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संजय चतुर्वेदी बगैर लाग-लपेट के अपनी बात कहने वालों में से हैं। जहाँ उन्होंने अपने चाहने वालों को हमेशा मोहब्बत बख्शी है वहीं हर विरोध को विनम्रता से स्वीकार भी किया है। वे कहते हैं कि 'सदियों के मतान्तर का कोलाहल हमारे फूलों की घाटी है'। इन सब के ऊपर संजय चतुर्वेदी ने कहन का एक ऐसा मुहावरा तैयार किया है जो उन्हें अपने समकालीनों में अद्वितीय बनाता है। अथक श्रम से हासिल किए गए अपने भाषा-वैविध्य और छंद-ज्ञान के साथ उन्होंने लगातार असंभव प्रयोग किये हैं। इन प्रयोगों की अविश्वसनीय परिधि को देखने के लिए हमें उनकी और भी बहुत सी कविताओं की ओर जाना होगा। उनकी एक पुरानी कविता 'पतंग' में एक बड़ी यादगार छवि आती है। कटी हुई पतंग लूटने को अपनी लग्गियाँ लेकर 'घास, हवा और ज़मीन से' निकले बच्चे 'सर्र से निकल जाते हैं सूरज के सामने से/ तेज़ भागती गाडिय़ों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से'। इस एक छवि में पिछले चार दशकों की संजय चतुर्वेदी की कविता के उत्तरोत्तर विकसित होते जाने के बीज देखे जा सकते हैं। उनकी तमामतर रचनाएँ पैने तर्कों और बेहतरीन भाषा की मदद से बनाई गई लग्गियाँ हैं जिनके सहारे वे कविता के आसमान की बोझिल खामोशी में लगातार खलल डालते रहे हैं। अपने परिवेश और उसकी ढहती-बनती आस्थाओं-परम्पराओं को गौर से देख रहा यह कवि विज्ञान और आधुनिकता की चेतना से लैस है। वह सतत प्रत्यक्ष और परोक्ष यात्राओं में रत रहता है और अपनी निगाह को कभी धुंधला नहीं पडऩे देता। —अशोक पाण्डे
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संजय चतुर्वेदी बगैर लाग-लपेट के अपनी बात कहने वालों में से हैं। जहाँ उन्होंने अपने चाहने वालों को हमेशा मोहब्बत बख्शी है वहीं हर विरोध को विनम्रता से स्वीकार भी किया है। वे कहते हैं कि 'सदियों के मतान्तर का कोलाहल हमारे फूलों की घाटी है'। इन सब के ऊपर संजय चतुर्वेदी ने कहन का एक ऐसा मुहावरा तैयार किया है जो उन्हें अपने समकालीनों में अद्वितीय बनाता है। अथक श्रम से हासिल किए गए अपने भाषा-वैविध्य और छंद-ज्ञान के साथ उन्होंने लगातार असंभव प्रयोग किये हैं। इन प्रयोगों की अविश्वसनीय परिधि को देखने के लिए हमें उनकी और भी बहुत सी कविताओं की ओर जाना होगा। उनकी एक पुरानी कविता 'पतंग' में एक बड़ी यादगार छवि आती है। कटी हुई पतंग लूटने को अपनी लग्गियाँ लेकर 'घास, हवा और ज़मीन से' निकले बच्चे 'सर्र से निकल जाते हैं सूरज के सामने से/ तेज़ भागती गाडिय़ों और टेनिस खेलकर लौटती औरतों के सामने से'। इस एक छवि में पिछले चार दशकों की संजय चतुर्वेदी की कविता के उत्तरोत्तर विकसित होते जाने के बीज देखे जा सकते हैं। उनकी तमामतर रचनाएँ पैने तर्कों और बेहतरीन भाषा की मदद से बनाई गई लग्गियाँ हैं जिनके सहारे वे कविता के आसमान की बोझिल खामोशी में लगातार खलल डालते रहे हैं। अपने परिवेश और उसकी ढहती-बनती आस्थाओं-परम्पराओं को गौर से देख रहा यह कवि विज्ञान और आधुनिकता की चेतना से लैस है। वह सतत प्रत्यक्ष और परोक्ष यात्राओं में रत रहता है और अपनी निगाह को कभी धुंधला नहीं पडऩे देता। —अशोक पाण्डे
Book Details
-
ISBN9789388799690
-
Pages128
