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‘पल्लव’ बिलकुल नए काव्य-गुणों को लेकर हिन्दी-साहित्य जगत में आया...पंत में कल्पना शब्दों के चुनाव से ही शुरू होती है। छन्दों के निर्वाचन और परिवर्तन में भी वह व्यक्त होती है। उसका प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली है। इसके साथ जब प्रकृति और मानव-सौन्दर्य के प्रति कवि के बालकोचित औत्सुक्य और कुतूहल के भावों का सम्मिलन होता है तो ऐसे सौन्दर्य की सृष्टि होती है जो पुराने काव्य के रसिकों के निकट परिचित नहीं होता। कम संवेदनशील पुराने सहृदय इस नई कविता से बिदक उठे थे और अधिक संवेदनशील सहृदय प्रसन्न हुए थे। पल्लव के भावों की अभिव्यक्ति में अद्भुत सरलता और ईमानदारी थी। कवि बँधी रूढ़ियों के प्रति कठोर नहीं है, उसने उनके प्रति व्यंग्य और उपहास का प्रहार नहीं किया, पर वह उनकी बाहरी बातों की उपेक्षा करके अन्तराल में स्थित सहज सौन्दर्य की ओर पाठक का ध्यान आकृष्ट करता है। मनुष्य के कोमल स्वभाव, बालिका के अकृत्रिम प्रीति-स्निग्ध हृदय और प्रकृति के विराट और विपुल रूपों में अन्तर्निहित शोभा का ऐसा हृदयहारी चित्रण उन दिनों अन्यत्र नहीं देखा गया।’’</p> <p> —आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
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‘पल्लव’ बिलकुल नए काव्य-गुणों को लेकर हिन्दी-साहित्य जगत में आया...पंत में कल्पना शब्दों के चुनाव से ही शुरू होती है। छन्दों के निर्वाचन और परिवर्तन में भी वह व्यक्त होती है। उसका प्रवाह अत्यन्त शक्तिशाली है। इसके साथ जब प्रकृति और मानव-सौन्दर्य के प्रति कवि के बालकोचित औत्सुक्य और कुतूहल के भावों का सम्मिलन होता है तो ऐसे सौन्दर्य की सृष्टि होती है जो पुराने काव्य के रसिकों के निकट परिचित नहीं होता। कम संवेदनशील पुराने सहृदय इस नई कविता से बिदक उठे थे और अधिक संवेदनशील सहृदय प्रसन्न हुए थे। पल्लव के भावों की अभिव्यक्ति में अद्भुत सरलता और ईमानदारी थी। कवि बँधी रूढ़ियों के प्रति कठोर नहीं है, उसने उनके प्रति व्यंग्य और उपहास का प्रहार नहीं किया, पर वह उनकी बाहरी बातों की उपेक्षा करके अन्तराल में स्थित सहज सौन्दर्य की ओर पाठक का ध्यान आकृष्ट करता है। मनुष्य के कोमल स्वभाव, बालिका के अकृत्रिम प्रीति-स्निग्ध हृदय और प्रकृति के विराट और विपुल रूपों में अन्तर्निहित शोभा का ऐसा हृदयहारी चित्रण उन दिनों अन्यत्र नहीं देखा गया।’’</p>
<p> —आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
Book Details
-
ISBN9788126718665
-
Pages156
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Rahat Indori's poetic style is known for its boldness, simplicity, and emotional intensity. His ghazals often revolve around themes of love, social issues, and patriotism. Filled with deep emotions and a strong connection to the common man, his poetry is widely appreciated by the masses. Despite its simplicity, his writing was impactful, conveying profound meanings in straightforward words. Rahat Indori primarily wrote in the traditional ghazal form, a significant genre of urdupoetry, but he added a contemporary twist to it. His ghazals often reflected a modern perspective and addressed contemporary issues. His work continues to inspire readers and audiences worldwide. Rahat Indori’s full name was Rahatullah Qureshi. He was born on January 1, 1950, in Indore. His father’s name was Rifatullah Qureshi, and his mother’s name was Maqbool-un-Nisa Begum. He earned a B.A. degree in urdufrom Devi Ahilya University, Indore, an M.A. in urduLiterature from Awadh University, and a Ph.D. (on urduMushaira) from M.P. Bhoj University. For 16 years, he served as a professor of urduliterature at I.K. College, Devi Ahilya University, Indore. He was also the editor of the urduquarterly magazine Shaakhein for 10 years. Several researchers in Indian and Pakistani universities have completed their Ph.D. degrees on Dr. Rahat Indori's life and works. His ghazals are included in the urducurriculum for classes 9 and 11 of the Maharashtra State Board. राहत इंदौरी की काव्यशैली को उसकी साहसिकता, सरलता और भावनात्मक तीव्रता के लिए जाना जाता है। उनकी ग़ज़लें अक्सर प्रेम, सामाजिक मुद्दों, और देशभक्ति जैसे विषयों से जुड़ी होती है। उनकी ग़ज़लें गहरी भावनाओं से भरी हुई हैं और आम आदमी से जुड़ी हुई भी हैं, जिससे उनको आम लोगों के बीच सराहा जाता है। उनका लेखन आसान होने के बावजूद असरदार था, जिसमें गहरे अर्थ को सीधे शब्दों में व्यक्त किया गया था। राहत इंदौरी मुख्य रूप से पारम्परिक ग़ज़ल शैली में लिखते थे, जो उर्दू कविता का एक ख़ास रूप है, लेकिन उन्होंने इसमें समकालीन ट्विस्ट दिया। उनकी ग़ज़लें अक्सर आधुनिक दृष्टिकोण से जुड़ी होती थीं, जो समकालीन मुद्दों को पेश करती थीं। उनका काम आज भी पाठकों और श्रोताओं को दुनिया भर में प्रेरित करता है। “राहत इंदौरी” का पूरा नाम राहतुल्लाह क़ुरैशी था। उनका जन्म 01/01/1950 को इंदौर में हुआ। उनके पिता का नाम रिफ़त-उल्लाह क़ुरैशी और माँ का नाम मक़बूल-उन-निसा बेगम था। उन्होंने बी.