Ga Hamari Zindagi Kuchha Ga
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इस संग्रह में संकलित रचनाओं को पढ़ते हुए लक्षित किया जा सकता है कि ये ‘ग्राम-अभ्युदय’ की कामनाओं से जुड़ी हैं। गांधी जी ने जिस आख़िरी आदमी के आशीर्वाद की कामना और जिस आदमी के लिए ‘स्वराज्य’ की बात की थी, ग्राम-अभ्युदय का सरोकार उससे था। अंग्रेज़ों ने इसी आदमी को गरिमाविहीन कर दिया था। राष्ट्रनेताओं ने इसी के अर्ध-नग्न शरीर के लिए सूत काता था। मैथिलीशरण गुप्त ने उल्लसित होकर कहा था—‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है’ और पन्त ने असीम अनुराग के साथ लिखा—‘भारत माता ग्रामवासिनी’। ये वे दिन हैं जब ‘गाँव और किसान’ अर्थशास्त्र के केन्द्र में थे। इन दिनों की तरह संवेदनाहीन ‘आत्महत्याओं’ की चर्चा के केन्द्र में <br />नहीं।</p> <p>इन गीतों में उस चिरन्तन आशावाद से रचा-बुना सपना है जो सब समतावादियों और उनके शुभचिन्तकों का रहा है। अभिधाप्रधान गीतों में उस नए समाज, नई संस्कृति, समय के सुदिनों की भविष्यवाणी भी है जिससे राजस्थान में व्यापक जनाधार के लिए लेखन शुरू होता है। कुछ गीतों, चतुष्पदियों में प्रेम की उदास विफलताओं का विषाद भी है—‘आज यूँ लगा कि दे न कुछ सका, और यूँ कि शेष कुछ न पास है।’ लेकिन इस विषाद की परतों को उधेड़ती बसन्त की नई कोंपल की तरह यह सुखद प्रतिज्ञा याद आ जाती है ‘मैं कहाँ भूला कि लाना है मुझे नव प्रात’।</p> <p>‘नया’ इन कविताओं का बीज शब्द है जो बार-बार आता है। स्वयं कवि के शब्दों में—‘नया शब्द मेरे लिए औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का प्रतीक था...। मेरे लिए नए का अर्थ था शोषण-मुक्त व्यवस्था, सामन्तों के उत्पीड़न से छुट्टी, प्रेम करने की आज़ादी, लोकतंत्र इत्यादि।’</p> <p>इसी नए का आह्वान करती ये कविताएँ काव्य-प्रेमी पाठकों को एक विशिष्ट आस्वाद से परिचित कराएँगी।
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इस संग्रह में संकलित रचनाओं को पढ़ते हुए लक्षित किया जा सकता है कि ये ‘ग्राम-अभ्युदय’ की कामनाओं से जुड़ी हैं। गांधी जी ने जिस आख़िरी आदमी के आशीर्वाद की कामना और जिस आदमी के लिए ‘स्वराज्य’ की बात की थी, ग्राम-अभ्युदय का सरोकार उससे था। अंग्रेज़ों ने इसी आदमी को गरिमाविहीन कर दिया था। राष्ट्रनेताओं ने इसी के अर्ध-नग्न शरीर के लिए सूत काता था। मैथिलीशरण गुप्त ने उल्लसित होकर कहा था—‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है’ और पन्त ने असीम अनुराग के साथ लिखा—‘भारत माता ग्रामवासिनी’। ये वे दिन हैं जब ‘गाँव और किसान’ अर्थशास्त्र के केन्द्र में थे। इन दिनों की तरह संवेदनाहीन ‘आत्महत्याओं’ की चर्चा के केन्द्र में <br />नहीं।</p>
<p>इन गीतों में उस चिरन्तन आशावाद से रचा-बुना सपना है जो सब समतावादियों और उनके शुभचिन्तकों का रहा है। अभिधाप्रधान गीतों में उस नए समाज, नई संस्कृति, समय के सुदिनों की भविष्यवाणी भी है जिससे राजस्थान में व्यापक जनाधार के लिए लेखन शुरू होता है। कुछ गीतों, चतुष्पदियों में प्रेम की उदास विफलताओं का विषाद भी है—‘आज यूँ लगा कि दे न कुछ सका, और यूँ कि शेष कुछ न पास है।’ लेकिन इस विषाद की परतों को उधेड़ती बसन्त की नई कोंपल की तरह यह सुखद प्रतिज्ञा याद आ जाती है ‘मैं कहाँ भूला कि लाना है मुझे नव प्रात’।</p>
