनचर्या, विचार-प्रक्रिया, प्रेमिलता और सहजीविता पर नाख़ूनों की गहरी खरोंचों की तरह आए हैं। इनकी त्रासदियाँ सहज मानवीय जीवन की आकांक्षा को नाना प्रकार चोटिल कर सकती हैं, उसके विचलित करनेवाले, मार्मिक ब्योरे यहाँ दर्ज हैं। वे इन कविताओं में संचित आवेग, प्रतिवाद और पीड़ाजन्य क्रोध में समेकित हैं। हम देख सकते हैं कि काली राजनीति से गाढ़े होते इस सामाजिक अन्धकार में नेहा संवेदित स्पर्श और दृष्टि-सम्पन्नता से अपनी कविता अग्रसर करती हैं।</p>
<p>तमाम तरह के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दुराचारों से लथपथ इस समय में घर के बाहर और भीतर जितने अत्याचार और ख़तरे हैं, वे नेहा की कविताओं के प्रस्थान-बिन्दु हैं। ये कविताएँ एक रचनाकार की तकलीफ़ और तलछट के साक्षात जीवनानुभवों से निसृत हैं। इनसे गुज़रते हुए निम्न-मध्यवर्गीय, निम्नवर्गीय और वंचित जीवन के बारीक फ़र्क़ को बेहतर समझा जा सकता है, हिन्दी कविता में इधर जिसका संज्ञान दुर्लभ हो गया है। स्त्रियों पर आरोपित अन्धविश्वासों, धार्मिक पाखंड से सनी कुरीतियों पर सीधे प्रश्नों की तीक्ष्णता इन्हें अधिक प्रभावी बनाती है। प्रेम पर लिखते हुए वे समाज में व्याप्त विषमताओं और अन्तर्विरोधों पर लगातार निगाह रखती हैं।</p>
<p>यहाँ स्त्रीवाद की जिरहें, पितृसत्तात्मकता, स्त्री-निर्मिति आदि के पहलू रोज़मर्रा की मुश्किलों और समझ से प्रेरित हैं। जहाँ वे इंगित कर सकती हैं कि व्यापक सुख व्यापक संवेदनहीनता में बदल रहे हैं। स्त्री की व्यथा स्त्री-कथा में बदल गई है। प्रकारान्तर से स्त्री-दशा की बृहत् तस्वीर बनती चली जाती है। इस हेतु वे तथाकथित वांछित काव्यात्मकता या लयकारी के बरअक्स उस ज्ञानात्मक संवेदित गद्य में कविता मुमकिन करती हैं जो समकालीन कविता का हासिल है। ये कविताएँ आँसुओं की नहीं सवालों की झड़ी लगाती हैं, एक सजग स्त्री, नागरिक की तरफ़ से आरोप-पत्र दाख़िल करती हैं। बाध्यकारी नैतिकताओं और पवित्रताओं को प्रश्नांकन के दायरे में लेती हैं। पहले ही कविता-संग्रह में यह सब देखना सुखद है, स्वागतेय है।</p>
<p><strong>—कुमार अम्बुज</strong>
ISBN: 9788119835652
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Ed. Shiromani Mahto +2
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- Description: झारखंड के 24 कवियों का यह संकलन कई दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। संकलन में शामिल लगभग सभी कवि बहुत पहले से ही अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करने के लिए जाने जाते रहे हैं। स्मृति-निर्मित प्रत्ययों के माध्यम से अनुभव को विस्तार देने के कारण अनिता वर्मा और ज्ञानात्मक संवेदन की गहराई के कारण अनिल अनलहातु की कविताएँ ध्यान खींचती रही हैं। इसी तरह, उसमें शामिल अन्य सभी चर्चित कवियों—अशोक सिंह, बलभद्र, सुशील कुमार, नीलोत्पल रमेश, अनिल किशोर सहाय, नरेश अग्रवाल, विनय सौरभ, अनिता