ए. उर्दू की डिग्री देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी, इंदौर से, एम.ए. उर्दू साहित्य की डिग्री अवध यूनिवर्सिटी से और पीएच.डी. (उर्दू में मुशायरा) की डिग्री एम.पी. भोज यूनिवर्सिटी से हासिल की। इंदौर स्थित आई.के. कॉलेज, देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी में 16 वर्षों तक उर्दू साहित्य के प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य किया। इंदौर से प्रकाशित उर्दू तिमाही पत्रिका “शाख़ें” के 10 वर्षों तक सम्पादक रहे। कई भारतीय और पाकिस्तानी विश्वविद्यालयों में डॉ. राहत इंदौरी के जीवन और कृतियों पर शोध करने वाले शोधकर्ताओं ने पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की है। डॉ. राहत इंदौरी की ग़ज़लें महाराष्ट्र राज्य बोर्ड के कक्षा 9 और 11 के उर्दू पाठ्यक्रम में शामिल हैं। Main Zinda Hoon - Rahat Indori Kulliyat Dive into the world of Rahat Indori with "Main Zinda Hoon," a comprehensive Kulliyat (Complete Works) that brings together the finest of his poetic creations. This remarkable compilation offers readers an immersive experience of Indori's profound verses, reflecting his bold voice, emotional depth, and unyielding spirit. From verses that ignite a sense of rebellion to tender expressions of love and longing, "Main Zinda Hoon" captures the essence of Rahat Indori’s literary legacy. A must-have for poetry enthusiasts and fans of urduliterature, this collection is a tribute to the enduring brilliance of one of India’s most celebrated poets.
Ishqnama
- Author Name:
Khwaja Ruknuddin Ishq
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इस किताब में ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ के प्रसिद्ध फ़ारसी और उर्दू कलाम का संग्रह किया गया है. सूफ़ी-संतों के कलाम जनमानस में लोकप्रिय तो रहे हैं, लेकिन हिन्दी के पाठकों को इन्हें पढ़ने का अवसर कभी नहीं मिला. हिंदी पाठकों के लिए पहली बार ख़्वाजा रुकनुद्दीन इश्क़ का कलाम देवनागरी में पेश किया जा रहा है. इस किताब के संपादक रय्यान अबुल
उलाई हैं.
Kavita Se Lambi Kavita
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla
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अपने असाधारण मितकथन के लिए विनोद कुमार शुक्ल समकालीन साहित्यिक परिदृश्य में इतने विख्यात हैं कि कइयों को उनकी इतनी सारी लम्बी कविताएँ देखकर थोड़ा अचरज हो सकता है। अपेक्षाकृत अधिक व्यापक फलक को समेटती हुई ये कविताएँ, फिर भी, उनके संयम और काव्य–कौशल की ही उपज हैं। उनका भूगोल किसी भी तरह से स्फीति नहीं, विस्तार है। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि अपने प्रथम प्रस्तोता गजानन माधव मुक्तिबोध के शिल्प का विनोद कुमार शुक्ल अपने ढंग से पुनराविष्कार कर रहे हैं।
वहीं खड़े–खड़े मेरी जगह निश्चित हुई
थोड़ी हुई
ज़्यादा नहीं हुई।
एक ऐसे संसार और समय में जहाँ प्राय: सभी अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा की चाह करते और न पाकर दुखी होते रहते हैं, विनोद ‘थोड़े–से’ को ही टटोलने और उसी को अपनी निश्चित जगह मानकर उससे अपने समय को ज़्यादा से ज़्यादा पकड़ते–समझते रहते हैं। उनकी कविता हमारी समझ और संवेदना, जो होता है उसके लिए हमारी ज़िम्मेदारी के अहसास को बढ़ानेवाली कविता है। वह हम पर अपना बोझ नहीं डालती और न ही किसी नैतिक ऊँचाई से हमें आतंकित करने की चेष्टा करती है। उसमें आत्मदया नहीं, बेबाकी है : दोषारोपण नहीं, आत्मालोचन है। वह हमारी सहचारी कविता है और हर समय उसे पढ़ते हुए हम इस विस्मय से भर जाते हैं कि वह हमसे हमारी तकलीफ़, संघर्ष, बेचारगी और ज़िम्मेदारी की कथा कहती है और ऐसे कि कवि और हम दोनों का ही वह जैसे शामिलात खाता है। लम्बी कविताओं का यह संकलन हिन्दी कविता की निश्चय ही शताब्दी के अन्त पर एक नई उपलब्धि है।
—अशोक वाजपेयी।
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