<p>‘नया’ इन कविताओं का बीज शब्द है जो बार-बार आता है। स्वयं कवि के शब्दों में—‘नया शब्द मेरे लिए औपनिवेशिक दासता से मुक्ति का प्रतीक था...। मेरे लिए नए का अर्थ था शोषण-मुक्त व्यवस्था, सामन्तों के उत्पीड़न से छुट्टी, प्रेम करने की आज़ादी, लोकतंत्र इत्यादि।’</p>
<p>इसी नए का आह्वान करती ये कविताएँ काव्य-प्रेमी पाठकों को एक विशिष्ट आस्वाद से परिचित कराएँगी।
Book Details
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ISBN9788126720309
-
Pages95
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह संग्रह अपनी कविताओं के तीव्र आवेग, भाव–विविधता एवं वस्तु–बहुलता के कारण महत्त्वपूर्ण माना जाएगा। बोधिसत्व की कविताएँ मानो अनेक नदियों का संगम हैं। लोकगीतों की ऊष्मा तथा रागात्मकता, वर्तमान जीवन के ‘दुख–तंत्र’ की कठोर प्रतीति और वैचारिक दृढ़ता एवं प्रतिरोध—इन सबके संयोग से ये कविताएँ हमारे लिए एक वैकल्पिक पाठ की सृष्टि करती हैं। ‘हाहाकार के बीच से गुज़रती’ इन कविताओं में दर्ज हैं ‘बेनूर आँखों के ख़्वाब’, ‘सिले होंठों की मुस्कुराहट’ और ‘बँधे हाथों की छटपटाहट’। लोकगीत और बोलियों की शक्ति का उपयोग, जिसके लिए बोधिसत्व की आरम्भिक कविताएँ चिह्नित की गई थीं, उनका अद्यतन रूप यहाँ मिलता है, कुछ ज्वाया और सख़्त।
इनमें बेचैन कर देनेवाली ऐन्द्रिकता है—‘ताज़े आटे की गर्मी थी उसकी ख़ुशी/वसन्त उसके लिए अब उखड़े नाखून की तरह है’। एक विरल करुणा और क्रोध। इनमें जीवन के प्रति समर्थन और लालसा है जैसे कि ‘ऐसा ही होता है’ कविता में, जो साधारण मनुष्य के दैनंदिन प्रेम को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। ‘गंध’ शीर्षक कविता स्वयं बोधिसत्व की कविताओं में अलग से उल्लेखनीय है। यह एक बड़ी कविता है, हमारे जीवन की दारुण विपत्ति, विडम्बना एवं निजी और सामाजिक के सीमा–प्रदेश पर निरन्तर विद्यमान द्वन्द्व की कविता।
एक बात और—ये कविताएँ गहरे राजनैतिक आशय एवं नैतिक संकल्प की कविताएँ हैं। बोधिसत्व का ही शब्द लेकर कहें तो यह वह कविता है ‘जो समाज के हारे–गाढ़े काम दे’।
—अरुण कमल
Mohabbat Na Samaj Hoti Hai
- Author Name:
Wasim Barelvi
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This book (Mohabbat Naa Samajh Hotii Hai) brings together such works, where on one hand the hardships of our times are depicted, and on the other, glimpses of the unspoken aspects of Wasim Barelvi’s life can also be found. Wasim Barelvi was born on February 8, 1940, in Bareilly, Uttar Pradesh. He is considered one of the most renowned and admired poets of the present time. His poetry reflects deep emotions and feelings. In his verses, one can see both the pain of clashing Eastern and Western cultures as well as respect for traditions. His poetry also highlights the bitterness of life’s struggles and expresses an inner sorrow over today’s political attitudes.