रश्मि, सुषमा सिन्हा, नीरज नीर आदि की कविताओं में भी औरों से कुछ अलग कहने और दिखने की कोशिश दिखाई देती है। रश्मि शर्मा और अखिलेश्वर पांडेय भी अपने समय के यथार्थ को देखने के नए नज़रिए और संवेदना की बनावट के कारण आकर्षित करते हैं। हालाँकि, इनमें से कुछ कवि भले ही झारखंड के रहवासी हो गए हों, कविता में प्रवासी ही बने हुए हैं। उनकी काव्यभाषा में भी भोजपुरी, मगही, अंगिका आदि की सुगंध है; नगपुरिया, खोरठा, पंचपरगनिया और कुर्माली से उनका रिश्ता बन नहीं पाया है। इसलिए भी यह दुहराना पड़ रहा है कि इस संकलन की खास पहचान आदिवासी कवियों से ही बनती है। वैसे झारखंड की अपनी औद्योगिक संस्कृति भी है, लेकिन इस्पात की धमन-भट्ठियों और कोयला खदानों मेें कार्य करनेवाले मज़दूरों के कठिन संघर्ष पर कविताएँ आश्चर्यजनक रूप से इसमें नहीं हैं। इस छोटी-सी कमी के बाद भी, इसकी विविधता और व्यापकता सराहनीय है। इससे झाारखंड की रचनाशीलता को गति मिलेगी। संपादक त्रयी में एक शिरोमणि महतो तो कवि हैं, लेकिन उनके दो कविता-प्रेमी शिक्षक सहयोगी सुभाष कुमार यादव और राजेश कुमार विशेष बधाई के पात्र हैं। —मदन कश्यप
Jangal Mein Jheel Jagati
- Author Name:
Haribhajan Singh
- Book Type:

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Description:
आधुनिक पंजाबी कविता में अपनी तरह के अकेले कवि हरिभजन सिंह की कविताओें के इस संकलन को उनकी प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन भी कहा जा सकता है। उनके पहले कविता-संग्रह ‘लासां’ (1956) से लेकर ‘मत्था दीवे वाला’ (1982) तक के सात संग्रहों से चुनी गईं ये कविताएँ उनके कवि-व्यक्तित्व को काफ़ी कुछ सामने ले आती हैं। साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत ‘ना धुप्पे ना छाँवे’ शीर्षक संग्रह की कविताएँ भी इस पुस्तक में संकलित हैं।
गहरे अर्थों में सामाजिक और स्वानुभूति के प्रति अत्यन्त सजग उनके कवि-व्यक्तित्व के बारे में इस चयन की सम्पादक गगन गिल ठीक ही कहती हैं कि उनकी अधिकांश कविता आत्मालाप होते हुए भी अकेले आदमी की कविता नहीं, उसमें कोई है, जो सदा उपस्थित है।
हरिभजन सिंह की कविता में व्यक्ति-मन से टकराते सामाजिक आलोड़न की प्रतिध्वनियाँ इतने प्रामाणिक रूप में सुनाई देती हैं कि स्वातंत्र्योत्तर भारत की आधी सदी का मोटा-मोटी एक ख़ाका हमारी चेतना में बन जाता है—ख़ाका उस यातना का जिसे इतिहास नहीं, कविता ही समझ और प्रकट कर सकती है। बांग्लादेश निर्माण के दौरान बहा ख़ून, आपातकाल, पंजाब का उग्रवाद, ऑपरेशन ब्लूस्टार और परमाणु हथियारों जैसी हर पल मौजूद विपदा को उन्होंने अपनी कविताओं में लगातार सम्बोधित किया है।
वे आवेग के कवि नहीं हैं, उनकी कविता रुककर अपने समय की पड़ताल करती है, और इस तरह उनका सघन और चिन्तनशील मनीषी काव्य-मन एक दीर्घकालीन प्रभाव के रूप में हम तक पहुँचता है।
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