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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वे न मनु थे न आदम/ग्रन्थों की गढ़ी हुई छवियों के बाहर/वे केवल और केवल चरवाहे थे। यह एक चरवाहे का गीत है जो सभ्यता के समानान्तर बजते हुए एक अपनी दुनिया का दावा पेश कर रहा है—उस सभ्यता के बरक्स जिसमें चारागाह दफ़्न होते जा रहे हैं। यह सभ्यता की आलोचना नहीं बल्कि प्रकृति के साहचर्य में जीती उस दुनिया का स्मरण है जो अगर अपने ही रास्ते आगे बढ़ती तो वैसी न होती जैसी आज हमारी यह दुनिया है। इन कविताओं को पढ़ते हुए अग्रगामिता की किसी वैकल्पिक सरणि का अभाव हमें लगातार विचलित करता है। हिंसा के नवीनतम दृश्यों की आदी होती आँखें जो कुछ भी देखने की तैयारी कर चुकी हैं, हमारे वर्तमान की आँखें हैं, जिनके लिए अद्यतित होने का अर्थ है और अधिक संवेदनशून्य होना, और भी भीषण को पचा लेने को प्रस्तुत रहना। ये कविताएँ इस प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से देखती हैं, और कहीं अपनी सावधानी को ढीला नहीं होने देतीं। तकनीक के आधुनिक युवा संसार की सत्ता को लेकर भी ये कविताएँ कम सजग नहीं हैं— मेरे मनुष्य के सामने तुमसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, पुरखा कवियो!/यहाँ मनुष्य बनाम मनुष्य नहीं, मशीन है। ऐन्द्रीय स्पर्श के दिन-ब-दिन संकीर्ण और सपाट होते जाने के मुकाबले प्रेम यहाँ एक उम्मीद की तरह आता है, लेकिन क्या वह भी हमारी पहुँच में है, मशीनों की इस्पाती निस्पन्द धवल चौंध को चीरकर क्या उस तक हमारा वह आर्त स्वर पहुँच पाता है जिसके सामने ‘कभी सूर्योदय न होनेवाली रात’ किसी भी दिन आ खड़ी होगी! आशंका जो मौजूदा समय की निर्मिति के अभिन्न हिस्से के रूप में हमारे चारों ओर उपस्थित है, इन कविताओं में बार-बार लौटती है। यह इस युवा कवि की सूक्ष्म संवेदना का प्रमाण है और सामाजिक-राजनीतिक बोध का भी जिसका एक सिरा जरूरी तौर पर तकनीक के आतंक से जा जुड़ता है जो अब मनुष्य को सामने से नहीं, ऊपर से देख रही है—देवता की तरह। पेड़ों, पशुओं और पत्तियों की भाषा से लेकर मशीनों की चीख तक को सुनतीं ये कविताएँ पाठक को निःसन्देह एक भिन्न धरातल पर ले जाएँगी।
Main Jab Tak Aayi Bahar
- Author Name:
Gagan Gill
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‘मैं क्यों कहूँगी तुम से/अब और नहीं/सहा जाता/मेरे ईश्वर’—गगन गिल की ये काव्य-पंक्तियाँ किसी निजी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति हैं या हमारे समय के दर्द का अहसास भी? और जब यह पीड़ा अपने पाठक को संवेदित करने लगती है तो क्या वह अभिव्यक्ति प्रकारान्तर से प्रतिरोध की ऐसी कविता नहीं हो जाती, जिसमें ‘दर्दे-तनहा’ और ‘ग़मे-ज़माना’ का कथित भेद मिटकर ‘दर्दे-इनसान’ हो जाता है? कविता इसी तरह इतिहास अर्थात समय का काव्यान्तरण सम्भव करने की ओर उन्मुख होती है।
गगन गिल की इन आत्मपरक-सी लगती कविताओं के वैशिष्ट्य को पहचानने के लिए मुक्तिबोध के इस कथन का स्मरण करना उपयोगी हो सकता है कि कविता के सन्दर्भ ‘काव्य में व्यक्त भाव या भावना के भीतर से भी दीपित और ज्योतित’ होते हैं, उनका स्थूल संकेत या भाव-प्रसंगों अथवा वस्तु-तथ्यों का विवरण आवश्यक नहीं है। इन कविताओं का अनूठापन इस बात में है कि वे एक ऐसी भाषा की खोज करती हैं, जिसमें सतह पर दिखता हल्का-सा स्पन्दन अपने भीतर के सारे तनावों-दबावों को समेटे होता है—बाँध पर एकत्रित जलराशि की तरह।