Kavya Chayanika
- Author Name:
Pramod Kovaprath
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बिगड़ते पर्यावरण की समस्या आज मनुष्य के लिए भूख के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या है। भूख जिस तरह एक देह के अस्तित्व के लिए आसन्न ख़तरा होती है, उसी तरह पर्यावरण-विनाश सृष्टि के अस्तित्व के लिए होता है। एक-एक व्यक्ति के रूप में जी रहे हम लोगों की आँखों से वह ख़तरा भले ही इतने स्पष्ट और ठोस रूप में न दिखाई देता हो, और भले ही हम बीच-बीच में प्रकृति द्वारा दी जानेवाली चेतावनियों को नज़रअन्दाज़ करने की ढीठता भी जुटा लेते हों, लेकिन जल, ज़मीन, हवा और हरियाली का सतत क्षरित होता जीवन उन निगाहों से अनचीन्हा नहीं रह जाता जो प्रस्तुत उल्लास की झीनी चदरिया के पार दूर क्षितिज के धुँधलके में लिखी जा रही नाश-विनाश की पटकथाओं की पंक्तियाँ पढ़ लेती हैं, यानी कवियों और रचनाशील हृदयों की निगाहें। यह पुस्तक प्रकृति और कवि के इसी अपने, और समाज की रिश्तेदारियों के धोखादेह प्रपंच से परे, उनके निहायत पवित्र और निजी रिश्ते का दस्तावेज़ है। पाठकगण इस किताब को सरकारों और संस्थाओं के रस्मी पर्यावरण-प्रेम और शुष्क रुदन के काव्यानुवाद के रूप में न लें। यह समष्टि-मन के रचनाकुल और ईमानदार स्नायुओं की पीड़ाजनित प्रतिक्रियाओं का संकलन है जिसमें हिन्दी के नए-पुराने, वरिष्ठ, श्रेष्ठ और सजग रचनाकारों ने प्रकृति के साथ अपनी सम्बन्ध-यात्रा के सबसे चिन्तित क्षणों को वाणी दी है। संग्रह में एक सौ एक समकालीन कविताएँ और पैंतालीस कवि शामिल हैं। कौन छोटा है, कौन बड़ा है, यह सवाल अप्रासंगिक है। क्योंकि कविता का विषय महत्त्वपूर्ण है, समस्याओं की भयंकरता प्रासंगिक है। एक ही त्रासदपूर्ण मुद्दा सबके लिए महत्त्वपूर्ण है। सब में आशंकाएँ हैं तो साथ ही आशाएँ भी हैं। प्रकृति की आसन्न मृत्यु पर चीख़ने के बजाय प्रतिरोध खड़ा करना ये रचनाकार अपना दायित्व समझते हैं।
Sarkti Parchhaiyan
- Author Name:
Sudha Om Dhingra
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Book
Ishq Nama
- Author Name:
Khwaja Ruknuddin Ishq
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ख़्वाजा रुक्नुद्दीन इश्क़ के उर्दू कलाम का संग्रह "इश्क़-नामा" पहली बार हिंदी पाठकों के समक्ष आ रहा है, जिस में रुक्नुद्दीन इश्क़ द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध कलाम शामिल हैं। इसमें हम्द, नात और मंक़बत के अतिरिक्त ग़ज़लें और रुबाई, क़िताएँ शामिल हैं। किताब का संपादन रय्यान अबुलउलाई ने किया है।
Ujle Paron Ki Dhoop
- Author Name:
Shakeb Jalali
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ये किताब आधुनिक उर्दू ग़ज़ल के बेमिसाल शायर शकेब जलाली की ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह है। उनकी शायरी एक मुसलसल सफ़र की तरह है जिसमें कुछ मंज़र ख़ुशनुमा हैं तो कुछ हैरत-कुन और कुछ बे-इन्तिहा अफ़सुर्दा। उनके इज़हार की शैली बेहद अनोखी और नायाब है जिसमें क़ुदरत, रात-दिन, जंगल-सेहरा, बहार-ख़िज़ाँ सहित सारे नुमाइन्दा इस्तियारे जलवा-नुमा नज़र आते हैं। ये किताब उर्दू ग़ज़ल के नौजवान पाठकों को काफ़ी पसन्द आएगी।
Harivansh Ray Bachchan Rachana Sanchayan
- Author Name:
Harivansh Rai Bachchan
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An anthology of the writings of modern Hindi writer Harivansh Rai Bachchan, compiled and edited by Ajit Kumar.
Jogiya Rang ki Bahar
- Author Name:
Shah Turab Ali Qalandar
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शाह तुराब अली क़लंदर के फ़ारसी, उर्दू और हिन्दवी कलाम का संग्रह "जोगिया रंग की बहार" पहली बार हिंदी पाठकों के समक्ष आ रहा है, जिस में शाह तुराब द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध कलाम शामिल हैं. इसमें हम्द, ना'त और मंक़बत के अतिरिक्त ग़ज़लें, बसंत, होली, गीत और बाबुल शामिल हैं। किताब का संपादन सुमन मिश्र ने किया है।
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