यह भी कह सकते हैं कि ये कविताएँ प्रार्थना के नये-से शिल्प में प्रतिरोध की कविताएँ हैं—प्रतिरोध उस हर सत्ता-रूप के सम्मुख जो मानवत्व मात्र पर, स्त्रीत्व पर भी, आघात करता है। इन आघातों का दर्द अपने एकान्त में सहने पर ही कवि-मन पहचान पाता है कि ‘मैं जब तक आयी बाहर एकान्त से अपने/बदल चुका था मर्म भाषा का’। ये कविताएँ काव्य-भाषा को उसकी मार्मिकता लौटाने की कोशिश कही जा सकती हैं।
—नन्दकिशोर आचार्य
Dhoop Ka Tukda
- Author Name:
Amrita Preetam +1
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अमृता प्रीतम की कविताओं में रमना, हृदय में कसकती व्यथा का घाव लेकर, प्रेम और सौन्दर्य की धूपछाँह-वीथी में विचरने के समान है, जहाँ वियोग तथा अतृप्ति के तीखे नुकीले काँटे भावना के सुकुमार चरणों को क्षत-विक्षत करते रहते हैं । ऐसी गहरी, दर्द में डूबी, प्राणिक संवेदनाओं के गीत कम ही देखने को मिलते हैं। अमृताजी धरती के जीवन के गीत भी गाती हैं । वह युग-संघर्ष के प्रति प्रबुद्ध होने के कारण प्रगतिशील भावधारा से प्रेरित हैं, किन्तु प्रेम के प्रति एकाग्र समर्पण ही उनकी जीवन-साधना तथा आत्म-विकास का एकान्त पथ है।
अमृताजी की कविताओं के अनुवाद से हिन्दी काव्य भाव-धनी, स्वप्न-संस्कृत तथा शिल्प-समृद्ध बनेगा। इन कविताओं से यह सहज ही प्रमाणित हो जाता है कि अमृताजी का स्थान पंजाबी ही नहीं, समस्त भारतीय भाषाओं में भी प्रथम श्रेणी के योग्य है । इस संग्रह से हिन्दी के नये कवियों को विशेष प्रेरणा मिलेगी। जिस गहरी भाव-संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा युग मानव की व्यथा का सच्चा चित्रण अमृताजी ने अपनी नारी-हृदय की जादू-तूली से इन कविताओं में किया है, वह उनकी कृति को एक अत्यन्त उच्च तथा व्यापक स्तर पर उठा देती है।
—सुमित्रानन्दन पंत
Aakash Dharti Ko Khatkhataata Hai
- Author Name:
Vinod Kumar Shukla +1
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विनोद कुमार शुक्ल समकालीन कविता के संसार में उन थोड़े से ऐसे कवियों में शुमार हैं जिन्होंने समकालीन कविता की दिशा और दृष्टि को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है। उनकी इस हैसियत को हिन्दी में लगभग सभी कवियों ने स्वीकार किया है।
काव्याभिव्यक्ति में मित कथनों का जितना सार्थक प्रयोग वे करते हैं, उतना शमशेर ही कर पाते थे। शब्दों को कम से कम ख़र्च करके कैसे अर्थ के भंडार को समेटा जाए इसे सीखने के लिए विनोद कुमार शुक्ल की कविता काम की चीज़ है।
उनकी कविता नितांत समसामयिक होकर भी समयातीत लगती है। वह पीछे भी देखती है और आगे भी, पर उल्लेखनीय बात यह है कि वह अपने समय में धँसी होने के बावजूद अपने समय में फँसती नहीं है। उनके काव्यबोध में जो अचूक क़िस्म की पारदर्शी सूक्ष्मता है, वह कई लोगों को जटिलता, रूपवाद, कलावाद का अवतार लगती है लेकिन रूपवादी कविता है नहीं। काव्य-प्रयोगों के लिए उनसे बड़ा कवि आज कम से कम हिन्दी में दिखाई नहीं देता
वे विचारधारा के पुल से होकर रास्ता तय करने वाले कवि नहीं हैं, बल्कि वे कविता की नदी को ख़ुद तैर कर पार करने वाले कवि हैं। कम से कम उनके लम्बे कवि-कर्म का संघर्ष यही प्रतिमान हमारे सामने रखता है। वे हिन्दी कविता के संसार में उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने चालू मुहावरे को तोड़कर अपनी कविता में संवेदना और काव्य-शिल्प के लिए अनोखा आयाम चुना है। अपनी काव्यभाषा के चुनाव में वे जितने विरल, संयमी और जागरूक कवि हैं, उतने कम ही कवि रहे हैं। यह उनकी चुनिन्दा कविताओं का संकलन है।
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